Wednesday, February 11, 2026
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निर्देश निधि की कहानी – प्रश्न तो वहीं खड़ा है

“कोई भी युद्ध, किन्हीं भी परिस्थितियों में जायज़ नहीं ठहराया जा सकता । यह तो प्रकृति का षड्यंत्र है, उसकी फूट डालो और राज करो की नीति, जिसके तहत वह इंसान को आपस में लड़वा कर खुद सुपर बनी रहती है ।” यही था बिज्जी के लिए मेरे द्वारा लिखी गई डिबेट का आरंभ । विषय था “युद्ध, पक्ष या विपक्ष“ । 
भले ही मैं भारतीय सेना के कर्नल की पत्नी हूँ, पत्नी ही क्या फौजी की भतीजी और पोती भी हूँ पर युद्ध के सदा विरोध में ही खड़ी हो जाती हूँ । कौन जाने इसमें मेरे जोडियक साइन लिब्रा का दोष है जो खून – खराबे से घृणा करवाता है या फिर पति की सुरक्षा की फ़िकर । मेरे पति कर्नल विक्रांत सिंह की नज़र, स्नान करके कपड़े पहनते-पहनते बिज्जी की कॉपी पर पड़ गई । वे मुझे घूर कर देखते हुए बोले, ”क्या सिखा रही हो शैला एक कर्नल के बेटे को, ये कैसी फिलॉसॉफी है कि किसी भी परिस्थिति में युद्ध जायज़ होता ही नहीं ? संत ही बनाकर छोड़ोगी क्या इसे ? प्लीज़ शैला, कम से कम बिज्जी को नहीं । चेंज करो इसे, उसके स्कूल जाने से पहले ।“
“अरे !”       
“अरे क्या ? भूलो मत शैला कि तुम भारतीय सेना के शौर्य भरे कर्नल विक्रांत सिंह की बहादुर पत्नी हो ।“ वे गर्व से बोले। 
“अच्छा ! यह तो मुझे आज ही पता चला कर्नल साहब ।“ मैंने विनोदपूर्ण स्वर में कहा    
“ये कोई मज़ाक़ नहीं है शैला। अपनी  फिलॉसॉफी, और क्या कहते हैं वो, अपनी यह सो काल्ड ह्यूमैनिटी अपने साहित्य और एनजीओज़ के लिए बचाकर  रखो, युद्ध और सेना जैसे सेंसिटिव विषयों के लिए नहीं, प्लीज़ । आख़िर तुम ऐसे कैसे लिख सकती हो, तुम्हारी रगों में भी खून तो मार्शल रेस का ही है ।“
“रेसिज़्म…….?”
“बेशक, ये तो ऐंशिएँट टाइम से है ।“
“ऐंशिएँट टाईम से अगर कोई विसंगति चली आ रही है, तो वो होती ही रहनी चाहिए कर्नल साहब ?”  
“क्या शब्द बोला तुमने ? हाँ विसंगति, ये कोई विसंगति नहीं है । बस अलग – अलग टाइप के लोग, अलग – अलग टाइप का काम । बुराई है ही क्या इसमें ? हमारे लिए तो राष्ट्र पिता की यह सीख भी कि कोई एक गाल पर चाँटा मारे तो उसके आगे दूसरा गाल भी कर दो, हंड्रेड परसेंट बेमाने है । कम ऑन शैला, चेंज इट।“ मेरी बात बीच ही में काटकर बोले विक्रांत और ‘हुक्म की तामील हो’, के अंदाज़ से मेरी तरफ देखा । जैसे लेखन और ह्यूमैनिटी का सेंसिटिविटी से कोई नाता हो ही ना ।  
“इतनी जल्दी कैसे हो पाएगा ? मैंने बदल भी दिया तो वो बोल पाएगा क्या ?” 
“तो इस बार जाने दो डिबेट, अगली बार बोल लेगा ।“ अपनी कर्नल वाली आदेशात्मक टोन में कहा था उन्होंने । उनके पीछे खड़े बिज्जी ने उन्हें पुकारा और लूज पेपर्स पर कुछ लिखा हुआ दिखाते हुए बोला,
“डों वरी डैड, मैंने पहले ही ठीक कर लिया, मॉम को बताया नहीं, मैंने सोचा उन्हें परेशान क्यों करूँ ।“
“शाबाश मेरे शेर, गॉड ब्लैस यू, दिखाओ तुमने क्या लिखा।” और वो बिज्जी का लिखा देखकर एक आश्वस्ति भरी मुस्कान मुस्कुराए और गौरवान्वित होकर मुझ पर कमेन्ट करते हुए मेरी तरफ देख कर बोले, 
“देखो, इसने कितना बढ़िया तैयार किया है, और तुम क्या सिखा रही थीं इसे……..”  
“…………“ उनकी इस बात पर कुछ बोल नहीं सकी थी मैं । 
“शैला तुम घर – गृहस्थी के चक्कर में शायद भूल गईं कि तुम्हारे पास एनसीसी का सी सर्टिफिकेट है । सी सर्टिफिकेट के साथ कोई भी कैडेट आर्मी में सी एस यू ओ यानि कंपनी सीनियर अंडर ऑफिसर की पोस्ट पा सकता है, अर्ध सैनिक बलों में जा सकता है, तमाम नौकरियों में टेन परसेंट बोनस मार्क्स पा सकता है, पंडित हृदय नाथ कुंजरू ने एन सी सी की स्थापना की सिफ़ारिश यूँ ही तो नहीं की थी शैला । एक तुम हो कि…” 
“ओहो आपने तो पूरा इतिहास ही सुना डाला ज़रा सी बात पर ।“ मैं थोड़ा झुंझलाई ।  
“….और हाँ तुम्हारी कैप में एक फैदर और भी है, याद दिलाता हूँ । तुम्हारे पास रीज़न की बेस्ट शूटिंग कैडेट का सर्टिफिकेट भी तो है एनसीसी का, शूटिंग में गवर्नमेंट का अच्छा खासा पैसा खर्च होता है शैला, पता है तुम्हें, फूलों पर उड़ती तितलियाँ मारने के लिए नहीं करती सरकार इतना खर्चा ।“
“हाँ – हाँ सब पता है ।“ मैंने थोड़ा और झुंझलाकर कहा। 
“अभी के लिए बस एक आख़िरी बात, इतने सोल्जेर्स फ्रंट पर नहीं मरते शैला, जितने सिविलियंस हर साल रोड्स पर मारे जाते हैं ।“ इसके उत्तर में भी मैं चुप ही रही थी । 
भूली तो मैं कुछ नहीं थी, ट्राट्स्की का यह कथन भी नहीं कि, “हो सकता है युद्ध में आपकी रुचि ना हो किन्तु युद्ध की आपमें सदा से ही रुचि रही है।“ यानि वही प्रकृति का षड्यंत्र । पर एनसीसी की कैटेड रीज़न की बेस्ट शूटर शैला खुद में अकेली थी । अब विक्रांत से, दो किशोर बेटों और एक बेटी से गुँथी हुई शैला ठीक वैसी ही कैसे रह जाती भला, यह विक्रांत कैसे समझते ! 
