Wednesday, February 11, 2026
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जयंती रंगनाथन की कहानी – पापा की बेटी

एकबारगी मन हुआ कि घर जाने के लिए बस के बजाय ऑटो कर ले। नीले रंग के पर्स मंे उसकी खुशियों की चाबी बना वो ऑफर लेटर पेट में गुदगुदी सा कर रहा था। पर्स टटोला, दो सौ रुपए थे। ऑटो करेगी, तो सौ का पत्ता तो वहीं निकल जाएगा। नहीं, उससे अच्छा है कि जाते समय हीरा हलवाई से पाव भर बालूशाही ले लेगी। मम्मी को कितना पसंद है। दादी भी नाना करते एक पीस तो खा ही लेंगी।
मेधा को दस मिनट इंतजार करने के बाद बस मिल गई। रास्ता और दिनों की अपेक्षा लंबा लगा। हर स्टॉप पर बस रुकती, तो दिल की धडक़न बढ़ जाती। मां को कैसा लगेगा, जब वह बताएगी कि उसे नौकरी मिल गई है? वो भी बैंगलोर में। मां को पता तो था कि इन दिनों कॉलेज में कैंपस इंटरव्यू चल रहे हैं। मां उससे कई दिनों से पूछ रही थी, मेधा, तुझे आगे पढऩा तो नहीं है? मेरे स्कूल में सब कह रहे थे कि इंजीनियरिंग के बाद अगर तू एमबीए कर लेगी, तो तेरे लिए अच्छा होगा।
मेधा मुस्करा कर बोली थी,‘मां, दोतीन साल बाद में करूंगी एमबीए। अभी तो मुझे नौकरी करनी है, पैसा कमाना है, तुम्हारे लिए ढेर सी चीजें लानी है।
मां के चेहरे पर इस बात से खुशी आनी थी, पर मेधा को पता था कि वो कुछ बातों को ले कर घबराती हैं। वैसे भी उनकी जिंदगी में सबकुछ आसान तो था नहीं।
स्टॉप पर उतर कर मेधा हीरा हलवाई की दुकान पर पहुंची ही थी कि सामने पड़ोस में रहने वाले कुलवंत अंकल नजर गए, ‘बिटिया, अपने बाबूजी के लिए मिठाई लेने आई हो?’
मेधा चौंक गई। अंकल निकल लिए। मिठाई लेने का उत्साह कम सा हो गया। बाबूजी? पापा घर गए? क्यों?
वह बिना मिठाई लिए झटपट घर चली आई। उनके घर के सामने छोटीमोटी भीड़ लगी थी। मेधा की आंखें मां को ढूंढ़ रही थी। पर सामने नजर आए चांद चाचा। पापा के बचपन के दोस्त। मेधा ने आगे बढ़ कर उनके पांव छुए। वे गदगद हो कर बोले, ‘कुडि़ए, तेरा बाबा लौट आया है। खुशियां मना। देख, मेरा यार घर गया, पूरे दो साल बाद।
किसी तरह भीड़ से रास्ता बना कर मेधा पीछे के रास्ते रसोई में घुसी। मां चाय बना रही थीं। सिर पर हलका सा आंचल। चेहरा पसीने से तरबतर। 
मेधा को देख कर मां की आंखों में हलकी सी चमक आई। मेधा को कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था। उसने कुछ रुखाई से पूछा, ‘मां, बाबा घर क्यों गए? सब ठीक चल रहा है उनके बिना भी। अब क्यों आए हैं? कित्ते दिन रहेंगे?’
