मोबाइल की घंटी लगातार बज रही थी, वैशाली ने स्क्रीन पर नजर दौड़ाई देखा घर से माँ का फोन था, माँ का फोन देखते ही उसकी आँखों में हमेशा जो चमक उभरती थी आज वो बिलकुल नजर नहीं आयी बल्कि आज उन आखो में बेहद मायूसी थी,जैसे कोई उत्साह ही नहीं बचा था किसी से बात करने का और माँ तो वैसे भी आवाज़ सुनते ही सब पहचान जाएँगी, उनसे कुछ कहे बिना ही वे सब समझ लेती हैंउसने यूँ ही फोन बजने दिया और वह वाशरूम में चली गयी। चेहरे पर पानी के छींटें मारे, मुँह में पानी भर कर गला साफ किया, कुछ हल्कापन महसूस हुआ। 
बाहर निकल कर माँ को फोन मिलाया !
बेटा कहाँ थी तुम ? कितनी फ़िक्र हो जाती है ? एक तो घर से इतनी दूर अकेले रहती हो और जब फोन नहीं उठाती तब तो मेरी जान ही निकल जाती है। उधर से माँ का घबराया हुआ स्वर और ढेर सारे सवाल ।
अरे माँ, मेरी बात तो सुनो।
हाँ बोलो, माँ कुछ संयत स्वर में बोली। 
मैं वाशरूम में थी,बाहर आते ही सबसे पहले आपको ही फोन मिलाया।
अच्छा चलो ठीक है। अब यह बताओ घर कब आ रही हो ?
वह चुप ही रही, अब उनका अगला प्रश्न होगा, बेटा शादी के लिए अब तो हाँ कर दो, उम्र निकली जा रही है। तेरे साथ की सब लडकियाँ अपना घर और बच्चे संभाल रही हैं और एक तू है कि तेरी पढाई ही ख़त्म नहीं हो रही। वैशाली के चेहरे पर हलकी सी मुस्कराहट आ गयी।
माँ आप मेरे गले में शादी का फंदा पहना के ही रहोगी, हैं न?
शादी और गले का फंदा ? बेटा अगर ये फंदा है तब भी सबको पहनना ही पड़ता है। मैंने भी तो पहना था।
लेकिन माँ को कैसे बताये कैसे समझाए कि अब तो खुद की ही नहीं रही किसी और की क्या होगी  और कैसे होगी ?
वह दिल से किसी की हो चुकी है सदा सदा के लिए, लेकिन क्या  वे उसके हैं ? एक उदासी सी वैशाली के मन में उतर आई।
माँ बाद में बात करती हूँ अभी कालेज जाना है। ये कहकर माँ के जवाब का इंतज़ार किये बिना ही उसने फोन काट दिया।
वह उदास उदास सी अपनी अलमारी खोलकर उसकी दराज से एक डायरी निकल लाई, खुली खिडकियों से ठंडी तेज हवाएं कमरे के पर्दों को हिला रही थी, वह ठंडक से सिहर उठी। आज ये कैसी हवाएं हैं जो डर पैदा कर रही हैं, हाथ में पकड़ी डायरी को मेज पर रखकर उसने सामने की दीवार पर लगे अपने छोटे से एल इ डी को ऑन कर लिया। न्यूज़ चेनल ही चल रहा था। न्यूज़ एंकर तेज आवाज में बोल रही थी।नेपाल में प्रथ्वी डोली जानमाल की हानि, इसके साथ ही इंडिया में भी झटके महसूस किये जा रहे हैं। अब हम आपको ले चलते हैं सीधे नेपाल ………………………………” बस इसके आगे वह नहीं सुन सकी, क्या वह यह चाहती थी ? हाँ यही तो चाहती थी कि भले ही धरती डोल जाये, तबाह हो जाये, दुनियां मिट जाए ! सब कुछ ख़त्म हो जाये और आ जाये कयामत
कयामत आ जाए, आ जाये क़यामत। 
