Wednesday, February 11, 2026
होमकहानीसरस दरबारी की कहानी - चाक

सरस दरबारी की कहानी – चाक

सुमित्रा ने घड़ी पर नजर डाली। शाम के 5.30  बजा रही थी। चलो, समय से घर पहुँच गयी, बच्चे आते ही होंगे। जल्दी से चाय चढ़ा दूँ। पानी चढ़ा वह पकौड़ों के लिए बेसन घोलने लगी। 
सुबह के निकले हैं। न कायदे से खाना न पीना, यह भी कोई जिंदगी है। भला क्या जरूरत है इतना खटने की। तीन लोगों की गृहस्थी में खर्च ही कितना है, पर पता नहीं सुबह होते ही भागते हैं दोनों। और शाम तक थक कर चूर…! पर मेरी सुनते कहाँ हैं। 
अपनी छोटी सी दुनिया में तीनों बहुत खुश थे। 
पिता के जाने के बाद, आशीष माँ का बहुत ध्यान रखने लगा था। वह जानता था पापा के बाद माँ का समय कितनी मुश्किल से कटता होगा। अकेले में अक्सर याद करता, कितना व्यस्त रखते थे माँ को दिनभर और जब से रिटायर हुए, यह हाल था, कि माँ ज़रा सी देर को भी ओझल हो जातीं, तो घर भर में आवाज देते फिरते, 
“ अरे कहाँ हो भाई,” और मैं हँसकर माँ से कहता “जाओ, खोज रहे हैं तुम्हें।” 
“हद करते यह भी, जैसे जैसे उम्र बढ़ रही है, बच्चा होते जा रहे हैं। आ रही हूँ” कहते तेज़ कदमों से माँ बढ़ जातीं। “अरे बगिया में थी। लौकी की बेल पर, कितनी ढेर सारी बतिया बतिया लौकियाँ लगीं हैं, बस वही देख रही थी।”
“इतनी देर से ढूँढ रहा हूँ तुम्हें”। 
“आप भी बिल्कुल बच्चे बन जाते हैं। कहाँ जाऊँगी। रहूँगी तो आस पास ही न।” 
“हाँ तो ठीक है, बस बताकर जाया करो, ताकि मुझे पता रहे कहाँ हो। खोजना न पड़े तुम्हें।” 
“अच्छा भाई, आगे से बताकर जाऊँगी, ठीक है। बच्चों से गए गुजरे हो।” 
 और वह कुछ झुककर, कुछ आशिक़ाना अंदाज़ में मुस्कुरा कर कहते,
“हूँ जैसा तुमने कर डाला,” और दोनों हँस पड़ते। पापा बच्चन जी के  फैन थे। उन्हें निशा निमंत्रण, मधुशाला पूरी तरह रटी हुई थी। और उनसे सुन सुनकर, माँ को भी पूरी की पूरी, रट गईं थी।
दोनों अपनी दुनिया में मस्त रहते। हर शनिवार रात देर तक देव आनंद के पुराने गीत या मेहँदी हसन की ग़ज़लें  सुनते। 
पापा अपने पसंदीदा शेरों को साथ साथ गाते, और एक ही बात कहते, 
“यार यह शायर हमारे मन की बात कैसे जान जाते है। हूबहू लफ्ज़ ब लफ्ज़ कह देते हैं। कमाल है।  देखो कितना खूबसूरत शेर है  
मैं तसव्वुर भी जुदाई का भला कैसे करूँ,  मैंने किस्मत की लकीरों से चुराया है तुझे।
प्यार का बनके निगहबान तुझे चाहूँगा, मैं तो मरकर भी मेरी जान तुझे चाहूँगा।
यह उनकी पसंदीदा गजल थी। “मेरे ही शब्द हैं, उधार के हुए तो क्या” वे मुस्कुराकर कहते।
माँ इस बात से कितनी पुलकित होती थीं, मैं जानता था। बहुत प्यार करते थे माँ को। जन्मदिन हो या एनिवर्सरी, हफ्ते भर पहले से तैयारियों में जुट जाते। माँ से छिपाकर, मेरे साथ कुछ प्लान कर रहे होते, तो उनके कमरे में आते ही दूसरे काम में जुट जाते। और मज़े की बात यह है कि सारे इंतजाम वह अंत तक छिपा भी ले जाते, और फिर ईव पर, रात को ठीक 12 बजे, माँ को सरप्राइज़ देते।
