कमरे के बाहर गाड़ी की हार्न की आवाज सुनकर सनारा ने तीव्रता से खिड़की से बाहर झाँक कर देखा। उसने देखा नीचे एक कार खड़ी थी। कार की खिड़की से एक लड़का ऊपर खिड़की की ओर देख रहा था। सनारा ने गाड़ी वाले लड़के को देखकर हाथ हिलाया और अपने आने का संकेत दिया।
’’अच्छा अब मैं चल रही हूँ। रात को हो सकता है। लौटने में देर हो जाये तो तू खा–पी कर सो जाना। नाहक ही जाग कर तू मेरी प्रतीक्षा करती हैं। सो जाना….’’ कहती हुई सनारा हाथ हिलाती हुई सीढ़ियों से नीचे उतर गयी।
सनारा के पीछे–पीछे मैं जो उसकी रूम पार्टनर हूँ बालकनी तक आयी यह देखने कि कल जो लड़का सनारा को लेने आया था, वही लड़का आज भी है या कोई अन्य। मन ही मन मैं सोच रही थी कि सम्भवतः कल का ही लड़का हो।
’’अरे! आज तो कोई और ही लड़का है जिसके साथ वो घूमने या किसी काम से जा रही है। कुछ समझ में नही आ रहा है।….. आज एक लड़का तो दो–चार दिनों पश्चात् दूसरा। पूछने पर कहती है काम से जा रही है।
मुझे कोई और रूम मिल जाता तो मैं इस लड़की के साथ नही रहती। मुझे इसका ये रंग–ढंग पसन्द नही है।….. किन्तु यही समस्या है इस शहर में कि रहने के लिए एक रूम ढूँढने में इतना समय लगेगा कि मिलते–मिलते रूम की आवश्यकता ही खत्म हो जाएगी। सब कुछ मिल सकता है किन्तु किराये का घर मिलना कठिन है यहाँ…..मन ही मन बड़बड़ाती हुई मैं कमरे में आयी और निढाल–सी बिस्तर पर पड़ गयी।
….न जाने कब मुझे नींद आयी, कुछ पता नही। रात के लगभग दो बजे मेरी नींद खुली। मैंने सनारा के बिस्तर की ओर देखा। बिस्तर खाली था।
’’ओह! इतनी रात तक बाहर रहने लगी है। उसकी ये बात मुझे पसन्द नही है। आज आएगी तो स्पष्ट शब्दों में कह दूँगी कि अपना रहने का ठिकाना अलग कर ले। मैं ये सब कुछ बर्दाश्त नही करूँगी। ’’ मैंने ने मन ही मन सनारा से ये बातें कहने का निर्णय लिया।
बिना भोजन किये मैं सो गयी थी। इस समय मुझे तीव्र भूख लग रही थी।…..अब ये भी कोई भोजन करने का कोई समय है? भूख तो लगी है। चलो बिस्किट खाकर पानी पी लेते हैं। ’’ यही सोचकर मैंने बिस्किट खाकर पानी की बोतल उठाई ही थी कि दरवाजा खुलने की आवाज आयी।
’’ तो ये समय है आने का? ’’ सनारा के रूम में घुसते ही मैंने कहा।
’’ अब तुम मेरी गर्जियन कब से होने लगी? मैं कभी भी, कहीं भी आऊँ–जाऊँ तुम मेरा हिसाब किताब रखने वाली कौन हो? ’’ सनारा की बात सुनकर मैं कुछ अचम्भित थी। सनारा को पहले से कुछ अनुमान था कि मैं ये सब कुछ उससे कह सकती हूँ। अतः उसने पहले से ही जवाब सोच रखा था।
सनारा का उत्तर सुनकर मैं आश्चर्यचकित सी खड़ी रह गयी। वैसे सनारा का देर रात तक बाहर रहना पहली बार नही था। पहले तो अधिकांशतः वैभव के साथ बाहर जाती थी। किन्तु अब आये दिन अलग–अलग मित्रांे के साथ देर रात तक बाहर रहती है।
