Friday, June 21, 2024
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शैली बक्षी खड़कोतकर की कहानी – सुनो नीलगिरी….!

क्या नामों में खुशबू होती है…? लिफाफे के दाहिने कोने पर सुंदर अक्षरों में लिखा…. नीरा…नीलगिरी-सा महक रहा है| महकते झोंके पर सवार मैं उड़ा चला जा रहा हूँ, अपनी पसंदीदा जगह की ओर, क्योंकि यह खत मैं वहीं पढना चाहता हूँ, जहाँ यह कहानी शुरू हुई है….. झूमते नीलगिरी और खिलते बोगनविलिया के बीच| जितना तेज मैं चल रहा हूँ, उससे भी तेज मन दौड़ रहा है, पीछे|
यादों की पोटली खुलकर, नीलगिरी के सूखे पत्तों और पीली टोपियों की तरह बिखर गई है…..| 
घुंघराले बालों वाला मासूम बच्चा सामने आ खड़ा हुआ है…. खूब बोलने, खुलकर हँसने और बुक्का फाड़कर रोने वाला बच्चा….. बात-बात पर झिड़की खाने वाला बच्चा….   
“दिनभर हल्ला मचाए रहते हो….? थोड़ा चुप भी रहो|”
“लड़के होकर रोते हो…. चुप….बिलकुल चुप….|”
“बड़ों से बहस नहीं करते…. चुप करो|”
चुप ….चुप ….और चुप…..! 
एक हँसते-बोलते बच्चे की जिंदगी में चुप ने कदम रख दिया, चुपके से| किसी को पता भी नहीं चला कि  बच्चे की लम्बाई और चुप्पी की गहराई बराबर अनुपात में बढ़ रही थीं और एक दिन वह चुप्पी के गर्त में समा गया, पूरा का पूरा| मन के किवाड़ पर चुप्पी का मोटा ताला जड़ गया और उस पर एक स्माइली चिपक गया| जबकि कितनी बातें थीं कहने को…… माँ को बताना था कि तुम्हारी गुलाबी छींट वाली साड़ी गुम नहीं हुई है, वो मैंने छुपाई है| उसे ओढकर सोता हूँ, कभी-कभी| जब तुम्हारी गोद में सर रखने का मन होता है न, तब| पापा से पूछना था कि मैनेजमेंट की जगह लिटरेचर पढूं तो उन्हें दुःख तो नहीं होगा? भाई से लड़ना था, बचपन की तरह, कि नहीं हूँ मैं तेरी तरह स्मार्ट और प्रैक्टिकल, सब कम्पेयर करते हैं तब नहीं, लेकिन तू मजाक बनाता है तो बुरा लगता है| क्लास में जिसे सब मोटी कहकर चिढ़ाते थे, उस प्यारी गदबदी लड़की से कहना था कि जब वो हँसती है तो उसके सुर्ख गालों पर जवांकुसुम खिलते हैं| पर नहीं कह सका ……अनकही बातों की परतें जमा होती गईं| माँ ने हाथ बढाया था पर सबने रोक दिया …..दुनियादारी सीखने दो, खाने दो ठोकर, ठीक हो जाएगा| मोम मत बनाओ उसे, लड़का है, फौलाद बनाओ| 
मैं भी कोशिश कर रहा था, पिघलते मोम को फौलाद में बदलने की| सोचता कि अगली दफे जिंदगी कोई टेढ़ा सवाल रखे, तो मुहँतोड़ जवाब दूँगा लेकिन इम्तेहान का वक्त आता तो भावनाएँ बिखरने लगतीं, शब्द नहीं सूझते, क्रम गडबडाने लगता और हमेशा की तरह पन्ने कोरे छोड़ कोने में खामोश खड़ा रह जाता| घबराए दिल, भर्राए गले से, आंसुओं को थामे जिंदगी की मार्कशीट में फिर एक बार ‘फेल’ लिखा देखता और चुप्पी के फौलाद के भीतर पिघलते मोम से मन पर एक और छाला उभर आता| 