लेकिन क्यों ? केवल अपने प्यार को पाने के लिए, सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए, पूरी दुनियां को ख़त्म करने के बारे में सोचना।  क्या वह आतंकवादी है ? जो अपनी ख़ुशी के लिए सबको मिटा देना चाहती है। क्या करे वो ? आखिर क्या
वो अपने प्यार को पाना चाहती है,हरहाल में,हर कीमत पर, वो खुद को भी तो मिटा लेना चाहती है, न जाने क्या सोचकर थम जाती है,ठिठक जाती है। 
अचानक से हवा का तेज झोंका आया और डायरी के पन्ने फडफडा कर खुल गये । मोटे मोटे अक्षरों में लिखा नाम आँखों के सामने छा गयाप्रेम तेरे लिए
मन में सिहरन भर गयी रोम रोम रोमांचित हो गया,वैशाली ने डायरी के साथ ही निकाली अपनी शाल को कसकर लपेट लिया,डायरी को सीने से चिपटा कर रो पड़ी।
क्यों किया तुमने सा ? क्या कमी थी मेरे प्यार में ? जान तक न्योछावर करने को तैयार रहती थी फिर क्या कमी रह गयी ? मन में एक हूक सी उठी,उसे महसूस हुआ दो प्यार भरी आँखें उसके चेहरे को भेद रही हैं, जो चीख चीख कर कह रही थी, मैं तुमसे प्यार करता हूँ। पहले भी करता था आज भी करता हूँ।
नहीं तुम प्यार नहीं करते ………. नहीं करते तुम प्यार। 
करता हूँ वैशाली, बस तुमसे ही तो प्यार करता हूँ,तुम गलतफहमी में मत रहो, वो मेरी कोई नहीं ……उसकी शक्ल अगर तुम एक बार देख लो दुवारा मिलना भी पसंद नहीं करोगी, डिअर उसे साड़ी पहनने की तमीज तक नहीं है। 
फिर ऐसा क्या था उसमें? जो तुम उससे मिलने चले गये।
नहीं प्रिय, मैं उससे मिलने नहीं मैं तो अपना सम्मान ग्रहण करने गया था। विश्वास करो, प्लीज वैशाली।
उसकी दलीलें सिर्फ अपनी सफाई में दी गयी दलीलें मात्र ही लग रही थी।
वैशाली की आवाज गले में ही घुटने लगी वो चाहकर भी कुछ नहीं कह पाई, कहकर कर भी क्या लेती ? उसके सामने तो हार ही जाती, हमेशा डॉ रंजन से हारती ही तो आई है, आज भी हार गयी, पहले उससे हार जाना सुख देता था और आज उसे आँसुओं में भिगो गया।
कुछ बोलो वैशाली ? कुछ तो बोलो
नहीं कह सकी वो, कुछ भी नहीं। 
वो बस फूट फूट के रोना चाहती थी। वो ख़ामोशी से वहां से निकल आई थी  
रंजन उसे रोकता ही रह गया
क्या गलती थी उसकी ? उसने क्या गलती की थी ? प्रेम ही तो किया था, अगर यह गलती है तो उसने यह गलती की है, वो जोर जोर से चीख चीख कर सबको बता देना चाहती थी, किसी से भी नहीं छुपाना, उसने प्रेम किया है वो भी सच्चा, डर कैसा ? लेकिन यह प्रेम न बड़ा भीरु बना देता है, एकदम डरपोक।
वैसे कभी कभी ये बहुत बहादुर और निडर भी बना देता है और कभी एकदम से कमजोर, आज वह स्वयं को बहुत कमजोर महसूस कर रही थी, एकदम हारा हुआ।
वैशाली को लगा कि उसके सारे ख्वाब मिटटी में मिल गये,वो टूटकर बिखरने लगी तिनका तिनका होकर, तिनके का क्या अस्तित्व?
