तीन दिन पहले परमेश्वरी बाबू का पत्र मिला था, “राजेश्वर भाई, आजकल इलाहाबाद में हूँ। कल हिरनापुर जाना है, हिरनापुर यानी शहीद मोहना का गाँव, वहीं तो उसे पेड़ पर लटकाकर फाँसी दी गई थी। गाँव में हर साल वहाँ शहीद मेला लगता है। तुम यहाँ आओ तो साथ-साथ चलेंगे।”
परमेश्वरी बाबू मेरे बचपन के मित्र हैं, पर बड़े जिद्दी। दीवानगी की हद तक। बरसों हम साथ-साथ पढ़े। फिर वे एक बड़ी यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर हुए। पर अचानक इस्तीफा देकर सड़क पर आ गए। एक बड़ा काम करना है। भारत के शहीदों की महागाथा लिखेंगे। आखिर किसी को तो करना ही चाहिए न यह काम!
पत्र पढ़कर बचपन की तमाम स्मृतियों ने आ घेरा। उनसे किसी तरह पिंड छुड़ाकर झटपट तैयारी शुरू कर दी। परमेश्वरी ने बुलाया है तो जाना ही होगा।
हिरनापुर के शहीद मेले का जिक्र सुना था। मोहना की शहादत का प्रसंग भी। पर कभी जा न सका। अब परमेश्वरी बाबू के साथ वहाँ जाने का एक अलग रोमांच। परमेश्वरी बाबू जिन्हें हम सारे नजदीकी दोस्त प्यार से पंबे बाबू भी बोलते हैं, आजकल भारत के शहीदों पर अपने महाग्रंथ को पूरा करने में जुटे हैं। रात-दिन मेहनत। समझना मुश्किल नहीं था कि जरूर मोहना की शहीदी गाथा भी उसमें शामिल होगी।
उसी रात गाड़ी पकड़कर सुबह-सुबह मैं इलाहाबाद पहुँचा।देखकर पंबे बाबू खुश। बोले, “ठीक है राजेश्वर, तुम सही समय पर आए। मेरा बड़ा मन था कि तुम्हारे साथ वहाँ जाऊँ। तुम नहा-धोकर तैयार हो जाओ। हिरनापुर गाँव बनारस से कोई बीस-पच्चीस मील आगे है, रास्ता भी ठीक नहीं। खासा ऊबड़-खाबड़। पर जाना तो होगा ही।…बस, थोड़ी देर में चल पड़ते हैं। शाम तक तो पहुँच ही जाएँगे।”
पहले बनारस तक बस से यात्रा, फिर एक खटखटिया टैंपू की सवारी। शाम को गाँव में जमींदार बाबू गंगासहाय के यहाँ हम लोग पहुँच गए थे। वहाँ मोहना की ही चर्चा चलती रही। अजीब समाँ था। मोहना जैसे मरा नहीं, हिरनापुर की मिट्टी में, हवा में, आकाश में, चप्पे-चप्पे में समा गया हो।
रात्रि-विश्राम के बाद अगले दिन हम सबके सब शहीद मेले में थे, और मोहना बच्चों के बनाए दर्जनों बड़े-बड़े चित्रों और पोस्टरों में हमारे सामने था। इकतारा बजाता हुआ खुशदिल मोहना।…यही नहीं, और भी बहुत कुछ, जिसकी कल्पना न मुझे थी और न पंबे बाबू को। देखा, सुबह से ही ठठ के ठठ लोग दूर-दूर के गाँवों से चले आ रहे हैं। स्त्रियाँ, पुरुष, बच्चे। कुछ बैलगाड़ियों पर, पर ज्यादातर पैदल। साथ में खाने-पीने और चना-चबेना की पोटलियाँ लिए। आपस में बतियाते हुए। जैसे चल न रहे हों, भावना में बहते हुए खुद-ब-खुद हिरनापुर की ओर खिंचे चले आ रहे हों।
इन्हें किसी ने बुलाया नहीं था। पर मोहना का आकर्षण ऐसा था कि ये आए बगैर रह भी कैसे सकते थे? मोहना न था, पर मोहना हर जगह मौजूद था। जगह-जगह इकतारा लिए गाते हुए उसके चित्र। हिरनापुर के बच्चों ने चित्र नहीं बनाए, मानो उसे उपस्थित कर दिया था।
आसपास के गाँवों की स्त्रियाँ छोटे-बड़े दलों में लोकगीत गाती हुई चली आ रही थीं। इनमें भी जगह-जगह मोहना का जिक्र। एक पंक्ति बार-बार हवा में गूँजती थी, “ऐसा जादू जगाया मोहना ने, कि फिरंगी को छकाया मोहना ने, गाँव-गाँव को जगाया मोहना ने…!”
आम मेलों जैसा मेला, पर कुछ अलग भी। इसमें उत्साह का रंग है। जोश की आँधी। यह शहीद मेला जो है। आसपास के स्कूलों के बच्चे भी अपने अध्यापकों के साथ आए थे और बड़े उत्साह में थे। सबके दिलों में अलमस्त मोहना की तस्वीर, जो देश के लिए हँसते-हँसते अपनी जान पर खेल गया।
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कोई दस-ग्यारह बजे तक मेला अच्छी तरह जम चुका था। कहीं खेल-कूद और कुश्ती के प्रोग्राम की तैयारियाँ शुरू हो गई थीं, तो कहीं बच्चों के लिए तरह-तरह की प्रतियोगिताओं की। साथ ही छोटे बच्चों के लिए गोल-गोल घूमने वाले रंग-बिरंगे चकरीदार झूले आ गए थे। कुछ छोटे, कुछ बड़े। कुछ हवाई जहाज सरीखे। थोड़े से खाने-पीने के ठेले भी।
एक तरफ चित्रवीथि थी, जिसमें स्कूलों के बच्चों के बनाए चित्र थे। देश की आजादी की लड़ाई। जगह-जगह धरना, जुलूस, सभाएँ। आमरण अनशन। सत्याग्रह और स्वाधीनता सेनानियों के बोलते हुए चित्र। खासकर गाँधी जी, बच्चों के बापू। डांडी यात्रा वाले बापू, चरखा चलाते बापू, जनता के बीच आजादी का अलख जगाते बापू। सरदार पटेल, जवाहरलाल नेहरू और सुभाषचंद्र बोस से गंभीर वार्तालाप करते बापू। और हाँ, छोटे-छोटे बच्चों के साथ हँसते-बतियाते हुए बापू भी। कैसी अजब एक पोपली सी हँसी। पर उसमें कितनी मिठास थी, कितनी उजास भी।…
बच्चों ने अपनी कल्पना की आँख से एक-एक दृश्य, एक-एक प्रसंग को सजीव बना दिया था।
एकाएक मंच से उद्घोष, “अब आप बच्चों से देशभक्ति के गीत और कविताएँ सुनेंगे।”
और लीजिए, अब हिरनापुर गाँव के मोहना की याद में लिखे गए गीत और कविताएँ सुनाई जा रही थीं। बच्चे इतने जोश में गा रहे थे कि सुनकर रोमांच होता था। गाँव के बूढ़े, जवान, स्त्रियाँ बच्चे सब सुन रहे थे। सबकी आँखों में नजर आया अपने गाँव के मोहना के लिए आदर और प्यार।