दुनियादारी का सबक सीखाने जिस महानगर और मैनेजमेंट की जिस पढाई को मुफीद माना गया था, उस तेज तर्रार, भागती-दौड़ती दुनिया में मैं अजनबी था, एकदम मिसफिट| मुझे न यह शहर रास आ रहा था, न पढाई| अनमने-से पढ़ने की कोशिश जाया हो जाती और दोस्ती की भी| चुप की दीवारें परत दर परत मोटी होती जा रही थीं| कॉलेज का वह विशाल परिसर काफी भव्य था, आलिशान इमारतों के साथ सजे- संवरे लॉन, ऑडिटोरियम, कैफेटेरिया…. हर कोना विद्यार्थियों की हंसी-ठहाकों से गुलजार रहता| आखरी इमारत लाइब्रेरी थी जो मेरी दूसरी पसंदीदा जगह थी क्योंकि वहाँ कोर्स के अलावा साहित्य की ढेर सारी किताबें थीं| सख्त-मिजाज लाइब्रेरियन मैडम ज्यादातर कंप्यूटर पर व्यस्त होतीं, जो किताब चाहिए हो, उसका नाम कंप्यूटर पर खोजतीं, अपनी सहायक को पढ़वाती और शोख हंसी वाली वह फुर्तीली लड़की चंद सेकंड में किताब के साथ हाजिर होती| मेरे ख्याल से वह इंटर्न थी| हमारे बीच कोई बात नहीं हुई, पर मुझे लगता, इस चंचल लड़की की भूरी आँखों से जैसे बातों का झरना बहता है| 
लाइब्रेरी के पिछले हिस्से में ढलान पर एक छोटा-सा उजाड़ बगीचा था| यहाँ नीलगिरी के खूब ऊंचे पेड़ों के झुरमुट थे, हल्के जामुनी फूलों के गुच्छों से लदी बोगनविलिया की बेतरतीब उगी झाड़ियाँ थीं, नीचे नीलगिरी के सूखे पत्तों और पीली टोपियों का गालिचा बिछा रहता और नीलगिरी की भीनी सुगंध के बीच दो प्रस्तर बेंच लगी थी| इंसानी हलचल से अछूती, ये थी मेरी पहली पसंदीदा जगह| इस निस्सार निस्तब्धता में कभी नीलगिरी ऐसे झूम-झूम जाते कि इनकी महकती-लरजती आवाज कानों में संगीत घोल अलौकिक शांति से भर देती और कभी भरोसेमंद दोस्त की तरह खामोशी से बस पीछे खड़े होते, हौले से सहलाकर हाल पूछते, तो लगता कलेजा खोलकर दिखा दूँ| समाधिस्थ खड़े नीलगिरी पर मानों वह लम्हा भी ठहर जाता….. यकीन दिलाता ठहराव कि कोई है जो पूरे धीरज और सुकून से सुन रहा है….. सबकुछ, बिना किसी पूर्वाग्रह के| मैं अक्सर लंच टाइम में यहाँ आया करता, खूब देर बैठा रहता, डायरी लिखता और फिर पढकर भी सुनाता| कभी कोई अनगढ़ तुकबंदी, कच्ची-पक्की कविता, ख़ुशी की फुहार या दुःख की धारा| मुझे भरोसा हो चला था कि ये नीलगिरी मेरे सबसे विश्वस्त साथी हैं, जो मुझे, मेरे मन को समझते हैं| मैंने उनसे वो सबकुछ साझा किया, जो मैं नहीं कह पाया था, माँ से, पापा से, भाई से और जवांकुसुम वाली प्यारी लड़की से….| वो मेरे इकलौते राजदार थे …..उस दिन से पहले तक मैं ऐसा ही समझता था| 