एक बार मुझे शक हुआ, कि माँ को कुछ भनक लग गई थी, पर फिर भी वह अंजान बनी रहीं। पापा का मजा किरकिरा जो नहीं करना चाहती। दोनों जैसे एक दूसरे के लिए ही बने थे। खूब लड़ाइयाँ भी होतीं दोनों में। हफ्ते हफ्ते बातचीत बंद रहती। पर फिर भी रहते दोनों एक ही कमरे में। साथ में बैठकर चाय भी पीते। पर बातचीत नहीं होती। छिप छिपकर कनखियों से देखते एक दूसरे को। जब एक देख रहा होता तो दूसरा जानबूझकर दूसरी ओर देखता रहता। बिल्कुल बच्चों जैसी हरकतें। और मेरी आफत होती। दोनों मुझ ही पकड़ते। 
“जाओ कह दो अपनी माँ से मेरा डिनर बाहर है।”
“जाओ कह दो अपने पापा से खाना बन गया है, पहले बताना चाहिए था।” 
कुछ ढूँढ रहे होते तो झुँझलाकर कहते, “कह दो उनसे मेरी चीज़ें न छुआ करें, सफाई के नाम पर सारा सामान तितर बितर कर देती है”
“हाँ हाँ मुझे भी शौक नहीं, बहुत काम हैं मेरे पास, सारा घर फैलाकर रख छोड़ा है, कह दो अपना सामान खुद ही जगह पर रखा करें, जिससे ‘वक़्त’ पर मिल जाए।” और मैं शटल कॉक की तरह इधर से उधर उछाला जाता। 
पापा माँ के जीवन की धुरी थे। और फिर सर्जरी के उस मनहूस निर्णय ने उन्हें हमसे छीन लिया। अच्छे खासे हँसते हुए गए थे, “बस हफ्तेभर में लौट आऊँगा।” हाँ लौटे थे वे। शीशे की ‘शव-पेटिका’ में। बर्फ से ठंडे। माँ ने जब रातभर के इंतज़ार के बाद डॉक्टर ने आकर उन्हें वह मनहूस खबर दी थी, तब पता नहीं कैसे ज़ब्त किया होगा माँ ने खुदको। वह रोई नहीं थीं। वह तब भी नहीं रोई थीं, जब मौसी को खबर हुई और वह दहाड़ मारकर रोई थीं, “दीदी जीजाजी नहीं रहे”। माँ ने केवल पीठ सहलायी थी उनकी। फिर अपना फोन उठाया और लोगों को खबर करनी शुरू कर दी थी। “वे नहीं रहे।” हर तरफ रोना धोना मच गया था। जहाँ जहाँ खबर पहुँची, मातम छा गया। लोगों के आँसू रुक नहीं रहे थे। माँ तब भी नहीं रोई थीं। 
हाँ जब मैं दूसरे दिन पहुँचा था पापा को मोर्चरी से निकलवा वापस एम्बुलेंस में घर ले जाने के लिये, तब पहली बार मेरी छाती से लग, वह बांध फट पड़ा था। तब एक बच्चे सी, मुझसे लिपटकर, हिलक हिलककर रोयी थीं माँ। नहीं भूल सकता वह पल, जो किसी तेज़ नोक से गुद गया है भीतर,  जिसकी पीड़ा आज तक महसूस करता हूँ। क्योंकि माँ को रोता देख,  रोक लिये थे मैंने अपने आँसू। 
पापा के जाने के बाद माँ बहुत अकेली हो गईं थीं। बुझ गई थीं। जो चेहरा हमेशा खुशी से दमकता रहता था, पापा के प्यार से दिपदिपाता रहता था, एकदम बुझ गया था, मानो उसका सारा रस, सारा तेज, सोख लिया हो नियति ने। तभी मैंने तय कर लिया था,  माँ को कभी अकेला नहीं छोड़ूँगा। 
जब वह मेरे विवाह के लिए चिंतित रहने लगीं तो एक आशंका मन में पैठ गई, अगर मेरी संगिनी मुझ जैसी न हुई तो कैसे संभाल पाऊँगा मैं माँ को। मैं उन्हें किसी हाल में दुखी नहीं देख सकता था। इसलिए मैंने  निर्णय माँ पर छोड़ दिया। 