कोई दर्द उससे लिपट गया, उसे लगा कि दर्द ने उसे अपने आगोश में ले लिया है, जल उठी कोई आग और उसके भीतर ही भीतर दहकने लगी,प्रेम जितना सुख देता है उससे कई गुना ज्यादा दुःख दे देता है। 
वह प्रेम के लिए जी रही थी और अब प्रेम के लिए ही मरने लगी। उसने बहुत परिपक्व प्रेम किया था, डॉ.रंजन से बहुत गहरा बौद्धिक जुडाव था, जो न जाने कब प्यार में तब्दील हो गया उसे पता भी नहीं चला, उसके साथ रहने पर कितना संतोष मिलता है। उसके बिना वो खुद को जान ही नहीं पाती। डॉ.रंजन का गंभीर और बौद्धिकता से भरा व्यक्तित्व, उसकी मेधा को दिनोंदिन परिष्कृत करता चला गया। वो कदम दर कदम आगे बढती ही जा रही थी, हर बात में आगे, किसी भी तरह के नोट्स या राय की जरूरत होती, सहज ही प्राप्त हो जाती। जिसकी जह से सबसे अच्छे नंबर आने लगे थे, अजीब सा नशा उसपर हावी हो रहा था, मन के कोमल तारों को छिड़ने के दिन आ गये लगते थे लेकिन अपने मन की भावनाओं को वह डॉ.रंजन के सामने प्रकट कर ही नहीं पाती थी।
वैशाली और डॉ रंजन दोनों एक ही कॉलेज में थे लेकिन डॉ रंजन वैशाली से काफी सीनियर थे, वैशाली ने पढाई इसी कॉलेज से की थी, एम ए करने के बाद जूनियर सेक्शन में उसकी नियुक्ति हो गयी थी।
और शायद इसमें डॉ.रंजन का ही पूरा प्रयास था जो फलीभूत हो गया था, जब फोन पर ये खुश खबरी उसने वैशाली को बतायी तो अचानक उसके मुँह से आई लव यू निकल गया। डॉ. रंजन ख़ुशी से झूम उठे। वह भी तो यही कहना चाहते थे । अभी वैशाली यहाँ उसके पास होती तो वह उसे गोद में उठाकर झूम रहे होते। 
अगले दिन जब कालेज में डॉ रंजन सर मिले तो उन्होंने वैशाली को एक डायरी और एक गुलाब का फूल देते हुए कहा था , ये तुम्हारी जॉब मिलने की ख़ुशी में ,एक छोटा सा उपहार।
सर, उपहार छोटा या बड़ा नहीं होता, बल्कि सामने वाले की भावनाओं को व्यक्त करने का जरिया होता है और सच में वह उनके लगाव को बिना कहे ही समझ गयी थी वैसे भी प्रेम ऐसी भावना है जो बिना कहे ही व्यक्त हो जाती है इसके लिए किसी भाषा या परिभाषा की जरूरत ही कब पड़ती है, निश्छल मन को समझने में देर ही कब लगती है ?
वे दोनों प्रेम में इस तरह प्रवाहित होने लगे जैसे नदी, उसने पी एच डी भी डॉ रंजन सर के निर्देशन में करनी शुरू कर दी थी लेकिन अब प्रेम में रहना दर्द पैदा करने लगा था जिसे मिलन के द्वारा ही पूरा किया जा सकता था। सच में अब एक दूसरे के बिना या एक दूसरे से अलग रहना बड़ा मुश्किल लगने लगा था, दोनों ने तय किया कि अब तो घर वालों को बताकर एक हो ही जाना चाहिए। 
इसी बीच रंजन का सेमिनार में जबलपुर जाना और अपनी पुरानी सहपाठी मृदु से मिलना, नहीं सहा गया …….बिलकुल भी नहीं
क्या जीवन में प्रेम कई बार हो सकता है ? एक प्रेम के रहते क्या दूसरा प्रेम पदार्पण कर सकता है
ये विचार लगातार उसके दिमाग को मथने लगे।
कैसे नहीं समझ पाई, अब कुछ कहने या पूछने की जरूरत ही नहीं लग रही थी क्योंकि जब प्रेम होता है तो मस्तिष्क में किरणें तरंगित होती है जो बिन कहे ही सब कुछ कह जाती हैं समझा जाती हैं, रंजन की सफाई में दी जाने वाली बातों पर वैशाली को विश्वास नहीं था। 
एक दिन जब उनका मेसेज मिला था, “सच मानों वैशाली हमारे बीच कुछ नहीं है” ना जाने कब का मृदु से मेरा ब्रेकअप हो गया है । 
    फिर जाना और मृदु से मिलना? क्या एक म्यान में दो तलवारें रह सकती हैं ? रंजन क्यों ऐसा कर रहे हैं ? वे क्यों दोनों को धोखा दे रहे हैं ! क्या था वो ? आखिर क्या ? क्या दोनों से सम्बन्ध ?
वो चीख चीख कर पूछना चाहती थी, नहीं कह पाई कुछ भी, टूट कर बिखर गयी, पीले सूखे पत्तों से झर झर कर झरने लगी। 
खुद को कोसना एक नियम सा बन गया आखिर क्यों आ गयी वो उनकी नैतिकता से भरी बातों में,जो खुद कहीं से भी नैतिक नहीं ।
छोड़ दिया पी एच डी का ख्वाब, नहीं करना पी एच डी, क्या करना है ऐसे व्यक्ति से सम्बन्ध रखके ? 
