एक ऐसा भी समय था जब हिन्दी सिनेमा में साइकिल एक महत्वपूर्ण सवारी हुआ करती थी। नूतन, शोभा खोटे, सायरा बानो, आशा पारेख का कोई ना कोई गाना साइकिल चलाते हुए फिल्माया ही जाता था। साइकिल एक तरह आत्मविश्वास का प्रतीक हुआ करता था। राज कपूर, दिलीप कुमार, देव आनन्द, राजेन्द्र कुमार, शम्मी कपूर, सुनील दत्त भी फ़िल्मों में साइकिल पर सवार दिखाई देते थे। आज जो जलवा मोटर साइकिल का है वो कभी साइकिल का हुआ करता था। पुरवाई की प्रिय साहित्यकार देहरादून की डॉ. किरण सूद ने साइकिल पर लिखे इस आलेख से हमारी पीढ़ी को नॉस्टेलजिक कर दिया है। पढ़िये आप भी… (संपादक)
उन्नीसवीं सदी के आरम्भ में कई दशकों तक लड़कियों के लिए साइकलिंग पर रोक रही। कुछ लोगों के लिए यह भ्रम भी रहा कि यह प्रजनन शक्ति को कम कर सकता है। जबकि नेहरु के लिए भारतीय औद्योगिक क्रांति का प्रतीक बनी साइकिल। पंजाब में एटलस साइकिल विशेष रूप से लेडीज़ साइकिल प्रगति का प्रतीक रहा। विज्ञापन का उस समय यह क्रांतिकारी स्वरूप रहा। लुधियाना में कॉलेज रोड पर लड़कियों को साइकिल पर कॉलेज आते/जाते देखने के लिए लड़कों के समूह आते रहे। साठ के दशक का ‘ मैं चली, मैं चली ‘ सायरा बानो पर फ़िल्माया गीत स्त्री स्वातंत्र्य’ का प्रतीक रहा। साइकिल को फैशन प्रतीक बनाने का उपक्रम पर्यावरण सुरक्षा के प्रति जागरूकता लाना भी है। यह वजन नियंत्रण के साथ-साथ मांसपेशियाँ सुदृढ़ करने का सहज व्यायाम है जो किसी बन्द कमरे में नहीं अपितु खुले आसमान के नीचे या समुद्र या नदी किनारे भी सम्भव है।
साइक्लॉथॉन 2025: स्वस्थ मतदाता और जनतांत्रिक सहभागिता
अधिकार और दायित्व का चोली-दामन का साथ है। यह सर्वत्र मान्य है कि सरकार वैसी ही होगी जैसेकि नागरिकों की योग्यता का अनुपात। मतदान जनतन्त्र की आधारशिला है और जागरूक मतदाता गुणवत्तायुक्त शासन के अग्रदूत। यह चिन्तन का विषय है कि गणतन्त्र के पचहत्तर वर्षों के बाद भी मतदान प्रतिशत पचास से पैंसठ प्रतिशत तक भी कठिन प्रतीत होता है। मतदाता की उदासीनता जनतांत्रिक व्यवस्था और राष्ट्रीय विकास के लिए चिंताजनक स्थिति है। जनतन्त्र को सार्थक बनाने में नागरिक सहभागिता वांछित है।
यह भी सुनिश्चित है कि लोकतंत्र में राजनीतिक दलों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। सुशासन के लिए सरकार की प्रतिबद्धता होना भी आवश्यक है।…. और इसी क्रम का अग्रणी सहयोगी हैंः सुयोग्य अधिकारी।
प्रायः उपरोक्त अधिकांश लोगों की छवि धूमिल और प्रश्नांकित रही है कि जन प्रतिनिधि जनता से दूरी बनाए हुए हैं और सुशासन के प्रति उत्तरदायित्व समीचीन नहीं है। तथापि प्रशासनिक अधिकारी कार्य की अधिकता के चलते भी नए प्रयोग करने से संकोच नहीं कर रहे हैं।
प्रमाण के लिए उत्तराखण्ड में वर्तमान मुख्य निर्वाचन अधिकारी डॉ. बी. वी. आर. सी. पुरुषोत्तम द्वारा मतदाताओं को जागरूक करने के लिए निरन्तर प्रयास किये जा रहें हैं। विशेष उल्लेखनीय है कि यह अभियान डिब्बाबंद उत्पाद की तरह नहीं परोसे जा रहे हैं।