उस दिन सवेरे से पूरब में काले घने बादलों का डेरा था लेकिन आती साँझ पर सुनहरी धूप के गहने सज गए| संझा-वधु के आगमन से पहले ही आसमान सिंदूरी हो आया| प्रकृति की अनुपम रंगोली और मदहोश झूमते नीलगिरी…. मैंने पहली बार प्रेम को शब्दों में बाँधने की कोशिश की| मंत्रमुग्ध-सा पूरे भावावेश में कविता पढ़ते हुए पीछे पलटा कि लगा इस अनन्यता के बीच कोई अन्य भी है| एक नजर के गर्म स्पर्श का अनुभव हुआ, मैंने चौंककर चारों ओर देखा| बेंच के पीछे कुछ दूरी पर लाइब्रेरी की अमूमन बंद रहने वाली खिड़की खुली थी और वही लड़की झाँक रही थी, जिसकी आँखों से बातें झरती हुई लगती| नजर मिली और वह हाथ हिलाकर मुस्करा दी| मैं स्तब्ध खड़ा रहा| मुझे लगा जैसे मेरे नितांत निजी पल में किसी ने बिना इजाजत घुसपैठ कर दी हो, जैसे मेरे चुप्पी के बंद किवाड़ से चोरी-छुपे कोई भीतर उतर आया हो| वह जो मेरा एकांत था, वहाँ किसी और की भी उपस्थिति थी, कब से खुलने लगी ये खिड़की….क्या उसने मेरी सारी बातें, सारे राज सुन लिए होंगे? इस बीच कितनी बार लाइब्रेरी गया लेकिन ढीठ लड़की ने कभी कुछ कहा नहीं| खैर, मैं इतना जान रहा था कि मेरे और नीलगिरी के नाजुक रिश्ते के बीच कोई आ गया है, जो मुझे बर्दाश्त नहीं था| मैं चुपचाप लौट आया और तय कर लिया अब मैं वहाँ नहीं जाऊँगा, लाइब्रेरी से किताबें भी किसी और से मंगवा लूँगा| यह दूरी कायम करने की वाजिब वजह भी सामने थी, एक हफ्ते बाद मेरे इम्तेहान थे| मैं उन विषयों से जूझने में जुट गया, जो अब तक मेरी समझ से परे थे|  
सेमिस्टर परीक्षाओं का पहला दिन था और जैसे कि अंदेशा था, मेरा पर्चा बिगड़ गया| मैं फेल होने वाला था| जिंदगी के साथ इस बार कॉलेज की मार्कशीट पर भी बाकायदा ‘फेल’ लिखा जाएगा| मैं बिखरने लगा, सबकुछ भूलकर आ पहुँचा, अपनी पनाहगाह में| नीलगिरी के झुरमुट से छनकर आती गुनगुनी धूप और हवा की मंद थपकियों में माँ के छींट वाले गुलाबी आँचल-सा अहसास हुआ और मैं बिलख पड़ा, ज़ार-ज़ार रोता रहा, मोम पिघलकर मन की सतह पर रिसता रहा, बूंद-बूंद| जी-भर रो लेने के बाद पीठ पर वही नजर महसूस हुई….. ‘ओह, वही थी…. चाहे-अनचाहे मेरे एकांत की साझेदार|’.मैं कुछ करीब गया, सोचा, ‘आज उसने कुछ पूछा तो नहीं रोकूँगा खुद को, बाँट लूँगा अपना मन….सच…!’ पर वह निश्चल खड़ी रही, एक उदास बुत की तरह, उसकी भूरी आँखों से बातों की जगह आँसू झरते रहे| मैं पलटा और सीधे हॉस्टल के कमरे में जाकर निढाल होकर गिर पड़ा|
अगले दिन मेस से खाना खाकर बोझिल कदमों से लौट रहा था कि पीछे से किसी ने पुकारा, 
“भैया…” लाइब्रेरी वाला प्यून था “आप अभिलाष भैया हो न? ये नीरा दीदी ने दिया है, आपके लिए|” उसने जेब से एक लिफाफा निकला| 
“कौन नीरा..?”
