Wednesday, February 11, 2026
होमकहानीसपना सिंह की कहानी - फिर मारे गये गुलफाम

सपना सिंह की कहानी – फिर मारे गये गुलफाम

हाथ मुंह धोकर खटिया पर लेट गये हैं, राजेश जी। मोबाइल पर गाने बज रहे थे। डेढ़ सौ वाला लोकल मेड रेडियो, सोचते हैं  घर के लिए भी ले लें । यहाँ बनारस में भी तो मिलता है। पिछली बार साहब मेमसाब के साथ उनके साले के घर भोपाल गये थे तो हफ्ते भर में ही मेमसाब की भाभी जी खुश हो गयी थीं। आखिर तीनों ननदें , ननदोई , सास , ससुर …बच्चे इतने सारे लोग । राजेश जी न होते तो भाभीजी बेचारी का तो बोलो राम हो जाता। भाभीजी के साथ किचन का पूरा कारोबार संभाल रहे थे राजेश जी। तभी तो हफ्ते भर में भाभीजी ने किसी समय कोई रेसिपी रीपिट नहीं की थी। ननदोई लोग भी ऐसी आवभगत से खुश हो गये थे। राजेश जी के गाने सुनने का शौक देखकर ही भाभीजी ने चलते समय उन्हें रेडियो दिया था। वह रेडियो तो  वह मेमसाब के किचन में फिट कर दिये। यूँ भी दिन का ज्यादा समय तो वहीं गुजरता है। कमरे पर तो दिन में दो घंटे और रात में 10-11 बजे से सुबह आठ बजे तक ही रहते हैं।थोड़ा भी देर अबेर हो जाये तो मेमसाब परेशान हो जाती हैं। सुबह जो राजेश जी घर में घुसते हैं तो फिर छुटकू की सारी जिम्मेदारी उन पर । फिर चाय , नाश्ता ,खाना  ये सब राजेश जी अपने हिसाब से करते हैं।
             कोई आने वाला आये या जाये .उन्हे फिक्र नहीं। किसी की गाड़ी छूट रही हो तो फिर मेम साहब देखें ! अभी कल ही की तो बात है, मेम साहब की वो सहेली जिनकी बिटीया भी अपनी छाया के साथ पढ़ती ह, आ गईसुबह – सुबह स्कूटी से! सहब ने फौरन कहा राजेश चाय बनाइये । पर राजेश तो बिजी थे छुटकू के पीछे कटोरी चम्मच लेकर दूध पिलाने में। आखिरकार मैडम बिना चाय पीये चली गईं 
‘‘राजेश जी चाय उधार रही‘‘ । ऐसी बहुत सी चाय उधार है राजेश जी पर
डेढसाल से हैराजेश जी यहापर जब आये थे तो छुटकू महाशय पाँचेक महीने के थ… दो लड़कियों के बाद हुए थे। मेम साहब के तीनों बच्चे आपरेशन से हुए थे, उस पर से फिर अपेंडिक्स का भी आपरेशन करवाना पड़ा। उस दौरान तहसीलदार साहब सी.ओ. साहब से कहकर उन्हें अपने यहाले आये थे। सी.ओ. साहब तहसीलदार ताहब की तरफ के थे सो जाते जाते उनका भला कर गये। भला मतलब ये कि राजेश जी की साहबी हलके में बड़ी पूछ थी। एक तो ब्राह्मण, ऊपर से किचन के काम में एकदम ट्रेंड। राजेश जी तो डी.एम. साहब के यहाभी काम कर चुके थे। उसी काम की बदौलतो परमानेंट हुए हैं। नहीं पांच साल से डेली वेजेज पर थे। गेंद की तरह लुढकाये जाते रहे इधर से इधर !
