शादी की पहली सालगिरह बहुत-बहुत मुबारक हो तुम्हें। माँ कैसी है?, बाबा, याद करते हैं मुझे?, छोटी कैसी है?, और हरी काका, वे तो मुझे पक्का से ही याद करते होंगे। मेरे कारण उन्होंने अपना सोमू जो खोया था। ना मैं उसे फौज में भर्ती करवाने के लिए कहता और ना ही काका का आखरी सहारा उनसे दूर होता।
पिछले खत में तुमने लिखा था कि, बाबा की तबीयत थोड़ी नाज़ुक है। अब कैसे हैं वे? मुझे आज भी याद है जब बाबा ने अपना पैर गवाया था और अस्पताल से घर आते ही माँ से बोले ‘मेरा बेटा फौज में जाएगा’। उस दिन ममता और फ़र्ज़ में थोड़ी अनबन हुई थी पर फ़र्ज़ जीत गया था। माँ का कहना था कि ‘फौज ने मुझे कुछ नहीं दिया तो मैं अपना बेटा फौज को नहीं दूँगी।’ पर बाबा को तो अपनी बात ही मनवानी थी। माँ से छुपाकर मेरी नौकरी का फॉर्म फौज में भरवा दिया और जिस दिन मैं फौज में जाने वाला था उस दिन माँ को बताया। बहुत हिम्मत वाले हैं मेरे बाबा। इतना सब होते हुए भी उन्होने मुझे यहाँ भेजने की हिम्मत जुटाई। बाबा कहते हैं कि ‘जो जान अपने वतन के काम ना आए वो कैसी जान’। एक दिन तो बाबा, माँ से इस बात पर नाराज़ हो गए थे कि माँ ने उनकी वर्दी छुपा दी थी। माँ, बाबा की वर्दी को अपनी सौत कहती हैं। बाबा बहुत प्यार करते हैं माँ से, इसलिए, उनसे थोड़ा सख्ती से बात करते हैं ताकि उनके जाने के बाद माँ को उनकी कमी महसूस ना हो, परंतु ये बात दोनों अच्छे से जानते हैं और मानते भी हैं कि वे दोनों एक-दूसरे के बिना नहीं रह सकते। आँसूओं को छिपाने का हुनर है उनमें। बाबा ने अपना सारा जीवन वतन के नाम कर दिया और उनहोंने मुझे भी यही सिखाया है।
माँ ने मुझे जन्म तो नहीं दिया, परंतु मेरी सग़ी माँ से भी बढ़ कर मुझसे स्नेह करती हैं वे। कहते हैं जन्म देने वाले से बड़ा पालने वाला होता है। मेरी सग़ी माँ ने तो जन्म देते ही मेरा साथ छोड़ दिया परंतु मेरी इस यशोदा मैया ने मुझे दुनिया की हर मार से बचाया है। हर उस तपश से मेरी रक्षा की है जो मुझे ज़रा-सा भी ताप देने वाली हो सकती थी। माँ के चरणों में मैने स्वर्ग पाया है और आँचल में दुनिया की हर ख़ुशी। जब बाबा रोज़ सुबह मुझे दौड़ के लिए ले जाते थे तब माँ बहुत झगड़ा करती थी उनसे। मानो उन्हें पता चल गया हो कि बाबा के मन में क्या है। जब मैं दौड़ करके लौटता तो माँ अपने हाथों से मुझे दूध के साथ देसी घी की चूरी देती।
मैंने जन्म देने वाली माँ को तो नहीं देखा परंतु मेरी यह माँ मेरे लिए मेरा ईश्वर हैं। कभी कोई कहता कि ‘तू तो इसकी सौतेली माँ है,’ तो वे रो देतीं और कहतीं कि ‘माँ कभी सौतेली नहीं होती माँ तो बस माँ होती है।’ माँ ने बाबा से यह तक कह दिया था कि वे अपना स्नेह किसी और बच्चे के साथ नहीं बाँटना चाहती। माँ के इतने स्नेह को देख कर मैं स्वयं को खुशनसीब मानता हूँ कि मैं इस माँ का बेटा हूँ।
छोटी के बारे में तुम्हें क्या बताऊँ। वह जान है मेरी। बहन तो सोमू की है परंतु उसके जाने के बाद उसने मुझे ही अपना सब कुछ माना है। मैं छोटी की शादी बड़ी धूमधाम से करना चाहता हूँ। उसकी शादी शहर की सबसे शानदार शादी होगी। सोमू ने मुझसे वचन लिया था कि मैं छोटी को कभी किसी बात की कमी महसूस नहीं होने दूँ। मैं उसके जीवन में वे सारी खुशियाँ भर देना चाहता हूँ जो सोमू करना चाहता था। अपनी बहन नहीं बल्कि बेटी मानता हूँ उसे। उसका ख्याल रखना।
