Sunday, July 21, 2024
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नरेंद्र कौर छाबड़ा की कहानी – कर्फ्यू

पूरा शहर परसों से कर्फ्यू के आगोश में समाया है. हर ओर सन्नाटा ,दहशत, दम घोटू चुप्पी छाई हुई है. दोपहर के समय गहरे सन्नाटे में कोई कुत्ता भोंकने पर रात्रि के तीसरे चौथे पहर का भ्रम हो जाता है . सभी लोग घरों में कैद अजीब सी छटपटाहट महसूस कर रहे हैं विशेषकर पुरुष वर्ग और बच्चे. पता नहीं कब उठेगा कर्फ्यू ? 
पापा यह कर्फ्यू क्यों लगाया जाता है इसका अर्थ क्या होता है ?”10 वर्षीय सोनू मुझसे पूछ रहा है. वक्त काटने के लिए पत्रिका पढ़ रहा मैं क्षणभर रुक कर उसे समझाने लगता हूं – “ जब किसी शहर, कस्बे की स्थिति किसी कारणवश नियंत्रण से बाहर हो जाए तो उसे सेना व पुलिस के हाथ में सौंप दिया जाता है यही कर्फ्यू होता है . इस दौरान सब बंद रहता है केवल पुलिस ही सड़कों पर गश्त लगाती है और स्थिति पर नियंत्रण रखती है. कोई व्यक्ति भी घर से बाहर नहीं आ सकता” .
उसका अगला प्रश्न था – “ लेकिन शहर की स्थिति बिगड़ती क्यों है?”
कुछ लोग दंगे फसाद करते हैं तभी स्थिति बिगड़ती है”. मैंने संक्षिप्त का उत्तर दिया.
पर वे लोग दंगे फसाद क्यों करते हैं अपना अपना काम क्यों नहीं करते ?” सोनू के प्रश्न का मेरे पास उत्तर नहीं था फिर भी उसकी जिज्ञासा शांत करने के लिए मैंने कहा- “ कुछ लोगों को अमन चैन शांति पसंद नहीं होती . उनके शैतान दिमाग में तोड़फोड़ , खून खराबा , मारपीट जैसी हरकतें भरी होती हैं . मौका देखकर वही ऐसी स्थिति पैदा करते हैं …..”
लेकिन इससे तो नुकसान ही होता है ना कोई फायदा तो नहीं ना .,?” उसकी बाल सुलभ जिज्ञासा चरम पर थी
नहीं …”
“ फिर लोग नुकसान वाले कार्य क्यों करते हैं? क्या उन्हें पता नहीं होता इसमें कोई लाभ नहीं…..” सोनू के तर्कपूर्ण प्रश्नों के उत्तर देना मेरे लिए संभव नहीं था. टालने की गरज से मैंने कहा- “ बेटा इधर देखो , इस पत्रिका में कितनी अच्छी प्रश्नोत्तरी आई है..” 
वह पत्रिका देखने में रम गया तो मैंने राहत की सांस ली. पत्नी रसोई में थी मैंने वहीं से आवाज लगाई – “ जरा एक कप चाय तो बना दो सिर में भारीपन सा महसूस हो रहा है”. बिना दूध की काली चाय का कप कमाते पत्नी भुनभुनाई – “ पता नहीं बगैर काम के ही तुम्हारा सिर भारी क्यों हो रहा है?  महीने के आखिरी दिन हैं सारे डिब्बे खाली हो रहे हैं. तुम चाय पर चाय ……”
उसका खीझना भी जायज है . बच्चे सारा दिन घर रहने पर धींगाकुश्ती , मारपीट.  चीख चिल्लाहट मचाते हैं . कभी एक शिकायत लेकर आता है तो कभी दूसरा. ढाई कमरे के घर को बेतरतीब बनाने में भी उन्हें समय नहीं लगता .पत्नी एक कमरा साफ कर दूसरे में आती है तो उसके वापस लौटने तक वह कमरा पूर्ववत हो जाता है. वह कलपती कहती है- “ नलायकों, तुम तो स्कूल में ही कैद रहने के लायक हो…. घर को कबाड़खाना बना रखा है पता नहीं कब अक्ल आएगी?” उस पर थोड़ी थोड़ी देर में मेरी फरमाइश – कभी पानी की, कभी नाश्ते की. कभी चाय की.