डी. एम. साहब भी गाजीपुर के उसी गाव के थे जहाँ के राजेश जी। राजेश जी के पिता पंडित रामनारायण चबे जी जिस प्रायमरी स्कूल में चथी कक्षा को गणित पढ़ाते थे उसमेकभी वीर प्रताप सिंह पढ़ चुके थे। बाबूजी अक्सर अपने इस मेधावी छात्र का उदाहरण अपने परिवार के लड़के बच्चोको देते । योभी वीर प्रताप सिंह गाँव भर के ठाकुर बाभन लड़को के रोल माडल बने रहे कई – कई सालों तक। आस पास के गाँव का जो भी लड़का थड़को पढ़ै लिखे में ठीक -ठाक हुआ फिर वो कलेक्टरी से नीचे का सपना नहीं देखता था। राजेश जी के घर का हाल भी जुदा नहीं था। पहले तो नरेन्द्र भइया गये थे इलाहाबाद पढ़ने के लिए । तब तो राजेश जी बहुत छोटे थे नरेन्द्र भइया की प्रेरणा स्त्रोत तो मीना दीदी थीक्या राजेश जानते न थे भले उस समय छोटे थे … पर इस कहानी के आदि अंत से पूरी तरह वाकिफ थे।
बड़का बाबूजी के मझले लड़का नरेन्द्र भईया दो बहनोके बीच का इकलौता भाई। बचपन से जहीन। उनको लेकर पूरे परिवार  की आखों में सपनों की रंगीन तस्वीरें। नरेन्द्र भईया का अफसरी करना निश्चित था। बाबूजी अक्सर कहते नरेन्द्रवा की मेधा उनके प्रतिभाशाली शिष्य वीर प्रताप सिंह से तनिको कम नहीं है। उ अगर कलक्टर बन सकता है तो अपना नरेन्द्रवा काहे नहीं?
.उन दिनों छुट्टियों में आये थे भईया। अक्सर ठाकुर साहब के घर आते थे। कभी कभार उनके मंदिर में भोग लगाने भी जाते। ठाकुर साहब की बड़ी सी हवेली में भोलेनाथ के दो मंदिर थे। एक बाहर अहाते में और दूसरा , हाथी दरवाजे कें अन्दर । बिना भोग लगाये खाना नहीं खाया जाता था। भोग लगाने का काम बाबूजी के जिम्म! जब कभी वह जजमानी मे गये होते तो घर के लड़के जाते भोग लगाने । ऐसे ही किसी दिन नरेन्द्र भईया को मंदिर से लगे कुँए पर स्नान करके ……कमर पर एक अंगोछा लपेट भोग लगाने जाते देख ठाकुर साहब की मझली बिटिया खिलखिला कर हंस  तो पड़ी थी। नरेन्द्र भईया को तो झेपंना ही था। अब , बालपन तो रहा नहीथा कि इसी मीना के साथ पूरी -पूरी दोपहर – गेदा भड़ -भड़ और आइस-पाइस खेलता था। या फिर उसकी और उसकी बहनों की गुड़ियों की शादी में पुरोहित गिरी की थी। मीना गांव से दूर शहर में अपनी मौसी के यहां रहकर ग्यारहवीं की परीक्षा दे रही थी। छ्ट्टियों में गांव आई थी। भरी-पूरी किशोरी, नरेन्द्र भी युवावस्था की दहलीज पर, दिल में कुछ उगा सा था। कुछ ऐसा, जो बहुत नाजुक… बहुत मासूम सा था। पूरी दोपहर विविध भारती के गाने सुनने में गुजार दिये जाते। छुट्टियों भर दोनों की देखा देखी चली। छुट्टियाँ खत्म, मीना दीदी मौसी के यहावापस चली गयी। नरेन्द्र भइया इलाहाबाद लौट गये। इण्टर में पूरे संभाग में प्रथम आकर वह बी.ए. करने इलाहाबाद ही गये थे। आखों मे एक ही सपना था , बड़ा अफसर बनना है। इलाहाबाद उन दिनों अफसर बनाने की फैक्टरी ही समझा जाता था। 