सनारा ने कपड़े चेंज किये और आराम से अपने बिस्तर पर लेट गयी। कुछ ही देर में उसके खर्राटे की आवाजें आने लगीं।
….किन्तु मेरी की आँखों में नींद नही थी। सनारा को लेकर मेरे मन में तरह–तरह के विचार आ रहे थे।…वो दिन मेरी स्मृतियों में पाँव पसारने लगे जब सनारा से पहली मुलाकात हुई थी।
…..सनारा मुझसे दो क्लास जूनियर थी। मुझे भली प्रकार स्मरण है कि उस दिन क्लास खत्म होने के पश्चात् जब मैं काॅलेज से हाॅस्टल के लिए निकल रही थी उसी समय, कालेज के गेट पर एक लड़की स्कूल बैग के अतिरिक्त एक अन्य सामानों का बैग लेकर व्याकुल और परेशान होकर इधर–उधर देख रही थी। सहसा मेरी दृष्टि उससे टकराई और वो निरीह दृष्टि से मुझको देखने लगी।
’’ तुम क्या किसी की प्रतीक्षा कर रही हो? ’’ मैं उसके समीप गयी और पूछा।
’’ नही, आज काॅलेज में पहला दिन है। मैं यहाँ किसी को नही जानती। ’’ उस लड़की ने कहा।
’’ क्लासेज खत्म हो गयीं तो अब कहाँ जाओगी? अपने घर? ’’ मैंने पूछा।
’’ कुछ पता नही। मेरा कोई घर नही है। मेरे चाचा दूसरे शहर में रहते हैं। वो मेरा एडमिशन करा कर वापस चले गये। ’’ उस लड़की ने कहा।
’’ माता–पिता? ’’ मैंने पूछा।
’’ माँ का निधन मेरे बचपन में ही हो गया था। मेरा पिता मेरी किशोरावस्था आते–आते पिता नही रहा। इस समय मैं अकेली हूँ। ’’ कहते–कहते उस लड़की की आँखों के कोर भीग गये और होठ काँपने लगे, कदाचित् रोने को तत्पर थे किन्तु किसी प्रकार उसने रूलाई रोक ली थी।
’’ तो अब चलना चाहो तो मेरे साथ हाॅस्टल चलो। मैं भी अपने रूम में जा रही हूँ। मेरा हाॅस्टल बस चन्द कदमों की दूरी पर है। ’’ मैंने कहा।
’’ हाॅस्टल? किन्तु किसी हाॅस्टल में मैं कमरा अभी तक ले नही पायी हूँ। ’’ उसकी बात सुनकर मेरी व्याकुलता और बढ़ गयी थी।
’’ तो, अपने चाचा से कहो कि आज तुम्हें रूम दिला कर जायें। या आज के लिए होटल वगैरह में….।
’’ …..नही…नही…चाचा नही आएंगे। मैंने उनसे कह दिया है कि मैं रहने की व्यवस्था स्वंय कर लूँगी। ’’ मेरे कुछ और कहने से पूर्व ही वह लड़की बोल पड़ी।
’’ तो रहने की व्यवस्था तुम कैसे करोगी? क्या कहा है तुमने अपने चाचा से? ’’ मैंने पूछा।
’’ मैंने कह दिया है कि ट्यूशन वगैरह कर के अपने खर्च निकाल लूँगी। ये मैंने अपने चाचा की चिन्ता दूर करने के लिए यूँ ही कह दिया। ’’ उस लड़की ने कहा।
’’ तो अभी शाम हो जाएगी। फिर कहाँ जाओगी? इतनी शीध्र हाॅस्टल में रूम मिल जाएगा? ’’ मुझे उस लड़की से सहानुभूति हो आयी। न जाने कैसे लोग हैं बिना रूम दिलवाये काॅलेज में छोड़कर लड़की को चले गये।
बहुत देर तक मैं असमंजस की स्थिति में वहीं खड़ी रही।
