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डॉ. संदीप अवस्थी की कहानी – और अल्लाह देखे तो

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वह भाग रहा था पर भाग नहीं पा रहा था… बल्कि कंधा दबाए, दर्द से कराहते हुए गली में कही छुपने का आसरा ढूंढ रहा था। परिवार का पेट पालने दूर गांव से आया था और अब जैसे जान जा रही थी।  
भागते हुए उसने पीछे देखा वह बंदूक लिए अभी भी सड़क के दूसरी तरफ उसकी रेहड़ी के पास खड़ा था। दूर से एकबारगी तो उसे वह खुद के ही जैसा लगा। वही लाचारी, पशेमान चेहरा क्या करूं, क्या न करूं  की मजबूरी लिए। वैसे ही वह तब भी लगा था उसे जब गोलगप्पे खाते हुए उसके बीवी बच्चों के हालचाल पूछ रहा था। दूसरा ग्राहक खामोशी से पैसे निकाल रहा था। “यहां के अलावा कहीं और नहीं मिला काम धंधा? जो इतनी दूर चले आए?” 
उसने लहसुन के पानी वाले मर्तबान में आलू मसाला भरा गोलगप्पा डुबोया और उसके दोने में रखते हुए कहा “साहब जी, जहां की रोटी पानी लिखी हो किस्मत वहीं ले आती है। और गरीब को  तो हर जगह ज़िंदगी भर मेहनत ही तो करनी है। क्या रांची और क्या श्रीनगर?” 
मगर वह उसकी बात सुनते हुए कहीं खो गया था। अपने घर में खांसते अब्बा, दो छोटी बहनें और बीवी के साथ चार बच्चे। कोई भी कमाई का जरिया नहीं था। वह हमाली भी करता तो भी इतना नहीं मिलता जिससे आठ लोगों का पेट भर पाता। वह खुद दो बार अनंत नाग, अखनूर, राजौरी के गाँव से शाल, फ़िरन, कालीन लेकर के अजमेर शरीफ़ जा चुका था। वहाँ किसी धर्मशाला में ठहरता और रिक्शा लेकर के शहर की गलियों की दिन भर खाक छानता। पर मुनासिब दाम कोई नहीं देता। कौन देता? सभी की झोलियाँ खाली और काम धंधे की कमी थी। जो भी कम  या कमतर मिलता उसे लेकर महीना भर रिक्शा खींचते जोड़ता, हिसाब लगाता रहता। 
धरती की जन्नत में रहने वालों के बेटे देश भर में रिक्शा चला रहे, कोई देखता तो क्या कहता? पर भूख बहुत बड़ी चीज है, अल्लाह मियां से भी बड़ी। अकसर आने जाने का खर्च निकालकर मुश्किल से इतना बचता की दो महीने के राशन का बंदोबस्त हो जाता। सियासतदान कितनी भी कौम के हित की बात करें पर गरीब तो गरीब ही रहता है। चाहे वह किसी भी मजहब का हो। ऐसे ही लोगों को वह लोग निगाह में रखते हैं।
@@ “बशीर मुहम्मद का यही घर है?” पूछते दो अजनबी उसके छोटे से चीड़ की लकड़ी के बने दरवाजे की चौखट पर खड़े थे। चार साल की छोटी बेटी जन्नत ने सिर ऊंचा कर उन को देखा। शाम का अंधेरा धीरे-धीरे सभी को अपने आगोश में लपेट रहा था। वह वहीं पीछे कमरे में बैठा अब्बा से मशवरा कर रहा था कि अब उधार पर खाने पीने का सामान किससे लाएं? क्योंकि इस छोटे से कस्बे के दोनों दुकानदारों का उधार बहुत हो गया था। 
