दीपावली आने वाली थी, लिहाज़ा शर्मा जी, वैसे तो नाम सागर शर्मा है, लेकिन लोग-बाग इनको शर्मा जी के नाम से ही जानते हैं. हाँ तो शर्मा जी यानि कि सागर शर्मा के फ्लैट में मरम्मत और साफ़ सफाई का काम चल रहा था. दरअसल शर्मा जी के पिता जी यानि बाबू जी को गाँव से यहाँ आये एक-डेढ़ महीना हो गया है और अभी उनका अपने बेटे-बहु और पोते के पास लम्बे समय तक रहने का प्रोग्राम है. अब क्यूंकि बढ़ती उम्र और पैरों की जकड़न के चलते बाबू जी को टॉयलेट में देशी स्टाइल के भांडे पर बैठने में परेशानी हो रही थी तो सागर ने अपने बाबू जी के लिए टॉयलेट में वेस्टर्न स्टाइल का भांडा लगाने के लिए मिस्त्रियों को काम पर लगा रखा था.
वैसे ये बात नहीं है कि सागर ने बाबू जी के घुटनों का ईलाज़ करवाने में कोई कसर उठा रखी थी, इसने बाबू जी को बड़े से बड़े डॉक्टर को दिखाया था, सबका यही कहना था कि बाबू जी के घुटने बदलने पड़ेंगे, यानि की ‘नी रिप्लेसमेंट’ और बाबू जी अपने घुटनों का ऑपरेशन करवाने को बिलकुल भी तैयार नहीं थे. डॉक्टरों के लाख समझाने पर भी जब बाबू जी ऑपरेशन के लिए नहीं माने तो डॉक्टरों ने इन्हें कुछ दवाईयां लिख कर दे दी थी, घर पर ही करने के लिए कुछ एक्सरसाइज़ बता दी थी और डॉक्टर्स ने सीढियां चढ़ने, घुटने मोड़ कर ज़मीन पर बैठने और उकड़ू बैठ कर टट्टी-पेशाब ना करने की सख्त हिदायत दे दी थी. अब बाकि परेशानियों का समाधान तो पहले से ही था, मसलन सीढियों की जगह बिल्डिंग में लिफ्ट थी. नीचे घुटने मोड़कर बैठ कर खाना खाने की ज़रुरत नहीं पड़ती, क्यूँकि घर में खाने की मेज पहले से ही मौजूद है. अब बस एक ही समस्या थी, उकड़ू बैठ कर टट्टी-पेशाब जाने की, सो उसके लिए ही सागर ने अपने पिता जी के कमरे के टॉयलेट में फेरबदल करने के लिए काम शुरू करवा रखा था. बाबू जी के कमरे के टॉयलेट में मजदूर पुराने भांडे को निकालने के लिए तोड़-फोड़ कर रहे थे.
सागर तो मिस्त्रियों को काम समझा कर अपने ऑफिस चला गया और उसकी पत्नी मालती अपने बेटे पियूष को लेकर स्कूल चली गई. दरअसल जिस स्कूल में पियूष पढ़ता है उसी स्कूल में मालती टीचर है. दोनों माँ-बेटा सुबह एक साथ स्कूल जाते हैं और स्कूल की छुट्टी होने पर साथ में ही घर लौटते हैं. मालती सुबह ही बाबू जी के लिए खाना बना कर रख जाती है और बाबू जी अपनी भूख के हिसाब से खुद ही रसोई से खाना लेकर खा लेते हैं.
हर रोज की तरह आज भी बाबू जी ने अपना खाना खत्म किया ही था कि उनका फ़ोन बजने लगा. खाने के बाद झूठी थाली रसोई में रख कर आते समय बाबू जी यही सोच रहे थे कि भला इस समय उन्हें कौन फ़ोन कर सकता है ? अपने दोस्तों के साथ तो सुबह ही गार्डन में सैर के वक़्त इनकी मुलाक़ात हो जाती है. रसोई से बाहर आकर जब इन्होने अपना फ़ोन देखा तो सागर का फ़ोन था, जो ना उठाने की वजह से कट गया था. बाबू जी सागर को फ़ोन करने ही जा रहे थे की एक बार फिर से फ़ोन की घंटी बजी. बाबूजी ने तुरंत फ़ोन उठा लिया, ‘हाँ बेटा बोलो.’