नई सोच से मतदाताओं में उत्साह का संचार हो रहा है और स्थानीय स्तर पर भी सभी लोग सक्रिय हैं विशेष रूप से युवा मतदाताओं की भागीदारी अच्छे भविष्य की ओर इंगित कर रही है।
साइक्लॉथॉन का आयोजन इसी क्रम में चुनौतीपूर्ण कदम है जो डॉ पुरुषोत्तम की स्वयं की भागीदारी से मील का पत्थर सिद्ध हो गया है।
थॉन जैसाकि हम जानते हैं कि मैराथॉन से सम्भूत बहु-प्रयुक्त सह-शब्द है। बहु प्रसिद्ध कथा है कि फाइडिपीडिस नामक धावक मैराथॉन से ऐथेन्स तक युद्ध में विजेता होने की सूचना देने के लिए दौड़ कर पहुँचा। इस प्रकार थॉन ग्रीक पौराणिक चरित्र है, उत्तर फ्रांस की नदी का नाम है। आज भी थॉन किसी मुख्य शब्द के साथ जोड़ कर किसी बड़े आयोजन के लिए प्रयुक्त होता है जिसका कोई विशेष उद्देश्य हो। प्रायः ऐसा आयोजन धन एकत्रित करने के लिये या किसी लक्ष्य विशेष की प्राप्ति के लिये किया जाता है। यहाँ यह आयोजन साइकिल चलाने से सम्बंधित आयोजन है जिसका मुख्य उद्देश्य मतदाताओं में जागरूकता फैलाना है, जिसके आनुषंगिक लाभ और भी अधिक महत्वपूर्ण हैं क्योंकि साइकिल चलाने से पर्यावरण संरक्षण का संदेश लोकमानस तक पहुँच जाता है और और साइकिल का दैनिक उपयोग स्वास्थ्य लाभ के लिए सर्वोत्तम व्यायाम है।



आदरणीया किरण सूद का लेख – साइकिल… कभी प्रतीक थी भारतीय औद्योगिक क्रांति की! में जिस साइकिल की बात की गई है वह एक साधारण सा प्रतीक मालूम होता है। लेकिन इस प्रतीक के माध्यम से उन्होंने हमारी समझदारी और पूरी विकास यात्रा को समेट दिया है।
शुरुआत (80 के दशक ) में इसका क्रेज हेलीकॉप्टर से कम नहीं था। लड़कियों के लिए तो यह वरदान सिद्ध हुई है। यही वह चीज थी जिसने लड़कियों को कैद से आजाद कराकर मुक्त हवा में सांस लेने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। साइकिल चलाती लड़कियों को लड़कों द्वारा देखा जाना कम रोमांचक नहीं था। एक समय फिल्मी दुनिया से लेकर गांव शहर तक साइकिल का ही एकछत्र राज्य चलता रहा।
यह लेख बहुत घुमावदार है। शुरुआत में लगा कि यह लेख साइकिल और लड़की तक सीमित होगा। लेकिन आगे पढ़ने पर साइक्लाॅथाॅन से सारा गेम चेंज हो गया। लेखिका ने इसे मतदाता जागरूकता से जोड़कर सार्थक संदेश दे दिया है। मुख्य चुनाव अधिकारी डॉ पुरुषोत्तम जी ने जागरूकता के लिए साइक्लाॅथाॅन का आयोजन कराया। इसमें बीस किलोमीटर साइकिल चलाकर सभी जाति धर्म के लोगों ने एक तरह की रेस पूरी की है। डॉ पुरुषोत्तम जी को इस नए प्रयोग के लिए श्रेय जाता है। एक कहावत है कि जमीन से जुड़कर तो स्वर्गिक वस्तुएं भी कोमल और आकर्षक हो जाती हैं। फिर यह आकर्षक क्यों नहीं होगा। डॉ पुरुषोत्तम जी जमीन से जुड़े हुए व्यक्ति हैं। ऐसे अधिकारी के प्रति सम्मान अपने आप बढ़ जाता है। मुझे लगता है कि इस जागरूकता में साइक्लाॅथाॅन लोकतंत्र के इतिहास में नई इबारत लिख चुका है।
डॉ पुरुषोत्तम जी को इसके लिए बहुत-बहुत बधाई। साथ ही लेखिका को भी बधाई एवं शुभकामनाएं।
किरण जी!