टीवी पर जाने माने पुराने नेता कह रहे थे, “आम कश्मीरी बहुत गुस्से में है। वह विकास चाहता तो है लेकिन अपने विशेष राज्य के दर्जे के साथ।” और वह सोच रहा था कि  तीन दशक हो गए, वह बच्चे से युवा और अब अधेड़ हो गया पर कभी उसने अपने घर, गाँव में कोई बदलाव, कोई तरक्की नहीं देखी। उलटे सब छिनता चला गया। पर्यट  मुख्य  आधार था यहां के हजारों आम कश्मीरियों का। वह भर-भर के आते और सब जगह चनाब, रावी, डल झील, उसके शिकारे, गन्दरबल से लेकर शंकराचार्य, क्षीर भवानी, शालीमार, निशांत सब चहक उठते, गुलजार हो जाते। सूखे मेवे, गर्म फिरन, असली पश्मीने के शाल, कालीन, साड़ियां, हस्तशिल्प सब बिक जाता। घरों में सब के पास काम था। चार महीने बिक्री के, चार महीने बनाने की तैयारी के और बाकी समय आराम से परिवार शादियों, रिश्तेदारी में मगन रहते। बर्फबारी के मध्य गर्म-गर्म कहवे के साथ बादाम का हलवा और बड़े बूढ़ों के साथ सुकून के वह लम्हे। 
“आह !” गहरी सांस ली उसने  वह सब सियासतदानों ने छीन लिया। यहां का हर राजनेता को कश्मीर को अपनी जागीर समझता और हमें गुलाम। वह उठा और बेटी को गोद में लिए दरवाजे पर आया। “बशीर मोहम्मद? हमें तुम्हारे दोस्त नासिर ने भेजा है। तुमने उससे कुछ अपनी परेशानियों का जिक्र किया था? हम मदद करने आए हैं।” उसने सिर हिलाया और दोनों को अंदर ले आया।  
“…सोच लो, कुछ भी खतरे की बात नहीं। और यह सवाब का काम है। तुम्हारे हक़ की लड़ाई है जो हम लड़ रहे हैं।”
वह चेतनाशून्य बैठा रहा। उसका दिमाग सांय-सांय कर रहा था। कानों में पिघले सीसे की तरह लफ्ज मानो भर दिए थे।
“यह नज़राना है बीस हजार। इतना ही और मिलेगा काम होने के बाद।” कहकर उसने रुपए और एक पैकेट उसे थमा दिया।” और हाँ, जितना नजदीक से करोगे…।” कहकर वह दोनों चले गए। पीछे एक बेहद परेशान बशीर को छोड़ कर।
“क्या हुआ? कौन  लोग  थे यह? पहले भी काफी नुकसान हुआ है, अब फिर से कोई नया धंधा मत कर लेना।” पुराने से फ़िरन को पहने नफीसा थी। वो जो गुलाब की पंखुड़ी सी खिली-खिली रहती थी, आज अभावों ने उसे बबूल बना दिया था। ऊपर से चार बच्चों को पैदा करते-करते वह कई गम्भीर बीमारियों की गिरफ्त में आ चुकी थी। पता नहीं  हमारा ही धर्म क्यों ज्यादा बच्चे पैदा करो की राय देता है? दूसरे धर्म तो कम बच्चों पर ही हैं। और सच भी है बच्चे उसके भी एक या दो होते तो वह उन्हें आज अच्छे स्कूल में भेज पाता। अब सब मदरसों में पता नहीं क्या पढ़ रहे हैं। वह चिढकर बोला, “मेरी अम्मी मत बनो। पता है मुझे क्या सही है क्या गलत। जब मौलवी साहब खुद कह रहे हैं तो बताओ धर्म के खिलाफ चला जाऊं? बिरादरी बाहर हो जाऊं? फिर कौन आएगा हमारे पास?” 