मैं डाइनिंग की तरफ चली तो नन्ही सी ईष्टा वायरलैस पर बातें करने की एक्टिंग करती हुई कह रही थी, “मैं जाऊँगी ही क्यों दुश्मन के पास मैं तो दूर से ही उड़ा दूँगी उसको कैनन से ।“ उसके तो बचपन से खिलौने ही टैंक और तोप यानि आर्टिलरी वैपन्स थे । 
“डर ही निकल गया है बच्चों के दिमाग से हिंसा का ।“  मैं अपनी धुन में बोलती हुई डाइनिंग की तरफ जा रही थी कि विक्रांत की आवाज़ ने रोक लिया ।  
“रुको शैला, क्या बोला तुमने, हिंसा ? युद्ध को हिंसा कहती हो तुम ?” विक्रांत असहज होकर बोले । 
“हाँ, है तो हिंसा ही । जिस संस्कृति में आक्रामक शब्दों और विचारों तक को हिंसा की श्रेणी में गिन लिया जाता हो वहाँ युद्ध का नाम दे देने से हिंसा प्रेम तो नहीं बन जाती ना कर्नल साहब ।“ कह कर मैं डाइनिंग की ओर चली गई अन्यथा वाकई, था तो यह एक अंतहीन बहस का मुद्दा, जिसे विक्रांत के सामने से हटकर, तब के लिए टाल दिया था मैंने ।  
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मेरे बड़े फूफा जी भारतीय सेना की गोरखा रेजीमेंट में थे । वही गोरखा रेजीमेंट जिसके लिए भूतपूर्व भारतीय सेना प्रमुख फील्ड मार्शल सैम मानिक शॉ कहा करते थे कि, “अगर कोई कहता है कि वह मौत से नहीं डरता तो या तो वह झूँठ बोल रहा है या फिर गोरखा है ।“ हिटलर तो और भी आगे की बात कहता था, “अगर उसे गोरखा रेजीमेंट मिल जाए तो सारी दुनिया पर उसका राज होगा ।“ फूफा जी भी खुद के गोरखा रेजीमेंट में होने को अपना मान समझते थे । इसी मान के साथ वे पूर्वी – पश्चिमी दो फ्रंटों पर लड़े जाने वाले, 1971 के युद्ध में शत्रु सेना के विरुद्ध भारत के पूर्वी फ्रंट पर लड़े थे । भारतीय सेना ने 3 दिसंबर से लेकर 16 दिसंबर तक सिर्फ तेरह दिनों के अल्पकालिक युद्ध में शत्रु को बुरी तरह धूल चटाई थी और उस युद्ध में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सबसे ज़्यादा सौनिकों (लगभग 93,000) का एक साथ सरेंडर कराए जाने का रेकॉर्ड बना था । 
कहते हैं कि फूफा जी ने उस युद्ध में तक़रीबन बयालीस शत्रु सैनिकों को अकेले ठिकाने लगाया था । पर हुआ क्या ? सीज़ फायर होने से ठीक एक दिन पहले किसी एक शत्रु सैनिक की गोली सीधी उनका फौलादी सीना भेद गई । कई बार सोचती हूँ कि लाइफ में सब कुछ अगर इतना रैंडम है तो फिर हार – जीत के भी मायने हैं ही क्या ? हार – जीत के मायने और परिणाम जो भी हों पर मेरी सोलह बरस की मासूम किशोरी, बड़ी बुआ के सकल व्यक्तित्व पर पूरी तरह युवावस्था आने से पहले ही, वैधव्य अपने क्रूरतम रूप में चढ़ बैठा । जो मुआवजा उसके लिए फूफा जी कि शहादत पर मिलना तय हुआ था, एक तो उसे पा सकने में ही छक्के छूट गए थे । आधे से ज़्यादा तो सरकारी लोग ही उड़ा गए किसी न किसी बहाने, जो मिला भी था वह घाघ ससुर, देवर, जेठों के होते मेरी मासूम बड़ी बुआ के पल्ले पड़ता भी तो कैसे भला । मुआवज़े की बात तो ख़ैर इतनी एक तरफ़ा भी नहीं थी । उसी गाँव के शहीद राज वीर त्यागी, जो अपने अपाहिज पिता और बूढ़ी हो आई माँ का एकमात्र सहारा था, की पत्नी उसकी शहादत के बाद, उसके बूढ़े माँ – बाप को एक – एक रोटी का मोहताज छोड़कर, सारा मुआवजा अपनी जेब के हवाले कर चलती बनी थी । वह दबंग परिवार से जो थी। इधर मेरी बड़ी बुआ को तो उसके ससुरालियों ने घर की परिचारिका ही बना छोड़ा था, यह भूलकर कि वह एक फ़ौजी की बेटी थी । मेरे फ़ौजी चाचा और मेरे किसान पिता दोनों जाकर बहन को वापस ले आए । फिर कभी ससुराल के गाँव की तरफ मुँह करके भी ना बैठने दिया, कह दिया कि मुआवज़े की मौहताज नहीं है हमारी बहन । पर उसकी कच्ची उम्र पर ऐसा पक्का दुख चढ़ बैठा कि उसके होंठ कभी मुस्कुरा ही न सके । दादी उसकी सखि – सहेलियों को बुला – बुला कर लातीं उसका दिल बहलाने को । उसके लिए तरह – तरह के कपड़े सिलतीं, उसकी पसंद के पकवान बनाती पर वह कभी ना मुस्कुराई। सहेलियाँ उसे गीत सुनातीं, चुट्कुले सुनातीं वह सब पचा जाती, बिना मुस्कुराए । एक दिन सहेलियों की ज़िद पर गीत सुनाने को राज़ी हो गई और उसने अपनी सूनी आँखें आसमान पर टिकाकर जब अपना ही लिखा गीत गाया, 
“ऐ देश के सिपाही 
आज से और अभी से लिक्खा रहेगा 
वीरान मस्तक पर मेरे
चिर मौन साधे 
बंद बक्से में तुम्हारा लौट कर आना
ऐ देश के सिपाही… ” 
तो उसकी सारी सहेलियों सहित दादी भी ज़ार – ज़ार रोई, पर वह खुद हमेशा की तरह पत्थर बनी बैठी रही आकाश पर अपलक आँखें टिकाए, खाली आँखों से अपने खो गए साथी को खोजती । फिर कभी ना सहेलियों ने गाया, न उससे गाने की ज़िद की । युद्ध का सबसे पहला और भयावह, वही परिणाम देखा था मैंने अपनी अबोध आँखों से । भले कभी बाद में बुआ की आँखों का वह सूनापन उनकी ख़ुशगवार ज़िंदगी ने निकाल फेंका हो पर मेरे मन की भीत पर उनकी वे सूनी आँखें किसी ढीट की तरह हमेशा छपी रहीं।  
***
भारतीय सेना में सूबेदार मेरे दादा बहुत ही प्रगतिशील विचारों के थे । बासठ का युद्ध लड़ा था उन्होंने । अपने शरीर पर छह गोलियाँ खाकर भी जीवन जीत गए थे । भले ही महीनों अस्पताल में पड़े रहे पर साबुत लौटे थे सेना में वापस । और रिटायरमेंट तक नौकरी पूरी की थी । वे बड़ी बुआ को देख – देख अपने नसीब को कोसते रहते । फिर एक दिन बड़े हृष्ट – पुष्ट लड़के के साथ घर आए और बड़ी बुआ को पानी देने के बहाने बुलाया, लड़के ने कनखियों से बड़ी बुआ को देखा । दादा जी और उसके बीच कोई नामालूम इशारा हुआ और महीने के भीतर – भीतर, बड़ी बुआ ब्याह कर अपनी नई ससुराल भी चली गईं, छोटी बुआ के ब्याह से पहले – पहले । बड़ी बुआ का दूसरा ब्याह विशेष बात नहीं थी, विशेष बात तो यह थी कि दादा जी जिसे लाए थे वह हृष्ट – पुष्ट लड़का भी फ़ौज में ही था । मेरी दादी ने फ़ौजी से बुआ के दूसरे ब्याह का बहुत विरोध किया था, दादा जी से बहुत बहस की थी,
“मैं फौजी से ना ब्याहूं अपनी छोरी, दुबारा करम फोड़न कूँ। जो दूसरे ब्याह को कलंक लगाई रए हो तो कोई किसान – फिसान देख लेओ ।“ इस पर दादा जी ने दादी को खूब समझाया था । 
“देख भागवान पहले तो अपनी सोच कूँ सुधार । छोरी को दूसरो ब्याह कोई कलंक ना होवै । दूसरी बात जे कि मैंने तो जंग भी लड़ी, मैं मरो का ?”