’’ यदि तुम चाहो तो मेरे साथ हाॅस्टल में चलो। वार्डन मैम से तुम्हारी समस्या कहती हूँ। कदाचित् वो कुछ कर सकें। यहाँ काॅलेज के गेट पर खड़े रहना सुरक्षित नही है। थोड़ी देर में अँधेरा होने लगेगा। ’’ मैंने उस लड़की से कहा।
’’ धन्यवाद दी। ’’ कहती हुई वह लड़की अपना सामानों का बैग लिए मेरे साथ चल पड़ी। उसने बताया कि उसका नाम सनारा है।
हाॅस्टल में कोई रूम खाली नही था। परिस्थितियाँ ऐसी बनी कि वार्डन मैडम ने मेरे रूम में ही सनारा को रूम पार्टनर बना दिया। मैं शोध कर रही थी। शोध में मेरा यह पहला वर्ष था। पढ़ने में मेरी रूचि थी। मैं अच्छी शिक्षा प्राप्त कर कोई अच्छी नौकरी करना चाहती थी। अतः प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी भी कर रही थी। पढ़ने में कोई व्यवधान न हो इस कारण मैंने अकेले रूम लिया था।
अब सनारा भी उसके रूम में रहने आ गयी। मैने मन ही मन सोचा कि चलो कोई बात नही, सामंजस्य बैठा लेंगे। उसके साथ कोई विवशता है, इसी कारण तो उसके लिए अब तक रूम की व्यवस्था नही हो सकी थी।
इस बात को दो वर्ष व्यतीत हो गये हैं। सनारा के खर्च के लिए पैसे कहाँ से आते हैं? वह अपनी फीस, अपने मेस के भोजन के पैसे कहाँ से पे करती है, इन बातों से मेरा कुछ लेना–देना नही था। कदाचित् उसके चाचा भेजते हों।
प्रथम वर्ष तो सब कुछ ठीक था। दूसरा वर्ष आते–आते सनारा के व्यवहार में बदलाव आने लगा। जो पैसे का हिसाब जोड़ती रहती थी वो अब फैशन और घूमने–फिरने पर अधिक ध्यान देती। उसके पास इसके लिए पैसे कहाँ से आते कुछ पता नही।
कॉलेज से आते ही नये फैशन के वस्त्र पहन कर मुझसे कुछ बताये बिना बाहर चली जाती।
थोड़ी देर आराम कर मैं अपनी पढ़ाई में व्यस्त हो जाती। देर रात सनारा आती और चेंज कर सो जाती। वह बहुधा बाहर से खा–पी कर आती अतः मेस के भोजन के समय की उसे परवाह भी न थी। किन्तु मेस के भोजन के पैसे वो अवश्य भरती थी। वार्डन मैम को भी कोई न कोई बहाना बना कर संतुष्ट कर देती।
आज के उसके जवाब से मैं बहुत आहत हुई। मेरे ही कारण सनारा को इस हाॅस्टल में रूम पार्टनर के रूप में जगह मिली। वो दिन भी मुझे स्मरण हैं जब पहले कॅलेज के गेट पर बिना किसी ठौर–ठिकाने के असहाय–सी खड़ी थी। मैंने आगे बढ़कर उसका साथ दिया।
आज वही सनारा उसे पढ़ाई में डिस्टर्ब तो कर ही रही है। ग़लत तरीके से देर रात तक बाहर घूमना…उधर से ही खा–पी कर आना….क्या मैं नही समझती कि सनारा ग़लत रास्ते पर चल पड़ी है?
आज मैं किसी प्रकार सो गयी। मैंने तय कर लिया कि कल वार्डन मैम से कह कर अपना रूम बदलवा लूँगी या सनारा को दूसरा रूम लेने के लिए कहूँगी।
अगले दिन की दिनचर्या प्रारम्भ हो गयी। मैं और सनारा काॅलेज के लिए तैयार हो कर निकलने ही वाली थीं कि….