“अरे तो क्या अपना पांव कुल्हाड़ी पर मारोगे?”  वह चौंका, क्या इसने बात सुन ली? जब से यह दोपहर में टीवी पर फ़ालतू के हिंदुस्तानी धारावाहिक देखने लगी है कुछ अधिक ही बोलने लगी है।  कहती है बेटियों को भी पढ़ने भेजो। हम किसी दूसरी जगह क्यों नहीं जाते? वहां काम कर लेंगे।  अब इसे क्या बताऊँ, क्या बोलूं? दशकों से कुछ लोगों के कुकृत्यों से पूरी कौम ऐसी बदनाम हुई है कि अपनी बिरादरी के बाहर कोई भी मिलता जुलता नहीं। दूसरे राज्यों को छोड़ो कोई जम्मू में भी काम नहीं देता। सब शक और अविश्वास की निगाह से देखते हैं। जबकि वह कहना चाहता है कि मैं भी तुम्हारे ही जैसा मुसीबतों का मारा हूं। मेरा भी परिवार आर्थिक तंगी बीमारी झेल रहा है। और हम तो ऊपर से यह अविश्वास और संदेह का जहर और झेल रहे। पर क्या करें अपनी ही कौम के गुमराह, भटके हुए लोगों ने कारनामे ही ऐसे किए हैं।
“ऐसा कुछ नहीं है। यह लोग अपना माल, वही सेब बागान का, करवाने के लिए आदमियों की भर्ती कर रहें हैं। उसी लिए आए थे और कुछ पैसे एडवांस दे गए हैं। ले रख”। उसने चन्द नोट उसको दिए, “राशन, कुछ फल  और अब्बू की दवाई ले आना।” नफीसा सब समझते हुए भी  उसे घूरती रही। “देखो,कुछ गलत मत करना कहे देती हूं। वरना खुद थाने जाकर तुम्हारी रिपोर्ट करूंगी।”  कंबख्त ऐसी ही  है हिंदुस्तानी मिट्टी की तासीर। यहां हर कोई अपनी जिम्मेदारी, कर्तव्यों की गठरी लादे चल रहा है। “अरे कुछ नहीं है ऐसा। तू बिना बात टेंशन न ले।” कहकर उसने फीकी सी हंसी में बात दबाई।
@@@@@ आज सात दिन हो गए थे उसे। तीनों टारगेट में से एक चुना था उसने। पर करने की हिम्मत नहीं थी। एक दिन अचानक चौक पर उसे वह मिल गया। उसने देखकर भी अनजान बनने की कोशिश की पर वह साथ ही आ गया। “क्या मियाँ, अभी तक काम नहीं किया? जबकि तुम्हारे बाद भी करने वाले तैयार बैठे हैं। नहीं करना है तो पैसे वापस।”
वह तो काफी खर्च हो गए थे और बाकी से आगे के कुछ अधूरे काम,घर की छत की मरम्मत भी करवानी थी। अब्बू को बड़े डॉक्टर को भी दिखाना था। कई जिंदगियां जुड़ी हुई थीं। “,करता हूँ भाई। जल्द करता हूँ। फिर उसका क्या करना है? “, हाथ से उसने इशारा किया।”, वहीं फेंक देना, रखना मत। तलाशी होगी। और तुरन्त निकल जाना। हां, रास्ता सुनसान हो बस यह ध्यान रखना। कोई देखे नहीं।” 
“और अल्लाह देखे तो….” बाकी शब्द उसके मुंह में ही रह गए।
रात्रि के आठ बजते ही सुनसान रास्ते हो जाते हैं। माहौल ठीक है, पर्यटक भी आ रहे हैं। और उस जैसे ढेरों आम लोग कोई पानी पूरी (गोलगप्पे), चाउमीन, दही-भल्ले, लाख की चूड़ियाँ बेचते तो कोई मसाले, मोचड़ी, खिलौने आदि। अकेले आते और एक कमरा कश्मीरी भाइयों के यहां किराये पर लेकर उसी में छह सात लोग रहते। न्यूनतम इनपुट से अधिकतम आउटपुट आता  जिससे महज दो जून की रोटी सुदूर गाँव, कस्बों में रहती उनकी मेहरारू, बच्चों और मां बाबू को मिलती। इसके आगे न वह कुछ सोचते और न कोई उनके लिए सोचता। 