मां ने कुछ जवाब नहीं दिया। ढेर सारे कप मंे चाय छान कर उन्होंने ट्रे में रखा और मेधा से कहा, ‘जा, बाहर जा कर दे आ। तेरे बाबूजी कब से चाय के लिए कह रहे हैं।
मेधा के होंठ व्यंग्य से टेढ़े हो गए, ‘ये साधूसंन्यासी कब से चाय पीने लगे?’ मां को कुछ जवाब दिए बिना वह ट्रे उठा कर बाहर ले आई। कमरे के बीचोबीच मेज पर उसने ट्रे रख दिया। दादी और छोटा भाई मनु वहीं बैठे थे। दादी ने उसे अपने पास खींच कर कहा, ‘पहचाना इसे महादेव? मेधा बिटिया है। इस साल पूरी इंजीनियर बन गई है। एक नंबर की होशियार है। बाहर का सारा काम ये ही करती है।
मेधा ने ना चाहते हुए भी पापा की तरफ निगाह डाली। पहले से और भी बूढ़े लग रहे थे। बड़ी सफेद दाढ़ी, आंखों के नीचे काले गड्ढे, पिचके गाल। मेधा के सिर पर हाथ रख कर बाबा बोले, ‘ये तो मेरी सबसे होनहार बिटिया है।मेधा बिना कुछ कहे पीछे सरक गई।
होनहार बिटिया, पापा की लड्डू, गुडिय़ापुडिय़ायही तो बुलाते थे उसे पापा। पर ये वो वाले पापा नहीं हैं, जो उसका हाथ पकड़ कर उसे संगीत सिखाने ले जाते थे, रात भर जाग कर गणित सिखाते, उसके बीमार पढऩे पर दस मिनट में डॉक्टर को घर ले आते और रात भर उसके सिराहने बैठ कर जागा करते।
वो शायद सातवीं में पढ़ती थी। छोटू दूसरी में। पापा एक कारखाने में काम करते थे। बीमार रहने लगे। हमेशा खांसते रहते। नौकरी छूट गई। मां स्कूल में पढ़ाती थी। पापा ने बहुत इलाज करवाया। फिर किसी ने कहा कि हरिद्वार में एक सिद्ध योगी हैं। वे बड़ी सी बड़ी बीमारी ठीक कर देते हैं। पापा वहां गए। कई महीनों बाद लौटे, तो पैंटशर्ट की जगह गेरुआ धोतीकुर्ता में थे। सबने कहापापा साधू बन गए हैं। पापा बदल गए थे। मेधा को उनसे डर लगने लगा। वह दूर खड़ी देखती, पापा को। मम्मी से कहती, ‘ये मेरे पापा नहीं हैं। ये तो कोई साधू बाबा हैं।
मां कुछ कहती नहीं, उनकी आंखें दिनबदिन सूखती जा रही थीं। बहुत संघर्ष वाले दिन थे। मां दोनों हाथ खींच कर घर चलाती। दादी पापड़ और बडिय़ां बना कर बिकने दुकान में दे आतीं। मेधा के बस में बस एक ही चीज थी कि वह खूब पढ़े, क्लास में फस्र्ट आए। 
पापा छह महीने में एक बार आते। दोतीन घर में रहते। उनसे मिलने दूरदूर से लोग आते। पापा सबको बिठा कर ज्ञान की बातें बताते, नीति की कहानियां सुनाते। कहतेसुख और दुख में एक सा रहो। सुख में डूबो मत, दुख मंे तैरो मत। अपने शरीर से प्यार मत करो, आत्मा से करो।
मेधा को अजीब लगता। स्कूल में उसकी सहेलियों के पिता इंजीनियर, डॉक्टर, पत्रकार थे और उसकेसाधू बाबा। पर जल्द ही उसने समझ लिया कि जिंदगी अब एेसी ही कटेगी। उसके प्यारे पापा अब नहीं लौटेंगे। जो कुछ है, वह मां है और मां का संघर्ष है।