‘बाबू जी मेरे पास मिस्त्री का फ़ोन आया था, उसे कुछ सामान लाना है, आप एक बार उसे 2000 रुपये दे देना.’
‘ठीक है बेटा, दे दूंगा.’
‘अच्छा सुनिए उससे कहियेगा कि जो भी सामान वो लाये उसका बिल वो ज़रूर लेकर आये.’
‘हाँ, कह दूंगा. और कुछ…?’
‘नहीं और कुछ नहीं. आपने खाना खा लिया…?’
‘हाँ बस अभी खाया ही है.’
‘ठीक है, मैं फ़ोन रखता हूँ.’
‘ओ के बेटा.’ कह कर बाबू जी ने फ़ोन काट दिया.
कुछ देर बाद ही मिस्त्री बाबू जी के पास आया, ‘वो साहेब ने आपको…’
इससे पहले की मिस्त्री अपनी बात पूरी कर पाता, बाबू जी ने अपनी जेब से निकाल कर 2000 रुपये उसके हाथ पर रख दिए.
‘मैं सामान लेकर आता हूँ.’ पैसे लेकर मिस्त्री जाने लगा.
‘सामान का बिल लेकर आना.’ बाबू जी ने अपने बेटे के आदेश को मिस्त्री के सामने दोहरा दिया.
‘जी बाबू जी.’ कह कर मिस्त्री वहां से चला गया.
मिस्त्री के जाने के कुछ देर बाद मालती भी पियूष के साथ स्कूल से आ गई. अपने कमरे में जाने से पहले उसने बाबू जी से पूछा, ‘आपने खाना खा लिया बाबू जी.’
‘हाँ बेटा.’
‘कुछ कम तो नहीं पड़ा…?’
‘अरे नहीं बेटा, थोड़ी सब्जी तो बच भी गई.’
बाबू जी की बात सुनकर मालती मुस्कुराते हुए अन्दर अपने कमरे में चली गई. उसके जाने के बाद बाबू जी भी आराम करने के इरादे से अपने कमरे में चले आये. कुछ देर बाद पियूष भी खाना खाकर उनके पास आकर बिस्तर पर उनकी बगल में लेट गया.
थोड़ी देर बाद ही मिस्त्री भी सामान लेकर आ गया, उसके डोर बेल बजाने पर दरवाज़ा मालती ने खोला था. मिस्त्री ने सामान का बिल मालती को दिया और सामान लेकर अन्दर चला गया. मालती भी अपने कमरे में जाकर लेट गई.
इधर अपने कमरे में बाबू जी पियूष के स्कूल के किस्से सुनने में मस्त थे कि मजदूर के जोर जोर से फ़र्श को तोड़ने की आवाजें आने लगी. जब छेनी पर पड़ने वाली हथोड़े की आवाज बाबू जी और पियुष की गुफ्गू में बाधा डालने लगी तो बाबू जी ने उठ कर अपने कमरे का दरवाजा बंद कर लिया. अभी पियूष ने अपनी बात शुरू ही की थी कि डोर बेल बज उठी. इस बार बाबू जी ने पियूष को दरवाज़ा खोलने के लिए कहा, क्यूंकि वो जानते हैं कि दिन भर स्कूल में बच्चों के साथ सिर खपा कर मालती थक जाती है, सो स्कूल से आकर खाना खाने के बाद वो दो घंटे आराम से सो जाती है.
पियूष ने जब दरवाज़ा खोला तो उसे अपने सामने बगल वाले फ्लैट में रहने वाले गुप्ता जी गुस्से में तमतमाते हुए खड़े नज़र आये.
‘यस अंकल…?’ पियूष ने आदर से पूछा.
‘तुम्हारे पापा कहाँ हैं.’ गुप्ता जी ने अन्दर आते हुए पूछा.
‘जहाँ उन्हें इस वक़्त होना चाहिए.’ पियूष ने बड़े सहज भाव में जवाब दिया.
‘बहुत बोलने लगा है. सीधे बताओ, कहाँ हैं शर्मा जी…?
‘पापा ऑफिस में हैं. दादू हैं घर पर… बुलाऊँ…?’