“बस जेई कसर रै गईए, जाय भी पूरी कल्लो ।“ दादी झुँझला कर बोली थी । 
“जंग मैं छै – छै गोली खाकेऊ तेरे सामने खड़ौ हूँ, मतलब जे कि जाकी जित्ती लिख गई, उत्ती तो वा पूरी करेगोई । नई तो डालचंद के जवान – जहान बेटे कूँ देख लो, परके बरस की तो बात हैं, बिना आँधी – तूफान अच्छी ख़ासी खड़ी – खड़ाई दीवारई गिर गई वाके ऊपर और मिनट न लगी दम तोड़बे में । जंग में मरतौ तो सहीद कहलातौ, अब का मिलौ, ढेंढ़स ? तो मेरो कहने को मतलब जेई है कि वावैला मचाबे की जरूअत नई है । होन दे जा कामें ।“ और दादी चुप होकर बैठ रहीं । दूसरी बार बुआ भाग वाली निकली और फूफा जी अपना कार्यकाल पूरा कर बाकायदा एक पेंशनर की हैसियत से लौटे थे गाँव।   
दादा जी को तो देश के सिवा और कुछ दिखता ही न था । वे अपने दोनों बेटों को सेना में ही भेजना चाहते थे पर अकेले चाचा ही जा पाए थे । मेरे पिता फिजिकल में बाहर कर दिये गए थे, बरसों तक इसका दुख सालता रहा था बाप – बेटे दोनों को । चाचा सन इकहत्तर के युद्ध के दौरान घायल अवस्था में तेरह दिन लापता रहे थे खून बह – बह कर थम गया, कभी दुश्मन की लाशों के ढेर के बीच तो कभी किसी नाले के पास पड़े रहे । उनके ट्रंक में उनका सारा सामान, उनकी शहादत की खबर के साथ घर आ गया था । दादी, माँ और  मेरी युवा चाची की हृदय विदारक चीखें मेरे मन में नासूर सी बन गई थीं। मैं ना सोती थी, ना जागती थी, कानों में उन तीनो का विलाप चौबीसों घंटे बजता रहता । यह था युद्ध का दूसरा भयावह परिणाम जो मैंने सहा था। मेरे मन में बस यही एक प्रश्न उभरता कि युद्धों की क्या ज़रूरत है ? युद्ध होते ही क्यों हैं, आपस में बैठकर क्या मसले सुलझाए नहीं जा सकते ? दुनिया भर का खुद को शिक्षित – सभ्य समाज बताने का दावा और ऐसी बर्बरता ? यह विरोधाभास मुझे पचाए नहीं पचता था । दादी मेरी जिज्ञासा का समाधान करती । महाभारत की कथा सुनाती और कहती, “ज़े तो आदमी के हक़ की लड़ाई होत है लाड़ो, जाए तो नंद के लाला भी ना टाल पाए । लड़ाई तो आदि जुग सै चली आ रई बेटी । बखत कोई हो लड़ाक मेरे सुसरे मान कैई ना दें ।“ अप्रत्यक्ष रूप से वह बुजुर्ग क्षत्राणी भी युद्ध का पक्ष ही ले लेती, उसे आवश्यक बताती, वह खुद का एक बहादुर फ़ौजी की बहादुर पत्नी होना सिद्ध करती । मैं फौजी से बुआ के दूसरे ब्याह का विरोध करने वाली दादी का यह रूप अवाक ताकती ही रह जाती बस । 
सब रो – पीट कर बैठ रहे थे कि अचानक कैजुयल्टी यूनिट से फ़ोन आया कि लैफ़्टीनेंट करण सिंह जीवित हैं। घर में खुशी की ऐसी लहर आई कि किसी के पाँव धरती पर पड़ते ही ना थे। चाचा एक हाथ गँवाकर ही सही पर घर वापस लौट आए, ज़िंदा। एक हाथ गंवाने का  मलाल तो उन्हें उतना नहीं था जितना वापस सेना में नहीं जा  सकने का । चाचा के लौट आने पर भी मेरे अबोध मन पर लगा वह तेरह दिनों का सदमा किसी धवल वस्त्र पर जंग के दाग सा बना रहा था । सदमा भले बीत गया हो पर उसके अक्स मेरे मानसपटल पर सदा छपे रहे और मैं युद्ध के नाम पर कभी सहज या निरापद तो नहीं हो सकी।                                                                            
                                          3 
मैं गाँव के पड़ोसी कस्बे से इंटर पास करके दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ रही थी । वहाँ पढ़ते – पढ़ते अपनी किस्मत में फ़ौजी मैंने खुद लिख लिया था । विक्रांत से मैं अपने कॉमन फ्रेंड समीर की पार्टी में मिली थी और फिर इतना मिली कि हमेशा के लिए ही मिल गई । विक्रांत की चुम्बक सी पर्सनैलिटी और भीतर तक समा जाने वाली आवाज़ के सम्मोहन ने मुझे कुछ इस तरह गिरफ़्त में लिया कि मैं खुद को उनसे छुड़ा ही ना पाई। फ़ौजियों के घर पली-बढ़ी, फ़ौजी के साथ ब्याह कर आई, दो – दो फ़ौजियों की माँ, फिर भी मैं युद्ध विरोधी ! हाँ, हूँ तो हूँ । वैसे भी फ़ौजी होने का अर्थ खालिस युद्धक मशीन होना ही तो नहीं होता ना । 
तीन बच्चों में से एक परम ही है जिसने अपना कैरियर मैडिकल को चुना । बिज्जी यानि विजयंत और ईष्टा ने सेना की कमान संभाली । बिज्जी को तो मैं चाहकर भी सेना में जाने से नहीं रोक सकती थी । भले ही उसे मैंने अधिकांशतः विक्रांत की अनुपस्थिति में, अकेले क्यों न पाला हो, पर वह प्रभावित हमेशा विक्रांत से ही रहा । इस वक्त यह सब बताते हुए, मेरी आँखों में छोटा सा बिज्जी चुपके से तैर गया है ।  
“बिज्जी ए बिज्जी, बहुत हो गई तेरी हाँ – हूँ अब खाना खा ले बेटा ।“ मैंने बिज्जी को डाइनिंग रूम से ही पुकारा। 
“नहीं मम्मा अभी एक दुश्मन और बचा है, ध्यान से सुनो उसकी साँसों की आवाज़ आ रही है, वो मेरे बंकर के पीछे ही है। पहले इसे फ़िनिश करना हैं।“
“तो फिर जल्दी फ़िनिश कर, खाना ठंडा हो रहा है । 
“अलर्ट होकर करना होगा ना मम्मा, इतना ईज़ी है क्या दुश्मन को फ़िनिश करना ? खाना रख दो, मैं ठंडा खा लूँगा ।” 
इस घर पर तो छोटे से लेकर बड़े तक सबको देशभक्ति का जुनून सवार है । बड़बड़ाती हुई मैं बिज्जी की ओर गई । छोटे से बिज्जी ने नकली बंकर बनाए हुए थे, मेज के नीचे सेफ़ के पीछे । भारत पर अनचाहे कई – कई युद्ध थोप चुके पड़ोसी देश के असली सैनिकों को विजुयालाइज़ करता हुआ उन्हें मार गिराने की एक्टिंग कर रहा था । मैं भविष्य के लिए डरती, संसार के लिए डरती कि इसे नाम कोई भी क्यों ना  दे दूँ, देशभक्ति कह लूँ या कृष्ण के अनुसार अपने अधिकारों के लिए लड़ा गया धर्म युद्ध पर अंततः होती तो यह एक तरह की हिंसा ही है । इसकी सभ्य – सुसंस्कृत समाज में कोई आवश्यकता होनी ही क्यों चाहिए । और फिर वही डर कि इस हिंसा ने मेरे भी मासूम बच्चों के दिलों में घर बना लिया था । 
ट्वेल्थ के साथ ही बिज्जी का सलेक्शन नैशनल डिफेंस एकेडेमी यानि एनडीए में हो गया । बिज्जी  अब ख़ालिस बिज्जी कहाँ रहा था, अब तो वह आइ एम ए से निकलकर “लेफ़्टीनेंट विजयंत सिंह” बन गया था । ईष्टा बहुत बड़बड़ाई थी एनडीए में लड़कियां अलाउड नहीं होने पर, सरकार की पॉलिसी को खूब कोसा था उसने । उसने एलेक्ट्रोनिक्स में मिलिट्री इंजीनियरिंग करके आर्मी की कॉम्बेट सपोर्ट सर्विसेज जॉइन की । परम ने मेडिकल ए एफ एम सी से किया । सो वह भी ख़ासा फौजी ही बन गया था । परन्तु बॉन्ड के सात बरस पूरे करके वह दिल्ली आकर सैटल हो गया था । 
दिलचस्प यह था कि बिज्जी के साथ उसके आठ और दोस्त सलेक्ट हुए थे, उत्साह से लबालब इन सजीले जाँबाजों का रूप देखते ही बनता था। कड़ी ट्रेनिंग के शुरुआती दिन, जहाँ घोर विपरीत परिस्थितियों में भी दुश्मन को ढेर करके सुरक्षित लौट आने के गुर सिखाए जाते हैं, बेहद कठिन गुज़रे थे । बिज्जी यह बताता था और बहुत से मज़ेदार किस्से भी सुनाता । रात होते – होते नए – नए सैनिक बने लड़के थक कर चकनाचूर हो चुके होते । वे अपनी थकान को भी हँसी – मज़ाक़ में ढाल लेते ।  वह सजीला सैनिक यौवन भी कभी थकता है भला ! 