आज क्लास में बच्चों को पढ़ते हुए एक जगह पढ़ा, प्रेम गली अति संकरी,जामें दो न समायें ।
ये कथन सही ही लगा था आज ।
इतना गहरा व्यक्तित्व और ऐसा कैसे हो सकता है,सहन नहीं हो रहा था उससे।
आखिर क्या करे वो ?
उनसे दूर रहा नहीं जाता और करीब जाने का बिलकुल भी मन नहीं, मन में अथाह दर्द का समावेश।
वो खुद को डॉ रंजन की याद से कितना भी दूर रखे लेकिन यादें हरवक्त साये की तरह बदन से लिपटी रहती।
उसने जानबूझ कर तो प्रेम किया नहीं था, ये स्वतः ही हो गया और अब कितना बेबस कर दिया था कि एक पल की दूरी भी बर्दाश्त नहीं होती, सच में वो बावरी ही हो गयी है।
माँ तो खुश हो जाएँगी, उन्हें क्या चाहियें बस यही तो कि उनकी बेटी हमेशा खुश रहे, कितनी ही बार उससे कहा था कि तुझे कोई पसंद हो तो बता दो मैं उसी से शादी करवा दूंगी। 
आज बता ही दे रही हूँ। 
अच्छा अभी रहने दे रही हूँ , शाम को बताउंगी तब तक पापा भी आ जायेंगे ।
उसने हाथ में पकड़ी डायरी को सम्भाल के अलमारी में रख दिया । 
और नहाने के लिए वाशरूम में चली गयी, आज उसने बहुत दिनों के बाद खूब अच्छे से नहाया, रंजन सर की तरफ से मन एकदम साफ़ हो गया था।  
सच मानों वैशाली हमारे बीच कुछ नहीं है, ना जाने कब का मृदु से ब्रेकअप हो गया है
ये मैसेज उसके दिमाग में लगातार घूम रहा था और वह ख़ुशी से झूम रही थी,डॉ रंजन सिर्फ उसके हैं और किसी के भी नहीं । 
उसका मन गुनगुनाने का हो आया ।
आज फिर जीने की तमन्ना है।
आज फिर मरने का इरादा है ।
अपने बालों को टावल से पोंछती हुई बाहर आ गयी, घडी की तरफ नजर दौड़ा के देखा दोपहर के पौने बारह बज रहे थे ।
इस समय वो अपने घर में ही मिलेंगे। 
अलमारी खोलकर लाल रंग की वही वाली साडी निकली जो डॉ. रंजन ने उसे गिफ्ट में दी थी।
उसी दिन उन्होंने कहा था, अभी पहन के दिखाओ? देखें तुम पर कैसी लग रही है
जब वह उसे पहन के बाहर आई थी तो उनके चेहरे पर बेहद खुबसूरत मुस्कान खिल आई थी, उसे बाँहों में भर कर चूम लिया था और कहा आज तुम सचमुच में किसी अप्सरा की तरह लग रही हो, जो स्वर्ग से उतर कर सीधे मेरी बाँहों में समां गयी है।
डॉ रंजन का इतना उन्मुक्त व्यवहार आजतक नहीं देखा था। 
वे उसे लगातार चूमे जा रहे थे ।
अब छोड़ दो रंजन प्लीज । 
नहीं आज मुझसे खुद पर कंट्रोल नहीं हो रहा, मैं अब तुम्हारे बिना नहीं जी सकता, तुम मेरी जान हो। 
हाँ मुझे पता है, तुम भी मेरी स्वासों में बसते हो, परन्तु अभी छोडो, अब हम जल्दी ही शादी करके एक हो जायेंगे। 
डॉ रंजन सारे बाँध तोडकर आज ही एक हो जाना चाहते थे, परन्तु वैशाली ने किसी भी हाल में आज उनका साथ देने से मना कर दिया था।
ओह्ह क्या हुआ है उसे ? हरवक्त उनके ही ख्याल। उसने सर को हल्का सा झटका दिया और मन ही मन मुस्कुरा उठी।
अपनी साड़ी पर रंजन के पसंदीदा परफ्यूम का स्प्रे करके बाहर आ गयी थी।
ऑटो लेकर सीधे उसके घर पहुँच गयी, कितना खुश हो जायेंगे रंजन और सारी बातों को भुला कर उसे गले से लगा लेंगे। 
यह सोचते हुए अपना हाथ डोरवेल की तरफ बड़ा दिया। 
अचानक अन्दर से आती फुसफुसाहटों पर ध्यान चला गया।  