‘हाँ बुलाओ.’ गुप्ता जी का गुस्सा और बढ़ रहा था. पियूष को समझ नहीं आ रहा था कि गुप्ता अंकल आज इतने क्यूँ भड़के हुए है. उधर बाहर शोर सुनकर बाबू जी खुद ही हाल रूम में आ गए. गुप्ता जी को देखते ही उन्होंने हँसते हुए कहा, ‘अरे गुप्ता बेटा… आओ… कुछ काम है क्या सागर से…?’
‘मुझे शर्मा जी से कोई काम नहीं है.’ गुप्ता जी ने अपने गुस्से को काबू करने की नाकाम कोशिश करते हुए कहा.
‘तब किससे काम है…?’
‘ये जो आप लोगों ने अपने घर में तोड़फोड़ लगा रखी है, इसके शोर ने हमारा जीना दुश्वार कर दिया है. आप अपने मजदूरों से कहिये, आराम से काम करे. आवाज न करे.’
‘मैं समझ सकता हूँ आपकी तकलीफ, बेटा जी आप बैठो तो सही. मैं अभी मिस्त्री को बुलाता हूँ.’ बाबू जी ने गुप्ता जी के गुस्से को शांत करने की कोशिश करते हुए कहा और फिर पियूष से बोले, ‘बेटा, मिस्त्री अंकल को बुला कर लाओ.’ फिर गुप्ता जी, जो अभी तक खड़े ही थे, को देखकर बोले, ‘अरे आप बैठ भी जाओ.’
‘नहीं, मुझे नहीं बैठना. मुझे अभी ऑफिस जाना है. इस वक़्त मैं ऑफिस में होता हूँ. वो तो आपके यहाँ की तोड़-फोड़ से परेशान होकर बीवी नें मुझे फ़ोन करके बुला लिया, वर्ना मुझे कहाँ फुर्सत है.’ कह कर गुप्ता जी गुस्से में पैर पटकते हुए जाने लगे. अचानक दरवाजे से बाहर निकलते निकलते गुप्ता जी एक पल के लिए रुके और बाबू जी की तरफ देख कर बोले, ‘आपको ये नॉइज़ पोलुशन बंद करना ही होगा. अगर नहीं किया तो मैं सोसाइटी में आपकी कम्पलेन करूंगा.’ उसके बाद बिना बाबू जी का रिएक्शन जाने वहां से चले गए. उनका इस तरह का व्यवहार देख कर अनायास ही बाबू जी के मुंह से निकल गया,‘बड़ा ही अहमक इंसान है भाई ये तो. अब बताओ कोई इंसान भला अपने घर में कुछ मरम्मत सरम्मत भी न करवाए. जाने कैसा वक़्त आ गया है और कैसा लोगों का स्वभाव हो गया है.’
उसी समय पियूष मिस्त्री को लेकर हॉल रूम में आ गया. आते ही मिस्त्री ने बाबू जी की तरफ प्रश्नात्मक दृष्टि से देखा तो बाबू जी ने उससे कहा,‘जाओ तुम अपना काम करो.’ मिस्त्री हैरान परेशान सा वापस अन्दर की तरफ चला गया. उसकी समझ में ये नहीं आ रहा था कि आखिर बाबू जी ने उसे बाहर बुलाया ही क्यूँ था.
‘पता नहीं क्या होता जा रहा है आजकल लोगों को.’ बाबू जी को गुप्ता जी के इस तरह आकर शिकायत करने से बड़ा दुःख हो रहा था. पियूष को भी कुछ समझ नहीं आ रहा था. उसका बाल मन शायद इस तरह की बातों को समझने में सक्षम नहीं था.
‘आप किन लोगों की बात कर रहे हैं दादा जी…?’ पियूष ने बाबू जी की बात को समझाने के लिए पूछा.
‘तुम्हारे गुप्ता अंकल जैसे लोगों की. पता नहीं कैसा स्वभाव हो गया है आज के ज़माने में लोगों का…’
‘कैसा स्वभाव दादा जी…?’
‘यही, दूसरों की ख़ुशी में खुश नहीं होते, दूसरों के दुःख में इन्हें दुःख नहीं होता. अपने आप में सिमट कर रह गए हैं सब के सब. खुदगर्ज़ हो गए हैं लोग इस ज़माने में.’
‘खुदगर्ज़ मीन्स…?’