पर, इस बार तो सब कुछ उल्ट-सुलट गया था। किताबों में मीना दीदी का खिलखिलाता चेहरा नजर आता। फिर क्या था लिख बैठे चिट्ठी मीना दीदी के स्कूल के पते पर। चिट्ठी क्या थी छोटी मोटी कहानी ही थी। बेहद सुंदर अक्षरों  में प्रेम की उद्धात भावनाओं से लबरेज। पर गर्ल्स स्कूल में किसी लड़की के नाम चिट्ठी आना अच्छा खासा गंभीर मामला समझा गया… नाकाबिले बर्दाश्त। फौरन मौसा मौसी को तलब किया गया। मौसी तो आग बबूला। कोई लड़का किसी लड़की को पत्र लिखे, ये लड़की के दुश्चारित्र होने का ही प्रमाण था। मौसा जी सुलझे हुए व्यक्ति थे। उन्होंने उस सात आठ पेज के पत्र को पढ़ा और गम्भीरता से बोले- कुछ तो ऐसा वैसा  नहीं लिखा है लड़के ने। मौसी अपने जीजाजी को इस गम्भीर मसले पर पत्र लिख चुकी थी। पन्द्रह दिन बाद बाबूजी छोटी बहन के साथ आ गये थे। मीना दीदी को देखते ही उन्होंने अपनी तर्जनी अपनी नाक पर रखकर कहा था। ‘नकिया त कटवा देहलू बहिनी ‘ उस क्षण मीना दीदी को लगा था धरती फट जाये और वह भी सीता माता की तरह  उसमें समा जायें। उस नरेन्द्रवा पर तो उन्हें इतना गुस्सा आया कि अगर सामने पाती तो शायद उसका कत्ल ही कर डालती। यूं भी जान बान मारना उनके खानदान में कोई अनोखा थोड़े था। कहते हैं ठाकुर साहब ने अपने लड़कपन में ही हरिया चमार को गोली मार दिया था। उहै तो बरम बनकर इनके वंश को लील रहा था। ऐसा थोड़े है कि ठकुराइन ने बेटा जना ही न हो दो बार बेटा पैदा हुआ पर दूनों सउरी में ही खत्म। गर्दन पर उगलियों के निशान साफ नजर आ रहे थे। बरम अपना बदला इसी तरह लेते है । 
नरेन्द्र भइया ने अकल से काम लिया था खत में भावनायें बेशक उनकी थी पर लिखवाया उन्होंने अपने किसी  दोस्त से था लिखावट मिलाई गयी ठाकुर साहब को तो पहले ही यकीन था, नरेन्द्र जैसा लड़का इतनी ओछी हरकत कर ही नहीं सकता
नरेन्द्र भइया के भावनाओं की तपिश से भला मीना दीदी कब तक आँखे फेरे रहती। पर दोनों दो अलग द्वीप थे  बीच में थी जांत-पांत, ऊच नीच, अमीरी गरीबी का ठाठे मारता सागर। 