तभी कोई बारह-तेरह बरस की एक बालिका आई। बोली, “मैं बीनू हूँ।…मैं छोटी थी, बहुत छोटी, तभी अपनी दादी माँ से एक लंबी कविता सुनी थी। दादी माँ अनपढ़ थीं, पर उन्हें गीत-कविताएँ सुनने का शौक था। कभी-कभी खुद भी कविता बना लेती थीं। ऐसी ही एक कविता उन्होंने मोहना पर बनाई थी। मुझे वह इतनी अच्छी लगी कि मैं दादी माँ से वह कविता बार-बार सुनती थी। सुनते समय मेरी आँखों से आँसू निकलते थे।…
कहते-कहते बीनू थोड़ी उदास हो गई। बोली, “दादी माँ तो अब नहीं रहीं, पर वह कविता मैंने अपनी हिंदी की कॉपी में लिख ली थी। बिल्कुल आखिर में। सो आज ढूँढ़ी तो मिल गई। उसे आप लोगों को सुनाती हूँ।” कहकर उसने कविता की तान उठा दी—
सुनो कहानी हिरनापुर के उस अलबेले मोहन की,
जिसने जालिम अँगरेजों को हाथ उठा ललकारा था,
नहीं चलाए तीर-तमंचे, नहीं चलाईं बंदूकें,
हाथों में उसके तो केवल छोटा सा इकतारा था।
उस बच्ची ने बड़े ही जोश में कविता सुनाई। उसकी अनपढ़ दादी ने हिरनापुर के मोहना की पूरी कहानी को ही एक लंबी नाटकीय कविता में ढाल दिया था। इतनी मार्मिक कि आँखें भीग गईं। मन हुआ कि हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम करूँ।
कुछ और भी लोगों ने कविताएँ सुनाईं। गाँव के प्राइमरी स्कूल के मास्टर हिरदैराम रँगीला साहब ने मोहना के जीवन पर एक सुंदर नाटक लिखा था। उसे कुछ बच्चों ने मंचित किया। नाटक का नाम था, ‘शहीद मोहना का इकतारा’।
नाटक बड़ा प्यारा था। मन को बाँध लेने वाला। उसमें मोहना का इकतारा ही उसकी पूरी जीवन-गाथा सुना रहा है।…जिस बच्चे ने मोहना का पार्ट किया, उसने सच ही मोहना का सच्चा रूप पेश कर दिया। मानो इतने बरसों बाद मोहना फिर से जी गया हो।
फिर सब लोग हिरनापुर के बच्चों द्वारा तैयार की गई चित्र-प्रदर्शनी देखने गए, जिसमें स्वाधीनता संग्राम की पूरी झाँकी थी। महात्मा गाँधी, लोकमान्य तिलक, सुभाष, नेहरू, सरदार पटेल, लाला लाजपत राय, राजेंद्र बाबू सभी थे। अपने-अपने ढंग से अंग्रेजों को ललकारते हुए। और सबके बीच ही हिरनापुर का मोहना भी, जिसने सन बयालीस की आजादी की लड़ाई में कुर्बानी देकर, अपना ही नहीं, हिरनापुर का नाम भी दूर-दूर तक अमर कर दिया।
दोपहर में सबके खाने-पीने का इंतजाम गाँव के जमींदार बाबू गंगासहाय की ओर से था। उसके बाद बच्चों की रंग-बिरंगी प्रतियोगिताएँ। इनमें स्वाधीनता संग्राम लेकर कविता, लेख या कहानी लिखने की प्रतियोगिता भी थी। बच्चे खास तैयारी के साथ आए थे और बड़े मन से लिख रहे थे।
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बच्चों को इनाम बाँटने के साथ शाम को मेला खत्म होने को था। तभी अचानक किसी कोने से आवाज आई, “हरखू दादा आ गए, हरखू दादा…!”
सुनते ही मेले के आयोजकों में बहुत से लोग दौड़े। जमींदार बाबू गंगासहाय भी। अभी-अभी मेले में लाठी ठक-ठक करते हरखू दादा ने प्रवेश किया था। बाबू गंगासहाय हाथ पकड़कर उन्हें मंच पर लाए। आदर से बैठाया। फिर सामने बैठे दर्शकों को संबोधित करते हुए, बहुत भावुक होकर बोले—
“मेरे प्यारे भाइयो, आप लोगों को तो यह पता ही है कि मोहना दादा की शहादत के बाद से ही हर साल गाँव में शहीद मेला लगता है। पहले मेरे दादा जी के समय लगता था। पिता जी के समय में भी लगता रहा, और अब तक तो इसमें कोई नागा नहीं हुआ। प्रभु राम जी ने चाहा, तो आगे कभी नागा होगा भी नहीं।…
“हमें खुशी है कि मोहना के बड़े प्यारे साथी हरखू दादा आज हमारे बीच हैं। हम सब धन्य हैं, बड़भागी हैं कि वे आ गए।…असल में, इस बार पता चला कि परमेश्वरी बाबू आएँगे, राजेश्वर भाई भी, तो हमने सोचा हरखू दादा को इस बार जरूर तकलीफ देंगे।…
“वैसे तो इतने बूढ़े हो चुके हैं हरखू दादा कि अब उनके लिए चलना भी मुश्किल है। होंगे कोई पंचानबे बरस के।…या शायद कुछ ज्यादा के हों। पीछे बीमार भी बहुत रहे, पर दिल में जोश है। मोहना से इनकी ऐसी दोस्ती थी कि रोज का मिलना था। साथ ही उठना-बैठना था। और फिर खूब बातें, बातें, बातें। हरखू दादा ने मोहना के साथ मिलकर आजादी की लड़ाई लड़ी। मोहना के साथ ही गिरफ्तार भी हुए थे, पर ईश्वर का लाख-लाख शुक्र है कि बाद में छूट गए।…”
फिर अपनी बात पूरी करते हुए बड़े भावुक हो गए बाबू गंगासहाय। बोले, “और भाइयो, सच्ची बात तो यह है कि आज भी मोहना की बात चलती है तो हरखू दादा यहाँ नहीं रहते। कहीं से कहीं पहुँच जाते हैं। और कभी-कभी तो आँखें बरसने लगती हैं उनकी। जैसे मोहना, मोहना नहीं, भगवान हो।…हमारा बड़ा सौभाग्य है, कि आज हरखू दादा आए हैं। अब वही आपको मोहना की पूरी गाथा सुनाएँगे।”
उसी समय एक युवक दौड़ा। हरखू दादा के आगे माइक लाकर रखा। पर वे चुप। एकदम चुप्प। जैसे तय न कर पा रहे हों कि क्या कहें, क्या न कहें। फिर कुछ रुक-रुककर बोले—
“देखो जी साहेबान, हालत तो वाकई मेरी कुछ ठीक नहीं थी। पर जमींदार बाबू ने कहा कि दादा, आज आपको सुनने बड़े-बड़े लोग आए हैं। मोहना के बारे में जानना चाहते हैं। तो जैसे-तैसे लाठी के सहारे मैं आ गया। वैसे भी मोहना तो ऐसा मोहना था कि उसकी कोई बात करो, तो आगे-पीछे कुछ होश रहता ही नहीं। मन कहीं से कहीं भागता है। तो सुन लो आप मोहना की कहानी, जितनी मुझे याद है…!”