शाम तक घर में आने जाने वालों का तांता लगा रहा। मेधा के बैग में रखी खुशियांे की चाबी ठंडी पड़ी थी। एकबारगी लगा जैसे अब उसके हाथ कभी ताला लगेगा ही नहीं। 
उसे इंजीनियरिंग कॉलेज भेजने के पीछे मां को सबसे कितना लडऩा पड़ा था। छोटे चाचा, बुआ सब मां को नसीहतें दे रहे थे कि बेटी के पीछे इतना क्यों खर्च कर रही हो? एक बार इसके बाबूजी से भी तो पूछ लो। उस दिन पहली बार मां ने जरा जोर से कहा, ‘बेटी मेरी है, मुझे पता है इसके लिए क्या सही है क्या गलत।
उस दिन मेधा की नजरों में मां का स्थान और बढ़ गया।
रात को खाने के बाद दादी ने मां को आवाज दी, मेधा भी उनके पीछेपीछे बड़े कमरे में गई। गर्मियां शुरू हो चुकी थीं। पलंग पर बाबा लेटे हुए थे। दादी उनके पास बैठी थी। मां को देखते ही दादी बोलीं, ‘धीरा, मेरा बेटा घर वापस गया है। अब यहीं रहेगा। देख, कितना बीमार पड़ गया है। मैं तो कह रही हूं इससे कि अब कहीं ना जाए, तुम भी कहो इससे कि यहीं रहे।
मां का चेहरा गंभीर हो गया। मेधा ने चेहरा आगे निकाल कर कहा, ‘दादी, उस वक्त कहां थे पापा, जब हम छोटे थे और हमें उनकी जरूरत थी?’
दादी ने झिडक़ दिया, ‘मेधा, एेसा नहीं कहते, तेरे बाबूजी हैं। इतनी बड़ी हो गई है तू?’
मेधा की आंखें डबडबा आईं, ‘बच्ची तो तब थी दादी, अब तो बड़ी हो गई हूं। सब देख लिया। अब ना खुद सहूंगी ना मां को सहने दूंगी। वैसे भी मुझे बैंगलोर में नौकरी मिल गई है। मैं मां और मनु को ले कर जा रही हूं। आप दोनों को जो करना हो कीजिए।
सबको हक्काबक्का छोड़ मेधा अपने कमरे मंे चली गई। दिल तो भरा ही था, वह फूटफूट कर रोने लगी। मां पीछे से गई, ‘तुमने बताया नहीं मेधा, नौकरी मिल गई?’
रोतेरोते मेधा मां के गले लग गई, ‘मैं आपको बताने वाली थी। पर घर में यह सब देख कर हिम्मत नहीं हुई। आप मेरे साथ बैंगलोर चलेंगी ना?’
मां ने उसका चेहरा अपनी तरफ करके कहा, ‘सब ठीक हो जाएगा बेटू।
मेधा बिफर गई, ‘इसका मतलब है आप नहीं चलेंगी? मुझे पता था, आप ओल्ड फैशन्ड हैं। इतना सब होने के बाद भीमां, उस आदमी ने आपके साथ इतना गलत किया और आप हैं कि उसीका पक्ष ले रही हैं?’
मां की आवाज शांत थी,‘मेधा, रात बहुत हो गई है। सो जाओ। कल बात करेंगे।
सुबह बहुत देर से आई। मेधा उठी, तो आंखें जल रही थी। बिना कुछ खाएपिए वह कॉलेज चली गई। दोपहर को वह लाइब्रेरी मंे थी, छोटू का मोबाइल पर मैसेज गयादीदी, घर जाओ, अर्जेंट।
मेधा छोटू को फोन लगाती रही, उसका फोन नहीं लगा। वह तुरंत ऑटो पकड़ कर घर पहुंची। रास्ते भर उसे मां की चिंता लगी रही। वह उनसे बिना कुछ कहेसुने चली आई। कहीं उन्हें कुछ हो तो नहीं गया?