“अबे यार कित्तनी मेहनत करवाई जाएगी यहाँ ? जिस भी देश से ख़तरा होता इतनी देर में तो उसे पूरा का पूरा तबाह करके लौट भी आते हम सब । पहले मारो, फिर सोचो है । हमारी तो सोच ये है और यहाँ हो रहा है पहले सोचो, फिर समझो, दुश्मन की ताक़त का अंदाज़ा लगाओ । इतने में तो दुश्मन मार के भी भाग जाएगा क़सम से ।“ मरी सी आवाज़ में राहुल गुप्ता खुसफुसाया। 
“अबे बनिए सेना में कोई शॉर्टकट नहीं होता, तू यहाँ आया ही क्यों ?” बिज्जी उससे बोला। 
“इस क्यों का जो जवाब तेरे पास है, वही मेरे भी पास है ।“ राहुल गुप्ता धीरे से बोला। 
“वहीं अपनी किराने की दुकान में डंडी  मारता रहता, खूब पैसे कमाता रहता ।” बिज्जी ने उसे चिड़ाया। 
“जब कुछ मारना ही था तो दुश्मन को ही क्यों ना मारता, आख़िर बेचारी डंडी ने मेरा क्या बिगाड़ा था जो उसे  ही मारता रहता ? रही बात कमाने की, तो यहाँ देश की सुरक्षा कमाऊँगा, खाली हाथ तो यहाँ भी नहीं रहूँगा ।“ राहुल सायास आवाज़ थोड़ी बुलंद करके बोला।
“यार गुप्ते वैसे काम तो ये क्षत्रियों का ही है, बनियों – वनियों का है नहीं ।“ मदन राठौर बोला । 
“कम से कम सेना में तो जातिवाद मत फैला राणा सांघा के रिश्तेदार ।“ राहुल दम लगाकर तेज़ आवाज़ में बोला था । 
चिढ़ाने को तो सभी, सबको चिढ़ाते किसी न किसी बहाने । करण पहले ही बोल देता, 
“मुझे कोई मत चिढ़ाना यहाँ शेड्यूल – वेड्यूल कास्ट कह कर, मैं यहाँ अपने बल – बूते पर आया हूँ किसी आरक्षण की भीख माँग कर नहीं आया ।“ सबसे ज़्यादा  चिढ़ाया जाता सिख रेजीमेंट के लड़कों को, खासकर हरजीत को जिसके जवाब में हरजीत बोलता कि, “चलो तुस्सी हुणे बोल लो कुज वी, मै जंग विच दिखावांगा कौण किन्ना बहादर है और कौण किन्ना तगड़ा मुंडा है । हुणे मेरा पिच्छा छोड़ दो क्मीणों ।“ 
बिज्जी की बटालियन में कई पीआईओ यानि पर्सन ऑफ इंडियन ओरिजेन भी थे । विदेशों में रहे या पले – बढ़े भारतीय मूल के लड़के भारत में स्थाई रूप से बसकर एलिजीबिलिटी सर्टिफिकेट लेकर एनडीए में भर्ती होने के योग्य हो जाते हैं । उनमें पाकिस्तान, बर्मा, कीनिया, युगांडा, यूनाइटेड रिपब्लिक ऑफ तंजानियां, ज़ाम्बिया, मालावी, जेयर, इथियोपिया और वियतनाम के लोग शामिल हो सकते हैं । नेपाली गोरखाओं को तो एलिजीबिलिटी सर्टिफिकेट की भी आवश्यकता नहीं होती । 
बिज्जी की ही बटालियन में विन नाम का एक भारतीय मूल का भूतपूर्व वियतनामी भी था । वह कैंटीन में इग्नौस कॉफी (वियतनाम के लोगों द्वारा पी जाने वाली अंडा मिली हुई कॉफी) माँगता, उसे स्नेक वाइन की याद आती । उसे साथी कुत्ते – बिल्ली का मांस खा जाने वाला कहकर चिढ़ाते । “मैं नहीं खाता यार वे मूल वियतनामी होते हैं ।“ विन धीरे से कहता। इस तरह का हँसी मज़ाक करके नए सैनिक लड़के थकान पर अपने जाँबाज़ी के जज़्बे को चस्पा किए रखते । 
बिज्जी और उसका बैच अभी ट्रेनिंग के बाद पोस्टिंग पर आए ही थे कि किसी चरवाहे का याक चरते – चरते बहुत दूर निकल गया था, पहाड़ पर। चरवाहे ने जब अपनी दूरबीन से अपने याक को खोजने का प्रयास किया तो भारतीय सीमा के भीतर उसे कोई घुसपैठिए हरकत करते हुए दिखाई दिये । उसने तुरंत सीमा पर गश्त कर रहे सिपाही को बताया । 
सीमा के उस क्षेत्र में सर्दियों में तापमान मायनस चालीस – पचास डिग्री तक भी गिर जाता है, जिसके कारण परंपरागत रूप से दोनों तरफ के बंकर, चौकियाँ खाली कर दी जाती हैं । 1999 के उस बरस भी यही परंपरा निभाई गई, पर सिर्फ भारत की तरफ से । पड़ोसी की तरफ के घुसपैठिए भारत के खाली बंकरों में घुस आए थे । ठीक वैसे ही जैसे भेड़िये शेर की माँद खाली देखकर उसमें घुस कर बैठ जाएँ और उसे अपनी कहने लग जाएँ । मैं युद्ध की घोषणा से चिंतित हो उठी, विक्रांत को फ़ोन करके पूछने लगी,
”सुनो क्या इन्हें खदेड़ने के लिए युद्ध के सिवा भी….?   
“नहीं शैला युद्ध क्यों, एक और रास्ता भी है…..“ विक्रांत ने मेरे प्रश्न से पहले ही उत्तर दिया । मैं भीतर से प्रफुल्लित हो गई,
“वह कौन सा विक्रांत ?”