कहकर बूढ़े हरखू दादा कुछ संजीदा हो गए। और फिर जाने कब खुद-ब-खुद चल पड़ी मोहना की कहानी। हालाँकि कहानी से पहले जाने क्या-क्या बुदबुदाते रहे वे। जैसे खुद को ही सुना रहे हों—
“देखो जी, भाई लोगो, इतने बरस बीते…बीतते ही जा रहे हैं। और भी बीतेंगे।…ये तो समय का खेल है, चलता रहता है। इसे कौन रोक पाया है?…यह कोई दुख की बात नहीं। पर दुख की बात तो यह है कि लोग भूलने लगे हैं पुरानी चीजों को। जो चीज बार-बार याद करने की थी, उसको भी भूल रहे हैं।…
“अच्छा, भाइयो, जरा याद तो करो। आजादी की लड़ाई के लिए कैसी-कैसी कुर्बानियाँ दी थीं इस देश के बहादुरों ने। बच्चों, बूढ़ों, औरतों, सबने। लोग फाँसी पर चढ़ने को तैयार रहते थे, कि कोई बात नहीं, हम मरते हैं तो मरें। पर यह देश तो खुशहाल रहे। लोग खुशहाल रहें।…और जी, आपको बताऊँ, कि गाँव पीछे नहीं थे इस लड़ाई में। बल्कि गाँव तो ज्यादा आगे थे शहरों से। सीना तानकर भिड़ते थे अंग्रेजों से।…पर लोगों को अब याद ही नहीं। कोई याद करना भी नहीं चाहता। हालाँकि हिरनापुर… मुझे यकीन है, हमारा हिरनापुर तो नहीं भूल सकता मोहना को…!”
कहते-कहते अचानक रुके हरखू दादा। फिर सामने बैठे लोगों पर एक नजर डालकर बोले, “क्यों जी, आप भूल जाओगे मोहना को…?”
इस पर एक गगनचुंबी शोर सा हुआ, “नहीं, नहीं…नहीं, हरखू दादा। नहीं भूलेंगे, हम कभी नहीं भूलेंगे अमर शहीद मोहना को!”
सुनकर हरखू दादा के चेहरे पर कुछ रौनक सी आई। आवाज में थोड़ा जोश भी। अब तक वे जान गए थे, कि वे कुछ भटक से रहे हैं। वरना मोहना की बात तो अभी शुरू हुई ही नहीं। तो एकाएक मोहना की ओर आते हुए बोले, बड़े गहरे-गहरे से सुर में—
हाँ, जी, तो अब क्या बताऊँ महानुभावो, आप लोगों को? क्या-क्या बताऊँ? मोहना तो बस, मोहना ही था। एकदम सीधा-सादा। मन से निर्मल, साफ।…भोला इतना, कि बिल्कुल बच्चा समझ लो। पर मन पक्का था उसका। जो सोच लिया, वह सोच लिया, कि अब तो करना ही है, चाहे जान भले ही चली जाए। ऐसे ही, जो बात उसके मन में आ गई, वो आ गई। अब चाहे कोई तीर-तलवार लेकर भी सामने आ जाए, तो उसके विश्वास को तिल भर डिगा नहीं सकता।…और गाँधी जी! उनकी हर बात पर तो जैसे वह जान छिड़कता था। जब कभी सुनो, जहाँ कहीं सुनो, ‘बापू ने ये कहा…बापू ने वो कहा…बापू…बापू…बापू…!’ लगता था, जैसे बापू उसकी साँस-साँस में बस गए हैं…!
अब बनारस के गंगा किनारे बसे इस हिरनापुर गाँव में मोहना कब आया, कहाँ से आया, यह तो पता नहीं। शायद किसी को पता नहीं। पर जब वह हिरनापुर में आया, तो बस यहीं का हो गया। यहीं की मिट्टी में रच-बस गया। यहीं सारे-सारे दिन वह हवाओं में अपने इकतारे के संगीत की मिठास घोलता था। और खासकर गाँव के बच्चों से तो उसकी ऐसी दोस्ती हो गई कि देखकर सब निहाल होते थे।
एकाध बार, मुझे याद पड़ता है, बच्चों को उसने बातों-बातों में अपनी कहानी भी सुनाई थी। उससे पता चला, कभी मोहना के एक सुंदर सा चाँद जैसा बेटा था और बड़ी अच्छी घरवाली भी। पर बीमारी की चपेट में आकर पहले घरवाली गई, फिर बेटा भी भगवान को प्यारा हो गया।…तो बस जी, मन उचाट हो गया मोहना का, और वह हाथ में इकतारा लेकर निकल पड़ा। कपड़े तो उसने जोगियों वाले नहीं पहने। मैंने तो उसे हमेशा एकदम सादा सा कुरता-पामा पहने ही देखा। पर मन से वह जोगी हो गया। पूरा, पक्का जोगी। इकतारे पर कभी दुख-दर्द, उदासी तो कभी खुशी की सरगम छेड़ते हुए वह निकलता तो गाँव में हर किसी का ध्यान चला जाता कि भई, मोहना आया है, मोहना।…
पर मोहना तो अपनी मस्ती की तरंग में रहता था। उसे शायद बड़ों के साथ कम, बच्चों के साथ रहना कहीं ज्यादा पसंद था। कहा करता, हिरनापुर के बच्चे बड़े अच्छे हैं। और फिर धीरे-धीरे उसके मन पर हिरनापुर की कुछ ऐसी छाप पड़ी कि समझो, मोहना बस, हमेशा-हमेशा के लिए हिरनापुर का ही हो गया।
अक्सर ऐसा होता कि मोहना इकतारे पर सुरीले गीत गाता हुआ गुजरता, तो गाँव के बच्चे भी उसके साथ-साथ चल पड़ते। जैसे उसके जादू से बँध गए हों। मोहना ज्यादा बोलता नहीं था। बस, कभी-कभी बच्चों की ओर देखकर प्यार से हँस पड़ता। या कोई मीठी सी, प्यारी सी बात कह देता।…बच्चे इसी के मुरीद थे। उन्हें लगता, मोहना कुछ अलग है। मोहना बड़ा अच्छा आदमी है।…तो ऐसा एक प्यार का रिश्ता मोहना और बच्चों में पनप गया कि क्या कहूँ!