 अचानक गोली चलने की आवाज आई तो बच्चे सहमकर मेरे इर्द-गिर्द बैठ गए. पत्नी भी वहीं आकर बैठ गई.
पापा , यह गोली किसने चलाई होगी…?” 8 वर्षीय टिंकू सहमते हुए पूछ रहा था.
पुलिस ने….”
किसको मारा होगा?”
देखो बेटा ,कई बार डराने के लिए पुलिस हवा में गोली चलाती है किसी को मारती नहीं..” मैंने समझाया.
पर कर्फ्यू में तो सब घर के अंदर रहते हैं सड़क पर तो कोई आता नहीं फिर किस को डराने के लिए गोली चलाते हैं.…” यह सोनू था.
कुछ लोग कर्फ्यू के दौरान भी नियम को तोड़ते हुए सड़कों पर तोड़फोड़ मारपीट करते हैं तो पुलिस को गोली चलानी पड़ती है…” बच्चे बिना पलकें झपकाए हैरत से सुन रहे थे. शायद उनके होश संभालने के बाद अपने शहर में कर्फ्यू का यह पहला अवसर था.
उन्हें गोली से डर नहीं लगता ?” सहमे हुए टिंकू ने पूछा तो मैंने बातचीत का रुख पलटते हुए कहा- “बेटा जाओ जरा एक गिलास पानी तो ले आओ मेरे लिए….” बेमन से वह उठकर चला गया. मैं पत्नी से दूसरे विषय पर बातचीत करने लगा ताकि दोबारा सोनू या टिंकू उसी विषय को ना ले बैठें
शायद रात का दूसरा पहर था. हल्के से शोरगुल की आवाज आई . साथ ही फायर ब्रिगेड की घंटियों की तीखी टनटनाहट से मैं हड़बड़ा कर उठ बैठा. पत्नी भी उठ गई थी. तेजी से खिड़की की ओर बढ़ा तो देखा कुछ दूरी पर आग की लपटें मानो आकाश को निगलना चाह रही थी. रात की नीरवता के कारण लोगों का हल्का सा शोरगुल भी सुनाई पड़ रहा था. घबराहट व भय से मैं एक शब्द भी ना बोल पाया. पत्नी ही बोली – “ उस इलाके में तो लकड़ी की दुकाने हैं ना! शायद वही कहीं आग लगाई गई है लेकिन कर्फ्यू में भी इतनी हिम्मत है लोगों में..! किसी को कोई डर ही नहीं..”
गुंडों , उच्चक्कों को काहे का डर किसका डर …?  मैं क्रोध से उत्तेजित हो बोलता गया- “ उनकी पीठ पर तो अवसरवादी, सत्ता लोलुप नेताओं का हाथ होता है . दंगे फसाद की योजना भी लोग ही मिलकर बनाते हैं अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए और होम होना पड़ता है निरपराध लोगों को…”
 पुलिस की गाड़ियां सड़कों पर दौड़ने लगी थी ताकि लोग बाहर ना आ जाएँ . दो बार खिड़की में से देखा कभी लपटें अधिक भयानक हो जाती कभी कुछ कम हो जाती. सोने की कोशिश तो बेकार ही थी इतने तनाव में नींद किसे आनी थी?  पता नहीं कितने निरपराध लोगों की रोजी-रोटी स्वाहा हो गई होगी.
 सवेरे अखबार वाले ने घंटी बजाई तो लपक कर दरवाजे पर पहुंचा शुक्र है कर्फ्यू पास लेकर यह लोग अखबार तो डाल जाते हैं. खबरों की जानकारी तो प्राप्त हो जाती है. पहले पृष्ठ पर ही बड़े अक्षरों में खबर थी- “ मुल्ला हुसैन के लकड़ी के पीठे में कुछ शरारती तत्वों ने देर रात को आग लगा दी. उसके साथ की चार और दुकाने जिनके मालिक क्रमशः श्याम लाल, मदन लाल, असगर अली और इकबाल अली है वह भी पूरी तरह भस्म हो गई हैं. कुछ पान व चाय की टपरिया जो इन  दुकानों के इर्द-गिर्द थी वह भी खाक हो गई. भागते हुए अपराधियों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है. इस अग्निकांड में करोड़ों के नुकसान का अनुमान है.