“अरे, आप तो जानते होंगे भैया, वो इंटर्न आई थीं न लाइब्रेरी में….कल चली गईं| बड़ी अच्छी थीं भैया, स्वभाव की| भले बोल-सुन नहीं सकती थीं तो क्या, पर सबसे खूब हिलमिल गईं थीं…. है न? ये लीजिए|” लिफाफा मेरे हाथों में थमाकर वह जा चुका था|
जिंदगी के सबसे धीमे और मुश्किल पलों में अपनी यादों के गलियारों से गुजरता हुआ मैं फिर नीलगिरी के पास पहुँच चुका हूँ| मेरे चारों तरफ नीरव सन्नाटा है, नीलगिरी हठात मौन खड़े हैं, हवा जैसे बहना भूल गई है| मैंने खत खोला,
प्रिय अभिलाष,
 सबसे पहले सॉरी…| मैंने तुम्हारे एकांत में अनाधिकार प्रवेश किया, जानती हूँ, तुम्हें अच्छा नहीं लगा, शायद गुस्सा भी आया हो| लेकिन यकीन मानों, मेरा उद्देश्य तुम्हारी निजता में दखल देना कतई नहीं था| दरअसल, मुझे बचपन से आवाजों के प्रति गजब का आकर्षण रहा है| मैं सोचती, कैसी होती होगी बारिश की बूंदों की रुनझुन, पंछियों का कलरव या प्रेम की मधुर धुन? मैं आवाजें पढ़ती, आवाजें सोचती, आवाजें महसूस करने की कोशिश करती और बोलने की भी..| माँ कहती है, इसीलिए मेरी आँखे बहुत बोलती हैं…| 
जब तुम्हारा नाम लाइब्रेरी कार्ड पर देखा, कुछ अलग लगा और तुम भी, एकदम शांत और चुप| मुझे हैरानी होती कि जो बोल सकता हैं, वह बोलना नहीं चाहता और जो बोलना चाहता है, वह ….| तुम कभी कोर्स की किताबें इशू नहीं करवाते, साहित्य पढते, मेरी तरह | अकेले आते और वापस न जाकर पीछे की ओर कहीं गुम हो जाते| फिर एक दिन इसी उत्सुकता में तुम्हारे जाते ही मैं खिड़की तक आई और मेरे सामने तुम्हारी अनोखी दुनिया खुल गई, गहरे अहसासों की दुनिया| झूमते नीलगिरी, बहती हवा और बोलते हुए तुम, ये छवियाँ मेरे लिए जिंदगी की सबसे सच्ची, सबसे मोहक तस्वीरें हैं| 
शाम को काम खत्म करके मैं भी रोज उसी जगह पर जाती| वह जगह, जो गवाह थी एकतरफा संवाद की और उससे उपजे एकतरफा प्यार की| बस, संवाद और प्यार करने वाला एक नहीं था| उस निस्तब्ध वीराने में जाने क्यों तुम बातें करने लगे और जाने क्यों मैं प्यार| शायद तुम्हारे लिए बाहर शोर था और वहाँ नीरवता थी, मेरे लिए बाहर की दुनिया खामोश थी, केवल वही जगह मुखर थी| तुम शांति चाहते थे और मैं शब्द तलाश रही थी| वे शब्द, जो इतने सच्चे हो कि मेरे जीवन में अनंत तक पसरे सन्नाटे को चीरकर मुझ तक पहुँच सके| जिन्हें दुनिया सुने न सुने पर मैं सुन सकूँ| उन शब्दों की अनुगूंज मेरी पूरी जिंदगी का संगीत बन जाए| तुम्हारे जाने के बाद भी तुम्हारे शब्दों की प्रतिध्वनि सुनाई देती, मैं उस निस्तब्ध वातावरण में उठती तरंगों को छूकर उन अनसुने शब्दों को महसूस करती| प्रेम बस घटित हुआ उन क्षणों में मेरे भीतर| मुझे लगता है, प्रेम ऐसे ही होता होगा, ऐसी ही बज उठती होगी न प्रेम की शाश्वत धुन..|
उस दिन मैंने तुम्हें टूटते हुए देखा| मैं तुम्हें सांत्वना देना चाहती थी, बहुत कुछ कहना था पर….जीवन में पहली बार अपनी असहायता का अनुभव इतनी तीव्रता हुआ| फिर भी यह सब लिख रही हूँ, इसलिए नहीं कि प्रतिदान में कुछ अपेक्षा है| बल्कि इसलिए क्योंकि मुझे लगता है, कह देना चाहिए| 