कभी चलते-चलते थोड़ा आराम करने के लिए मोहना किसी पेड़ के नीचे बैठ जाता तो बच्चे भी आसपास घेरा बनाकर बैठ जाते। इकतारे के संगीत के साथ-साथ न जाने कब मोहना गा उठता—
छपछैया…ताता थैया,
चंदा के भैया के भैया,
आसमान की मैया,
तक-तक, तिक-तिक, तक-तक, तिक-तिक,
आओ नचन-नचैया….छपछैया…ताता थैया…!”
पता नहीं इतनी गहरी-गहरी सी पुकार के साथ किसे बुलाता था मोहना, कि गाते-गाते उसकी आँखें गीली हो जातीं। गला भर्राने लगता। पर फिर भी इतना मीठा सुर कि सुनकर हर कोई उसका मुरीद हो जाता था।
कभी-कभी बच्चे जिद करते तो मोहना कहानी भी सुनाता। उसकी कहानी एक सुंदर रूपदुलारे बच्चे की कहानी थी, जो चंदा मामा की दुनिया से धरती पर आया था और हर वक्त बस किलकता रहता था। दूर तक उसकी नन्ही दँतुलियों की हँसी और किलकारियाँ गूजतीं।…पर फिर एक दिन न जाने किस बात पर वह रूठा और उड़कर चला गया चंदा मामा के पास…!
कहानी कहते-कहते मोहना उदास हो जाता। पर कहानी तो जारी रहती। बच्चों को बहुत पसंद थी मोहना की यह कहानी और वे उसे बार-बार सुनते। हालाँकि हर बार सुनाते हुए मोहना उसे कुछ न कुछ बदल देता था। और हर बार उसमें कुछ न कुछ नया जुड़ जाता था। कभी सतरंगी चिड़िया, कभी एक नन्ही गोरी सी खरगोशनी, कभी मोर जैसी शक्ल वाला चाँदी का पलना…कभी सात दरवाजों वाजा आसमानी महल, जिसमें चाँदनी के फव्वारे लगे थे। बच्चे सुनते तो निहाल हो जाते।
गाँव की औरतें मोहना को कुछ न कुछ खाने को दे देतीं। नहीं तो यों ही वह कुछ फल खाकर और नदी का पानी पीकर गुजारा करता, मगर उसकी मस्ती की तरंग में कोई फर्क न आता।
मगर फिर कुछ ऐसा हुआ कि मोहना बदला। बदलता गया।…जैसे मोहना के जीवन में कोई आँधी आ गई हो।…
*
सचमुच वह आँधी ही थी। देश की आँधी। देशभक्ति की आँधी।…
हुआ यह कि एक बार गाँधी जी के शिष्य काशीलाल पटवर्धन बनारस आए तो आसपास के गाँवों की यात्रा का भी उनका कार्यक्रम बन गया। घूमते-घूमते अपने साथियों के साथ वे हिरनापुर भी आए। मोहना ने उन्हें देखा तो उसे लगा कि उसके अंदर कुछ चाँदना सा हो रहा है।…चीजें बदल सी रही हैं। पता नहीं काशी भाई की आँखों में कुछ था या बातों में, पर मोहना उनकी ओर ऐसे खिंच आया, जैसे किसी बड़े चुंबक से वह खुद-ब-खुद खिंचा जा रहा हो।
हिरनापुर में काशी भाई की सभा हुई तो लोगों के बार-बार आग्रह करने पर मोहना ने भी अपने इकतारे पर कुछ मीठे सुर निकाले और जोश में ‘तिरंगा प्यारा’ गाकर सुनाया। अब तो सबके साथ-साथ काशी भाई भी हैरान। बोले, “इस गाँव में ऐसे ऊँचे दरजे का कलाकार भी है, मुझे पता न था।”
और फिर काशी भाई की यात्रा आगे शुरू हुई तो उनके साथ गाँव-देहात की पद-यात्रा में बिना रुके, बिना थके, साथ चलने वालों में मोहना सबसे आगे था। काशी भाई को भी वह भा गया। बोले, “मोहना, तुम्हारे इकतारे का संगीत मैंने सुना है। हिरनापुर गाँव के लोगों ने भी बड़ी तारीफ की है। तुम गाते भी अच्छा हो।…तो अब पहले तुम मंच पर इकतारा बजाकर कुछ गाया करो, उसके बाद ही मैं बोला करूँगा।”
भला मोहना को इसमें क्या परेशानी थी?…उसे तो इकतारा बजाने में आनंद आता था।
फिर तो यही सिलसिला चल पड़ा। काशी भाई बाद में भाषण देते, मोहना को पहले मंच पर खड़ा कर देते। वह इकतारा बजाता और फिर उस पर स्वदेशी और सुराज का राग छेड़ देता। ‘गाँधी बाबा की जय’ से शुरू करता और जब उसके सुर विराम लेते तो चारों ओर एक निस्तब्धता सी छा जाती। लोग पुकारकर कहते, “मोहना, मोहना, कुछ और सुनाओ, मोहना…!”
इस पर मोहना हँसकर कहता, “अरे बाबा, हम तो यहीं के हैं।…गाँधी जी के इतने बड़े, ज्ञानी शिष्य आए है। पहले आप उनको तो सुनो…!” और सचमुच जादू हो जाता। सभा में फिर से परम शांति।
काशी भाई महसूस करते कि मोहना के स्वर में कोई ऐसी बात है कि सुनते ही सबके दिल पर असर होता है। मानो वह सबके दिलों को जीत लेता है। ऐसा आदमी देश के लिए काम करे तो कितना अच्छा है।
जाते-जाते उन्होंने मोहना से वचन लिया, “मोहना, देश तुम्हें पुकार रहा है। बेड़ियों में बंदी भारत माता पुकार रही है।…उसकी पुकार को अनसुना मत करना। आगे इसी राह पर तुम्हें बढ़ना है। गाँधी जी के दिखाए रास्ते पर चलकर देश की सेवा करनी है…!”