’’ मैं आज अभी वार्डन मैम से अलग रूम लेने के लिए बात करूँगी। उनसे कहूँगी कि मेरा और तुम्हारा रूम अलग कर दें। मैं तुम्हारे साथ अब नही रह पाऊँगी। शाम तक उनसे अलग व्यवस्था कर देने के लिए कहूँगी। ’’ मैंने सनारा से कहा।
’’ कल रात के अपने व्यवहार के लिए साॅरी। ’’ मेरी दृढ़ता देख सनारा कदाचित् थोड़ा विचलित हो गयी थी और रूँआसी भी।
’’ साॅरी से क्या होता है? तुम्हारा प्रतिदिन का यही है। मैं यहाँ पढ़ने आयी हूँ। मेरा शोध कार्य समय और एकाग्रता मांगता है। तुम्हारी वजह से मुझे डिस्टर्ब होने लगा है। ’’ मैंने स्वर में थोड़ी सख्ती लाते हुए कहा।
’’ वान्या, प्लीज मुझे अपने साथ रहने दो। ’’ सनारा के नेत्र डबडबाने लगे।
’’ नही सनारा, बहुत हो गया। अब हम अलग–अलग अपनी व्यवस्था कर लेते हैं। एक दो कमियाँ तुम्हारे या मेरे में हों तो इग्नोर किया जा सकता है। मुझे कहने कोई अधिकार नही किन्तु अब मैं तंग आ चुकी हूँ…..तुम देर रात तक लड़कों के साथ बाहर रहती हो। ये सब मेरी समझ से बाहर है। अपने लिए अलग रूम देख लो तुम या मैं ही किसी और के साथ एडजस्ट कर लूँगी। ’’ सनारा के न मानने पर मैंने पुनः वही बातें दोहराई।
मेरी बातें सुनकर सनारा अब सिसकने लगी थी। अब रोना–धोना क्यों कर रही हो? मेरी क्लास की देर हो रही है। मैं जा रही हूँ। ’’ कह कर मैं बाहर निकलने के लिए तत्पर हुई।
’’ नही वान्या, जैसा तुम सोच रही हो मेरा जीवन, मेरी परिस्थितियाँ वैसी नही हैं।……मैं लड़कों के साथ घूमने जाती हूँ किन्तु उनके साथ ग़लत काम नही करती। मुझे तुम्हारे साथ रहना है वान्या। कल रात के लिए और उन सभी ग़लत बातों के लिए जो कर के, मैने तुम्हारे हृदय को चोट पहुँचाई है उन सभी के लिए मुझे क्षमा कर दो।…..’’ कह कर सनारा चुप हो गयी और एक दोषी की भाँति जमीन की ओर देखने लगी।
’’ क्षमा मांगने वाली कोई बात नही है सनारा। मैं तुम्हारी रूम पार्टनर हूँ। कोई रिश्तेदार नही। वार्डन से मैं मिल लूँ आज। ’’ मैंने कहा।
’’ वान्या आज मैं अपने जीवन की कुछ व्यक्तिगत् बातों से तुम्हें अवगत् कराना चाहती हूँ। तुम मानो या न मानो तुम्हारे साथ रह कर मैं स्वंय को सुरक्षित महसूस करती हूँ।….वान्या आज मैं तुम्हें अपने बचपन की वो दःुखद बातें बताऊँगी, जिनसे तुम्हें अवगत् कराना अब मैं आवश्यक समझती हूँ।…..तुम्हें यह तो मैंने बताया था कि मेरी माँ मेरे बचपन में गुज़र गयी थीं। मेरे माँ के न रहने पर मेरा जीवन नरक हो गया था, वान्या नरक।….उस दिन की बात है जब मैं बारह–तेरह वर्ष की हो गयी थी। मैं उस समय मैं स्कूल पढ़ने जाती थी। साथ ही पापा घर के अधिकांश काम भी मुझसे ही करवाते थे। मैं चाहे जितना भी थकी रहती, काम तो मुझे करने ही होते…..