 खबर पढ़कर मन वितृष्णा से भर उठा आखिर कब ऐसी शर्मनाक हरकतों को आम आदमी लाचारी से देखता व सहन करता रहेगा? क्या हजारों लाखों कुर्बानियों के बाद प्राप्त हुई आजादी की यही उपलब्धि है ..?
सुनते हो कर्फ्यू में ढील की संभावना है क्या…?” पत्नी ने मुझे अखबार में सिर गड़ाए देखते हुए पूछा .
तुम भी कैसी बातें करती हो..!  अभी रात को इतना भीषण अग्निकांड हुआ है कर्फ्यू में ढील कैसे दी जाएगी..?” मैंने अपना  ज्ञान बघारा.
बड़ी मुश्किल हो जाएगी . सब्जियों की जगह दालों से तो काम चल रहा है पिछले 3 दिनों से, पर अब आटा भी खत्म होने वाला है…,” पत्नी ने परेशान होते हुए कहा.
कितने दिनों का है अभी…?” मैंने पूछा.
आज का दिन चल जाएगा. मुझे थोड़े ही पता था कि कर्फ्यू लगने वाला है नहीं तो एक-दो दिन पहले और डब्बा भर गेहूं पेशवा लेती ..” मैं कुछ ना कह सका क्योंकि सचमुच ही इसमें पत्नी का तो कोई दोष था नहीं. केवल इतना ही अपनी ओर से कहा- “चावल तो होंगे ना उन से काम चलाओ तब तक….” हालांकि मैं स्वयं जानता था कि महीने का अंत होने के कारण सभी राशन के डिब्बे खाली होने वाले होंगे. हम मध्यमवर्गीय , अति साधारण लोगों के लिए महीने भर से अधिक खाद्य पदार्थों का संग्रह संभव ही नहीं हो पाता. हर माह खींचतान कर बचाई हुई मामूली सी रकम कभी बीमारी तो कभी मेहमान नवाजी या त्योहारों के लेनदेन में फुंक जाती है. उस पर सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती महंगाई रही सही कसर पूरी कर देती है.
 इत्तेफाक से अगले दिन कर्फ्यू में 2 घंटे की ढील दी गई ताकि लोग जरूरत का सामान खरीद सकें.पत्नी ने फौरन जरूरी सामान की सूची के साथ 10 किलो गेहूं भी डब्बे में डाल मुझे थमा दिए. तनख्वाह तो कर्फ्यू उठने के बाद ही मिलने थी सो आड़े  वक्त के लिए रखे पैसों को ही निकालना पड़ा. मोहल्ले में स्थित चक्की पर मैंने डब्बा रखा तो पता लगा करीब 15 लोग पहले ही नंबर लगा चुके हैं .बड़ी कोफ्त हुई . तभी चक्की वाला बोला – “ घंटे भर में गेहूं पिस जाएगा तब तक आप दूसरे काम निपटा आएं ,”  मैंने तत्क्षण बाजार का रुख किया . दो-चार दिनों के लिए तेल, दालें .सब्जी वगैरह लेने में करीब 1 घंटा लग गया. हर दुकान पर ग्राहकों की भीड़ जैसे टूट पड़ी थी. हर कोई जल्दी सामान लेकर शीघ्र घर पहुंचना चाहता था. दुकानदार भी अफरा-तफरी से सामान बांधते हुए बीच-बीच में बाहर की ओर भी निगाहों से चौकसी कर रहे थे कहीं कोई गुंडा तत्व न आ धमके. सामान लेकर जब मैं चक्की पर पहुंचा तो पता लगा घंटे भर से बिजली ही गुल थीकेवल दो तीन लोगों के गेहूं ही पिसे थे. मैं काफी परेशान हो गया. चक्की वाले से पूछा- “ आपके पास आटा होगा ना ! मुझे 5 किलो दे दो,” 
नहीं साहब , आटा तो खत्म हो गया . आपके आने से पहले जिनके गेहूं नहीं पिसे वे लोग ले गए..”