इस बीच दीदी को क्षय रोग हो गया। ननिहाल में उनका इलाज चल रहा था इधर भईया की शादी की चर्चा भी उठ रही थी। बड़के बाबूजी जल्दी उनका ब्याह निबटाना चाहते थे भईया की कुंडली के अनुसार ब्याह के बाद ही ही उनका भाग्य जागना था ! पर भाइया तो टस्स से मस्स नहीं ! बड़की अम्मां उनके अड़ियल रवैये का रोना हवेली में भी रोयी होंगी। हर जगह रोती थी ! फिर फिर जाने क्या हुआ एक दिन भइया राजी हो गये ! कोई ना-नुकर नहीं।लड़क़ी देखने का भी कोई उत्साह नही, जिससे चाहो कर दो। दबी दबी चर्चा थी  मीना दीदी ने अपने सिर की कसम दी थी। 
भाभी थीगाव की सामान्य पढ़ी-लिखी सीधी साधी लड़की भईया उनके पति परमेश्वर ही बने रहे मीना दीदी के लिए भी उनके दिल में बड़ा आदर था। जब कभी मीना दीदी शहर से गाँव आतीभाभी से मिलने जरूर आती राजेश जी को आज भी याद है, मीना दीदी को हवेली छोड़ने जाते भाईया की बात‘‘ आप किसी अच्छे डक्टर को दिखाइये… कुछ फायदा तो दिख नहीं रहा… कितनी कमजोर हो गयी हैं ‘‘ 
‘‘ अच्छे ही डक्टर देख रहे हैं यो भी लगता है, जिंदगी जल्दी – जल्दी खत्म हो जाये… इस बीमारी ने उबा दिया है हमकों‘‘
ऐसा न कहो नरेन्द्र भाईया की आवाज गले में फंसने लगी थी।
तीन महीने बाद दीदी फिर गाव आयीं थी। इस बार चेहरे पर थोड़ी रौनक थी। भइया  राजस्थान सेवा में सलेक्ट हो गये थे। ट्रेनिंग से पहले वाली औपचारिकतायें पूरी करने गये थे। दीदी गई थीं भाभी को बधाई देने, चलो, अब तुम अफसर की बीवी हो गई। भाभी हमेशा दीदी के पैर छूतीं। दीदी संकोच से भर जातीं, बाभन होकर क्यों पाप चढ़ाती हो भाभी? ‘‘
उसी रात दीदी की तबियत खराब हो गयी थी। खून की उल्टी शुरू हुई… हवेली की चीख- पुकार सुनकर सभी भागकर पहुंचे। भाभी भी पहली बार हवेली की चखट के भीतर गई। दीदी का हाथ पकड़ जार-जार रोती भाभी और दो हिचकी के बाद एक तरफ लटक गया दीदी का चेहरा… जीवन भर नहीं भूल सकते राजेश जी। उस रात पहली बार हिलक हिलक कर रोये थे। क्यों रो रहे हैं इसकी कैफियत भी खुद को नहीं दे पाये थे।
दो दिन बाद नरेन्द्र भइया गाव आये थे। सपाट चेहरा लिए हवेली भी गये, और सातवें दिन ट्रेनिंग पर चले गये। पोस्टिंग के बाद एक बार एक बार आये थे गाव भाभी को लेने फिर उनको कभी किसी ने गाँव में नहीं देखा। भाभी ही आती जाती थीं। बाद में अम्मा बाबूजी भी उधर ही चले गये तो फिर उनका आना भी बंद हो गया। राजेश जी अभी कुछ साल पहले गये थे भईया के पास। क्या अफसरी ठाठ था। भाभी भी एकदग बदल सी गई थी। पर ये बदलाव सिर्फ ऊपरी था। शहरी और अफसरी परिवेश ने उनकी ग्रामीण भोली आत्मीयता को अभी लीला नहीं था भइया के घर जितने दिन भी रहे राजेश जी, बार-बार मीना दीदी का चेहरा आँखों के आगे आता रहा क्या भइया अब भी उन्हें उस तरह याद करते होंगे?