…….अब मुझे प्रतीत होता है कि वे मेरे प्रति निर्दयी थे। जिसको कौमार्य कहते हैं न, जिसका लड़कियों के जीवन में खासकर वैवाहिक जीवन में हमारे समाज में बहुत महत्व होता है। मैंने सुना है कि अच्छी लड़कियाँ पहली बार अपने कौमार्य का उपहार ले कर पति के पास जाती हैं। मेरा वो कौमार्य खत्म हो चुका है।….’’ कह कर सनारा चुप हो गयी और फफक–फफक कर रोने लगी।
’’ हाँ, तुम सच कह रही हो। किन्तु मैं भी लड़की हूँ। इसलिए कहना चाहूँगी कि कौमार्य का प्रोपोगैंडा हमारे समाज में मर्दाें ने जो फैलाया है उसमें मैं विश्वास नही करती। उसके टूटने के कई कारण हो सकते हैं लड़की का चरित्र उसके लिए उत्तरदायी नही है। मेरे कहने का अर्थ यह है कि कौमार्य टूट गया तो इसका मतलब यह नही कि लड़की चरित्रहीन है।…किन्तु? ’’ किन्तु कह कर मैं खामोश हो गयी।
’’ किन्तु क्या वान्या? बताओ न? वान्या किन्तु कह कर तुमने बात अधूरी क्यों छोड़ दी? ’’ सनारा की स्थिति दयनीय–सी हो गयी।
’’ सनारा, तुम भी समझ रही हो तुम किस मार्ग पर चल पड़ी हो? मुझे किसी के व्यक्तिगत् जीवन के बारे में कुछ नही कहना। तुम्हारे भी नही। तुम जो चाहे करो। बस, हम रूम अलग कर लेते हैं। ’’ सनारा के व्यवहार से मेरा मन व्यथित था।
’’ ठीक है वान्या। किन्तु तुम मेरी प्रेरक हो। तुम पूछोगी नही कि बचपन में मेरी माँ गुज़र गयी थी तो मेरी देखभाल, मेरा पालन पोषण किसने किया? कैसे मैं पली–बढ़ी? ’’ सनारा ने मुझसे पूछा।
सनारा की बात सुनकर मैं चुप थी। वह इस विषय पर कोई बात करना नही चाहती थी।
’’ तुम नही पूछोगी किन्तु मैं तुम्हें अवश्य बताऊँगी।….वान्या ये जो तुम्हारी ग़लतफहमी है कि मैं लड़कों के साथ देर रात घूमती हूँ तो उनसे शारीरिक सम्बन्ध स्थापित करती हूँ, मूवी देखती हूँ, होटलों में घूमती हूँ, पैसे लेती हूँ।….तुम्हारी ये सोच स्वाभाविक है वान्या।…
…. तुम्हें मैं अपनी मित्र और शुभचिन्तक मानती हूँ। इसी कारण मुझे तुमसे यह कहने में कोई झिझक या संकोच नही है कि मैं जिन लडकों के साथ बाहर जाती हूँ उन्हें अपने शरीर का स्पर्श भी करने नही देती।….और यह भी कि मुझे पुरूषों से घृणा है। ’’ सनारा के यह कहते ही मैं आश्चर्य से उसकी ओर देखने लगी।
’’ हाँ वान्या, यह सच है। मैं पुरूष द्वारा छली गयी हूँ। मेरा शोषण किया गया है। तुम सोच रही होगी कि यहाँ लड़कों के साथ घूमती हूँ और उनसे दूरी भी बना कर रहती हूँ तो मेरा शोषण कब हो गया? सुनना चाहोगी मेरी हृदयविदारक दास्तान? ’’ कह कर अनारा उम्मीद भरी दृष्टि से मेरी ओर देखने लगी।
’’ आज का हमारा फस्र्ट पीरियड छूट ही गया। बताओ क्या बताना चाहती हो? वैसे मैं सुनकर भी क्या करूँगी? तुम्हारी जो मर्जी होगी वो तो तुम करोगी ही। ’’ मैंने कहा।
……’’ वान्या, तुम्हें पता है एक बच्ची जो अपने माता–पिता की इकलौती सन्तान है, नौ वर्ष की उम्र में उसकी स्वस्थ माँ सहसा गुज़र जाती है, उस बच्ची पर क्या गुज़री होगी? कैसे पली होगी।….
…..माँ के गुजरने के पश्चात् कुछ समय के लिए मेरे पिता न जाने कहाँ चले गये थे। मुझे कुछ नही पता था। मेरी देखभाल मेरे चाचा–चाची करते थे। क्यों कि उस समय हमारा सयंुक्त परिवार था। चाची तैयार कर मुझे स्कूल भेजती थीं।…..
…….कुछ महीनों पश्चात् मेरे पापा आ गये। इतने दिनों वे कहाँ थे? क्या कर रहे थे मुझे कुछ नही पता। पता भी कैसे होता? आठ नौ बरस की बच्ची इस दुनिया को अकेले हकबकाई हुई दृष्टि से देख रही थी। उसके साथ कोई नही था। वो अकेली थी….बिलकुल अकेली।…..