“यही कि भारतीय प्रधान मंत्री – राष्ट्रपति सहित तीनों सेनाओं के प्रमुख जाकर उनके पाँव छूकर रिक्वेस्ट करें, हम पर रहम खाओ माई – बाप, आप हमारी जगह खाली कर दो न । नॉनसेन्स……“ कहकर फ़ोन डिस्केनेक्ट कर दिया था उन्होंने और मैं अपने प्रश्न के साथ खड़ी रह गई थी बस । 
जिसके घर के पाँच में से तीन सदस्य सेना में हों सशस्त्र युद्ध की खबर सुनकर उस पर क्या बीतती है, यह हम फ़ौजियों के घर वाले ही जान सकते हैं । युद्ध की सूचना मात्र, सैनिकों के घरों में अनदेखा खौफ़ पसार देती है । पड़ोसी से 1999 का युद्ध तो युद्ध की औपचारिक घोषणा मात्र थी, पर सच तो यह है कि सीमा पर पिछले सात दशकों से युद्ध कभी थमा ही नहीं, बिना युद्ध के ही दोनों ही तरफ अनगिनत सैनिक सीमा पर शहीद होते रहे हैं । पर इतिहास जानता है कि पड़ोसी की जीत तो क्या उसके आसार तक भी कभी नहीं बने । बिज्जी और उसके साथियों को तुरंत सीमा पर भेज दिया गया था । विक्रांत भी फील्ड पर थे और ईष्टा ने अपनी एलेक्ट्रोनिक्स मशीनी कमान संभाल ली थी । बिज्जी के लिए मेरा दिल बैठा जा रहा था । यूँ मुझे तो भारत के हर युवा सैनिक में बिज्जी का चेहरा ही उभरता हुआ दिखाई दे रहा था, इस तरह मेरे लिए एक नहीं, हजारों बिज्जी थे। आख़िर क्यों मुझमें इतनी संवेदना भरकर भेजा था प्रकृति ने धरती पर, जहाँ मनुष्य – मनुष्य में इतने भयानक युद्ध होते हैं । 
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परम ने कहा था कि मैं उसके साथ चलूँ उसके फ्लैट में । एस एफ के तहत हालाँकि मुझे छोटा घर दे दिया गया था फिर भी मैं उसके साथ नहीं गई थी । कर्नल विक्रांत के तमाम अधीनस्थों के परिवारों का ज़िम्मा जैसे मेरा ही था । मैंने कभी भी खुद को ऑफिसर्स के परिवारों तक सीमित बिल्कुल नहीं रखा था । सेना के छोटे – बड़े सभी लोगों से मेरी समान आत्मीयता थी और उनके प्रति मैं अपने कर्तव्य से नहीं भाग सकती थी । मैं कॉलेज के दिनों से ही एन सी सी के साथ – साथ, एनएसएस के माध्यम से गाँव – गाँव, घर – घर जाकर जो सोशल वर्क करती रही थी, यहाँ आकर भी उसे मैंने जीवित ज़रूर रखा था । 
फ्रंट पर लड़ रहे युवा सैनिकों के परिवारों की बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी थी मेरे ऊपर, जिसे मैंने स्वेच्छा से  लिया था । खासकर राधिका और रश्मि की । राधिका एक घरेलू लड़की थी । सूबेदार सोरन सिंह से उसकी शादी को लगभग साढ़े सात बरस हो गए थे पर वह एक बार भी कंसीव नहीं कर सकी थी । मैंने ही उन दंपति को प्रेरित किया था आर्टिफ़िशियल इन्सेमिनेशन कराने के लिए और वे सफल भी हुए थे । राधिका को अभी तीसरा माह चढ़ा ही था कि जियाले जवान सूबेदार सोरन सिंह को दुश्मन के दाँत खट्टे करने सीमा पर भेज दिया गया । ठीक ही कहते हैं कि मौत से भी भयावह उसका भय होता है । खौफज़दा राधिका हर वक्त टी वी के सामने बैठी समाचारों पर नज़रें गढ़ाए रहती । पति के जीवन और मृत्यु की जंग लड़ने की कल्पना से उसका तनाव हद से अधिक बढ़ गया था । इतने महीनों की मेहनत, खर्चा और साढ़े सात बरस की लंबी प्रतीक्षा के बाद आने वाले सुखद क्षण को छनाक से टूटकर बिखर जाने में साढ़े सात दिन भी तो नहीं लगे थे । उधर सोरन सिंह के शहीद होने की खबर आई थी इधर राधिका को तुरंत हॉस्पिटल पहुँचाना पड़ा था, जहाँ उसका गर्भस्थ भ्रूण, जिसके सहारे वह पति की अनुपस्थिति में कुछ तो जी पाती, जाया हो गया था । राधिका ही नहीं रश्मि ने भी यही झेला था, राधिका और रश्मि ही क्यों हमारे लगभग सात जवानों की पत्नियाँ खुद को अति के तनाव से बचा नहीं पाई थीं । और उनके गर्भस्थ शिशु ज़ाया हो गए थे । युद्ध के ये वे परिणाम थे जो कभी किसी समाचारपत्र  में नहीं छपे, ये तो छपे थे हमेशा के लिए सैनिकों के परिवारों के दिलो – दिमाग पर ।  
ऐलेना की तो मैं अपराधिनी ही हो गई थी जैसे । वह एमबीए करके अच्छी नौकरी करने वाली आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी लड़की थी । फौज के ग्लैमर ने उसे इतना प्रभावित किया कि वह कैप्टन अनिकेत के लिए अपने घर वालों से भी लड़ गई थी, उनकी मर्ज़ी के ख़िलाफ अनिकेत से प्रेम विवाह किया था उसने । पर अनिकेत की पोस्टिंग दो – ढाई बरस यूएनओ की पीस कीपिंग फोर्स में भारत के बाहर रही । भारत लौटकर भी वह ऐलेना के साथ बहुत अधिक नहीं रह पाया था । इस तरह लगातार दूर रहने से ऐलेना का फ्रस्ट्रेशन हद पार गया था । जिसके लिए घरवालों से लड़ी, अब उसी से लड़ाई थी । वह अनिकेत से डायवर्स ले लेना चाहती थी । उस फौजी की व्यथा कौन जान सकता है जो हर पल ऐडवर्सिटीज़ से साक्षात्कार कर रहा हो और जिसकी विवशता उसकी प्रेमिका रह चुकी पत्नी ही ना समझ पाई हो । मैंने अनिकेत की व्यथा खुद महसूस की थी । उसने मुझे ही तो फ़ोन किया था जब ऐलेना ने डायवर्स प्लान किया । मैंने आवर रूम में बैठाकर ऐलेना की रोज़, घंटों – घंटों काउंसलिंग की थी बहुत प्यार से समझाया था उसे, “ऐलेना वो हार जाएगा बच्ची, दुश्मन से लड़ने की ताकत कहाँ बचेगी बेचारे में जब घर में ही लड़ता रहेगा, उस निरीह पर रहम करो ऐलेना । भूलो मत तुमने उसे किस कदर प्रेम किया है और किया तो उसने भी तुम्हें है ही ना । आख़िर ढाई – तीन बरस ख़ासी लंबी कोर्टशिप चली है तुम्हारी । जब ब्याह किया था तब भी पता तो होगा ही उसकी ज़िम्मेदारी का । वो फौजी है ऐलेना, उसका काम ही वो है ।“ 
अपनी ही मर्ज़ी को तरजीह देने वाली वो लड़की ऐलेना, लगातार कई दिनों बिना कुछ कहे रोती रही थी और ना जाने कैसे अंत में मेरी बात मान गई थी । सीमा पर जो कोई पहला अफ़सर शहीद हुआ वो कैप्टन अनिकेत था । मैं तो ऐलेना से नज़र ही नहीं मिला सकी थी, कोई शब्द नहीं थे मेरे पास उसे सांत्वना देने के लिए। मैं यही सोच रही थी कि इससे तो बेहतर होता कि ऐलेना अनिकेत से नाराज़ होकर उससे अलग ही हो गई होती । अलग होकर अंतस तक को भेद डालने वाली उसकी यह वेदना थोड़ी तो धुंधला गई होती । कहीं घर के तनाव से अनिकेत का ध्यान भटक तो नहीं गया था युद्ध क्षेत्र में ? यह विचार मेरे मन में हमेशा समाया रहा । ऐलेना की तरह दूर से सैनिकों के जीवन से प्रभावित होकर उनसे ब्याह करने वाली लड़कियों को ऐलेना की कहानी से सीख लेनी चाहिए कि युद्ध सिर्फ सेना के जवान ही नहीं लड़ते । एक युद्ध उनकी स्त्रियाँ भी लड़ती हैं कई मोर्चों पर । आसान होता है क्या अपनी खुद की शारीरिक, मानसिक और कुछ दूसरी ज़रूरतों को भुलाए रखना । आसान होता है क्या पिता की अनुपस्थिति में बड़े होते बच्चों को संभालना, सही रास्ते पर चलाए रखना, उनकी पढ़ाई – लिखाई कराना । इस आधुनिक होते समाज में भटकाव के अनगिनत साधन होने के बावजूद उन्हें भटकाव से बचाए रखना । आसान होता है क्या शेष समाज से अलग तरह का जीवन जीना ?  