‘खुदगर्ज मीन्स….’ बाबू जी सोचने लग गए. ‘ सेल्फिश’
‘ओह… क्या आपके ज़माने में लोग सेल्फिश नहीं होते थे दादा जी…?
‘बिलकुल नहीं. सब लोग मिलजुलकर रहते थे. एक दुसरे के सुख-दुख में काम आते थे. एक दूसरे की लोग चिंता करते थे.’ कहते कहते बाबू जी जैसे अपने ख्यालों में खो गए थे. पियूष उत्सुकता से अपने दादा जी के सफ़ेद दाढ़ी से ढके झुरियों वाले चेहरे को देख रहा था. वो समझ गया था कि आज भी उसे दादा जी के ज़माने का कोई खास किस्सा सुनने को मिलने वाला है. दोनों दादा पोता फिर से अपने कमरे में आ गए थे. उधर मजदूर ने फिर से तोड़ा-फोड़ी शुरू कर दी थी.
‘आप अपने ज़माने के बारे में कुछ बता रहे थे दादा जी.’
‘मैं आज तुम्हे अपने मोहल्ले के बारे में बताता हूँ.’
‘जी दादा जी.’
‘हमारे मोहल्ले में पुजारियों का एक बड़ा पुराना मंदिर था…. था क्या आज भी है. उस मंदिर के पीछे की तरफ बहुत बड़ी खाली ज़मीन पड़ी थी, जिसमे कुछ ठठेरे रहते थे.’
‘ये ठठेरे कौन होते हैं दादा जी…?’ उत्सुकतावश पियूष ने पूछा.
‘बेटा ये वो लोग हैं जो पीतल के बर्तन अपने हाथों से बनाते हैं. किसी भी तरह की मशीन की कोई मदद नहीं लेते ये लोग. लकड़ी के बड़े से हथोड़े से पीतल की प्लेट को पीट पीट कर ये उसे बर्तन का रूप देते हैं.’
‘मुझे इन लोगों को देखना है दादा जी.’ हाथ से बर्तन बनाने वाली बात सुनकर पियूष रोमांचित हो उठा था.
‘अब तो शायद ही कोई ठठेरा बचा होगा बेटा. फिर भी इस बार तुम लोग छुट्टियों में आओगे तो मैं तुम्हे इन लोगों से मिलवाने की कोशिश करूंगा.’
‘जी दादा जी. चलिए अब आगे की कहानी बताइये.’
‘हाँ तो मैं बता रहा था कि पुजारियों की उस ज़मीन पर कई ठठेरों ने अपने कच्चे घर बना रखे थे और वहीँ वो अपना बर्तन बनाने का काम भी करते थे. जब ये लोग बर्तन की गढ़ाई करते थे और लकड़ी का बड़ा सा हथोड़ा जब पीतल की प्लेट पर पड़ता तो ‘घन’ ‘घन’ ‘घन’ ‘घन’ की ज़ोरदार आवाज होती थी. ये आवाज़ इतनी तेज होती थी की सोया हुआ आदमी भी नींद से उठ जाये.’
‘इतने शोर से वहां कोई डिस्टर्ब नहीं होता था…?’
‘वही तो, शुरू शुरू में तो लोगों को थोड़ी तकलीफ हुई, मगर मजाल कि किसी ने भी जाकर उनसे इस बात की कोई शिकायत की हो. लोग समझते थे कि ये लोग जान बूझकर कोई शोर नहीं कर रहे हैं, अपने बच्चों का पेट भरने के लिए इस शोर को करना उनकी मजबूरी है. और इस तरह धीरे धीरे पूरे मोहल्ले को उस शोर की जैसे आदत सी हो गई थी. हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का एक हिस्सा बन कर रह गया था वो शोर. लोगों को अब वो शोर शोर नहीं एक पार्श्व संगीत लगता था, जैसा फिल्मों में डायलाग के पीछे हल्का हल्का बैक ग्राउंड म्युज़िक चलता रहता है.’
‘आप भी कमाल करते हैं दादा जी, भला इतना शोर संगीत कैसे लग सकता है.’
‘बेटा बात शोर-शराबे की नहीं है, बात है हमारी सोच की. उस समय हमारे मोहल्ले की सोच ये थी कि मेहनत करके अपना और अपने बच्चों का पेट पालने का हक़ हर किसी इंसान को है. अपनी जीविका कमाने का हक़ सबका है. अब अगर उनकी जीविका के अर्जन में कोई शोर होता है तो ये उन गरीबों की गलती तो नहीं थी.’