भईया की प्रेरणा भले ही मीना दीदी रही हो पर राजेश के प्रेरणास्त्रोत तो  भइया ही थे। खुली आखों सपने देखते, अब अगली पीढ़ी में उनका नाम चलेगा   उसी रजेसवा का जो हवाई चप्पल चटकाटा इन्हीं गाव की गलियों से कंधे पर बस्ता लटकाये स्कूल जाता था, वही रजेसवा जिसकी माँ ठाकुर साहब के घर कच्ची रसोई बनाती थीं  जिन्हें सभी मतवा कहते थे। वही रजेसवा, खाना बनने के बाद जिसकी पुकार मचती थी मंदिर में भोग लगाने की खातिर। वही राजेश द्विवेदी भी गये थे इलाहाबाद बड़का अफसर बनने। 
यूतो राजेश जी को कभी नहीं लगा कि उनका बाभन होना उन्हें कोई अतिरिक्त लाभ पहुंचाता हो। इलाहाबाद पहुंचे तो और बातें अलग सुननी पड़ी – बाभन हो च्च च फिर तो भूल जाओं अफसरी। बड़ा मुश्किल है भइया इम्तहान निकालना । तुम्हारे बूते का नहीं। अम्मा के साथ रहकर कुछ, रसोई के गुर सीखे  थे उसकी बदौलत उनकी पूछ परख साथियों में खूब थी। मेस बंद होने पर या कभी कुछ स्पेशल खाने का मन होने पर राजेश जी की ही पुकार होती दाल-भात , रोटी, तरकारी की साधारणतया से आगे बढ़कर, लिट्टी चोखा, या दलभरी पूड़ी और आलू परवल की सब्जी बनानी हो या फिर छोले भटूरे… इलाहाबाद के कटरा मोहल्ले में दस साल राजेश जी ने पाककला में कई एक्सपरिमेंट किये। साथ-साथ कम्पटीशन की तैयारी भी। पर सपने धरे रह गये, साल दर साल निकलते गये। आई.ए.एस. का प्रिलिमों नहीं निकाल पाये। राज्य सेवा में तीसरी बार प्रिलीम निकाले पर मेन में रह गये। मन और थोड़ हो गया, जब अपने ही गाव के वो लद्धड़ से पिछड़ी जाति के दोनों लड़के एस.डी. एम. और बिक्री कर अधिकारी बन गये। उस दिन दूसरी बार राजेश जी रोये थे… खूब रोये थे। उनसे आधी योग्यता वाला आरक्षण की बदौलत अधिकारी बन गया। अब सरकार को कोई क्या बताये क्या सभी बाभन, ठाकुर जमींदार ही होते हैं? या फिर शोषक की होते हैं? अब रामखेलावन और बसेसरा के परिवार से बेहतर स्थिति तो नहीं थी राजेश जी के परिवार की। पिता प्रायमरी स्कूल के मास्टर, जमीन के नाम पर दो भाइयों के बीच पांच बीघा खेत
पैसे और पद की सभी जगह पूजा होती है। वह तो बचपन से अपने परिवार को दीन हीन देख रहे है पिताजी एक्स्ट्रा इनकम के लिए एल.आई.सी. और डाकखाने की एजेंटगिरी भी करते रहे मुंह में पान कसैली भरे हुए पिता कितने निरीह कितने बेजार दिखते थे
ये तमाम बातें अक्सर याद करते रहते हैं रामजी। इन्हीं यादों के साथ एक और चेहरा भी याद आता है , कला का चेहरा जिसे घूघंट की ओट से आधा अधूरा ही देख पाये थे वो  फिर भी उस चेहरे की झलक भूलती नहीं राजेश जी पढ़ाई में अच्छे थे सो अच्छे घरानों से रिश्ते आने लगे थे । लड़की वालों की सोच थी, जहीन लड़का है, अभी मामला फिटिया जाय तो अच्छा … कल को परीक्षा पास कर लेगा तो यही शादी लाखों की हो जायेगी पंडित जी भी प्रलोभन में आ गये और बाइस साल के राजेशजी की शादी पन्द्रह साल की पंडित रामरतन तिवारी की लाडली बेटी से हो गई कन्या का नाम पंडितजी ने सत्यनारायण की कथा में श्रद्धावत कलावती रक्खा था कालान्तर में यह नाम