“माँ तुमसे बेहतर मुझे कोई नहीं जानता। इसलिए मेरे लिए उपयुक्त साथी तुम ही चुनोगी। मुझे पता है, तुमसे बेहतर चॉइस मैं भी नहीं कर सकता।” और निशा को चुनकर माँ ने, हम सब का जीवन संवार दिया था। 
मैं और निशा दोनों सुबह निकल जाते और शाम को घर लौटते। माँ दिनभर अकेली रहतीं। कभी कभी समय निकालकर हालचाल पूछ लेता, पर वह प्रैक्टिकल नहीं था। उनका व्यस्त रहना जरूरी था। हमने उन्हें सलाह  दी, “ माँ दिनभर घर में अकेले बोर हो जाती होगी, ज़रा निकला करो। इस बिल्डिंग में ही तुम्हारी उम्र की बहुत सारी महिलाएँ हैं, उनसे मिलो, थोड़ा समय कटेगा, थोड़ा माहौल बदलेगा। नए चेहरे देखोगी, नए लोगों से मिलोगी, अच्छा लगेगा। तुम तो शुरू से ही कितनी उद्यमी, कितनी महत्वाकांक्षी थीं, कितनी टैलेंटेड थीं।  अपनी प्रतिभा को उड़ान दो। बहुत कुछ करना चाहती थीं, जो पापा की वजह से नहीं कर पायीं, अब मौका मिला है, अपनी तरह से अपना जीवन जियो।”
माँ को सलाह पसंद आई। उनके अंदर अब भी वह ज़िंदादिल स्त्री मौजूद थी। कुछ संकोच के बाद उन्हें मज़ा आने लगा। वे एक विमेंस क्लब से जुड़ गईं, जहाँ जिम्मेदारियों से मुक्त, उन्हीं की हम उम्र महिलाएँ, अपने लिए जीती थीं। कभी पिकनिक, कभी किटी, तो कभी समाज सेवा। कभी व्यंजनों के स्टाल लगाना और सारी आमद चैरिटी में दे देना। मोहल्ले के लोगों से पुराने कपड़े इकट्ठा कर, अनाथाश्रम और वृद्धाश्रमों में जाकर बाँटना। माँ को यह जीवन रास आ गया और हम उनकी तरफ से निश्चिंत हो गए। हम लोगों के निकल जाने के बाद माँ भी अपनी गतिविधियों में व्यस्त हो जातीं। पर जहाँ भी होतीं, हमारे पहुँचने से पहले घर पहुँच जातीं। 
आज जब पहुँचे, तो दरवाजे के बाहर ही प्याज के पकौड़ों की खुशबू ने स्वागत किया।
“माँ क्या परफेक्ट टाइमिंग है तुम्हारी।  रोज इधर हमारी एंट्री होती है और उधर तुम्हारी चाय तैयार, और आज तो गरमा गर्म पकोड़ों की खुशबू, अहा…हा,  बाहर तक आ रही है।” 
“तुम लोगों की टाइमिंग भी तो परफेक्ट है, ठीक 6 बजकर 10 मिनट पर तुम लोग हाजिर हो जाते हो। बस उसी हिसाब से चाय चढ़ा देती हूँ।” और तीनों खिलखिला कर हँस पड़े। 
“माँ तुम चाय निकालो, बस मुँह हाथ धोकर अभी आया, बहुत भूख लग रही है।” 
चाय पीते पीते ऑफिस की बातें होती रहीं। 
“और बताओ माँ, तुम्हारी समाज सेवा कैसी चल रही है,” मैंने पूछा। 
“बढ़िया बेटा, अगले इतवार एक चैरिटी  प्रोग्राम है, उसमें हम लोग स्टॉल लगा रहे हैं। मैं सोच रही हूँ चाट का स्टॉल कैसा रहेगा?”  
“अरे माँ कमाल का आइडिया है, फिर तो सारी भीड़ तुम्हारे ही स्टॉल पर रहेगी। तुम्हारे हाथ की चाट के आगे सब फ़ेल हैं। अच्छा माँ थोड़ा ऑफिस का काम निबटा लूँ, कल प्रेजेंटेशन देनी है।”  
“चलिये माँ, खाने की तैयारी कर लेते हैं,” निशा बोली।  
“क्यों बेटा तुम नहीं थकीं?” 
“अरे मिलकर कर लेंगे माँ, काम जल्दी निबट जाएगा, फिर तो खाकर सोना ही है।” 