आज घर के सामने शांति थी। एेसा लगा, जैसे बरसों से घर खाली पड़ा हो। बड़े कमरे मंे दादी पलंग पर लेटी थी। मेधा को देखते ही उन्होंने मुंह फेर लिया और रोने लगीं। मेधा मांमां पुकारती अंदर चली गई। मां आंगन मंे चबूतरे पर चुपचाप बैठी थीं, उनके बगल मंे मनु। मां की आंखें नम थीं। उन्होंने कुछ कहा नहीं। मनु जल्दी से बोला, ‘दीदी, सुबह नाश्ता करने के बाद पापा घर से चले गए।’ 
पता नहीं, तुम्हारे नाम एक चि_ छोड़ गए हैं। दादी तब से रो रही हैं, कह रही हैं कि अब बाबा कभी घर नहीं आएंगे।
मेधा का दिल बैठ गया। पापा की चिट्टी? मनु ने इशारा किया, मां ने फ्रिज के ऊपर रखा है।
मेधा दौड़ के गई। पुराने से कागज में पापा ने लिखा थामेरी गुडिय़ा, मुझे माफ करना। मैं तुम लोग की तरह मोबाइल, मैसेज करना नहीं जानता। बस तुमसे कहना चाहता था कि मैंने जो कुछ भी तुम्हारे साथ किया, नहीं किया, उसके लिए लिए सॉरी। कई बार आप जो निर्णय लेते हैं, उसका असर आपको बहुत बाद में पता चलता है। मुझे पता है कि मैंने तुम लोगों के साथ बहुत गलत किया है। तुम एक नई जिंदगी की तरफ बढ़ रही हो। तुम्हारी कामयाबी के पीछे तुम्हारी मां का हाथ है। तुम सब खुश रहो। 
मेधा की आंखें बरसने लगीं। उसके पुराने पापा। कितने बीमार हैं। कहां जाएंगी बीमारी मंे
रात तक घर मंे शोक छाया रहा। मेधा मां से आंखें मिलाने की हिम्मत नहीं कर पाई। दादी बिस्तर पर औंधी पड़ी रही और बेचारा मनु इधरउधर चक्कर काटता रहा कि कोई तो उसे पूरी बात बता दे।
मां ने किसी तरह खिचड़ी बनाई। दादी ने खाने से मना कर दिया। मेधा के सामने प्लेट रखते हुए मां बोलीं, ‘मेधा, मैंने तो जिंदगी में तुझसे ज्यादा दुख देखे हैं। मुझे पता है कि परिस्थितियांे का सामना कैसे करना है। कुछ दिन रुक जाती बेटा, सबकुछ ठीक करने की जल्दी में देख तूने क्या कर दिया?’
मेधा मां से लिपट गई, ‘मां, मैंने क्या कर दिया? पापा अब कभी वापस नहीं आएंगे ना?’
उसकी पीठ थपथपा कर मां कमरे से बाहर निकल गई। अचानक मनु जोर से चिल्लाया, ‘दीदी, बाहर आओ।
किसी के कुछ बोलने की आवाज आई। अपने आंसू पोंछ मेधा बाहर निकलीबड़े कमरे में पापा खड़े थे, दाढ़ी बनी हुई थी, बाल कटे हुए थे। पापा ने शर्ट और पाजामा पहन रखा था। हाथ में सामान। 
दादी से कह रहे थे, ‘अम्मा, मैंने हीरा हलवाई की दुकान में काम ले लिया है। मैं बहुत बढिय़ा मिठाई बनाता हूं अम्मा, कल ही चखाऊंगा तुम सबको।
मेधा दौड़ कर उनके पास गई। उसके पहले वाले पापा उसके सामने खड़े थे, ‘गुडिय़ा, मेरे पास आ। कितनी बड़ी हो गई है मेरी बिटिया, मुझे जिंदगी सिखा गई। देख बेटा, अपनी मां को हमेशा खुश रखना। अब मैं चाहता हूं कि मैं काम करूं और वो आराम।
मेधा को इस वाले पापा से डर नहीं लगा। वो तो वही थी उनकी लड्डू बेटी। उसने पापा के गले लगते हुए देखा, मां की आंखें नम थी और सालों बाद होंठों पर मुस्कान थिरक रही थी।