‘आपकी ये बड़ी बड़ी बातें मेरी समझ में नहीं आ रहीं हैं दादा जी.’
‘बेटा ये बातें तो बड़ों बड़ों की समझ में नहीं आती, तुम्हारी समझ में कहाँ से आएँगी.’
‘तब आप वो बताइये ना जो मेरी समझ में आ जाये.’
‘मेरे कहने का मतलब ये है कि उस ज़माने में लोग पड़ोस में होने वाले शोर को नॉइज़ पोल्यूशन नहीं समझते थे. जैसा की ये तुम्हारे गुप्ता अंकल समझते हैं. बल्कि कभी ठठेरों के घर से ठक ठक या घन घन की आवाज़ नहीं आती तो पूरा मोहल्ला परेशान हो जाता था, ये सोच कर कि उनके घर सब ठीक तो है. किसी तरह की कोई परेशानी तो नहीं. मोहल्ले के लोग उनके घर पहुँच जाते थे उनकी खैर-खबर लेने. उनके घर पहुँचने पर पता चलता था कि सब ठीक ठाक है और उनके पास कच्चा माल नहीं पहुंचा है, तब जाकर मोहल्ले वालों को चैन पड़ता था. अब समझ आई मेरी बात…?’
हेमंत वर्मा जी की ‘नाॅइज पाल्युशन’ कहानी हमारी पीढ़ियों के अंतर को दर्शाती है। दादा और पोते के माध्यम से लेखक ने इस अंतर को बड़े सलीके से व्यक्त कर दिया है।
आज के जमाने में लोग जरा सी बात पर संबंध बिगाड़ लेते हैं। लेकिन इससे पहले वाली पीढ़ी दूसरे की रोजी रोटी के खातिर कष्ट भी सह लेते थे।
कहने का तात्पर्य यह है कि उस पीढ़ी के लोग सहृदय थे। आज की पीढ़ी स्वार्थी व हृदयहीन हो चुकी है। बाबा पोते को अपने जमाने की कहानी सुनाते हैं। उस कहानी में ठठेरे है, उनके बर्तन हैं जो अभी-अभी बनाए गए हैं। घनन….घनन की आवाज़ें हैं। दादा जी जब उन्हें याद करते हैं तो उनके कानों में वे आवाजें गूंज उठती है। पोता कहानी सुनकर कह उठता है – योर टाइम वाज अमेजिंग।
हेमंत वर्मा जी को अच्छी कहानी के लिए बधाई।
यह कहानी अद्भुत है! आपकी लेखनी ने मानो शब्दों में जीवन भर दिया। कहानी का प्रवाह और पात्रों की भावनाएं इतनी प्रभावी हैं कि पाठक को अंत तक बांधे रखती हैं। आपकी रचनात्मकता और संवेदनशीलता प्रशंसनीय है। उम्मीद है, भविष्य में भी आपकी ऐसी ही और शानदार कहानियां पढ़ने को मिलेंगी।
हेमंत जी!