मैं तुम्हारा सबसे बड़ा गुनहगार हूँ। उस रात तुम्हें अपनी आँखों में बसा कर चला तो आया परंतु खुद को तुम्हारे ही पास छोड़ आया था। आज भी जब आँखें बंद करता हूँ तो उन्हीं पलों में खो जाता हूँ। तुम्हारा मुस्कुराता हुआ चेहरा, सर पर लाल चुनरी, हाथों में लाल चूड़ा और सिर से पाँव तक दुल्हन के जोड़े में लिपटी तुम ही नज़र आती हो। मैने, तुम्हारा बहुत दिल दुखाया है। गुनहगार हूँ तुम्हारा। अबकी बार खूब खबर लेना मेरी। मैं कुछ नहीं कहूँगा। सच कहूँ, तुम्हें छोड़कर आने का बिलकुल भी मन नहीं था। मैने अर्ज़ी दी है। जैसे ही मंज़ूर हो जाएगी मैं अगले ही पल तुम्हारे पास हाज़िर हो जाऊँगा।
जल्द ही तुमसे मिलूँगा।
तुम्हारा
अरुण।
‘ये खत, मुझे कल की डाक से भेजना होगा। बहुत जल्द छुट्टी मंज़ूर हो जाएगी और मैं प्रीत से मिल सकूँगा।’ अरुण, प्रीत की यादों को ओढ़ता हुआ खत को सीने से लगा कर सो गया।
‘अरुण, तुम्हें कप्तान साहब ने बुलाया है।’ आदेश के लहज़े में एक संदेश।
‘मैं आता हूँ।’ बिना किसी सवाल के अरुण ने उस खत को चार तहों में समेटा और एक डायरी में डाल कर चला गया।
‘लेफ्टिनेंट अरुण, रिपोर्टिंग सर।’ सीमा का जवान अपना फ़र्ज़ माथे पर सजाए, रगों में देशप्रेम की लहर लिए, हाथ और माथे के क्षितिज को जोड़ते हुए दृढ़ता से सलाम करता है।
‘बैठो अरुण।’
‘सर।’
‘तुमने छुट्टी के लिए अर्ज़ी दी है?’
‘जी सर। घर गए हुए काफ़ी समय हो गया था तो.. और आज कल सब ठीक भी चल रहा है यहाँ.. इसलिए मैने सोचा कि घर हो आता हूँ।’
‘अभी तुम्हारी छुट्टी मंज़ूर नहीं की जा सकती। बटालियन में से काफ़ी लोग छुट्टी पर गए हुए हैं। उनके आने तक तुम्हे इंतज़ार करना होगा।’
‘इंतज़ार..?’
‘कोई सवाल…?’ एक कड़क आवाज़ में।
‘नहीं सर।’
‘क्या हुआ लेफ्टिनेंट अरुण?’ मित्र कामरा ने पूछा।
‘आज मेरी शादी की पहली सालगिरह है। मैंने छुट्टी के लिए अर्ज़ी दी थी, लेकिन वह मंज़ूर नहीं हुई। सोचा था कि इस बार घर जाऊँगा, पर हमारी बटालियन के काफ़ी जवान पहले ही घर गए हुए हैं, इसलिए मुझे इंतज़ार करने के लिए कहा गया है।’ अरुण ने उदास चेहरे के साथ कहा।
चिंता मत करिए सर। बहुत जल्द आपको छुट्टी मिल जाएगी। वैसे शादी की सालगिरह बहुत-बहुत मुबारक आपको।’
‘शुक्रिया।’ उदास मन से।
सुबह की परेड में अरुण हमेशा की तरह समय से पहले ही पहुँच गया। उसने परेड का कार्यभार संभाला। परेड ख़त्म होने पर कप्तान साहब का एक आदेश।
‘लेफ्टिनेंट अरुण।’
‘सर।’
‘तुम्हें एक महत्वपूर्ण कार्य सौंपा जा रहा है।’
‘सर’ बिना किसी सवाल के अरुण का उत्तर।
‘तुम्हें सरहद के साथ वाले गाँव में जाना है और वहाँ के लोगों को अपने विश्वास में लेना है। उनको लगता है कि हम उनके साथ नहीं हैं।’
‘सर।’
‘मुझे पूरा विश्वास है कि तुम ये कर सकते हो।’
‘मैं ज़रूर करूँगा सर।’ कप्तान साहब को सलाम करता हुआ अरुण बोला।
‘और हाँ अरुण, जैसे ही तुम ये कार्य पूरा करके लौटोगे। तुम्हें छुट्टी पर भेज दिया जाएगा।’
‘धन्यवाद सर।’
अरुण की खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा। वह अपने कमरे में गया और प्रीत की तस्वीर निकाल कर उसे चूमने लगा।
‘मैं बहुत जल्द वापस आ रहा हूँ प्रीत। बहुत जल्द।’
अरुण उसी रात वहाँ से चल पड़ा। उसने अपने मित्र विनय से उस खत को सुबह की डाक में भेजने को कहा।
अरुण गाँव पहुँचा तो वहाँ लोगों का झुँढ इकट्ठा होते देर नहीं लगी। सब उसे ऐसे देखने लगे कि जैसे सच में कोई दुश्मन आ गया हो।
‘मेरा नाम अरुण है। मैं आप सब से मिलने आया हूँ। और..’