सुनकर मोहना की अजब हालत।
“काशी बाबू, हमने तो आपसे नई जिंदगी पाई है।…आपने हमें रोशनी दिखा दी। यह बात हम कभी नहीं भूलने के।” मोहना भावुक होकर बोला।
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हरखू बाबा थोड़ी देर के लिए रुके। जैसे अतीत के बिखरे धागों को जोड़ रहे हों। फिर एक हलकी सी चुप्पी के बाद बोले—
…और फिर काशी भाई के जाने के बाद मोहना ने भी वही रास्ता चुन लिया। जगह-जगह पद-यात्राएँ। गाँव-गाँव में जागरण।…वह सीधे-सादे शब्दों में गाँधी जी का संदेश लोगों के सामने रखता। कहता, “गाँधी बाबा ने दुनिया को रोशनी दिखा दी। तो वह रोशनी भला हिरनापुर में क्यों न आए?…भाइयो, मैं तो अज्ञानी था। काशी भाई ने अपनी बातों से मेरे दिल में चाँदना कर दिया। गाँधी बाबा की बातों का सत मुझे समझ में आ गया। वही आपको समझाता हूँ।…इससे देश जागेगा, हिरनापुर भी जागेगा। बच्चा-बच्चा जागेगा। हर जगह देशप्रेम की ऐसी आँधी उठेगी, कि फिरंगी उसके आगे तिनके की तरह उड़ जाएगा। बिल्कुल तिनके की तरह…!”
मोहना की सीधी-सादी बातें लोगों के दिल में घर कर लेतीं। जैसा मीठा सुर उसके इकतारे के संगीत में, ऐसी ही मिठास उसकी बातों में थी। वे दिल से दिल को जोड़ने वाली बातें थीं। इसलिए जहाँ भी वह जाता, दर्जनों लोग जुट जाते।
बच्चे दूर-दूर तक ढिंढोरा पीट देते, “सब लोग जल्दी आओ, जल्दी, मोहना काका की सभा होने वाली है…!” और आसपास की स्त्रियाँ, पुरुष, बच्चे सब दौड़ पड़ते।
मोहना उनका अपना मोहना था। पर वे देख रहे थे, उस मोहना में गाँधी का तेज उतर रहा था। वह बोलता तो उसकी आँखों में एक नूर होता। वह लोगों के दिलों में उतर जाता। गाँव के बुजुर्ग और औरतें उस पर ममत्व वारतीं। जवान उसके कंधे से कंधा मिलाकर चलते और बच्चे उसकी सेना के सबसे बड़े सिपाही बन गए।
अब तो हर रोज सुराजी उसके पास आते और कहते, “गाँधी बाबा ने संदेश भिजवाया है।” देखते ही देखते महात्मा गाँधी का वह संदेश आसपास के सभी गाँवों में पहुँच जाता। गाँवों के लोग अनपढ़ थे, पर बातों का मर्म समझने में उनसे कोई भूल नहीं होती थी।
फिर एक दिन सारे देश में सन् बयालीस के आंदोलन की लहर पहुँची, तो भला हिरनापुर में वह क्यों न पहुँचती? काशी भाई ने गाँधी जी के ‘करो या मरो’ का संदेश मोहना तक भी पहुँचाया। उन्होंने चिट्ठी में लिखा—
“मोहना, मेरा प्यार भरा आशीष। उम्मीद है, तुम काम में जुटे होगे। बड़ा चुनौती भरा समय सामने आ गया है, मोहना। यह करो या मरो का समय है।…बस, मोहना, बस, यही हमारी और तुम्हारी परीक्षा है। जीते तो समझो देश की आजादी को कोई रोक नहीं सकता, मरे तो देश के काम आएँगे। इन अंग्रेजों ने बहुत अत्याचार किए हैं। धरती कराह रही है। बेड़ियों में जकड़ी भारत माता आँसू बहा रही है…और उम्मीद भरी नजरों से हमारी ओर देख रही है। यह माँ के आँसू पोंछने का समय है…!”
“…यह माँ के आँसू पोंछने का समय है।…भारत माँ उम्मीद भरी नजरों से हमारी ओर देख रही है, गुलामी के जुए को उतार फेंको…!” मोहना ने काशी भाई की चिट्ठी का मर्म गुना, और हर ओर एक लहर सी फैला दी।
हवाओं में भी जैसे वही पुकार समा गई थी, “आजादी, आजादी…सुराज…! यह जीने या मरने का समय है…! जननी पुकार रही है…! भारत माँ पुकार रही है…! कब तक सोते रहोगे, मेरे भाइयो? बहनो, तुम भी उठो और देशवासियों के कंधे से कंधा मिलाकर चल पड़ो…! सब मिलकर सामने आ जाएँ तो मुट्ठी भर अंग्रेज क्या करेंगे…?”
अब तो जैसे मोहना में सच्ची-मुच्ची गाँधी जी उतर आए थे।…
लोगों पर उसकी बातों का गहरा असर होता। जहाँ भी चार लोग इकट्ठे होते, मोहना अपने इकतारे का सुर छेड़ देता, और फिर देखते ही देखते वहाँ चारों ओर लोगों के सिर ही सिर दिखाई देते। मोहना के साथ-साथ हवाएँ भी गाने लगतीं—
गाँधी आया रे….आया रे,
गाँधी आया रे!
सोता देश जगाने गाँधी आया रे,
लेकर नए तराने गाँधी आया रे,
बड़ा अँधेरा, बड़ा अँधेरा है भाई,
उसको दूर भगाने गाँधी आया रे…!!
*
एक दिन मोहना नदी किनारे बच्चों से बात कर रहा था। बच्चे उसके नन्हे सैनिक थे। उन्हें वह समझा रहा था, कैसे गाँधी बाबा के संदेश को दूर-दूर तक पहुँचाना है। बीच में बच्चों के कहने पर उसने गीत का यही जोशीला सुर छेड़ दिया, “गाँधी आया रे….आया रे, गाँधी आया रे…!”
मोहना गा रहा था तो घोड़े पर जा रहे दरोगा खुदाबख्श ने भी सुना। बड़ा ही सख्तकलेज आदमी।…वह झपटकर वहाँ पहुँचा। गुस्से से लाल-लाल आँखें दिखाकर बोला, “मोहना, क्या बोल रहा है? कुछ होश भी है? यहाँ अंग्रेज बहादुर की सरकार है। खबरदार…! वरना काटकर इसी नदी में डाल देंगे, तो पता भी नहीं चलेगा…!”