सिर्फ उन्हीं लड़कियों को किसी सैनिक से ब्याह करना चाहिए जो खुद अपनी, अपने परिवार और सैनिक के भी परिवार की देख-भाल अकेले अपने दम पर करने के साथ – साथ, जीवन को अकेले जीने का माद्दा रखती हों । छुट्टी पर आए सैनिक के सामने दुःख शिकायतों का पिटारा नहीं खोलतीं या सब सुखों से दूर फील्ड में पड़े हद की कठिनाइयाँ झेलते उसे, रोज़ अपनी कठनाइयों की पोटली नहीं थमातीं । अगर फ़ौजी पति सीमाओं पर विदेशी दुश्मन से लोहा ले रहा होता है तो पत्नी का भी समाज के भीतर सक्रिय तमाम अदृश्य और देशी दुश्मनों से वास्ता पड़ता ज़रूर है । युद्ध के दौरान सैनिकों की कठिनाई सिर्फ उन तक ही सीमित ना रह कर, सारे परिवार को  अपनी सलेटी छाँव तले ढाँप लेती है । किसी भी समय पर, जब कोई फ़ोन आता है तो उसे उठाने का साहस नहीं होता, एक – एक पाँव मन भर का हो जाता है, देह जैसे उत्तरी ध्रुव की हिम शिला हो जाती है, दिल गोधूलि के सूरज की तरह डूबने लगता है और दिमाग में एक बड़ा सा ब्लैक होल बन जाता है जो हर ऊर्जा को जबरन खुद में खींच लेता है, शेष बचता है घटाटोप अंधकार बस । उस वक्त सकारात्मक सोच रखकर हिम्मत रखने के सारे भाषण मिथ्या और बेमाने हो जाते हैं । 
युद्ध आरंभ होने के बाद, कर्नल विक्रांत से तो मेरी बात फिर भी हो जा रही थी पर बिज्जी से बहुत ही कम बात हो पाई थी और मेरा दिल उसके लिए तड़पता रहता । याद तो उसे भी मेरी ज़रूर ही आ रही होगी पर वह तो दुश्मन को मुँह की खिलाने में जुटा था । वह युद्ध भारत की खुफिया एजेंसियों की नाकामी के परिणाम के सिवा कुछ नहीं था । शुरू में जिसे मात्र घुसपैठ समझा गया था वह शत्रु से बाक़ायदा चौथा युद्ध निकला था । भारत में एक चरवाहा देख सकता था अपनी सीमाओं में हो रही पड़ोसी घुस पैठ, पर खुफिया एजेंसियाँ बेहोश थीं । मेरी मेड दिन में दो – एक बार तो यह बात ज़रूर ही कहती कि, “मेमसाब गरीबन के बच्चा जात हैं ना लड़ाई करन फिरंट पै, जा लिए नेता लोग सुरच्छा पै ध्यान ना दें । उनके अपने बच्चा हों ना सेना में तो सारे इंजाम पल मैं पुख्ता हो जाएँ ।“ मैं उसे समझाती कि ऐसा मत कह रामरती, “गरीबों के ही क्यों बच्चे तो हमारे भी हैं फ्रंट पर और हम जो भी हों पर गरीब तो नहीं हैं ।“ अकेले बिज्जी कि सलामती माँगकर उसके खुद के जज़्बे का अपमान नहीं कर सकती थी, पर आख़िर तो मैं एक माँ ही थी ना, औरों की सलामती चाहने का ज़िम्मा उनकी माँओं पर भी तो ज़रूर ही था । 
मैं अपने शब्द मन ही मन दौहरा रही होती “युद्ध किन्हीं भी परिस्थितियों में जायज़ नहीं ठहराया जा सकता,,,,” आख़िर क्या गलत लिखवाया था मैंने बिज्जी को ! प्रकृति ने आदमी के भीतर यह झगड़ालू प्रवृति डाली ही है, षड्यंत्र किया है आदमी से, ताकि वह आपस में लड़ता रहे । और किसी न किसी बहाने वह ख़ुद सुपर बनी रहे । प्रकृति ने आदमी को दिमाग तो दिया पर अपना यह षड्यंत्र समझ सकने की क्षमता नहीं दी उसे । इस युद्ध के समय तो मेरा यह विचार और भी दृढ़ हुआ था । तब जब नए – नए जवान सैनिक और अफ़सर भेंट चढ़ गए उस बिना बात लादे गए युद्ध की । यूँ  तो कौन सा युद्ध ऐसा हुआ है जिसमें जान – माल की हानि – ग्लानि ना उठानी पड़ी हो । इसी हानि – ग्लानि ने पांडवों को जीत कर भी हस्तिनापुर पर राज नहीं करने दिया था । यहाँ कारगिल में तो दुश्मनों से लड़ते हुए पांडवों ने अनेक पांडवों को ही खो दिया था । पाँच सौ से भी अधिक साथियों को खो देने के बाद, युद्ध जीतकर भी किस सैनिक के सीने में पत्थर रखा था जो उस जीत का जश्न मना सकता, हर आँख में नमी थी और हर दिल में अपने जाँबाज़ साथियों को खो देने का दर्द था । 
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दुनिया भर में दूसरे नंबर की विशाल भारतीय थलसेना, जिसे आज़ादी से पूर्व भी तमाम युद्ध सम्मान प्राप्त थे, को छेड़ कर, आखिर तो पड़ोसी को हारना ही था । भारतीय सेना को अंडरएस्टीमेट करने का दुस्साहस किया ही क्यों था आख़िर उसने ? मुट्ठी भर विश्वासघाती, जो युद्ध के नियमों तक को नहीं मानते, अपने ओपरेशन ‘कोह पैमा’ या ‘ओप के पी’ की सफलता का स्वप्न देख भी किस बिना पर रहे थे । वे क्रूर लोग, जो अपने ही सैनिकों के शव नहीं ले रहे थे, जिनके मृत सैनिकों को भी हमारे सैनिकों ने ही दफनाया था बाइज्जत, वे जाहिल, आदर्श भारतीय सेना से जीतने का सपना भी देखने का दुस्साहस कैसे कर पाए । बस इसलिए कि उनका एक सिरफिरा जनरल जो 1998 में भारत द्वारा किए गए पोखरण परमाणु टेस्ट से जल कर राख़ हो गया था । उससे पहले सन इकहत्तर में भारत के हाथों अपने देश की करारी हार पर धार – धार रोया था, और उसका बदला लेना चाहता था । 
अपने सैनिकों के परिवारों के ज़ख्मों का तो कोई हिसाब था ही नहीं । कितने ही सजीले जवान शत्रु देश की मूर्खता भरी महत्वाकांक्षाओं की भेंट चढ़ गए थे । उस भारतीय सैनिक वीर अफसर के माता – पिता जीवन भर अपने घाव पर कौन सी दवा रख कर आराम कर पाए होंगे जिनके बेटे ने शत्रु की चौकी फतह करने जाने से ठीक पहले उन्हें खत लिखा था कि, “माँ – पापा जब तक आपको यह खत मिलेगा मैं स्वर्ग की अप्सराओं की सेवा ले रहा होऊँगा, आप अपना ख्याल रखना…….कैसी घड़कन महसूस करते होंगे वे माता पिता उस कागज के पुर्जे में, अंदाज़ा लगा सकता है कोई ? और वह, जिसने अपनी बटालियन से दुश्मन का ध्यान हटाने के लिए खुद जान – बूझ कर शत्रु की चौकी के सामने जाकर फायर खोला था और अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया था । और उसका क्या जिसने कैप्टन बनकर अपना पहला वेतन भी तो नहीं लिया था और उसे पड़ोसी राक्षसों की तथाकथित सेना अपहरण कर ले गई थी और उसकी आँखें निकाल ली थीं, सिर धड़ से अलग कर दिया था । क्या उसके माता पिता ने हर बार आँख मूँदते ही महसूस नहीं किया होगा, किन्हीं अंजान लोगों द्वारा अपनी आँखें निकाल लिया जाना । क्या महसूस नहीं किया होगा अकेले में अनगिनत बार अपने सिर का धड़ से अलग होकर धड़ाम से पक्के फर्श पर गिर जाना ? और क्या उसे भुलाया जा सकता है जो जानता था कि उसका विमान दुश्मन सेना को चकमा तो दे सकेगा पर वापस लौटने में सक्षम नहीं है, फिर भी सीना तान कर गया कभी ना लौट कर आने के लिए, ताकि दुश्मन को हमारे विमानों की संख्या कम न लगे । और उसका क्या