‘देखिए सिपाही बाबू, हमें कुछ नहीं सुनना कि आप कहाँ से आए हैं और हमसे क्यों मिलना चाहते हैं। हम आपसे बात नहीं करना चाहते। चलो भाई, सब चलो यहाँ से…’ अरुण की बात को बीच में ही काटते हुए गाँव का एक आदमी बोला।
‘आप मेरी बात तो सुनो। हम आपके दुश्मन नहीं हैं।’
अभी अरुण की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि गोलियाँ चलनी शुरू हो गईं। हर तरफ भगदड़ मच गई। अरुण ने अपनी पिस्तोल निकाली और सब तरफ देखने लगा। गोलियाँ कहाँ से चलाई जा रहीं थीं ये किसी को भी मालूम नहीं था। सब घरों के दरवाज़े, खिड़कियाँ बंद हो गए। कुछ ही समय में हर तरफ सन्नाटा छा गया।
अचानक अरुण की नज़र एक ऐसे दरवाज़े पर पड़ी जिसमें बहुत सारे छेद थे। अरुण को ये समझने में ज़रा भी देर नहीं लगी कि उसी घर के अंदर से गोलियाँ चलाई जा रही हैं। उसने इस बात की खबर अपने कप्तान तक पहुँचाई और उस घर पर नज़र रखने लगा। कुछ ही समय में कप्तान सहित बहुत सारे जवान वहाँ आ पहुँचे। सब गाँव वाले ये देख कर घबरा गए। हर तरफ सेना के जवान तैनात हो गए।
‘अरुण।’ कप्तान साहब ने अरुण की तरफ देखते हुए आँखों ही आँखों में सवाल पूछा।
‘सर।’ अरुण ने उस दरवाज़े की ओर इशारा करते हुए कहा।
उस घर को चारों तरफ से घेर लिया गया। हर जवान उसी घर को अपना गंतव्य समझता हुआ आगे बढ़ता गया। जैसे ही एक जवान दरवाज़े की ओर बढ़ा भीतर से गोलियों की बौछार होने लगी। दोनों तरफ से गोलियाँ एक-दूसरे से टकराने लगीं। कप्तान साहब ने बारूद का इस्तेमाल करने से मना किया था, ताकि बाकी घरों को कोई नुकसान ना हो। अरुण ने कप्तान साहब से, घर की खिड़की से अंदर जाने की अनुमति माँगी।
‘नहीं अरुण। तुम ऐसा नहीं करोगे। हमें ये भी नहीं मालूम है कि घर के अंदर कितने लोग मौजूद हैं। उनके पास कोई बड़ा हथियार भी हो सकता है और तुम वहाँ अकेले जाने की बात करते हो। मैं तुम्हें ऐसा करने की अनुमति नहीं दे सकता।’
‘सर, मुझे कुछ नहीं होगा। इन छिपे हुए चूहों को बिल से बाहर तो निकालना ही है।’
‘सहमत हूँ, लेकिन ऐसे नहीं। कुछ ओर सोचते हैं।’
‘नहीं सर और कोई रास्ता नहीं हैं हमारे पास।’ इतना कहते ही अरुण ने उस दरवाज़े की ओर कदम बढ़ाने शुरू किए।
‘अरुण, रुक जाओ। ये मेरा आदेश है।’
जैसे ही अरुण खिड़की से उस घर में घुसने लगा, एक ज़बरदस्त धमाका और सब तहस-नहस हो गया। अरुण उछल कर पीछे की ओर गिरा।
‘अरुण….’ कप्तान साहब चिल्लाए।
‘प्रीत, देख तो सरहद से खत आया है। पढ़ तो क्या लिखा है मेरे बेटे ने। जैसे-जैसे खत की तहें खुलती गईं प्रीत के दिल की धड़कन बेलगाम भागती गई। खुद को संभालते हुए प्रीत ने खत पढ़ना शुरू किया। पूरा खत ख़त्म होने पर अरुण की माँ खुशी से झूमने लगी।
‘मेरा बेटा आ रहा है.. मेरा बेटा आ रहा है।’
प्रीत की खुशी का भी ठिकाना नहीं रहा।
‘क्या हुआ प्रीत? तुम दोनों बहुत खुश हो। क्या बात है? मुझे भी बताओ।’ बाबा ने प्रीत से पूछा।
‘अरुण भैया आ रहे हैं। छोटी बहन खुशी से चिल्लाई।’
‘क्या? मेरा बेटा आ रहा है। मेरा बेटा आ रहा है?’