“बेटा सारा खाना तैयार है बस रोटियाँ बननी हैं वह जब खाने बैठेंगे तो गर्म गर्म बन जायेंगी। जाओ तुम भी थोड़ी देर आराम कर लो।”
“पक्का माँ?”
“हाँ बेटा,पक्का,” कहकर उसने निशु का माथा चूम लिया। 
सुमित्रा अपनी छोटी सी दुनिया में बहुत खुश थी। ख्याल रखनेवाला बेटा, बेटी जैसी बहू। आशीष उसका बहुत ख्याल रखता था, छोटी से छोटी बात उससे पूछकर करता । निशा भी उसकी हाँ में हाँ मिलाती। उसने बेटे के विवाह के बाद, कई घर बिखरते देखे थे , पर वह खुश थी कि उसके बेटा और बहू उसका कितना ख्याल रखते हैं। कभी कभी सोचती आशीष ने मजबूती से न संभाला होता तो टूटकर बिखर गई होती मैं। पति की तस्वीर से अक्सर बतियाती, “कभी सोचा न था, तुम्हारे जाने के बाद मैं जी भी पाऊँगी। पर देखो, उसने न केवल मुझे संभाला, बल्कि जीने के लिए प्रेरित कर, जीजीविषा जगाई मेरे भीतर, और क्या माँगूँ ईश्वर से।” 
रात का भोजन हो चुका था। तीनों लिविंग रूम में बैठे बतिया रहे थे। तभी आशीष बोला, 
माँ सोच रहा हूँ, इस बार दीवाली पर घर पेंट करवा लें। कैसा रहेगा, पिछले चार सालों से यही रंग देख मन ऊब गया है।” 
“बहुत ही नेक ख्याल है बेटा, साथ ही पर्दे भी बदलवा लेंगे, वह भी तो पेंट के साथ मैच करते हुए होने चाहिए।” 
“एब्सल्यूट्ली….! बताओ माँ कौनसा रंग ठीक रहेगा?” 
“हल्का क्रीम कैसा रहेगा? निशा तुम बताओ तुम्हें कौनसा रंग पसंद है।” 
“जो आपको पसंद हो माँ।” 
“अरे यह क्या बात हुई, तुम भी बताओ।” 
“मैं सोच रही थी बेडरूम में हल्का मौव, बहुत सुंदर लगेगा, वैसे भी वहाँ कम रोशनी हो तो सही रहता है। मुझे यह रंग बहुत पसंद है।”
“क्या निशा, हर कमरे में अलग अलग रंग, बहुत चीप लगता है। पूरा घर एक रंग में हो तो क्लासिक लुक आती है। मेरे हिसाब से तो क्रीम ही सही रहेगा।” 
“अरे यह क्या बात हुई, उसका मन है मौव का तो वही लगेगा। वह भी बहुत प्यारा रंग है बेटा, अच्छा लगेगा।” 
“नहीं माँ मैंने सोच लिया, क्रीम ही लगेगा। अब इसमें कोई डिस्कशन नहीं होगा।” 
सुमित्रा को आशीष का यूँ निशा की बात को खारिज करना अच्छा नहीं लगा। निशा भी कुछ उदास लगी थी उसे।  
उस रात जब वह सोने जा रही थी, तभी आशीष के कमरे से कुछ ऊँची आवाज़ें सुनाई दीं। वह उनके कमरे की तरफ बढ़ी ही थी, कि कुछ सुनकर ठिठक गई। दोनों में किसी बात को लेकर बहस हो रही थी।
हर बात में माँ की ही सलाह लेते हो, जैसे मेरी पसंद ना पसंद तो तुम्हारे लिए कोई मायने ही नहीं रखती।”
“यह क्या कह रही हो निशा, माँ बड़ी हैं, उनकी राय लेंगे तो उन्हें अच्छा लगेगा।”
“वह ठीक है आशीष पर मेरी भी तो कुछ इच्छाएँ हैं। कभी मेरी चॉइस भी पूछ लिया करो। हर बात में तुम वही करते हो जो माँ चाहती है। माँ यह चाहती है, ऐसा करो, माँ को बुरा लगेगा यह न करो, कभी ऐसी बात भूले से भी न हो, जिससे माँ का दिल दुखे। और तुम जानते हो, मैं भरसक इस बात की कोशिश करती हूँ, की मुझसे कभी ऐसी कोई बात न हो, जिससे माँ को कोई ठेस पहुँचे, या उनका दिल दुखे। जानते हो न? पर तुम्हें मेरा कभी ख्याल नहीं आता, की आज निशा के मन का कर लें। क्या मेरा मन नहीं रख सकते कभी? मेरी पसंद न पसंद कोई मायने नहीं रखती तुम्हारे लिए।”