जयंती रंगनाथन
जयंती रंगनाथन
लेखिका वरिष्ठ पत्रकार, संपादक एवं कहानीकार हैं. संपर्क - [email protected]
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2 टिप्पणी

  1. प्रिय जयंती रंगनाथन एक उम्दा कहानी “पापा की बेटी” हमारे भारतीय समाज में परिवार नाम की एक बेहद मजबूत संस्था है इसके बंधन हम चाह कर भी नहीं तोड़ पाते, पति चाहे निकम्मा हो शराबी हो जुआरी हो लेकिन उसकी पत्नी का उसके रहते सुहागन का शगुनआत्मक रूप धारन रहता है, एक मां के लिए बेटा चाहे जैसा भी क्यों ना हो मां के लिए कभी बोझ नहीं होता वह उसकी मंगल कामना ही करती रहती है ,उसके जीवित रहने पर ही उसका मातृत्व शांत रहता है। हां परिवार का भरण पोषण न करने पर परिवार में उस व्यक्ति के प्रति वितृष्णा अवधि रहती हे लेकिन मैने कहा न उस व्यक्ति के भी जीवित रहते रिश्ते
    घिसटते रहते हैं ,मरते नहीं
    जयंती जी की इस कहानी में बेटी को नौकरी का लेटर प्राप्त हो चुका हे ,वो अपनी संघर्ष करके गृहस्थी संभालती मां को यह खबर सुनाना चाहती है,परंतु घर पर आकर उसकी खुशी पर पानी फिर जाता हे जब वो अपने घर से साधु बनकर पलायन कर चुके
    पिता को देखती हे ,जब दादी पिता को बताती हे यही घर की देखभाल करती हे ,बहुत होशियार हे ,परंतु बेटी को नागवार गुजरता हे जब पापा उसे प्यारी पापा की बेटी कहते हैं ,वह तंज कसती हे तब कहां थे ,जब हम छोटे थे
    पिता इतनी सी बात पर उन्हें अपना कर्तव्य बोध होता हे ,वो पुनः साधुवेश बदलकर कर्म करने के लिए उद्धत हो जाते हैं
    एक भारतीय परिवेश की रिश्ते का वजन हर हाल में भरी होता हे ,चाहे अच्छा या बुरा नतीजा क्यों न हो
    प्रिय जयंती जी बहुत बधाई सुंदर कथानक के लिए।

  2. जयंती जी !आपकी कहानी पढ़ी। आँखें भर आईं। बड़ी मार्मिक लगी।पिता तो घर की, परिवार की, छत की तरह होते हैं।अपने पारिवारिक उत्तरदायित्व को भूलकर अगर वो संन्यासी हो जाएँ तो निश्चित ही तकलीफ की बात है। पत्नी के लिए ही नहीं बच्चों के लिएं में भी, माँ के लिए भी। बीमारी का इलाज तो हो सकता है पर इस तकलीफ का सुधरना ज्यादा जरूरी था। अंत अप्रत्याशित लेकिन सुखद रहा।
    मेधा की बात से पिता को चोट पहुँची। और पिता की चिट्ठी से मेधा का मन परिवर्तित हुआ। सारी स्थितियाँ एकाएक परिवर्तित हो गईं। कहानी के अंत में कहानी के शीर्षक ने अपनी सार्थकता सिद्ध की। अंततः पापा की बेटी पापा को वापस घर लाने में सफल हुई।
    एक कहावत है कि सुबह का भूला अगर शाम को घर लौट आए तो वह भूला नहीं कहलाता। और फिर अंत भला तो सब भला।
    पर अंत ने आँखों में खुशी के आँसू भर दिये।
    बेहतरीन कहानी के लिए आपको बहुत-बहुत बधाइयां जयंती जी।
    प्रस्तुति के लिए तेजेंद्र जी का शुक्रिया और पुरवाई का आभार!

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