सब खुशी से नाचने लगे। बाबा तो बैसाखी को छोड़कर खुशी का दूसरा पाँव बना का झूमने लगे।
‘गोलियाँ बंद हो गईं। सब गाँव वाले अपने-अपने घरों से बाहर निकले।’
‘कौन रहता था इस घर में?’ कप्तान साहब का गाँव वालों को एक सीधा प्रश्न।
‘हम नहीं जानते साहब। कुछ समय पहले दो लड़के आए थे यहाँ और वही रहते थे।’
‘क्या नाम था उन दोनों का?’
‘जी.. हम नहीं जानते।’
‘नहीं जानते? क्या मतलब है इसका? तुम्हारे गाँव में, तुम लोगों के बीच कोई रह रहा है और तुम्हें ही नहीं मालूम कि वे लोग कौन हैं?’ कप्तान साहब ने सवालों की बौछार की।
‘साहब हम सच कह रहे हैं। ये लोग कभी किसी से बात नहीं करते थे। हमें बिल्कुल भी अंदाज़ा नहीं था कि हम गाँव वालों पर इस घर से गोलियाँ चलाई जाती थी। हम तो आज तक यही समझते रहे की सेना के जवान गोलियाँ चला रहे हैं।’
‘सेना के जवान तुम्हारी रक्षा के लिए है। वे तुम लोगों को क्षति क्यों पहुँचाएँगें? क्या तुम लोगों को इतना भी भरोसा नहीं है हम पर। हम तुम्हारे अपने हैं।’
‘साहब, जब भी किसी को गोली मारी जाती थी तो उसके पास से सेना का ये निशान हमें मिलता था। इसलिए हमें लगा…’ भारतीय सेना का चिन्ह जिसे हमेशा वे अपने कंधों पर लेकर चलते है।
कप्तान साहब सब समझ गए परंतु अरुण के घर वालों को क्या जवाब दें उन्हें कुछ भी समझ नहीं आ रहा था।
इधर अरुण के घर पर मानो उत्सव हो कोई। मिठाइयाँ बन रही हैं, फूलों से हर तरफ सजावट हो रही है, नए कपड़े निकाले जा रहे हैं। उन्हें तो यही लग रहा था कि उनका बेटा अरुण आ रहा है। हाँ…, आ तो अरुण रहा था परंतु…
एक बड़ा सा मिलिटरी ट्रक घर के बाहर आ कर रुका।
‘माँ देखो भैया आ गए.’ छोटी, खुशी से उछलती हुई बोली।
सब दरवाज़े पर इकट्ठा हो गए। ट्रक से लेफ्टिनेंट विनय उतरे।
‘अरे विनय! तुम यहाँ? अरुण कहाँ है?’ अरुण की माँ ने चिंतित स्वर में पूछा।
विनय ने ट्रक के पीछे की ओर इशारा करते हुए सर झुकाया।
“बहुत मुश्किल होता है एक परिवार को उसके बेटे की मौत की खबर देना। वो भी एक ऐसे वक़्त पर जब वे सभी उसके आने की राह ताक रहे हों। परिवार का हर सदस्य एक उत्सव मना रहा था। उनके घर के चिराग के लौटने का उत्सव। इस बात से बेखबर कि बहुत जल्द वह उत्सव एक मातम में बदलने वाला है।”
सब चेहरे घबराए हुए थे। तभी तिरंगे में लिपटा हुआ एक बड़ा-सा बक्सा सामने आया।
‘लेफ्टिनेंट अरुण, देश की रक्षा करते हुए शहीद हो गए।’ दिल पर पत्थर रखते हुए विनय ने कहा।
विनय के इन शब्दों ने खुशी के माहौल को गम की तपती हवा में बदल दिया। अरुण की माँ वहीं गिर पड़ीं। बाबा का खुशी का दूसरा पाँव भी अब नहीं रहा। खुशी के आँसू गम के आँसुओं में बदल गए। प्रीत के हाथों से लाल चूड़ा निकाल दिया गया, चुनरी का लाल रंग पल में सफेद हो गया, माँग का सिंदूर हटा दिया गया, घर के सारे फूल उतार दिए गए और मिठाई बनाने वाले चूलेह की आग बुझा दी गई।