“निशु यह क्या हो गया है तुम्हें, ऐसा कबसे सोचने लगीं। मैं तो समझता था, कि हमारी सोच हमेशा एक रहेगी, खास तौर पर माँ को लेकर।
“आशीष कभी कभी बहुत गौण महसूस करती हूँ।” 
“निशु तुम्हारा दिल दुखाने की मेरी मंशा बिलकुल नहीं है, यह तुम भी जानती हो। पर हम माँ को छोटी छोटी  खुशियाँ तो दे सकते हैं न। माँ के लिए तुमने ऐसा कैसे सोच लिया। जान छिड़कतीं हैं वह तुम पर।”
“ आई एम सॉरी आशीष, आई एम रियली सॉरी। मुझे ऐसे नहीं सोचना चाहिए था।”
सुमित्रा वहाँ से चुपचाप चली आई। रातभर वह बिस्तर पर पड़ी सोचती रही। ठीक ही तो कह रही थी निशु। यह बात मेरे दिमाग में क्यों नहीं आयी। मैं तो अपना जीवन अपने हिसाब से जी चुकी। अपनी मर्ज़ी से अपनी गृहस्थी चलायी। छोटा बड़ा हर निर्णय अपने मन से लिया। यह उसकी गृहस्थी है, और वही मन मारकर रहे। उसके भी बहुत से अरमान होंगे। बच्चे मेरी हर खुशी का ख्याल रखते हैं और मैं उनके बीच कलह की वजह बन गई। कैसे इतनी खुदगर्ज़ हो गई मैं। चाक बनकर जिस घड़े को ढाला, उसी में धचक लगा दी। नहीं यह सही नहीं हो रहा। निशा के मन में अगर यह ख्याल आया है, तो इसमें गलती मेरी है। मुझे कुछ सोचना होगा। 
अगले दिन छुट्टी थी। सब साथ बैठे नाश्ता कर रहे थे। तभी सुमित्रा बोली, “बच्चों बहुत दिनों से एक बात सोच रही थी। यह तो मानते हो कि मेरी उम्र हो गई है। और यह भी जानते हो कि मुझे घूमने का, कितना शौक था, पर तुम्हारे पापा घूमने के मामले में उतने ही आलसी थे। न खुद घूमे न कभी मुझे घूमने दिया। जहाँ जाओगी साथ चलेंगे। वे तो हाथ छुड़ाकर, अकेले ही चल दिये। अब सोच रही हूँ कि अपना शौक पूरा कर लूँ। अभी हाथ पैर चल रहे हैं। समय आ गया है, अपनी यह इच्छा भी पूरी कर लूँ। बहुत संभाल ली अपनी गृहस्थी, अब मुझे इस जंजाल से मुक्त करो। निशु अब तुम संभालो बेटा, अपनी गृहस्थी, और मेरे इस बिगड़ैल बेटे को। कब तक माँ का पल्लू थामे रहेगा। मेरा भी फ्रेंड सर्कल है। हम लोग थोड़ा घूम फिर लें, अपने शौक पूरे कर लें, क्यों ? तुम दोनों को कोई ऐतराज तो नहीं।” 
“नहीं माँ यह तो बहुत अच्छी बात है। पर यूँ ऐसे अचानक, पहले कभी कोई ज़िक्र नहीं किया?” आशीष हकलाया। 
“लो कर लो बात। अरे भाई, प्रोग्राम तो ऐसे अचानक ही बनते हैं। बस मन में आ गया।” 
“अब तुम्हारा दिमाग बदले, उसके पहले अपनी तैयारी कर लूँ।” सुमित्रा बोल रही थी, और दोनों कनखियों से एक दूसरे को देख रहे थे। मन में एक ही प्रश्न, “कहीं माँ ने कल रात की बातें सुन तो नहीं लीं।” 
पर सुमित्रा की सुकून भरी मुस्कुराहट और हौसला देख, दोनों आश्वस्त हो गए। 
सुमित्रा खुश थी, उसने अपने मिट्टी के घड़े को टूटने से बचा लिया था।