जो सेना में गया ही परमवीर चक्र लेने था । मिला भी, पर उसे लेने के लिए वह खुद उपस्थित नहीं था । वह जिसके शरीर के टुकड़े भी नहीं मिले । बहादुर सिख हरजीत जिसने अपने कहे अनुसार भरसक बहादुरी की थी, पर अंत तो उसका भी शहादत की चूनर ओढ़कर ही आया । महेंद्र जो दुश्मन की पूरी चौकी उड़ाकर भी बच ही गया था और युद्ध समाप्त होने के बाद दिल दहला देने वाले मौत के सन्नाटे में चारों तरफ बिखरे हुए शवों में से एक शव को अपने सीने से लगा रहा था, जो उसके छोटे भाई का था । जिस पर शत्रु द्वारा बांधा गया हैंड ग्रेनेड फट गया था, और उसका परिवार क्षण में दोनों बेटों से वंचित हो गया था । जब उन दोनों के शव उनके गाँव पहुँचे थे तो गाँव में किसी बच्चे तक ने कोई एक निवाला मुँह में नहीं डाला था । पूरा गाँव प्रैस वालों और दूसरे लोगों से भरा था । जीवन का सारा सत खींच लेने वाली उस अनहोनी पर भी प्रैस वाले उनके माता पिता, पत्नियों और बच्चों से इंटरव्यू करने का दुस्साहस कर पा रहे थे । कैसे निर्मम प्रश्न पूछ रहे थे,
“आपको अपने बेटों की शहादत पर गर्व है ?“ दिमाग को सुन्न कर देने वाली पीड़ा, दिमाग को क्या जीवन को ही सुन्न कर देने वाली, मर्मांतक पीड़ा में कोई कैसे बोले, क्या बोले ? दो-दो बेटे खोए थे उन्होंने । क्या बोलते पिता इसके सिवाय कि, “हाँ मुझे अपने बेटों की शहादत पर गर्व है।“
जब महेंद्र की आठ वर्षीया बच्ची से किसी एक बेरहम पत्रकार लड़की ने यही प्रश्न पूछा था तब उसने बुरी तरह रोते – रोते एक सच कहा था, बाल मन का मासूम सच, जहाँ वह नन्ही बच्ची अपनी समझ से, पिता की मृत्यु के साथ गर्व को नहीं, सिर्फ दुःख को ही जोड़ सकी थी,
“मुझे तो अपने पापा के मर जाने का दुख है बस…“ 
और इतना कहकर वह एक हृदय विदारक चीख के साथ अपने पिता के कॉफ़िन से लिपट गई थी । माँ और पत्नियाँ तो किसी प्रश्न का उत्तर दे ही नहीं सकी थीं । और वह जो सगाई छोड़कर चला आया था और गोलियाँ लग जाने पर बार – बार यही कह रहा था कि, “मैं अभी मरना नहीं चाहता अभी बहुत काम करने हैं । माँ को बोलकर आया था वापस आकर छत ठीक कराऊँगा और तभी सगाई करूँ…….”  और कहते – कहते ही साँस और सगाई सब टूट गया था । वियतनाम से आया विन शुरुआती खोज दस्ते के साथ ही गायब हो गया था फिर मिला ही नहीं । कितने ही और भी थे सैकड़ों, जिनकी गाथाएँ कभी गाई नहीं गईं, कभी गाई भी नहीं जाएँगी । मैं अपनी स्त्रीवादी बहनों से क्षमा चाहते हुए कहना चाहती हूँ कि यहाँ खड़े होकर देखने पर सारे के सारे स्त्री विमर्श और स्त्री – पुरुष की बराबरी की जंग क्षण भर में धराशाई हो जाती जान पड़ती है । यूँ आने वाले कल वहाँ भी स्त्रियाँ खड़ी होंगी तो ज़रूर । किस – किस को याद करूँ किस – किस को छोड़ दूँ । जिसको भी याद करती हूँ उसके चेहरे पर उभरता मुझे एक ही चेहरा दिखाई देता है, कैप्टन विजयंत सिंह का चेहरा । मेरे लाडले बिज्जी का चेहरा, जिसे अपनी हर जीत कम पड़ जाती थी और जिसका दिल किसी भी जीत से भरता ही ना था । हर जीत के बाद बस एक ही ऐलान करता था, “अभी तो दिल भरा नहीं” और एक के बाद एक चोटी फतह करता गया था । उसे तो दुश्मन सेनाएँ भी उसके नाम से जान गई थीं और उसी को टार्गेट करके प्लान बनाए थे ।
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सोलह सत्रह – हजार फीट की ऊंचाई पर सुरक्षित खड़ा था दुश्मन, ना उसकी संख्या का पता था, ना ताक़त का और न उसकी किसी अन्य स्थिति का ही पता था । नीचे तलहटियों में चींटियों से बेखबर भटकते हमारे फ़ौजी बच्चे, जिनके पास इतनी ठंड के लिए कपड़े, जूते भी नहीं थे । जैसे आँखों पर पट्टी बाँधकर घने जंगलों में आदमखोर जानवरों के आगे ठेल दिये गए थे । इतनी अदूरदर्शिता से तो कोई युद्ध ना लड़ा गया होगा कभी, यह रोष तो रहेगा मुझे हमेशा । लगातार पैंतालीस दिनों तक वे बहादुर बच्चे अपनी इस अनभिज्ञ स्थिति पर या तो शहीद होते रहे थे या फ्रस्ट्रेट । बहुत देर तक तो उन्हें यही पता था कि उनकी लड़ाई शलवार कमीज़ धारी मुज़ाहिद्दीनों से है, जबकि वे थे तो सशस्त्र शत्रु सेना के सैनिक । ऐसे दुश्मन से लड़ना और जीतना कितना मुश्किल पड़ा होगा हमारे जवानों को तलहटियों में खड़े होकर जहाँ उनके ऊपर चढ़ने पर दुश्मन तब तक चुप रहता जब तक वे छुप – छुपा कर उसके काफ़ी पास तक न पहुँच जाते और पास जाते ही उन्हें गोलियों से भून देता । वहाँ बैठा एक – एक दुश्मन हमारे कई – कई जवानों पर भारी था । तभी तो एक के सामने कम से कम दस जवानों का रेशो रखा गया था । अराची – कराची, इमला – शिमला सब समझौते बेमाने थे ऐसे विश्वासघाती पड़ोसी के साथ । 
दुश्मन घुस तो गया ही था हमारे बंकरों में, अगर हमारी तैयारी में और कुछ दिन लग भी जाते तो क्या बिगड़ता भला, मेरा दिमाग़ तर्क करता । जैसे सन इकहत्तर में सैम मानेक शॉ ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी तक की बात नहीं मानी थी तत्काल आक्रमण करने की । छह – सात महीने तैयारी में लगाए थे । परिणाम ? युद्ध मात्र तेरह दिनों में खत्म करके शत्रु सेना को समर्पण करने पर विवश कर दिया था । इस बार भी हम तैयारी कर सकते थे, एक बार फिर सैम बहादुर को याद कर सकते थे । पीछे से जाकर वार कर सकते थे, पर इजाज़त नहीं मिली, हम ज़्यादा ओफ़ेंसिव हो सकते थे पर नहीं हुए क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर दुश्मन को मासूम नहीं बनाना था और हमें तो हर हाल में आदर्शों पर टिके रहना था ? मैं तो यही कहती थी कि विश्वासघाती के साथ कैसा आदर्श ? और वैसे भी प्रेम और युद्ध में तो सब जायज़ होता है । अगर युद्ध लड़ा ही गया था तो उसे जीतना चाहिए था जल्दी से जल्दी ताकि कैजुयल्टीज़ कम से कम होतीं, पर नहीं, पूरे पैंतालीस दिन तो शत्रु की स्थिति समझने में ही लग गए । मुझे बिज्जी की एक – एक बात याद आती । बिज्जी के आर्मी जॉइन करने के बाद मैं अक्सर उससे यह बात कहती कि, 
“बिज्जी मेरे दिमाग में हमेशा से एक बात आती है……..” 
“…….कि जब हम इतने हाई टेक वैपन बना सकते हैं तो क्या हम अपने सैनिकों की जैकेट्स पूरी तरह बुलेट प्रूफ नहीं बना सकते ? यही न मॉम ?” वह हर बार ही मेरी बात काटकर, मेरी ही टोन में मेरी शेष बात खुद बोलता ।    
“हम बुलेट्स एड्वान्स करते जा रहे हैं डियर मॉम, उसका इम्पैक्ट बढ़ाते जा रहे हैं ।“ वह दोनों हथेलियों में मेरा चेहरा रखकर बोलता ।  
“हाँ तो फिर हम जैकेट क्यों एडवांस नहीं करते जा रहे बेटे, क्या रक्षक की अपेक्षा मारक ही बलिष्ठ बनता जा रहा है ?”  