सर्वप्रथम आपके आलेख के शीर्षक ने सोच में डाला, गंभीर हो पाते उसके पूर्व ही रोचकता का आभास हुआ और प्रारंभ में पढ़ते हुए एक पल के लिये अतीत में खो गये। वाकई वह एक सुनहरा ,अच्छा और प्यारा वक्त था। साइकिल सिर्फ परिवहन का ही साधन नहीं, बल्कि मनोरंजन का भी साधन थी।
और तब वह उम्र औद्योगिक क्रांति का महत्व न जानती थी न समझती थी।
वर्तमान युग कल-युग है। मशीनी-युग, रफ्तार का युग…..…और लोगों के लिये अब मोटर साइकिल के सामने साइकिल, प्रतिष्ठा का विषय बन कर खड़ी है किन्तु वह आज भी उतनी ही उपयोगी व महत्वपूर्ण है, इसमें दो मत नहीं।
यह लेख कई अर्थों में महत्वपूर्ण है।
लेडीज साइकिल स्त्री -स्वातंत्र्य का प्रतीक रही और आजादी के बाद नेहरू के लिये औद्योगिक क्रांति का।
वैसे यह सौ प्रतिशत सही है कि वजन नियंत्रण के साथ यह मांसपेशियों को सुदृढ़ करने व शरीर को स्वस्थ रखने के लिये एक सर्वाधिक श्रेष्ठ व्यायाम है और साथ ही डीज़ल, पैट्रोल के खर्चे के साथ ही प्रदूषण से मुक्त सस्ती, सुन्दर, टिकाऊ और कम जगह घेरने वाली।
निश्चित रूप से मतदान जनतंत्र की आधारशिला है अतः अपने दायित्व को समझते हुए और उसका निर्वाह करते हुए अपने अधिकार का प्रयोग अवश्य करना चाहिये किंतु ऐसा हो नहीं पा रहा!ऐसा क्यों? यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
संभावित कारण जो लेख में उल्लिखित हैं; चिंतनीय हैं, लेकिन कारण और भी हैं जिन्हें जानना, समझना और उसे दूर करना जरूरी है।
सभी प्रशासनिक अधिकारी अपने उत्तरदायित्व के प्रति कितने सजग व कर्तव्य निष्ठ रहते हों यह उनके स्वभाव पर निर्भर होता है, अतः सब एक से नहीं होते; किन्तु जो हैं वे और उनके प्रयास स्वागत योग्य एवं प्रशंसनीय हैं।
आपको पढ़ते हुए उत्तराखंड के वर्तमान मुख्य निर्वाचन अधिकारी डॉ. बी. वी.आर.सी पुरुषोत्तम जी, उनकी सोच, कार्यप्रणाली व प्रयासों को जानकर बहुत अच्छा लगा। निश्चित ही प्रशंसनीय व सराहनीय , क्योंकि आपके कहे अनुसार उसका सकारात्मक प्रभाव नजर आ रहा हैऔर
साइक्लॉथॉन का आयोजन और डॉ. पुरुषोत्तम की स्वयं की भागीदारी निश्चित रूप से काबिलेतारीफ़ है।
मैराथॉन शब्द बहुत बार पढ़ा और सुना था,पर इसकी वास्तविकता को जानने के प्रयास में हम हमेशा ही लापरवाह रहे।
आपका यह लेख हमारे लिये इस दृष्टि से भी और अधिक महत्वपूर्ण
है कि आज आपको पढ़कर थॉन का और मैराथॉन का इतिहास, अर्थ और महत्व की संपूर्ण जानकारी विधिवत् हासिल हुई। इसके लिये तहेदिल से शुक्रिया आपका।
साइक्लॉथॉन के आयोजन को पढ़ते हुए संभवतः 92 की फिल्म “जो जीता वही सिकंदर” याद आ गई। उस समय शायद हीरो साइकिल का नाम था। राजनीति भी कुछ ऐसी ही है। चुनावी प्रतियोगिता में जीत की उच्च महत्वाकांक्षाओं के चलते , प्राप्ति के प्रयासों में प्रतिभागियों को खूनी रास्ते लांघना भी जायज़ लगता है।
वर्तमान की महती आवश्यकताओं में से एक है- पर्यावरण संरक्षण हेतु जागरूकता। इस प्लास्टिक प्रयोग जागरूकता अभियान के तहत प्लास्टिक प्रयोग पर रोक के कई प्रयास सख्ती से पूरे देश में ही लागू किये गये ,लेकिन कुछ समय तक हलचल रहती है; उसके बाद सब पुराने दौर में लौट आते हैं, लेकिन प्रयास जारी रहें और जागरूकता बनी रहे यह जरूरी है।