वोट,लोकतंत्र उनके लिए है जिनके पेट भरें हों और मुंह में गुटखा हो। इन जैसे करोड़ो लोगों के लिए तो यह की जो दो बोतल शराब और कुछ कपड़ा दे जाए उसी को वोट। वरना जाति के नाम पर तो थोक भाव में मुफ्त में ही वोट ले लेते हैं, कछु न मिलत। वह कई  बार सोचता और देखता भी की उसी की जाति का घनसु, श्यामू, दीनू पार्टी कार्यकर्ता बनते ही जम-जम सफेद झक पजामा कुर्ता पहन ठाठ से घूमते। जल्द गाड़ी भी आ जाती। यह पैसा बिना काम किए कहाँ से आता इनके पास वह सोचता रहा जाता। और उ जाति का उम्मीदवार जीतने के बाद तो इतना ऊंचा हो जाता कि जिन लोगों के वोट से जीतता उनसे ही दूरी बना लेता। रईस जो हो जाता। कुछ सालों बाद फिर आ जाता कोई टोपी गमछा लगाए। और हम सब ऐसे के ऐसे ही चमड़ी गलाते, फटे पुराने कपड़ों में मिलते। 
अभी सुना था की उसके राज्य में हर व्यक्ति को पांच किलो चावल, दाल और एक बोतल तेल दिया जा रहा।  जिससे गरीबों को इस आपदा काल में भूखों न सोना पड़े।  यही सोचते हुए वह लाल चौक से थोड़ा आगे  जाकर बायीं तरफ की गली में अपनी टपरी को समेट रहा था। आगे एक अंधेरा कोना था वहीं से अचानक…एक साया सामने आ गया। मुंह पर कपड़ा लपेटे और हाथ में पिस्तौल।
वह सामान समेटता ठिठक गया, कांप गया पर बाहर से सहज बनता बोला “क्यों भैया जी,बनाएं गोलगप्पे? बड़े स्वाद होते हैं हमारे। सूजी के बनाएं या आटे के?” उधर चेहरे को कपड़े से ढके बशीर की भी दिल की धड़कने तेज थीं। नर्वस था और जुबान सूख रही थी उसकी। लग रहा था अभी कोई आ गया तो वह गन वन सब फेंक भाग जाएगा। किसी जीते जागते इंसान को मारना कोई हंसी खेल नही होता।  आम व्यक्ति को कई-कई बार मरना पड़ता है अपनी ही गैरत में। कई दिनों तक नींद नही आती। मरने वाले का चेहरा और आंखें लगातार पीछा करती रहती हैं। लेकिन मजबूरी है, कर्ज है,बीवी और चार बच्चे हैं। लेकिन इसके लिए यह निर्दोष गोलगप्पे वाला या मजदूर जिम्मेदार तो नही। लेकिन यह इन्हें कौन समझाए।  पिस्तौल वाला हाथ उसने ऊंचा उठाया, उधर कन्हैया ने मन ही मन कहा ,”बिट्टू, गीतू की मम्मी हमें माफ़ करना। ई जन्म में तो तुम्हें भरपेट खाना नही दे पाए। अगले जन्म में इंसान न बनकर  ढोर बने तो कुछ घास-फूस खाकर पेट भर लेंगे।” 
रात के सन्नाटे को चीरती हुई गोली की आवाज सुनाई दी। 
@@@@@ वह लड़खड़ाता हुआ छुपने का आसरा ढूंढ रहा था। सब तरफ सुनसान बन्द गलियां थीं। दूर कुछ मकान थे, उनकी आड़ में छिपने हेतु वह बढ़ा की तभी…।
वह साया हाथ में पिस्तौल लिए आगे बढ़ता हुआ उस कोने तक आया जहां से दो रास्ते विपरीत दिशा में जा रहे थे। उसने चारों ओर देखा, कोई नहीं था। “देखा तो यहीं था, कहाँ गया?” बशीर की आवाज में बेचैनी  के साथ अपना काम अधूरा छूटने की खीज भी थी।  दोनों मकानों में अंधेरा था,कोई आहट नहीं थी। वह कुछ देर खड़ा टोह लेता रहा फिर आगे से बाएं जा रहे रास्ते पर दौड़ता हुआ गया।
दूर लाल चौक पर लगे घंटाघर ने बारह घण्टे बजाए। अंधेरी, गहरी काली रात में सुनसान गली का वह दरवाजा निःशब्द खुला। साया  बाहर आया उसने चारों तरफ देखा, कोई नहीं दिखा। कुछ देर फिर भी वह खड़ा रहा, आहट सुनता। फिर दरवाजे के अंदर गया और कहा,”रास्ता साफ है। अब निकल सकते हो। सुबह किसी ने देख  लिया तो सब पीछे पड़ जाएंगे हमारे। “कहते हुए बेबसी से सफेद दाड़ी वाले बुजुर्ग ने ऊपर आसमान की तरफ  देखा जहां बादलों की कैद से चांद निकल रहा था।
शिक्षाविद, चार कथा संग्रह सहित आठ किताबें, पुरस्कृत, राजस्थान, भारत, सम्पर्क: 00 91 77374 07061, leooriginal2010@gmail.com

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