“ओ माय डियर मॉम, फिजिक्स की अपनी एक लिमिट होती है और हर सोल्जर की वेट उठाने की भी । अब हम दो कुंटल की जैकेट तो बना नहीं सकते ना मॉम । वैसे अभी सुधार किया तो जा रहा है जैकेट्स में भी । पर वे कभी फूल प्रूफ हो पाएँगी कहना मुश्किल है, क्योंकि जैकेट का काम होता है बुलेट के इंपेक्ट को डिस्पर्स करना । चूंकि बुलेट का इम्पैक्ट हमने बढ़ा दिया पर हम जैकेट और हैवी नहीं कर सकते क्योंकि सोल्जर जैकेट के सिवा भी बहुत कुछ उठाए घूमता है डियर मॉम । जो जैकेट अभी है ना वो इतना ही डिस्पर्स कर सकती है । सॉरी माय डियर मॉम ।“ कहकर वह मुझे प्यार से गले लगा लेता । 
“हूँ…” मैं सोच में बैठी ही रह जाती ।   
“बट यू डों वरी मॉम, मुझे कुछ नहीं होगा, तुम मेरे लिए डरा मत करो बस, डरने जैसी कोई बात नहीं है । दुश्मन की तो किसी भी गोली पर, तुम्हारे बिज्जी का नाम लिखा ही नहीं है न मॉम ।“ 
डरती कैसे नहीं, डर की तो बात थी पूरी – पूरी । अंतिम चोटी को भी जीत ही तो चुका था पर किसी छुपे हुए दुश्मन ने ठीक सीने पर गोली दाग दी । जीत के पुरोधा, फील्ड पर ही प्रमोशन लेकर लैफ़्टीनेंट से कैप्टन बने विजयंत सिंह को तिरंगा लहराते हुए वापस आना था, पर वह आया उसमें लिपटा हुआ। आख़िर मैंने उसे खो ही दिया, वो भी उसकी चौबीस बरस की ज़रा सी उम्र में । परमवीर चक्र मिला है, जब वो ही नहीं, तो ना जाने क्या करूँ उसके परमवीर होने की इस सनद का? 
उसके सामने सारा जीवन पड़ा था जीने के लिए और हमारे बुढ़ापे को भी आश्वस्ति की दरकार थी । वैरौनिका बेताबी से उसकी पत्नी कहलाने की प्रतीक्षा कर रही थी। बिज्जी जैसे प्यारे बेटे को खो देने का दुःख मेरी अंतिम साँस तक, मेरे पोर – पोर से निरंतर रिसेगा । 
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खुद सघन पीड़ा से गुजरते विक्रांत ने धीरे से मेरा सिर अपने बलिष्ठ, पर चहेते बेटे के ग़म से लदे बोझिल और उदास कँधे पर झुका लिया है । यह गृहस्थ रिश्ते का घनिष्ठतम रूप है, प्राणलेवा घनघोर पीड़ा, निराशा और अवसाद के समय यह सान्निध्य हर मत वैभिन्य को धूमिल कर एक सच्चे प्रेम का सूत्र सा है । उन्होंने मुझे अपनी दाहिनी बाँह के माध्यम से, दर्द से सराबोर पर प्रेमिल अपनत्व भरे विश्वसनीय सुरक्षा घेरे में ले रखा है । वे मेरी युद्ध विरोधी बातों पर ज़रा भी ग़ुस्सा नहीं कर रहे, बहुत धैर्य रख कर अपने स्वभाव के विरुद्ध मुझे सांत्वना दे रहे हैं,,, 
“शैला पहली बात, हम युद्ध कभी नहीं करना चाहते । अच्छा तुम बताओ क्या भारतीय सेना ने कभी युद्ध की पहल की? पर डिफैंस तो करेंगे ही । तुम्हारे घर में कोई ग़लत आदमी घुस कर बैठ जाए तो क्या तुम उसे भगाओगी नहीं ? रहने दोगी अपने ही घर में ? इस भगाने और रह जाने के क्रम में घायल वो भी हो सकता है और तुम भी हो सकती हो, प्रोबेबिलिटी तो होती है ही ना फ़िफ़्टी – फ़िफ़्टी परसेंट । और अगर नहीं भगाओगी तो वह तुम्हें ख़त्म कर देगा, उसे भगाना मजबूरी है शैला। देश भी हमारा घर ही तो है । आक्रांता को नहीं भगाया गया तो वो देश को ख़त्म कर देगा । फिर बोलो कौन सी ज़मीन तुम्हारी होगी ?”
“भले ही देश के लिए युद्ध कितना भी ज़रूरी क्यों न हो पर मैं तो यही कहना चाहती हूँ विक्रांत कि किसी भी युद्ध की भेंट आख़िर मेरा ही बच्चा क्यों चढ़े ? मुझे नहीं कहलाना है खुद को, संसार की सबसे मज़बूत औरत ।“ 
“फिर ऐसे तो हर माँ यह कहेगी मेरा ही बच्चा क्यों ? तो फिर कौन जाएगा सीमाओं पर ? इससे पहले भी ना जाने कितनी माँओं के कितने ही बिज्जी शहीद हुए हैं शैला, बस फ़र्क़ इतना सा है कि इस बार वह तुम्हारा बिज्जी था ।“ 
बिज्जी विक्रांत का भी हमेशा से चहेता बच्चा था। मैं जानती हूँ उसके बिना वे भी भीतर से बुरी तरह टूटे हुए हैं पर अपने और बिज्जी के शौर्य का मज़बूत बख़्तर पहने खड़े मुझसे कह रहे हैं, “बिज्जी की शहादत बेकार नहीं गई उसने आक्रांता को देश से निकाल फेंका है शैला, इस तरह बिहेव करके तुम उसकी शहादत का अपमान मत करो ।“ 
अब आँसू  नहीं हैं, पत्थर हुए दिल में बिज्जी की याद और मेरी वही बात है कि आदमी आज भी उतना ही असभ्य और बर्बर है जितना शतब्दियों पहले अपनी आदिम अवस्था में था । समझता नहीं है प्रकृति का यह सोचा – समझा षड्यंत्र कि वह हमें आपस में लड़वा कर खुद सुपर बनी रहती है । यहाँ मेरा प्रश्न भी रह – रह कर मुँह चमकाता है कि जिसे हम इस पार मार गिराते हैं उस पार तो वह भी शहीद ही होता है। वह भी मेरे बिज्जी से कम लाड़ला तो नहीं होगा अपने माता – पिता का।  उसके माता – पिता को भी हमसे कम दुःख तो नहीं होता होगा अपने बच्चे की शहादत का । जब इस कदर दुःख है इस पार, उतना ही उस पार भी है, तो युद्ध जायज़ कैसे हुआ भला ?
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2 टिप्पणी

  1. निर्देश निधि जी की यह कहानी युद्ध पर आधारित है। “कोई भी युद्ध किसी भी परिस्थिति में जायज नहीं ठहराया जा सकता है” पूरी कहानी पर हावी रहता है। इसके साथ ही प्रकृति अपने को श्रेष्ठ साबित करने के लिए हमसे ऐसे युद्ध करवाती रहती है। लेखिका का प्रकृति पर यह आक्षेप सोचने पर मजबूर करता है कि हें! ये भी। मतलब सब करा-धरा प्रकृति का होता है। युद्ध की विभीषिका और उससे उत्पन्न संवेदना कहानी को उत्कृष्ट बनाती हैं। कहानी में युद्ध के सजीव चित्र तो है ही साथ ही युद्ध के बारे में हर पात्र की अपनी सोच है। मां की सोच कहना ठीक नहीं होगा, मां की अन्तर्वेदना ऐसी है कि सुनकर हृदय पिघल उठता है। कहानी में ऐतिहासिक युद्धों को समाहित करके सच के काफी नजदीक पहुंचा दिया जाता है। शहीद सोल्जर्स के नाम वास्तविक हैं अगर कुछ के नहीं भी हैं तो उनके वास्तविक कामों से पहचान लिया जाता है। बढ़िया कहानी के लिए लेखिका को बधाई।

  2. सही है कि किसी भी परिस्थिति में युद्ध जायज़ नहीं है। युद्ध एक देश के वर्चस्व और दम्भ की उपज है जिसे दूसरा देश सुरक्षा की दृष्टिकोण से नज़र अंदाज़ नहीं कर सकता। फौज के कई पहलुओं को बाखूबी उजागर किया और उसके साथ न्याय किया है। कहानी में अनेकों वास्तविक घटनाओं और सूचना को दर्शाया गया है जिससे कहानी रियलिस्टिक लगता है। सभी पात्रों का चरित्र चित्रण भी सटीक है। कहानी का शीर्षक सार्थक है। सुंदर कहानी। साधुवाद। बधाई।

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