प्रतिदिन साइकिल से ऑफिस जाना,व बीस किलोमीटर की साइकिल यात्रा में भाग लेना- सिर्फ कह कर नहीं, बल्कि स्वयं करके नज़ीर पेश करने की तरह है और निश्चित ही एक उच्च पदस्थ अधिकारी का साथ चल रहे लोगों से संवाद स्थापित कर उन्हें सहजता से स्वयं पर विश्वास करने का यह बेहतरीन सार्थक व सही प्रयास रहा-मतदान जागरूकता की दृष्टि से। डॉक्टर साहब की कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं है।
साइकिल चलाने का इस आयोजन का उद्देश्य महत् है। सिर्फ मतदान के प्रति जागरूकता पैदा करना ही नहीं अपितु विशेष रूप से इस ओर भी ध्यान दिलाना है कि किसी व्यक्ति के दबाव में आकर मतदान नहीं करना है और किसी भी ऐसे कार्यक्रम से बचना है जो जनतांत्रिक प्रक्रिया के विरुद्ध हो।
यह सजगता सुरक्षित व सुखद भविष्य की जरूरत है।काश!ऐसा हो पाए।
डॉक्टर पुरुषोत्तम जी के बारे में जैसा आपने बताया -ऐसे अधिकारी हीरे की तरह कोयले की खान में बिरले ही मिलते हैं। उन्हें हमारा प्रणाम।
कला नींव से सफर करती हुई कंगूरे तक पहुँचने के लंबे श्रम और अनवरत साधना के बाद प्रतिष्ठा पाती है।
साइकिल पर सवार माँ बेटी के गतिमान चित्र के लिये और पुरस्कार के लिये पारुल तोमर जी बधाई की पात्र हैं। उन्हें बधाई के साथ अनंत शुभकामनाएँ।
परिवहन, मनोरंजन, स्त्री विकास व स्वातंत्र्य, औद्योगिक क्रांति, साइकिल के स्वास्थ्य लाभ, मतदान के प्रति जागरूकता व सावधानी के क्रमशः पायदानों से गुजरते हुए उद्देश्य के केन्द्र में डॉक्टर पुरुषोत्तम जी के माध्यम से साइक्लॉथॉन और नारी सशक्तिकरण व पर्यावरण संरक्षण के लिये टेलन्टिला स्वयंसेवी संस्था द्वारा पारुल के साइकिल पर मां बेटी के रेखाचित्र पर समाप्त यह आलेख अपने उद्देश्य में सफल हो यह ईश्वर से प्रार्थना।
डॉक्टर साहब के व्यक्तित्व ने प्रभावित किया। उन्हें प्रणाम।
ढेर सारी जानकारियों से समृद्ध, सचेत व जागरूक करने वाले इस लेख के लिये किरण जी को बधाई संग शुक्रिया।
बेहतरीन टिप्पणी संग प्रस्तुति के लिये तेजेन्द्र जी का शुक्रिया।
पुरवाई का आभार तो बनता है।
यह आलेख पढ़ते हुए जैसे एक ही फ्रेम में तीन अलग-अलग परतें खुलती चली गईं—हिन्दी सिनेमा का सुनहरा दौर, लोकतंत्र में नागरिक भागीदारी की प्रेरक कहानी और कला-संवेदनाओं से जुड़ी एक निजी उपलब्धि। डॉ. किरण सूद का साइकिल पर भावपूर्ण पुनर्स्मरण हमें उस समय में ले जाता है जब साइकिल केवल यातायात का साधन नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, आज़ादी और फैशन का प्रतीक थी। उसके बाद साइक्लॉथॉन 2025 का वृत्तांत यह विश्वास जगाता है कि यदि नेतृत्व प्रतिबद्ध और सहभागी हो, तो जनजागरूकता के अभियान केवल ‘औपचारिक कार्यक्रम’ न रहकर जनांदोलन बन सकते हैं। डॉ. पुरुषोत्तम का स्वयं साइकिल चलाकर प्रतिभागियों के साथ बीस किलोमीटर तय करना निश्चय ही प्रशासनिक सक्रियता और जन-संवाद का सशक्त उदाहरण है।
विशेष रूप से, ‘कला-वीथिका’ खंड में जिस आत्मीयता से डॉ किरण सूद जी ने मेरी कलाकृति ,चित्रकला-यात्रा, प्रेरणा-स्रोत और पुरस्कार का उल्लेख किया है, उसके लिए मैं हार्दिक आभार व्यक्त करती हूँ