….मेरी चाची में मेरी माँ का हल्का प्रतिरूप था। वे ही मुझे स्कूल भेजती थीं। साथ ही घर के काम भी सिखाती थीं। समय बढ़ता रहा साथ ही मैं भी। चाची के भी दो बच्चे थे। लगभग मेरे ही हम उम्र।….
…….मुझे अपने पापा से डर लगता। किन्तु स्कूल की फीस और अन्य खर्चे आदि मांगने के लिए चाची मुझे पापा के पास भेजतीं। पापा मुझे पैसे देते और मैं तुरन्त लेकर चाची के पास भाग आती।….
…..उस वर्ष मैं दसवीं की परीक्षा की तैयारी कर रही थी। चाची के बच्चों से मेरी मित्रता या स्नेह जो भी कह लो अच्छा था।….चाची के उन्हीं दोनों बच्चों का फोन अब भी कभी–कभी मेरे पास आता है। ’’ सनारा अपनी बात कहती जा रही थी और मैं अपनी पढ़ने की मेज पर बैठी ध्यान से सुन रही थी।
……तुम जानती हो सनारा समय एक चिकित्सक की भाँति होता है। बड़े–बड़े जख्म भर देता है। माँ की स्मृतियाँ मेरे मन मस्तिष्क में धुँधली हो गयी थीं। कि एक दिन न जाने क्या हुआ? पता नही किस बात पर मेरे पापा और चाचा में झगड़ा हो गया।…..
…..एक सप्ताह में झगड़ा इतना बढ़ गया कि चाचा ने वो घर छोड़ दिया और दूसरी जगह रहने चले गये। मैं दसवीं की परीक्षा दे चुकी थी। ग्रीष्मावकाश चल रहा था। अब मैं सोचती हूँ उसी समय ये सब कुछ होना था।
……एक तो गर्मी की छुट्टियाँ दूसरे खाली घर में अकेली मैं। पापा तो अधिकांशतः घर के बाहर रहते थे। घर में भी बाहरी कमरे में। वैसे भी उनका बाहर रहना ही ठीक था। उनके घर में रहने पर मैं सहज नही रह पाती थी।….
…..चाची के परिवार के न रहने से अकेलापन मुझे बहुत काटता था। बस…उन्हीं गर्मियों की बात है एक रात जिसे कौमार्य कहते है न, मेरा वह कौमार्य खण्डित हो गया। या खण्डित कर दिया गया। मैं क्या करती? आत्महत्या कर लेती? या चिल्ला–चिल्ला कर दुनिया को बताती कि मैं कुमारी नही रही, मैं चरित्रहीन हो गयी हूँ?
चरित्रहीन मैं थी या चरित्रहीन पुरूष के रूप में वो भेड़िया था, जो जब इच्छा होती रात के अँधेरे में मुझे नोचता। मैं निर्जीव हो चुकी थी…एक जिन्दा लाश जिसे तुमने शायद ही कभी देखा हो। क्या तुमने जिन्दा लाश देखी है? न देखी हो तो मुझे देख लो।
…सब कुछ इतना सरल नही होता है वान्या।….
……कदाचित् मेरी परिस्थितियाँ देख कर ईश्वर ने मेरे भीतर साहस की मात्रा कुछ ज्यादा ही भर दी है। उन परिस्थितियों का साहस के साथ मैंने सामना किया और पढ़ना जारी रखा।….
…..ये काॅलेज के लड़के जिनके साथ मैं देर रात बाहर रहती हूँ वो उस भेड़िया से कहीं अच्छे हैं। मैं उनके साथ घूमती हूँ, होटलों में अच्छा डिनर करती हूँ। अपना अतीत भूलने के लिए मेरे लिए ये अति आवश्यक है वान्या। उन पैसे वाले घरों के लड़कों के साथ मैं बाहर न निकलूँ तो अतीत के बोझ से घुटकर मर जाऊँगी।…..
………आवश्यकता पड़ने पर या समझ लो लगभग प्रतिदिन मुझे कुछ न कुछ पैसे भी देते हैं। वो पैसे मेरी फीस व अन्य आवश्यकताओं के काम आते हैं। उन लड़कों ने मुझसे आज तक शारीरिक सम्पर्क बनाने के लिए नही कहा।….
