Friday, April 17, 2026
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शिवानी की कहानी – ज्यूँ घुंण काठहि खाई

वो अस्सी के दशक के शुरुआती दिन थे। उस समय भी लड़कियों के लिए शिक्षण क्षेत्र में नौकरी करना ही सबसे सुलभ और सुरक्षित माना जाता था। जो अधिक पढ़ाकू होती थीं वे कॉलेज में प्रोफेसर के पद तक पहुँचती थीं और औसत दर्जे की लड़कियों को विद्यालयीन शिक्षा क्षेत्र में ही अपना भविष्य उज्ज्वल नज़र आता था। शिक्षा के भरपूर प्रचार-प्रसार के चलते गाँव-गाँव में, दूरदराज़ के क्षेत्रों में भी सरकारी विद्यालयों की संख्या बढ़ती ही जा रही थी। उनमें शिक्षण कार्य कितना होता था, ये एक अलग ही मुद्दा था। खैर… बीस बरस की उम्र में मैं भी ग्राम पंचायत के विद्यार्थियों के बीच अपने सुनहरे भविष्य की खोज में प्रतिदिन लोकल ट्रेन से आने-जाने लगी। नौकरी की प्रसन्नता तो थी ही साथ ही इस बात की प्रसन्नता अधिक थी कि रेलवे स्टेशन से दो फर्लांग की दूरी पर ही विद्यालय था सो गाँव में पैदल भटकने से बची रहती थी। 
हमारे स्टाफ में अधिकतर महिलाएँ ही थीं। और वो भी छोटे ग्रामीण क्षेत्र से। एक मैं ही थी जो शहर से आई थी और बाकी सबसे थोड़ी ज्यादा आधुनिक, समझदार और साहसी मानी जाती थी। स्कूल में कोई प्रशासनिक स्टाफ नहीं था इसलिए प्रधानाचार्या जी ने प्रशासनिक कार्यों की अतिरिक्त जिम्मेदारी मुझे दे रखी थी। 
गाँव में बिजली की समस्यायों का कोई अंत नहीं था। कभी अचानक गुल है जाती तो कभी बिजली का बिल देखकर साँसें फूल जातीं। फिर भाग-दौड़ शुरू हो जाती बिल को सही करवाने की। इन्हीं सब सिलसिलों में बिजली विभाग में मुझे कई बार जाना पड़ता था। हमारे विद्यालय के समीप ही बिजली विभाग का कार्यालय था। उसी में प्रधान लिपिक यानी हैड क्लर्क थे साँई दम्पति। पति तो बहुत मन लगाकर काम करते थे पर पत्नी कभी-कभी ही कार्यालय में दिखाई देती थीं, खासकर वेतन मिलने के दिनों में, बस। उसके अलावा वे आए दिन आने वाले रिश्तेदारों को ही देखती थीं। बच्चे उनके थे नहीं।
बिजली विभाग भी शायद स्टाफ की कमी की समस्या से जूझता रहता था। इसीलिए एक ही व्यक्ति कई-कई जिम्मेदारी निभाता था। साँई अंकल ही हमारे बिजली के मीटर की रीडिंग लेकर जाते थे। वही मेंटेनेंस के लिए आते थे और दफ्तर जाओ तो वही बातचीत करके मसले हल करने के लिए उपलब्ध रहते थे। बाकी लोग फाइलों में घुसे रहते थे या इधर-उधर की बातें करके टाइम पास करते रहते थे। कुल मिलाकर हमें यह लगता था कि हमारे गाँव का बिजली विभाग साँई अंकल के भरोसे ही चल रहा है। सारे काम का दारोमदार उन्हीं के कंधों पर है।
तीन साल वहाँ नौकरी करने के बाद मेरा स्थानांतरण हमारे शहर के विद्यालय में ही हो गया। कुछ समय तक गाँव वालों से, विद्यालय के लोगों से और बिजली विभाग के साँई अंकल से मेरा संपर्क रहा, लेकिन समय के साथ सब चीज धुँधलाने लगीं और मैं अपनी शहरी जिंदगी में व्यस्त हो गई। 