यह मेरे लिए केवल एक व्यक्तिगत सम्मान नहीं, बल्कि गाँव की गलियों, भित्तिचित्रों और सहज ग्रामीण संस्कृति के प्रति मेरे ऋण का स्मरण भी है। साइकिल पर सवार माँ-बेटी का चित्र वास्तव में पर्यावरण और स्त्री-सशक्तिकरण—दोनों का संदेश देने का प्रयास था और यह देखना सुखद है कि उस भाव को आपने इतनी आत्मीयता से पाठकों तक पहुँचाया गया है।
इस पूरे आलेख में साइकिल एक धागे की तरह सबको जोड़ती है स्मृति, समाज, संस्कृति, स्वास्थ्य, पर्यावरण और लोकतंत्र। यह न केवल नॉस्टेलजिया जगाता है बल्कि भविष्य के लिए एक सक्रिय और सुंदर जीवनशैली का आह्वान भी है।इस सारगर्भित आलेख के लिए डॉ किरण सूद जी बधाई की पात्र हैं ।
आभार सहित… पारुल तोमर
मेरी प्यारी किरण दी का आलेख समय निकालकर ध्यान से पढूंगा…
यह भी एक संयोग है बहन साइकिल पर लिख रहीं है और भाई तांगे पर लिख रहा है ।
किसी ने सच ही कहा है एक स्थान जो घटनाएं हो रहीं होती है , ठीक उसी तरह की हूबहू घटनाएं दूसरी जगह हो रहीं होती है। विज्ञान अभियंत्रण का भी विद्यार्थी होने के कारण हमें लगता है जब दो लोगों का फ्रीक्वेंसी मैच कर जाता है, दोनों दो अन्य स्थान पर होते हुए उनके जीवन में समान घटनाएं होने लगती है।
किरण दी आप जहां भी रहें पूर्ण स्वस्थ रहें,खूब प्रसन्य रहें ।
सुमंगल कामनाएं
पुरवाई परिवार के सभी बहनों एवं भाइयों को इस श्री शिव शंकर का प्रणाम एवं हार्दिक स्नेह
आदरणीया डॉ किरण सूद जी ,
आपका यह आलेख पढ़ते हुए जैसे एक ही फ्रेम में तीन अलग-अलग परतें खुलती चली गईं—हिन्दी सिनेमा का सुनहरा दौर, लोकतंत्र में नागरिक भागीदारी की प्रेरक कहानी और कला-संवेदनाओं से जुड़ी एक निजी उपलब्धि। डॉ. किरण सूद जी का साइकिल पर भावपूर्ण पुनर्स्मरण हमें उस समय में ले जाता है जब साइकिल केवल यातायात का साधन नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, आज़ादी और फैशन का प्रतीक थी। उसके बाद साइक्लॉथॉन 2025 का वृत्तांत यह विश्वास जगाता है कि यदि नेतृत्व प्रतिबद्ध और सहभागी हो, तो जनजागरूकता के अभियान केवल ‘औपचारिक कार्यक्रम’ न रहकर जनांदोलन बन सकते हैं। डॉ. पुरुषोत्तम का स्वयं साइकिल चलाकर प्रतिभागियों के साथ बीस किलोमीटर तय करना निश्चय ही प्रशासनिक सक्रियता और जन-संवाद का सशक्त उदाहरण है।
‘ कला-वीथिका’ खंड में जिस आत्मीयता से आपने (डॉ किरण सूद जी )मेरी कलाकृति ,चित्रकला-यात्रा, प्रेरणा-स्रोत और पुरस्कार का उल्लेख किया है, उसके लिए मैं उनकी हार्दिक आभार व्यक्त करती हूँ। यह मेरे लिए केवल एक व्यक्तिगत सम्मान नहीं, बल्कि गाँव की गलियों, भित्तिचित्रों और सहज ग्रामीण संस्कृति के प्रति मेरे ऋण का स्मरण भी है। साइकिल पर सवार माँ-बेटी का चित्र वास्तव में स्त्री-सशक्तिकरण के साथ-साथ पर्यावरण का संदेश देने का प्रयास था और यह देखना सुखद है कि उस भाव को आपने इतनी आत्मीयता से पाठकों तक पहुँचाया गया है।
इस पूरे आलेख में साइकिल एक धागे की तरह सबको जोड़ती है स्मृति, समाज, संस्कृति, स्वास्थ्य, पर्यावरण और लोकतंत्र। यह न केवल नॉस्टेलजिया जगाता है बल्कि भविष्य के लिए एक सक्रिय और सुंदर जीवनशैली का आह्वान भी है।
इस आलेख के लिए डॉ किरण सूद जी एवम् पुरवाई पत्रिका की सम्पादकीय टीम को बहुत-बहुत बधाई एवं शुभकामनाएँ ।
…आभार सहित
पारुल तोमर
महत्वपूर्ण आलेख । ध्यान से पढ़ना बाक़ी है ,बहुत रोचक