…..तुम्हारा ये कहना बिलकुल सत्य है कि समय–समय पर मेरे साथ घूमने वाले लड़के बदल जाते हैं। वो लड़के तब बदलते हैं वान्या जब उन लड़कों की अपेक्षाएँ मुझसे बढ़ जाती हैं। मैं उन्हें छोड़ देती हूँ और अपने लिए मुझे किसी दूसरे लड़के का सहारा लेना पड़ता है।….
’’ इसका अर्थ यह हुआ कि तुम लड़को को बेवकूफ बनाती हो? बेवकूफ बना कर उनसे पैसे एंैठती हो? ये तो गलत बात है। ’’ मैंने कहा।
’’ नही, मैं किसी लड़के को बेवकूफ नही बनाती हूँ। लड़के सोचते हैं कि इस लड़की को सरलता से फँसा कर शोषण किया जा सकता है। ये उनकी सोच है। ये सोच मात्र मेरे लिए नही बल्कि प्रत्येक उस लड़की के लिए है जो उन्हें पसन्द आ जाती है। ’’ सनारा ने कहा।
’’ मुझे तो ऐसे लड़के नही मिलते? मैं भी उसी काॅलेज में पढ़ती हूँ। ’’ मैंने कहा।
’’ सही कहा तुमने। तुम्हें नही मिलेंगे। क्यों कि तुम्हारे माता–पिता हैं जो तुम्हारी सभी आवश्यकताएँ पूरी करने के लिए तुम्हारे साथ हैं। ’’ सनारा ने कहा।
’’ तुम्हारे साथ भी तो तुम्हारे पिता है? उनके रहते हुए तुम्हें क्या आवश्यकता पड़ जाती है? तुम उनकी इकलौती सन्तान भी हो। तो फिर? ’’ मैंने कहा।
’’ बस, यही तुम नही समझ पायी। मैं पढ़–लिख कर आत्मनिर्भर बनना चाहती हूँ। मुझे मेरी पढ़ाई के लिए पैसे देने वाला कोई नही है। कभी–कभी मेरे चाचा मेरी मदद करते हैं। किन्तु उनके भी दो बच्चे हैं। वे कब तक मेरा उत्तरदायित्व उठाते रहेंगे। बहुधा पैसे कम पड़ जाते हैं। ’’ सनारा ने कहा।
’’ फिर वही प्रश्न….तुम अपने पापा से पैसे क्यों नही लेती? तुम उनकी इकलौती सन्तान हो। तुम्हें ये सब करने की क्या आवश्यकता है? ’’ मैंने सनारा से कुछ सख्त होते हुए पूछा।
’’ वान्या…ओ वान्या…। ’’ कह कर सनारा ठहाका लगा कर हँस पड़ी। मैं आश्चर्यचकित उसकी ओर देखती रही।
’’ क्यों? ऐसे हँस क्यों रही हो? मैंने कुछ ग़लत कहा क्या? ’’ मैंने कहा।
’’ नही, कुछ ग़लत नही कहा। तुमने ये क्यों नही पूछा वान्या कि मेरे कौमार्य जैसा इम्र्पोटेन्ट चीज खण्डित कर देने वाला वो भेड़िया कौन था? ये क्यों नही जानना चाहा तुमने? जब कि उन साधारण लड़कों को जो कुछ समय मेरे साथ घूम फिर कर खुश हो लेते हैं, उन्हंे तुमने दोषी ठहरा दिया? ’’ सनारा ने व्यंग्यात्मक हँसी हँसते हुए कहा।
’’ तो बताओ न कौन था वो भेड़िया? यह व्यक्तिगत् बात हो जाती इसलिए नही पूछा। अब बता दो। ’’ मैंने कहा।
’’ यह व्यक्तिगत् बात हो जाती? उन लड़कों और मेरे ऊपर आक्षेप लगा रही थीं, वह व्यक्तिगत् नही था? तुम्हें अपनी व्यक्तिगत् बातें भी बताऊँगी। क्यों कि तुम्हारे साथ मुझे अपनापन और सहारे की अनुभूति होती है।…