आपकी कहानी नॉइज़ पॉल्यूशन पढ़ी।
यह बात सही है कि जब भी कोई भवन-निर्माण अपने घर के आस-पास होता है या कोई सुधार कार्य होता है तो जब तक पूरा हो नहीं जाता, एक सिर दर्द की तरह लगता है। पर यह व्यक्ति की जरूरत होती है। चाहे आपको कितना ही बुरा क्यों ना लगे लेकिन कुछ समय के लिए आपको तकलीफ सहनी होती है और सहना चाहिये भी।
पर आपकी कहानी दादाजी के मुख से निकलते ही हमें अपने अतीत में ले गई।
पहले हिंदी वर्णमाला में ठ से ठठेरा ही पढ़ाया जाता था और उसमें हथौड़े से बर्तन को ठोकते हुए एक पुरुष का चित्र होता था। हमारा परिवार उसी पेशे से जुड़ा हुआ था। और हम उसी समाज से हैं।
हमारे पिता फ्रीडम फाइटर थे वे राजनीति में सक्रिय रहे। बर्तन तो नहीं बनाए लेकिन बर्तन की दुकान थी। पर हमारे परिवार का पेशा यही था बड़े पिताजी वगैरह यही काम करते थे। कहीं ठठेरे ,कहीं कसेरे,कहीं तमेरे। नागपुर,रायपुर साइड तो कसार समाज चलता है। लगभग हर जगह शहरों में एक कसेरा मोहल्ला जरूर है। हमारे बड़े पिताजी वगैरह सरनेम भी कसार ही लिखते थे लेकिन हमारे पिताजी वर्मा लिखने लगे। हमारा समाज हैहयवंशी कहलाता है।
सुबह उठते से ही चाय पीकर सभी पुरुष काम में लग जाते थे। हमारे घर गुंड, बना करती थीं छोटी से बहुत बड़ी-बड़ी तक।
जब हम थोड़े बड़े हुए, हम सोचा करते थे कितनी आवाज होती है यह सब लोग जल्दी बहरे हो जाएंगे। पर जब बन जाती थी गुंड तो बहुत सुंदर लगती थी।
वह समय कठोर शारीरिक श्रम का था और यह काम तो अभी भी होता है।
जिस माहौल में अपन रहते हैं धीरे-धीरे उस माहौल की आदत हो जाती है इसलिये कुछ बुरा नहीं लगता और फिर यह जीवन यापन का साधन था।आज भी है काम होता है। सामान्यतः पहले संयुक्त परिवार हुआ करते थे और यह पेशा एक से दूसरे को स्वत: मिल जाता था। जो बच्चे पढ़ नहीं पाते वह इस काम में लग जाते थे।वह जो पढ़ लिख जाते थे वह नौकरी में आगे निकल जाते थे।
पर इस कहानी को पढ़ते हुए अपने ही घर के अपने अनेक अज़ीज़ आँखों के सामने आकर खड़े हो गए जिनसे बेइंतहा प्यार मिला। जिन्होंने हमारे बचपन को दुलारा, लड़की होकर भी सर पर चढ़ा के रखा, सब याद आए। और आँखों में आँसू भी भर आए।
कहानियाँ सिर्फ कहानियाँ नहीं होतीं। कहीं ना कहीं वह जीवन की सच्चाई होती हैं। उसे देखता,समझता और भोगता कोई और है, लिखता कोई और है और प्रभाव पाठकों पर पड़ता है।
दादाजी ने बहुत ही सलीके से, कहानी के माध्यम से, जीवन की सच्चाई को और उसमें अंतर्निहित संवेदनाओं को, भावनाओं को, एक बाल मन को समझाने के प्रयास के साथ अतीत और वर्तमान के बीच में आए समय के अंतर को समझाया।
इस बेहतरीन ,सच्ची और प्रेरणास्पद कहानी के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई हेमंत जी।
बहुत बहुत शुभकामनाएं जी,
कहानी पुरानी यादें ताजा करती हुई,मजा आ गया ,एक ही सांस में पढ़ ली।
शहरी व ग्रामीण जीवन का भेद करती ये कहानी आज की कटु सच्चाई को प्रदर्शित करती है।
हेमंत वर्मा जी की ‘नाॅइज पाल्युशन’ कहानी हमारी पीढ़ियों के अंतर को दर्शाती है। दादा और पोते के माध्यम से लेखक ने इस अंतर को बड़े सलीके से व्यक्त कर दिया है।
आज के जमाने में लोग जरा सी बात पर संबंध बिगाड़ लेते हैं। लेकिन इससे पहले वाली पीढ़ी दूसरे की रोजी रोटी के खातिर कष्ट भी सह लेते थे।
कहने का तात्पर्य यह है कि उस पीढ़ी के लोग सहृदय थे। आज की पीढ़ी स्वार्थी व हृदयहीन हो चुकी है। बाबा पोते को अपने जमाने की कहानी सुनाते हैं। उस कहानी में ठठेरे है, उनके बर्तन हैं जो अभी-अभी बनाए गए हैं। घनन….घनन की आवाज़ें हैं। दादा जी जब उन्हें याद करते हैं तो उनके कानों में वे आवाजें गूंज उठती है। पोता कहानी सुनकर कह उठता है – योर टाइम वाज अमेजिंग।
हेमंत वर्मा जी को अच्छी कहानी के लिए बधाई।
यह कहानी अद्भुत है! आपकी लेखनी ने मानो शब्दों में जीवन भर दिया। कहानी का प्रवाह और पात्रों की भावनाएं इतनी प्रभावी हैं कि पाठक को अंत तक बांधे रखती हैं। आपकी रचनात्मकता और संवेदनशीलता प्रशंसनीय है। उम्मीद है, भविष्य में भी आपकी ऐसी ही और शानदार कहानियां पढ़ने को मिलेंगी।
https://www.thepurvai.com/story-by-hemant-verma/
हेमंत जी!