इधर पुलिस की गाड़ियां कर्फ्यू लगने की घोषणा करने लगी थी. दौड़ते भागते सभी अपने अपने घरों की राह पकड़ रहे थे. निराशा से डिब्बा उठा मैं भी तेज कदमों से घर में दाखिल हुआ .पत्नी सारा वृत्तांत सुनकर मन मसोसकर रह गई .
जिस मुल्ला हुसैन की दुकान को आग लगाई गई थी उसका भाई हमारा पड़ोसी था. हमारे घर एकदम सटे हुए थे फिर भी हमारे संबंध दुआ सलाम तक ही सीमित थे, वैसे उनकी ओर से तो दोस्ती बढ़ाने की शुरुआत हुई थी लेकिन मेरी पत्नी ने ही उसे सीमित दायरे में बांध दिया था. अपने संस्कारों के कारण उसे किसी मुस्लिम के घर चाय पानी खाने आदि से परहेज था. कभी मैं उसके संकुचित दृष्टिकोण का मजाक उड़ाता तो वह खफा हो उठती – “ कुछ पता भी है  इनका रहन सहन कितना अजीब हैमैंने खुद इनके घर देखा है. एक सदस्य ने पानी पीकर गिलास मटके के ऊपर रख दिया. दूसरा सदस्य भी उसी प्रकार उसी गिलास में पानी पीकर मटके के ऊपर रख चला गया. जूठा गिलास मटके पर रख दिया तो वह भी तो जूठा हो गया. अब क्या उनके घर चाय पानी पीने का दिल चाहेगा?” 
मैं निरुत्तर हो गया . वहमी लोगों के सामने कोई दलील नहीं टिक सकती मैं जानता था. ईद के दिन जब उन लोगों ने मेवों से भरी सिवईयां भेजी तो पत्नी ने चुपके से राह चलते फकीर के कटोरे में उलट दीं. मुझे काफी बुरा लगा . मैंने कहा- “तुम्हें  नहीं खानी थीं तो न खाती बच्चों को तो दे सकती थी . उन लोगों ने इतने प्रेम से इतने मेवे डाल कर भेजी और तुमने भिखारी को दे दी. अगर उन्हें पता लग गया तो….”
“ लगने दो, मुझे परवाह नहीं.  मैं खाने संबंधी लेनदेन के मामले को आगे बढ़ाना नहीं चाहती …”
 उसके पश्चात भी उनकी ओर से दो चार बार कुछ पकवान , सब्जियां आई लेकिन पत्नी ने हर बार भिखारियों में बांट दीं . शायद उन्हें इस बात का पता लग गया क्योंकि सोनू के साथ खेलते वक्त उनके बेटे कादिर ने कहा – “ अब मैं तुम्हारे घर नहीं आऊंगा. तुम्हारी मां हमारे भेजे पकवान भिखारियों को बांट देती है…” सोनू खामोशी से उसका चेहरा ताकता रहा. सचमुच ही उस छोटे से बच्चे ने हमारे घर आना छोड़ दिया था. पहले खेलते वक्त अक्सर ही पानी पीने वह इधर ही आ जाता था परंतु अब तो वह झांकता भी ना था . मेरी पत्नी को कोई फर्क नहीं पड़ा . वह तो वैसे ही उनसे विशेष संबंध बनाना चाहती ही नहीं थी . लगभग दो-तीन महीने पहले खेल खेल में झगड़ते हुए कादिर ने सोनू को धक्का दे दिया था जिससे उसके पैर में मोच आ गई . पत्नी शिकायत करने गई तो कादिर की मां ने भी काफी खरी-खोटी सुना दी जिससे दोनों में बातचीत लगभग बंद हो गई. बच्चे फिर भी कभी कभार खेल बोल लेते थे . हां मेरी या कादिर के पिता की मुलाकात होती तो हम एक दूसरे की कुशलक्षेम पूछ लेते थे.