सिर्फ कला यह गया ’वती’ साइलेंट में चला गया। ब्याह के वक्त राजेश जी कलावती के सिर्फ हाथ और मुखड़े पर पड़े घूंघट की ओट से झांकते चेहरे की ललाई ही देख पाये थे। संतोष  था लड़की गोरी है। पाच साल का गौना रखाया था। राजेश जी फिर इलाहाबाद। उधर दामाद बाबू अफसर बनने जा रहे हैं। तो बिटीया क्यों अनपढ़ रहे कलावती भी प्राइवेट 10वीं की परीक्षा का फार्म भर दी। साल दर साल सरकते गये दमाद बाबू हर बार असफल होते रहे। अतंतः उन्होंने हार मान ली और वीर प्रताप सिंह जी की बदौलत डेली वेजेज में कुछ दिन चपरासी गिरी करने के बाद परमानेंट हो गये।
एक दिन राजेश जी को सुन्दर लिखावट में कलावती का पत्र मिला   जिस पत्नी  को अभी तक सपनों में ही देखते थे उसका पत्र पाकर रोमाचित हो गये। धड़कते दिल और कांपते हाथों से उन्होंने खत को खोला पर ये क्या  कलावती ने बहुत सुंदर अक्षरों और स्पष्ट रूप से जो लिखा था उसका लब्बो लुआब यही था कि वह जिस कालेज से बी.ए. कर रही थी वही के सहपाठी से उसका प्रेम संबंध है… और वह एक सरकारी महकमें में बतौर क्लर्क कार्यरत है (चपरासी से ऊपर) राजेश जी से उसने प्रार्थना की थी कि वह गौना कराने से मना कर दें और भविष्य में भी उसके प्रेमी के साथ होने वाले विवाह में कोई अड़चन पैदा न करें।
राजेश तो कठुआ से गये थे घर भर बौखला गया था पिताजी गुस्से में बउरा गये थे – भउसा मचा है का?  शादी ब्याह न हुआ तमाशा हो गया पर राजेश जी ने चुप्पी साध ली। पिताजी भी फनफना कर शान्त हो गये, किस बूते उठते। समधी लोग ऊचे रसूख वाले थे। अब तो वो सब बातें सपने जैसी हो गयी है। साहब मेमसाब को इतना मालूम है कि राजेश जी का विवाह हो चुका है गौना रक्खा है। जब राजेश जी छुट्टी की बात करते हैं  मेमसाब मुस्कुराते हुए पूछ लेती है गौना कराने जा रहे हैं क्या?  बेचारे राजेश जी हर बार नहीं में मुडी हिला देते है ।
इतने वर्षो की नौकरी में भांति भांति के साहबों के पल्ले पड़ चुके हैं राजेश जी अब यही तहीलदार साहब ठाकुर है। राजेश इनके यहाखाना बनाने कपड़ा धुलने का काम करते हैं। कहने को तो झाडू पोछा और बर्तन के लिए महरी भी है पर उसके गोल करने पर उन्हें ये काम भी करने पड़ जाते हैं। साहब  आवाज लगाते हैं , राजेश जूता लाओ माने राजेश जी जूता पोंछ कर साहब के पैरों के पास रक्खें। मेमसाब की माँ आई थीतो ये सब देखकर बेटी को बरजी थी… बाभन आदमी से जूता पोंछवाती हो… जूठा बर्तन उठवाती हो… पाप पड़ेगा । बेटी ठहरी शुद्ध आज के जमाने की, जांत-पांत कुछ नहीं जानती। ओहदा, पोस्ट, आदमी को बड़ा बनाता है। चमार एस.डी.एम. साहब, ओ.बी.सी. मैडम डी.एम. ही इन लोगों के भगवान हैं। भुनभुना कर बोलीं, ‘‘कुछ पाप वाप नहीं लगता  इतना मानने लगे तो हो गया काम… शक्ल देखने को तो रक्खे नहीं है।‘‘