आपकी कहानी नॉइज़ पॉल्यूशन पढ़ी।
यह बात सही है कि जब भी कोई भवन-निर्माण अपने घर के आस-पास होता है या कोई सुधार कार्य होता है तो जब तक पूरा हो नहीं जाता, एक सिर दर्द की तरह लगता है। पर यह व्यक्ति की जरूरत होती है। चाहे आपको कितना ही बुरा क्यों ना लगे लेकिन कुछ समय के लिए आपको तकलीफ सहनी होती है और सहना चाहिये भी।
पर आपकी कहानी दादाजी के मुख से निकलते ही हमें अपने अतीत में ले गई।
पहले हिंदी वर्णमाला में ठ से ठठेरा ही पढ़ाया जाता था और उसमें हथौड़े से बर्तन को ठोकते हुए एक पुरुष का चित्र होता था। हमारा परिवार उसी पेशे से जुड़ा हुआ था। और हम उसी समाज से हैं।
हमारे पिता फ्रीडम फाइटर थे वे राजनीति में सक्रिय रहे। बर्तन तो नहीं बनाए लेकिन बर्तन की दुकान थी। पर हमारे परिवार का पेशा यही था बड़े पिताजी वगैरह यही काम करते थे। कहीं ठठेरे ,कहीं कसेरे,कहीं तमेरे। नागपुर,रायपुर साइड तो कसार समाज चलता है। लगभग हर जगह शहरों में एक कसेरा मोहल्ला जरूर है। हमारे बड़े पिताजी वगैरह सरनेम भी कसार ही लिखते थे लेकिन हमारे पिताजी वर्मा लिखने लगे। हमारा समाज हैहयवंशी कहलाता है।
सुबह उठते से ही चाय पीकर सभी पुरुष काम में लग जाते थे। हमारे घर गुंड, बना करती थीं छोटी से बहुत बड़ी-बड़ी तक।
जब हम थोड़े बड़े हुए, हम सोचा करते थे कितनी आवाज होती है यह सब लोग जल्दी बहरे हो जाएंगे। पर जब बन जाती थी गुंड तो बहुत सुंदर लगती थी।
वह समय कठोर शारीरिक श्रम का था और यह काम तो अभी भी होता है।
जिस माहौल में अपन रहते हैं धीरे-धीरे उस माहौल की आदत हो जाती है इसलिये कुछ बुरा नहीं लगता और फिर यह जीवन यापन का साधन था।आज भी है काम होता है। सामान्यतः पहले संयुक्त परिवार हुआ करते थे और यह पेशा एक से दूसरे को स्वत: मिल जाता था। जो बच्चे पढ़ नहीं पाते वह इस काम में लग जाते थे।वह जो पढ़ लिख जाते थे वह नौकरी में आगे निकल जाते थे।
पर इस कहानी को पढ़ते हुए अपने ही घर के अपने अनेक अज़ीज़ आँखों के सामने आकर खड़े हो गए जिनसे बेइंतहा प्यार मिला। जिन्होंने हमारे बचपन को दुलारा, लड़की होकर भी सर पर चढ़ा के रखा, सब याद आए। और आँखों में आँसू भी भर आए।
कहानियाँ सिर्फ कहानियाँ नहीं होतीं। कहीं ना कहीं वह जीवन की सच्चाई होती हैं। उसे देखता,समझता और भोगता कोई और है, लिखता कोई और है और प्रभाव पाठकों पर पड़ता है।
दादाजी ने बहुत ही सलीके से, कहानी के माध्यम से, जीवन की सच्चाई को और उसमें अंतर्निहित संवेदनाओं को, भावनाओं को, एक बाल मन को समझाने के प्रयास के साथ अतीत और वर्तमान के बीच में आए समय के अंतर को समझाया।
इस बेहतरीन ,सच्ची और प्रेरणास्पद कहानी के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई हेमंत जी।