 शहर में भड़के दंगों में सरकारी खबरों के अनुसार अब तक 15 लोगों की जान जा चुकी थी और लगभग 100 से अधिक दुकानों को बुरी तरह क्षति पहुंचाई गई थी. हमारे पड़ोसी के भाई मुल्ला हुसैन का भी काफी नुकसान हुआ था अतः मैंने पत्नी से कहा कि शाम के वक्त पिछवाड़े के दरवाजे से मिलने चलेंगे. उस ओर पुलिस का पहरा नहीं है. कम से कम कम से कम सहानुभूति तो प्रकट कर रहे आखिर पड़ोसी हैं पत्नी ने पहले तो आनाकानी करते हुए इनकार कर दिया पर मेरे जोर देने पर राजी हो गई.
 शाम का धुंधलका होने पर बच्चों को दरवाजे अच्छी तरह से बंद रखने की हिदायत देकर हम पिछले  दरवाजे की ओर बढ़े . अभी कुंडी पर हाथ रखने को ही था कि भीतर से आती आवाजों ने रोक दिया- “देखा इन काफिर लोगों ने कितनी बर्बादी कर दी भाई साहब की ! बीमा भी माल के मुकाबले बहुत कम था उसे मिलने में भी तो वक्त लगेगा . उन्होंने तो कभी हिंदुओं से कोई दुश्मनी नहीं रखी. कितने ही उनके दोस्त हिंदू हैं मगर उन्हीं लोगों ने कैसा दगा दिया!”
मैं तो कहती हूं यह लोग भरोसे के काबिल ही नहीं. हम लोगों की तरक्की ये सहन ही नहीं कर पाते तभी तो हर साल 6 महीने में कहीं ना कहीं जरूर दंगे करवाते हैं. हर बार हम लोगों का ही जान माल का अधिक नुकसान होता है….. “ मेरी पत्नी ताव खा कर बोली- “अब भी सहानुभूति प्रकट करने जाओगे तुम?  अब तो अपने कानों से सुन लिया कैसी मनोवृति है उनकी हमारे बारे में…? तुम्हें जाना हो तो जाओ मैं तो घर जा रही हूं…” वह वापस पलट गई. मैं असमंजस की स्थिति में कुछ क्षण खड़ा रहा फिर कुंडी पर हाथ धर ही दिया .
कौन है …?” भीतर से कुछ तेज व तनिक घबराहट भरी आवाज आई.
मैं हूं आपका पड़ोसी विक्रम ….” मैंने धीरे से कहा. आहिस्ता से दरवाजा खुला. मुझे देखते ही बड़े घबराए से बोले – “ क्या बात है खैरियत तो है…?”
जी हां . दरअसल मुल्ला भाई के नुकसान के बारे में जानकर अफसोस हुआ उसी सिलसिले में आया था.
बैठिए ..” वे औपचारिक हो गए. मैं वहां 15 मिनट बैठा पर इन पंद्रह मिनिटों में मैंने महसूस किया कि जो प्रश्न मैंने पूछे केवल उनका उत्तर ही मिला . उनकी ओर से तो बातचीत की शुरुआत ही नहीं हुई. उनकी पत्नी ने तो कमरे के प्रवेश द्वार से मुझे देखा तो जितनी देर मैं वहां रहा वह सामने ही नहीं आई . मुझे बुरा लगा . आया था सहानुभूति जताने और बन गया उपेक्षा व घृणा का शिकार.पत्नी ठीक ही कहती थी उनकी मनोवृत्ति ही बदल गई है . खैर उपेक्षित सा मैं वापस लौट आया.
अगले दिन पुनः दो तीन स्थानों पर भयंकर आगजनी , लूटपाट और छुरेबाजी की घटनाएं हुई तो कर्फ्यू में कोई ढील ना देने की घोषणा कर दी गई. पत्नी परेशान सी बोली- “ बच्चे रोटी की मांग कर रहे हैं. कब उठेगा यह कर्फ्यू…?”