RELATED ARTICLES

4 टिप्पणी

  1. प्रिय सरस!
    तुम्हारी कहानी पढ़ी “चाक”!
    काफी करुण लगी।

    वास्तव में यह कहानी जीवन के उस विशेष संदर्भ की ओर संकेत करती है कि परिवार में जब सब साथ रहते हों, विशेष तौर से बेटा और बहू,तो कभी-कभी निर्णय लेते समय विशेष तौर से बेटे को अपनी पत्नी के मश्वरे का भी सम्मान करना चाहिये। जबकि माँ इस को बेहतर समझती है। और वह बेटी के साथ-साथ नौकरी पेशा बहू का भी उतना ही ध्यान रखती है।

    एक लंबे समय का साथ दांपत्य जीवन में पति-पत्नी को इतना करीब ले आता है कि दोनों को ही एक दूसरे की आदत हो जाती है। निकटता इतनी अधिक हो जाती है कि कल्पना में भी नहीं होता कि अगर दोनों में से कोई एक साथ छोड़ दे तो दूसरे का जीवन किस तरह से बीतेगा?

    अपने आप को अधिक से अधिक काम में व्यस्त कर लेना ही ध्यान को भटकाने का साधन रह जाता है।
    घर के बड़े होने के नाते बच्चों से कुछ कह भी नहीं पाते। सामंजस्य स्थापित करने में वक्त लगता है।
    माता-पिता में से किसी एक का साया भी सिर से हटने पर बच्चे दूसरे के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते हैं। विशेष और अधिक ध्यान रखने लगते हैं।
    पति के बाद माँ की जिंदगी बच्चों में बस जाती है।
    आशीष एक बेहद संवेदनशील बेटा है।उसे माँ का पिता के साथ गुजारा हुआ समय याद रहता है। पहले की तुलना में माँ के प्रति अधिक सजग और सचेत हो जाता है, यहाँ तक कि अपने लिए पत्नी ढूँढने का काम भी माँ को सौंप देता है।