इस पर मोहना बिना डरे, प्यार से हँसकर बोला, “बहुत जिंदगी जी ली हमने, दरोगा जी। अब और जीकर क्या करना…? अब तो देश के लिए जीना, देश के लिए मरना है।…आप भी दिल की कर लो और फेंक दो मोहना को नदी में। ताकि आपको तसल्ली हो जाए।”
“अच्छा, बहुत बनने लगा है। समझ रहा होगा, मैं बड़ा नेता बन गया हूँ…!” कहकर दरोगा खुदाबख्श ने आव देखा न ताव, तड़ातड़ एक के बाद एक तीन बेंत मोहना की पीठ पर जड़ दिए।
मोहना सारा दर्द पी गया। मुँह से एक आह तक नहीं। इतने में आसपास खड़े बच्चे भी दौड़कर आ गए। मोहना के चारों ओर दीवार बनाकर खड़े हो गए। कहा कुछ नहीं, पर उनकी आँखें कह रही थीं, “पहले हमें मारो, बाद में मोहना काका को हाथ लगाना।…”
तीन बेंत खाकर भी मोहना पर कोई असर नहीं पड़ा था। बोला, “दरोगा साहब, बेंत से क्या होगा…? जिसके दिल में निर्भयता है, उस पर तो बंदूक की गोली का भी असर नहीं होता। यही तो समझाया है गाँधी बाबा ने। मेरी मानो तो भैया, उतार दो यह गुलामी की वरदी और भारत माता की पुकार सुनो।…गाँधी तो फरिश्ता बनकर आया है। उसके पीछे चलोगे तो तुम भी गुलामी का जुआ उतार फेंकोगे।”
इस पर फिर से दरोगा ने बेंत चलाने चाहे, पर बच्चे मोहना को घेरे खड़े थे। आखिर चलते-चलते उसने मोहना के सिर पर जोर से बेंत मारा और बुरी तररह धक्का मारकर झाड़ियों में गिरा दिया। फिर घोड़े पर बैठ, यह जा और वह जा।
घायल मोहना खूनमखून। सिर से खून का फव्वारा फूट पड़ा था। काँटेदार जंगली झाड़ियों में गिरकर उसका सारा शरीर भी बुरी तरह छिल गया था।
बच्चे दुखी थे। उसी समय गाँव वालों को बताने दौड़ पड़े। सुनते ही सबके खून में उबाल आ गया, “ऐसे सीधे-सादे निरीह आदमी को मारा दरोगा खुदाबख्श ने? राच्छस है, पूरा राच्छस…!”
इसके तीसरे रोज ही एक खबर आई, गाँधी जी पकड़े गए। साथ ही देश के सारे बड़े-बड़े नेता भी, जिन्हें जगह-जगह जाकर अलख जगाना था। सुनते ही लोगों के दिलों में विद्रोह की आग उमड़ पड़ी।…
मोहना सिर पर पट्टी बाँधे हुए ही लोगों के बीच पहुँच गया। उसके दिल से जैसे वीरता का मारू गान फूट पड़ा। बोला, “दरोगा खुदाबख्श में इतनी अकड़ इसलिए है, क्योंकि वह समझता है कि अंग्रेज इस देश से कभी नहीं जाएँगे। जैसे ही उसे समझ में आएगा कि जनता जाग उठी है और सुराज आने वाला है, उसकी वर्दी की अकड़ ढीली हो जाएगी।”
देखते ही देखते सैकड़ों लोग इकट्ठे हो गए। हिरनापुर के अलावा आसपास के गाँवों के लोग भी थे। मोहना ललकार उठा, “भाइयो, अगर हिम्मत है तो चलो। हम थाने पर तिरंगा लहराकर दरोगा खुदाबख्श को जनता का संदेश दें कि अब आजादी दूर नहीं है। फिरंगी भागेगा, सुराज आएगा।…”
“हाँ-हाँ, चलो, थाने पर तिरंगा फहराएँगे…!” एक साथ सैकड़ों कंठों से स्वर फूट पड़ा। उनमें मर्द, औरतें, बच्चे सब थे।
हिरनापुर से थोड़ी दूर थाना था। लोग जोश में नारे लगाते हुए चल पड़े। किसी के पास लाठी, किसी के पास डंडा। एक नौजवान के हाथ में लंबा सा बाँस और तिरंगा भी था। एकाध ने ऊपर चढ़ने के लिए बड़ी सी रस्सी भी ले ली। सबके होंठों पर एक ही बात, “थाने पर तिरंगा फहराएँगे…! दरोगा को बताएँगे कि अब जनता जाग गई है!”
‘भारत माता की जय’, ‘गाँधी बाबा की जय’ और ‘वंदेमातरम्’ के नारे लगाता हुआ मोहना सबसे आगे चल रहा था। स्त्रियों और बच्चों का उत्साह भी कुछ कम न था।…
थाने में फिरंगी राज का अकड़बाज दरोगा खुदाबख्श और दो सिपाही थे। भीड़ को देखकर उन्होंने मोरचा सँभाल लिया। दरोगा के हाथ में बंदूक, सिपाही मोटे-मोटे डंडों से लेस।…पर भीड़ के जोश का उन्हें अंदाज नहीं था। जब एक साथ सैकड़ों लोग थाने में घुसे, जिनमें औरतें और बच्चे सबसे आगे थे, तो सिपाहियों के साथ-साथ अकड़बाज दरोगा की भी सिट्टी-पिट्टी गुम।
हजारों की भीड़ ने निर्दयी दरोगा को पकड़ लिया और देखते ही देखते उसे रस्सियों से जकड़ दिया। यही हाल उन दोनों सिपाहियों का भी हुआ। भीड़ में छोटे-छोटे बच्चे भी थे, पर किसी की आँखों में खौफ नहीं। स्त्रियाँ तो जुलूस में सबसे आगे थीं ही।
इसके बाद शान से तिरंगा लहराया गया। सबने मिलकर ‘विजयी विश्व तिरंगा प्यारा’ गीत के बोल दोहराए। ‘वंदे मातरम्’ के नारों से हवाएँ गूँज उठीं।
कुछ देर बाद मोहना ने इशारा किया तो सब लौट पड़े। चलते-चलते हिरनापुर गाँव के एक जोशीले नौजवान अशर्फी ने रस्सियों से बँधे दरोगा की ओर देखकर कहा, “मोहना काका, यह तुम्हें नदी में फेंकने की बात कह रहा था न। अब हम इसे नदी में फेंकते हैं…!”
सुनकर मोहना ने समझाया, “नहीं अशर्फी भाई, मत मारो। गाँधी जी का रास्ता तो अहिंसा का रास्ता है। बल्कि मैं तो कहता हूँ, तिरंगा फहराने हम आए थे, वह हमने फहरा लिया।…अब इनके भी बंधन खोल देते हैं, फिर भले ही ये हम पर गोलियाँ क्यों न चलाएँ!”