राजेश जी को अपने सहपाठी रामाधार पाल याद आते हैं। वेटेनरी विभाग में चपरासी के पद पर पोस्टिंग पाये थे। कालेज के जमाने से नेतागिरी का चस्का लगा था। तो नौकरी में भी नेतागिरी शुरू कर दिये। ठाकुर थे, जाति की अकड़ थी ही। धड़ल्ले से डाक्टर के सामने कुर्सी पर बैठते थे। मजाल क्या जो कोई उसे चपरासी समझ ले। डक्टर भी चाय आने पर एक कप पाल के लिए भी भिजवाना का आदेश जब-तब डक्टराइन को पारित करते। डक्टराइन मन ही मन भुनभनाती, पर चाय भी भिजवाती है। इहै  पाल हरिजन डी.एल. ओ.के. यहागाय को सानी-पानी देने से लेकर सौदा – सुलफ लाने का काम बेमन से ही सही, करते ही। जाने कहाँ होंगे अब  पाल महोदय?   राजेश जी, सर झटक कर अपने को इन सारी यादों से मुक्त करते हुए खटिया से उठ पड़ते हैं । साढ़े चार बज गये।  छुटकू महाशय उठ गये होंगे। मेमसाब बिलिया रही होंगी। ये यादें जब-तब बिन बुलाये मेहमान की तरह फाट पड़ती है।  मीना दीदी, नरेन्द्र भइया, कलावती  ये सब  अब क्या वास्ता उनका  उन सबसे  हाथ मुह धोकर  सिर को पानी से भिगोकर शीशें में देख बाल संवारते हुए सोचते हैं  अभी इतनी उमर तो नहीं गई  कि शुरूआत न हो सके… बाबूजी की चिट्ठी पैंट की जेब में मेमसाहब के समान की लिस्ट के साथ मौजूद है – लिखा है, विवाह तय कर दिया है… ‘‘आ जाओ ‘‘ न चाहते हुए भी राजेश जी फिर से सपने सजाने को तैयार हैं। साहब से छुट्टी की बात करनी होगी, मेमसाब फिर मुस्कुराते हुए पूछेंगी ‘‘गौना कराने जा रहे है क्या? इस बार क्या कहेंगे राजेश जी ? 
सपना सिंह,
10/1467, अनहद,
अरुण नगर, रीवा 486001(.प्र.)
मोबाइल 9425833407
सपना सिंह
सपना सिंह
हिंदी की चर्चित कहानीकार. हंस, कथादेश, परिकथा, कथाक्रम, सखी(जागरण), निकट, अर्यसदेंश, युगवंशिका, माटी, इन्‍द्रपस्‍थ भारती आदि देश की प्रमुख पत्रिकाओं में कहानियाँ प्रकाशित. आकशवाणी से कहानियों का निरतंर प्रसारण. संपर्क - [email protected]
RELATED ARTICLES

3 टिप्पणी

  1. गाँव घर की संवेदना से बंधी, किस्सागोई से भरपूर सुंदर कहानी, जो विमर्श के कई मुद्दों को उठाते हुए भी लोक की सहजता को संभाले रखती है। बधाई सपना जी

  2. बहुत अच्छी संवेदनशील और मार्मिक कहानी।जीवन की व्यथा कथा का कटु यथार्थ प्रस्तुत करती कहानी मन को स्पर्श करती.है।घटनाक्रम जैसे अपने आसपास ही घटित हो रहे हों और हम.मूक प्रत्यक्षदर्शी रहे हों।प्रतियोगी परीक्षाओं की उलझने,दम तोड़े सपने युवा मन की तमाम कहानियाँ इसी सामाजिक यथार्थ की देन हैं।कहानी अत्यंत रोचक और प्रवाहमय है।शुरु से अंत तक पूरा पढ कर ही समाप्त की। ग्रामीण और देशज शबदों का प्रयोग कहानी में जान डालता है।अंत में एक ही संदेश कि प्रेम न जाने जांत और पांत।समाज केवल धन और.लिप्सा जीवी है।*पैसे और पद की सभी जगह पूजा होती है* एक बहुत अच्छी कहानी के लिए अशेष धन्यवाद सपना जी।

  3. आपकी’फिर मारे गए गुलफाम’ कहानी पढ़ी। अच्छी मनोरंजक कहानी है।
    बेचारे राजेश! अफसर शाही की उम्मीद में चपरासी में ही संतुष्ट होना पड़ा। गौने के चक्कर में हँसी के पात्र बन गए। पढ़ लिखकर लड़कियाँ भी समझदार हो रही हैं। और फिर चपरासी से क्लर्क भला।
    कहानी के लिये बधाई आपको।

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Most Popular

Latest