अच्छा हुआ मृदु तुम वापस आ गयी मेरे जीवन में, तुम्हारे बिना पता है मैं कितना अकेला हो गया था, कैसे जी रहा था
अकेले कहाँ वो थी न , आपकी शिष्या।
अरे वो , वो तो बस उसकी चाहत थी न जाने क्यों जान छिड़कती थी । मुझसे शादी के ख्वाब सजा रही थी। किसी भी बिषय में उसकी कोई जानकारी नहीं, जब यहाँ एडमीशन लिया था, कुछ भी नहीं आता था, घर में भी पढाई नहीं करती थी सो उन लोगों ने इसे होस्टल में डाल दिया,मेरी वजह से ही इतना पढ़ लिख गयी। 
मैं शादी कैसे करता उससे, वो तो मेरे लायक ही नहीं है, मैं तो सिर्फ तुम्हें ही प्यार करता हूँ।
आगे कुछ सुन ही न पाई, दिमाग सुन्न सा होता लगा और दिल में अचानक से हूक उठी, आखों से बेतहाशा आंसू छलक पड़े । क्या है ये सब? किसी के भी दिल से यूँ ही खेलना, अगर वह उस दिन भावनाओं में वह जाती तो पूरी तरह से बर्बाद हो जाती, जिसके लिए उसने खुद को अकेला तनहा और उदास कर रखा है, स्वयं को दोषी मानती आई थी और आज यह सब।
वह अपने मन से ऐसे नीच और शुद्र व्यक्ति के प्रेम को खेंच के बाहर फैंक देगी ।
स्त्री होने के कारण क्या उसे ही समस्त वर्जनाओं को सहना होगा, नहीं वह नहीं सहेगी, बिलकुल नहीं।
ऐसा इन्सान उसका आदर्श कैसे हो सकता है ? वो तो उन्हें ही अपना सब कुछ समझ बैठी थी।
क्या सिर्फ वो ही उनको प्यार करती थी ? जान छिड़कती थी और वो क्या खेल कर रहे थे ? उसके साथ,उसकी भावनाओं के साथ,जज्बातों के साथ। 
वो तो तन के साथ भी खेलना चाहते थे शायद वे मंझे हुए पक्के खिलाडी थे, दर्द देना ही उनकी फितरत थी, उसकी मासूम भावनाओं के खिलाडी, वो अकेले कैसे सहेगी ये सब
उसने ऑटो वाले को बुलाया और उसमें बैठते ही माँ को फोन मिलाते हुए कहा , माँ मैं कल आ रही हूँ आपकी सारी बातें मुझे मंजूर हैं। 
वह अपनी झोली में ढेर सारी खुशियाँ भर के ले आएगी और अपना जीवन संवार लेगी,बहुत कीमती जीवन होता है कोई बर्बाद करने को तो नहीं? उसने प्यार किया, सच्चा प्यार, तो गम कैसा ? वह प्रेम में है और प्रेम कभी नहीं मरता किसी न किसी रूप में बचा ही रहता है ।

सीमा असीम सक्सेना मूल रूप से कथाकार और उपन्यासकार हैं और कविताएं लिखना इनको बहुत पसंद है । इनका लेखन थोड़ा  विस्तार लिये हुए है। इन्होंने लगभग 40  कहानियों के अलावा  सात उपन्यास लिखे हैं।  उनके 4 कहानी संग्रह, 2 कविता संग्रह और पाँच उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं! 
विभिन्न साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं परीकथा, कथाक्रम, कथादेश, साक्षात्कार,हरीगंधा, गगनांचल, पुस्तक संस्कृति, अमर उजाला दैनिक जागरण  आदि में नियमित रूप से कहानियां, कविताएं और आलेख आदि प्रकाशित होते रहते हैं।  इसके साथ ही आकाशवाणी तथा दूरदर्शन से कहानियों व वार्ता आदि का प्रसारण साथ ही इनको घूमने व थिएटर में काम करने का शौक है । युवा कथाकार का सम्मान और वेस्ट विवुवेर्स अवार्ड मिल चुका है । अभी हाल ही में इंडिया नेट बुक से एक उपन्यास “जाग मुसाफिर” प्रकाशित हुआ है ॥ 
सीमा सक्सेना 
208डी, कॉलेज रोड निकट रोडवेज 
बरेली 243001 उ.प्र. 

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.