“ठीक है, इनके बंधन खोलेंगे, मोहन काका, पर अभी नहीं, कल।…रात भर ये ऐसे ही पड़े रहें, तो अपने पाप तो इन्हें याद आएँगे। फिरंगी राज की अकड़ में कैसी निर्दयता से निहत्थी जनता पर गोलियाँ चलाते हैं ये लोग?” अशर्फी बोला तो गाँव वालों ने भी हाँ में हाँ मिला दी।
अब मोहना क्या कहता? सब लौट आए।
पर सुबह गाँव वाले दरोगा और सिपाहियों की रस्सियाँ खोलने आएँ, इसकी जरूरत ही नहीं पड़ी। रात में गश्ती पर गया थाने का सिपाही लौटा तो थाने की हालत देखकर सकते में आ गया। उसने दरोगा और सिपाहियों की रस्सियाँ खोलीं। फौरन बनारस शहर के बड़े थाने में रिपोर्ट की गई।
जल्दी ही उस इलाके के बड़े अंग्रेज अफसरों तक बात पहुँच गई। बड़ी संख्या में सिपाही आ गए। हिरनापुर में देखते ही देखते हर ओर खाकी वर्दी की गश्त और धर-पकड़। अंग्रेज इस विद्रोह को कुचल देना चाहते थे। सो सबसे पहले मोहना पकड़ा गया, फिर और लोग।…
अकेले दो दर्जन लोग मोहना को हथकड़ी पहना, उसके चारों ओर ऐसे सतर्क होकर खड़े थे, जैसे वह कोई खूंखार अपराधी हो, और अभी-अभी हथकड़ी तोड़कर हवा में घुल जाएगा। वायरलेस से बड़े-बड़े अफसरों को बताया जा रहा था, “मोहना गिरफ्तार हो गया…जी हाँ, गिरफ्तार…! जी, पक्की खबर…!”
यह सारा तमाशा देख, मोहना हँसकर बोला, “अगर आप लोग कहते, तो मैं तो वैसे ही थाने में आकर गिरफ्तारी दे देता। इतनी तकलीफ आपने क्यों की…?”
पर उसे गिरफ्तार करने वाले सिपाहियों की आँखों में एक अजीब सी हिंस्र चमक थी। जैसे कह रहे हों, “बस, अब आखिरी बार हँस लो मोहना, क्योंकि अब तुम जेल से छूटकर कभी नहीं आ सकोगे।”
हिरनापुर गाँव का वह ऐतिहासिक दिन था। कोई आधे गाँव की गिरफ्तारी हुई थी, जिनमें गाँव की स्त्रियाँ भी थीं। सब ओर दुख और गुस्से की लहर।
बाकी लोग तो कुछ अरसे बाद छूट गए, पर मोहना…? वह कहाँ गया… उसका क्या हुआ? किसी को पता नहीं।…
*
“इसके बाद की कहानी बहुत दुख भरी है…!” कहते-कहते हरखू बाबा का गला जैसे रुँध गया हो। पुराना सब कुछ उन्हें याद आ रहा था, जैसे कल की ही बात हो।
कुछ रुककर हरखू बाबा ने फिर से बोलना शुरू किया। पर वे बोल कहाँ रहे थे। जैसे अपने आँसू पी रहे थे…
…और फिर हिरनापुर के लोग इंतजार करते रहे, इंतजार करते रहे, बस, इंतजार ही करते रहे। पर मोहना को कहाँ लौटना था? वह नहीं लौटा। नहीं ही लौटा…! अंग्रेजों ने उससे किस तरह का बदला लिया होगा, सोचकर सब उदास थे।
तभी जेलखाने के किसी कैदी ने संदेश भेजा, “मोहना अब कभी नहीं लौटेगा। आज की रात उसके जीवन की आखिरी रात…!”
सुबह हिरनापुर के लोगों ने देखा, मोहना का शव गाँव के तालाब किनारे वाले बरगद के पेड़ से झूल रहा है।
लोगों ने देखा तो गुस्से से उबल पड़े। पर गाँव में चप्पे-चप्पे पर अंग्रेजी सरकार के सिपाही मौजूद थे। डंडे और लाठियाँ लिए, लेफ्ट-राइट…लेफ्ट-राइट करते हुए। कहा गया, “मोहना जेल की दीवार फाँदकर भाग आया था। फिर न पकड़ा जाऊँ, इस खौफ से उसने खुद ही फाँसी लगा ली।…”
पर यह ऐसा सफेद झूठ था, जिस पर यकीन करना तो दूर, हँसना भी मुश्किल था।
उस दिन हिरनापुर गाँव में किसी घर में खाना नहीं बना। मोहना किसी का नहीं था, पर अब वह गाँव में हर किसी का अपना हो गया था।
अगले दिन से गाँव की स्त्रियों ने उस बरगद की पूजा करनी शुरू कर दी, जिस पर मोहना को फाँसी दी गई थी। यही वह पेड़ था, जिसके नीचे मोहना अपना प्यारा इकतारा बजाया करता था और बच्चों को एक से एक सुंदर कहानियाँ सुनाता था।
मोहना की शहादत की यह कहानी रहस्य ही बनी रहती, अगर एक और चमत्कार न होता।…
हाँ, इसे चमत्कार ही तो कहेंगे…कि दरोगा खुदाबख्श जिसने मोहना की बेंतों से पिटाई की थी, आखिर इस अन्याय का बोझ नहीं सह पाया। और मोहना की फाँसी के बाद तो उसकी आत्मा उसे धिक्कारने लगी। उसे मोहना की बात याद आती, “इस अन्याय की वरदी को उतारकर, गुलामी के जुए को उतार फेंको, दरोगा साहब। गाँधी इस देश में फरिश्ता बनकर आया है। तुम भी महात्मा गाँधी के बताए रास्ते पर चलो…!”