सोचो, कितनी अद्भुत बात है कि तुम बोल सकते हो…..! बयाँ कर सकते हो जो चाहो, अपनी आवाज में, अपने अंदाज और अहसासों के साथ…..| इसलिए कह देना…. किसी बहुत अपने से…. या फिर बादल से, हवा से और नीलगिरी से…. मैं सुन लूँगी…. लेकिन कहना…… क्योंकि कहा जाना जरुरी है|
मधुर-मुखर स्मृतियों के लिए सदैव आभारी
                                                           -नीरा                                                                                      
मैंने खत को सहेजकर रख लिया है और दृढ़ क़दमों से लौट रहा हूँ, जिंदगी की ओर| क्योंकि मुझे माँ को गुलाबी छींट वाली साड़ी लौटानी है| ताकि जब वो पहने तो उसकी गोद में सर रख सकूँ, पापा को बताना है कि नहीं हो पाएगी मुझसे ये पढाई, मुझे साहित्य पढ़ना और पढ़ाना है, भाई को धौल जमाकर प्यार वाली लड़ाई करनी है|
और हाँ….. नीरा को बताना है कि…. मैं कहूँगा, सबकुछ…. किसी बहुत अपने से…… और बादल से, हवा से, नीलगिरी से भी …. तुम सुन लेना……..क्योंकि सुना जाना भी उतना ही जरुरी है|


शैली बक्षी खड़कोतकर
शैली बक्षी खड़कोतकर
संपर्क - shaily_157@rediffmail.com
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10 टिप्पणी

  1. शैली जी! आपकी कहानी “सुनो नीलगिरी” बहुत अच्छी लगी! भाषा शैली तो काबिले तारीफ! हमें लगता है इस तरह की कहानी लिखना आसान नहीं। बच्चों की परवरिश भी आज के समय में इतनी सरल नहीं है। किंतु बचपन को बचपन की तरह ही जीने देना चाहिए ।बहुत ज्यादा प्रतिबंध लगाना और बार-बार एहसास दिलाना कि तुम लड़के हो तो यह उचित नहीं लगता, वह करो,यह मत करो;यह ठीक नहीं।प्रतिभा कुंद होने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं।
    नीरा के चरित्र ने बहुत प्रभावित किया। कैसी विडम्बना रही कि जो बोल सकता था वह बोलता नहीं था, बोल पा नहीं रहा था और अपना चैन और सुकून नीलगिरी के नीचे एकान्त में पाता था अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करके।
    जो बोलना चाहती थी वह बोलने में असमर्थ थी।
    इस कहानी का अंत बेहद प्रभावशाली रहा। नीरा के पत्र ने भावुक कर दिया। आपकी कहानी बहुत पसंद आई। आपको बहुत-बहुत बधाई इस बेहतरीन कहानी के लिए, इसके संयोजन के लिए ,भाषा- शैली की प्रभावशाली बुनावट लिए और अंतरंग भावों को बांधों को बेहतरीन तरीके से उभारने के लिए, एक अबोली भावनाओं की कुशल अभिव्यक्ति के लिये।
    यह प्रमाण है कि एक सकारात्मक सोच किस तरह से स्वभाव को अचानक ही परिवर्तित कर देती है। जीवन अचानक ही बदल जाता है।
    इस बेहतरीन कहानी की प्रस्तुति के लिए नीलिमा शर्मा जी का बहुत-बहुत शुक्रिया। पुरवाई का आभार तो बनता ही है।

  2. मूक बधिर लड़की ,की अपनी भावनाएं,और एक लड़का जो बहुत कुछ कहना चाहता है पर भीतर दबाए बैठा रहा,दोनो की ही भावनाओ के कोमल तंतुओं को कहानी में सुंदरता से बुननेवाली लेखिका को बहुत बहुत बधाई

  3. एकदम अलग तरह की कहानी शब्दों का महत्व रेखांकित करती हुई।एक अच्छी कथा के लिए बधाई।

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