…..तुम मेरी विवशता समझो या न समझो, यह तुम्हारे ऊपर निर्भर करता है। मेरी सच्चाई सुन कर तुम वार्डन के पास जाना चाहो तो जा सकती हो। मैं तुम्हें रोकूँगी नही।…वो भेड़िया जो रातों के अँधेरे में मेरा शरीर नोचता था वो मेरा पिता था। मेरा अपना पिता। जिससे तुम मुझसे सहायता मांगने के लिए कह रही हो।….बस मुझे इतना कहना था। शेष….समय और भाग्य जहाँ ले जाएगा, मैं वहाँ चली जाऊँगी। ’’ कह कर सनारा चुप हो गयी। उसने मेरी ओर से अपना चेहरा दूसरी ओर घुमा लिया था।
’’ उफ्…उफ्….ज़िन्दगी ने तुम्हें इतनी पीड़ा दी है सनारा? मैं अपने इस अमानवीय व्यवहार के लिए तुमसे क्षमा मांगती हूँ। तुम मेरे साथ रहो। एक बात मैं तुमसे कहना चाहती हूँ सनारा, क्या तुम अपनी बड़ी बहन की बात मानोगी? ’’ मैंने अपनी कुर्सी से उठकर सनारा के पास आकर उसका हाथ पकड़ लिया।
जीवन में किसी से पहली बार इतना स्नेह और सच्ची सहानुभूति पा कर सनारा दर्द भरे स्वर में रोने लगी।
’’ मत रोओ सनारा। अब रोने का नही कुछ करने का समय है। ’’ मैंने सनारा को समझाते हुए कहा।
’’ बताओ वान्या मुझे तुम्हारी कौन–सी बात माननी है। तुम जो कहेगी मैं वो करूँगी। मात्र इस हाॅस्टल में रहते हुए नही। मैं जीवन भर तुम्हारे बताये रास्ते पर चलूँगी। इस दुनिया में मेरा कोई नही है। तुम्हें बड़ी बहन–सा सम्मान देती रहूँगी। ’’ सनारा की रूलाई थमने का नाम नही ले रही थी।
’’ पहली बात यह कि तुम अब किसी लड़के के साथ पैसे के लिए बाहर नही जाओगी। हाँ, मैं लड़के–लड़िकयों से मित्रता करने के लिए नही रोक रही हूँ। किन्तु पैसों के लिए नही जाओगी। खर्चे के पैसे और तुम्हारी फीस की व्यवस्था मैं अपने स्टाईपेन्ड के पैसे से करूँगी। कम पड़ने पर अपने पापा से कह कर मंगवा लूँगी। तुम अपने अनावश्यक खर्चों में कटौती कर के मात्र शिक्षा पर ध्यान दोगी। जब तक कि कुछ बन नही जाती। अपनी और कोई बात तुमसे नही मनवानी है। तुम मेरे साथ ही रहोगी। ’’ मैंने सनारा से कहा।
’’ मैं चरित्रहीन नही हूँ। मेरा मन अब भी वैसा ही है जैसा बचपन में था, बच्ची–सा। मैं चरित्रहीन कभी नही रही वान्या। ’’ कहते–कहते सनारा की रूलाई पुनः तेज हो गयी।
’’ तुम नही हो। लड़कियों का शोषण पुरूष करे और एक पवित्र रिश्ते को कलंकित करेे तो लड़की कैसे चरित्रहीन हुई? यह समाज पुरूषों को बलात्कारी या चरित्रहीन घोषित कर के उन्हें सामाजिक बहिष्कार की सजा क्यों नही देता? क्यों लड़कियाँ मुँह छुपाती फिरती है? जिस कौमार्य की बात तुम कर रही हो वो अब भी तुम्हारे भीतर मौजूद है। मात्र शरीर का कौमार्य ही कौमार्य नही होता, मन का भी होता है। ’’ मेरी बातें सुन कर सनारा की रूलाई थमने लग गयी।
’’ चलो अब क्लास में चलें नही तो आज की पूरी पढ़ाई मिस हो जाएगी। ’’ मैंने कहा।
सनारा और वान्या दोनों एक साथ अपने–अपने क्लासरूम की ओर बढ़ गयीं।