शुक्र करो तुम्हारे पास चावल तो हैं. जिनके पास कुछ नहीं,  जो रोज कमाकर, खरीद कर खाते हैं उनका क्या हाल होगा…?”  मैंने अपना आक्रोश पत्नी पर उतार डाला.
रात को फिर से कुछ आगजनी की घटनाएं घटी तो हमने अंदाज़ लगाया शायद कल भी कर्फ्यू में ढील नहीं दी जाएगी. अब तो मैं भी परेशान हो गया था. पत्नी ने बताया चावल भी चुकने वाले हैं.  अगर 2 दिन कर्फ्यू ना हटा तो क्या खाएंगे..? जब तक तनख्वाह नहीं मिलती अगले महीने का राशन लाना संभव नहीं. इस बार तो पिछले 5 दिनों से मैं और बच्चे भी सारा समय घर पर ही थे. अतः राशन कुछ जल्दी ही चुक गया था. कुछ काम ना होने पर कभी बच्चे कुछ फरमाइश करते कभी मैं. यह तो सोचा ही नहीं था कि स्थिति इतनी बिगड़ जाएगी और कर्फ्यू इतना लंबा खिंच जाएगा . इसी चिंता से रात को नींद ठीक से नहीं आ पाई थी. सुबह नीम अंधेरे ही उठ बैठा अखबार के इंतजार में. आज कल सुबह के वक्त पक्षियों का कलरव भी सुनाई नहीं पड़ता था शायद शहर की दहशत से वे भी कहीं दूर चले गए थे .
अचानक पिछवाड़े के दरवाजे की कुंडी खटखटाने की आवाज आई तो क्षण भर के लिए हम घबरा से गए. एक आतंक सा पसर गया. कौन होगा इतनी सवेरे..? दोबारा आवाज आने पर पत्नी उठी तो मैं उसे रोकते हुए दरवाजे तक गया- “ कौन है…?”
मैं आपकी पड़ोसन  कादिर की मां…”  मैंने पत्नी को इशारे से बुलाया और स्वयं दूर हट गया. पत्नी ने दरवाजा खोला . कुछ पूछने से पहले ही उसने एक छोटा सा कनस्तर पत्नी की ओर बढ़ा दिया- “ इसमें आटा है ..” 
पत्नी हतप्रभ सी उसका मुंह ताकती रह गई. इसे कैसे पता लगा?.
तुम्हारे सोनू ने कल शाम कादिर को बताया था कि तुम्हारे पास आटा नहीं है चावल भी खत्म होने को हैं..”उसने स्वयं ही खुलासा कर दिया
लेकिन ..…” पत्नी को सूझ ही नहीं रहा था क्या कहे.? शायद वह दुविधा में थी एक  ओर खाली होते राशन के डिब्बे और दूसरी ओर उसी की ओर से मिली सहायता जिसके घर का पानी पीना भी उसे गवारा नहीं था. पिछले कई महीनों से तो उनसे बातचीत की औपचारिकता भी खत्म हो चुकी थी .
मैं जानती हूं तुम्हें हमारे घर का कुछ भी खाना पसंद नहीं लेकिन इस मजबूरी में कम से कम बच्चों का ध्यान रखते हुए इसे रख लो . चाहो तो बेशक वापस लौटा देना.. और वैसे हम लोग इतने गैर तो नहीं…”
पत्नी किंकर्तव्यविमूढ़ सी उसका चेहरा ताकती रह गई. इस बार कादिर की मां कुछ  तीखे और अधिकार पूर्ण लहज़े में बोली- “ अब रख भी लो ..बच्चों को भूखा मारना है क्या…?  यह कर्फ्यू मरा तो न जाने कब हटेगा…..?” पड़ोसन वापस लौट रही थी और पत्नी के हाथों में थमा कनस्तर  थरथरा रहा था और आंखों में कृतज्ञता….
नरेंद्र कौर छाबड़ा
ए – २०१ , सिग्नेचर अपार्टमेंट बंसीलाल नगर
तंदूर होटल के पीछे, रेलवे स्टेशन रोड
औरंगाबाद ४३१००५ ( महाराष्ट्र )
Mo .9325261079
Email – narender.chhabda@gmail
                     
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