आखिर उसने नौकरी से इस्तीफा दिया और सुराजियों के साथ मिल गया। उसने लोगों से साफ-साफ कहा, “मोहना को फाँसी अंग्रेजों की सोची-समझी चाल थी, जिससे कि हिरनापुर के लोग डर जाएँ।…”
पर हिरनापुर के लोग डरे नहीं। पहले मोहना जिस तरह गाँव-गाँव जाकर लोगों को जगाता था, वही काम अब खुदाबख्श ने सँभाल लिया। अब वह दरोगा नहीं था। गंधी जी का विनम्र अनुयायी था। मोहना की तरह ही गाँव-गाँव अलख जगा रहा था।
उसी ने कहा, “हम मोहना की याद में हर बरस शहीद मेले का आयोजन करेंगे। इसी तालाब के पास वाले मैदान में।”
और यों हिरनापुर में शहीद मेला लगने लगा। बरस-दर-बरस। सन् बयालीस से मैं इसे देखता आ रहा हूँ, सत्तर से ज्यादा बरस हो गए, और आगे भी, मुझे यकीन है, चलता रहेगा।…
कहते-कहते हरखू दादा एक पल के लिए चुप हो गए। चेहरा ऐसा, जैसे उनकी आँखें अब भी मोहना को खोज रही हों।
उन्होंने एक नजर सभा में बैठे लोगों पर डाली। फिर अपने को तनिक सँभालकर बोले—
“गाँव के तालाब के किनारे सामने वाला बरगद का पेड़ वही है, जिसके नीचे मोहना इकतारा बजाकर बच्चों को किस्से-कहानियाँ सुनाया करता था।…फिरंगी सरकार ने पहले तो धमकी दी कि बंद करो यह शहीद मेला, वरना यह बरगद भी कटवा दिया जाएगा। पर गाँव की औरतों और बच्चों ने कहा, हम इसी बरगद से चिपककर खड़े हो जाएँगे। फिर देखेंगे, कैसे कटवाएँगे यह पेड़!…सो शहीद मेला बराबर लगता रहा। और यह बरगद आज भी वही है, वैसा ही है, और आप यकीन करें या नहीं, मुझे तो मोहना के इकतारे का संगीत यहाँ आज भी सुनाई देता है।…”
*
बूढ़े हरखू दादा की बात पूरी होते-होते अँधेरा छा गया था। मंच पर बस एक टिमटिमाती लालटेन।…पर किसी को कोई हड़बड़ी नहीं। अँधेरे में भी लोग हरखू दादा की आवाज ऐसे सुन रहे थे, जैसे उस खरखराती आवाज में लोगों को मोहना की तसवीर नजर आ रही हो।
हरखू दादा की कहानी पूरी होते ही ‘मोहना की जय…! हिरनापुर के अमर शहीद मोहना की जय…!’ के नारों से आसमान गूँजने लगा। और इसी के साथ ही शहीद मेला का समापन।
अब सब लोग अपने-अपने गाँव लौटने की तैयारी में लग गए।
*
जमींदार बाबू गंगासहाय, हरखू दादा और सब गाँव वालों से विदा लेकर मैं और परमेश्वरी बाबू हिरनापुर के शहीद मेले से लौट रहे थे, तो ‘मोहना की जय…हिरनापुर के अमर शहीद मोहना की जय…!’ के नारे हमारा पीछा कर रहे थे।
“मोहना तो गाँव का सीधा-सादा भोला युवक था। पर उसमें गाँधी जी समा गए थे। इसीलिए तो वह अंग्रेजी अत्याचार से कभी नहीं घबराया और अपनी जोशीली बातों से आसपास के सारे गाँव वालों को जगा दिया।…राजेश्वर, वह समय ही ऐसा था। गाँधी एक नहीं रहा। जिस तरह कृष्ण के अनेक रूप थे, गाँधी के भी जैसे अनेक रूप हो गए। हर गाँव, शहर का एक गाँधी… मोहना भी हिरनापुर का गाँधी ही था!”
“हिरनापुर का गाँधी…!” मेरे होंठों पर शब्द काँप रहे थे, और मन में तुन-तुन-तुन इकतारे का संगीत गूँज रहा था, जो सुन-सुन-सुन कहकर शायद फिर से मोहना की कहानी छेड़ रहा था।
आशा ही नहीं विश्वास है कि अब आप स्वास्थ्य लाभ की ओर होंगे। आने वाला हर दिन आपके लिए स्वास्थ्य की दृष्टि से एक नई सुबह की तरह हो, ईश्वर से यही प्रार्थना है।
आप की कहानी *”गाथा एक शहीद की “* पढ़ी। कहानी में मेले की बात पढ़ कर एकाएक याद आया-
*शहीदों की चिताओं पर*
*लगेंगे हर बरस मेले*
*वतन पर मिटने वालों का*
*यही बाकी निशां होगा।*
*वतन पर जो फिदा होगा*
*अमर वो नौजवाँ होगा*
*रहेगी जब तलक दुनिया*
*ये अफसाना बयाँ होगा।*
शहीदों की कहानी पढ़ कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं ।अपने जीवन को, जो सिर्फ एक बार मिलता है, जो अनेक-अनेक कष्ट सहकर भी अपने देश के नाम पर कुर्बान कर देता है ,उसी का जीवन धन्य है। इस कहानी ने यह साबित किया कि देश के लिये मर मिटने का जज़्बा होना अधिक जरूरी है उसके लिए अन्य किसी डिग्री की आवश्यकता नहीं होती।इंसान दुःख सहकर भी अपनों को खोकर भी देश के लिये कुछ करने की हिम्मत रखें ,इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है।
शहीद मोहना और उसके इकतारे की कहानी बहुत मार्मिक है। इस कहानी तक पहुँचाने के लिये आपका बहुत-बहुत शुक्रिया।
वह समय ही ऐसा था कि गाँधी जी की एक पुकार पर लोग उनके पीछे चल रहे थे।
वह समय गांधी नेहरू जी के नाम था। वह वास्तव में समय की पुकार थी।
https://www.thepurvai.com/story-by-prakash-manu/
आदरणीय बाबूजी
आशा ही नहीं विश्वास है कि अब आप स्वास्थ्य लाभ की ओर होंगे। आने वाला हर दिन आपके लिए स्वास्थ्य की दृष्टि से एक नई सुबह की तरह हो, ईश्वर से यही प्रार्थना है।
आप की कहानी *”गाथा एक शहीद की “* पढ़ी। कहानी में मेले की बात पढ़ कर एकाएक याद आया-
*शहीदों की चिताओं पर*
*लगेंगे हर बरस मेले*
*वतन पर मिटने वालों का*
*यही बाकी निशां होगा।*
*वतन पर जो फिदा होगा*
*अमर वो नौजवाँ होगा*
*रहेगी जब तलक दुनिया*
*ये अफसाना बयाँ होगा।*
शहीदों की कहानी पढ़ कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं ।अपने जीवन को, जो सिर्फ एक बार मिलता है, जो अनेक-अनेक कष्ट सहकर भी अपने देश के नाम पर कुर्बान कर देता है ,उसी का जीवन धन्य है। इस कहानी ने यह साबित किया कि देश के लिये मर मिटने का जज़्बा होना अधिक जरूरी है उसके लिए अन्य किसी डिग्री की आवश्यकता नहीं होती।इंसान दुःख सहकर भी अपनों को खोकर भी देश के लिये कुछ करने की हिम्मत रखें ,इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है।
शहीद मोहना और उसके इकतारे की कहानी बहुत मार्मिक है। इस कहानी तक पहुँचाने के लिये आपका बहुत-बहुत शुक्रिया।
वह समय ही ऐसा था कि गाँधी जी की एक पुकार पर लोग उनके पीछे चल रहे थे।
वह समय गांधी नेहरू जी के नाम था। वह वास्तव में समय की पुकार थी।