    निशा एक समझदार बहू है। सुमित्रा जितना बेटे का ध्यान रखती है उतना ही अपनी बहू निशा का भी रखती है।
    यह महसूस होता है शाम की पूरी तैयारी करके जब बहू और बेटे दोनों नौकरी से साथ लौटते हैं। तो वह चाय के बाद बेटे के साथ ही निशा को भी आराम करने के लिए कहती है।

    दिवाली पर जब आशीष घर को पेंट करवाने की बात होती है तो पर्दे बदलने की चर्चा पर सहमति होती है।
    यद्यपि सुमित्रा ने क्रीम कलर कहा था किंतु प्रश्नवाचक में कि कैसा रहेगा?उसने निशा से भी उसकी राय पूछी।
    वह भी मन की सहमति से सहमत थी लेकिन माँ के आग्रह पर वह कहती है
    “मैं सोच रही थी बेडरूम में हल्का मौव बहुत सुंदर लगेगा।वैसे भी वहाँ कम रोशनी हो तो सही रहता है ।मुझे यह रंग बहुत पसंद है।
    पर आशीष माँ की पसंद पर मोहर लगा देता है।

    रात के समय कमरे में उन दोनों की बीच में बातचीत होती है।निशा को थोड़ा सा बुरा लगता है।आशीष बहुत प्यार से निशा को समझाता है की माँ को छोटी-छोटी खुशियाँ तो दे सकते हैं। निशा को अपनी गलती महसूस होती है। वह माफी भी माँगती है।

    सुमित्रा उनकी बातचीत सुन लेती है।
    उसे अपनी गलती समझ में आती है कि वह अपनी जिंदगी जी चुकी है तो फिर निशा को भी अपने हिसाब से उसकी जिंदगी जीने देना चाहिये ।उसे खुदगर्ज नहीं बनना चाहिये। वह बात ही बात में अपनी समझदारी दिखाते हुए फ्रेंड सर्कल के साथ घूमने जाने का बहाना बनाती है।
    इस तरह वह अपने उसे चाक को बचा लेती है जिस पर उसने परिवार रविवार रूपी घड़े को बनाया था। वह टूटने से बच जाता है।

    कहानी काफी प्रेरणास्पद भी है।
    अक्सर देखा गया है कि महिलाएँ ही महिलाओं की दुश्मन होती हैं। किंतु घर की प्रधान महिला समझदारी से निर्णय लेने में समर्थ हो तो घर का प्रेम बना रहता है और कलह से तो मुक्त रहता ही है टूटने से भी बच जाता है।
    एक बेहतरीन कहानी के लिए बहुत-बहुत बधाई तुम्हें प्रस्तुति के लिए तेजेन्द्र जी का शुक्रिया पुरवाई का आभार।

  2. धन्यवाद दी। आपने इतने मनोयोग से टिप्पणी की, वाकई लिखना सफल हो गया। कहानी के मर्म में रिश्तों की ऊष्मा सर्वोपरि है। वह एक ऐसा तार है जो रिश्तों को बांधे रखता है। यही अनमोल है।
    आपने कहानी पर इतने विस्तार से अपनी बात रखी, वाकई बहुत खुशी हुई पढ़कर।
    स्नेह बनाए रखियेगा..

  3. बहुत सुन्दर और सरल कहानी लिखी है आपने। मैं नीलिमा जी बराबरी तो नहीं कर सकता हूं किंतु यह जरूर कहूंगा कि आपकी कहानी मन छु लेती है।

  4. कहानी ने मन को छुआ।
    प्रौढ़ होते युगल की चर्चा ने मेरे मन को अतीत में खड़ा कर दिया। और बिछड़ने के बाद जीने की कोशिश मानो मेरे वर्तमान को ब्याँ कर दिया।
    बधाई हो सरस जी

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Most Popular

Latest