शादी, बच्चे और उनसे जुड़ी नई ज़िम्मेदारियों से लदी-फदी मैं आगे बढ़ती जा रही थी। नौकरी में पदोन्नति के साथ ऊपरी पायदानों तक पहुँचाने की एक लंबी यात्रा में चीज़ें पीछे छूटती ही जा रही थीं कि नियति ने एक बार फिर मुझे उसी गाँव में पहुँचा दिया। पूरे बीस वर्ष बाद मैं उसी विद्यालय में प्रधानाचार्या बनकर कार्य भार सम्हालने आ पहुँची थी। बच्चे उच्च शिक्षा के लिए अलग-अलग शहरों में रह रहे थे। पति की अपनी सरकारी नौकरी की विवशता के चलते मुझे अकेले ही आना पड़ा। ज़िम्मेदारी और उम्र का तकाज़ा था कि मैंने गाँव में ही रहना उचित समझा। सप्ताहंत पर या तो पति आ जाते थे या मैं चली जाती थी। कुल मिलाकर ज़िन्दगी की गाड़ी ठीक-ठाक तरीके से खींच रहे थे हम दोनों मिलजुल कर।
शाम का समय मेरे पास बिल्कुल खाली होता था तो मैं गाँव में निकल जाती थी। पुराने लोगों से मिलना और इतने वर्षों में आए परिवर्तन को देखना, महसूस करना अच्छा लगता था। एक दिन मैंने साँई अंकल के बारे में पूछताछ की तो पता चला कि वे रिटायर हो गए हैं और गाँव में ही बस गए हैं। बस फिर क्या था! मैं चल दी उनसे मिलने।
अच्छा, पक्का, सुंदर, शहरी सुख सुविधाओं से सुसज्जित घर और चारों ओर खाली जगह में छाई हुई हरियाली देखकर मुझे बहुत अच्छा लगा। दरवाजा साँई अंकल ने ही खोला।
“नमस्ते अंकल! पहचाना मुझे?” मैंने हाथ जोड़कर नमस्ते करते ही प्रश्न उछाल दिया।
दो-चार पल दिमाग पर जोर डालने के बाद अंकल थोड़ा सा मुस्कुराए और फिर उन्होंने पहचान लिया “अरे शीला बेटी! ग्राम पंचायत स्कूल वाली! अरे! आओ आओ! क्या बात है! तुम तो बिल्कुल भी नहीं बदली बेटी! अचानक यहाँ कैसे?”
“बताती हूँ अंकल जरा बैठने तो दें।” मैं हँसी। “अब मैं ग्राम पंचायत स्कूल की प्रिंसिपल बन कर के वापस आई हूँ। पिछले हफ्ते ही मैंने यहाँ ज्वाइन किया है। ज़रूरी कामकाज निपटाने के बाद अब फुर्सत मिली, तो सोचा पुराने लोगों से मिला जाए। पता चला आप दोनों रिटायर हो गए हैं और यहीं रहते हैं, तो मिलने चली आई।”
“बहुत अच्छा किया बेटा! तुम्हारी आंटी तुम्हें देखकर बहुत खुश होगी।” 
“कहाँ हैं आंटी? दिखाई नहीं दे रहीं!”
“आओ भीतर चलो। आज थोड़ी तबियत ठीक नहीं है उसकी, आराम कर रही है।” 
हम दोनों भीतर की ओर बढ़ चले। आधुनिक सुख-सुविधाओं की हर चीज़ वहाँ मौजूद थी। फुली ऑटोमैटिक वॉशिंग मशीन, एसी और तीन दरवाज़ों वाला बडा-सा फ्रिज। होम थिएटर देखकर तो एक बारगी मुझे लगा मैं इनके सामने कितनी गरीब हूँ। 
“देखो कौन आया है?” अंकल ने परदा हटाकर मेरे भीतर आने की जगह बनाई और फिर खुद भी भीतर आ गए। बाहर चारों तरफ लगे हरे-भरे वृक्षों के कारण घर प्राकृतिक रूप से ठंडा था। पलंग के सिरहाने की ओर एक बड़ी सी खिड़की थी जिससे शीतल ठंडक भीतर पहुँच रही थी।
“कौन है?” अपने आप को जतन से हिलाती आंटी ने करवट बदलकर मेरी ओर नज़र डाली।
“आप शायद नहीं पहचानेंगी! हम बहुत कम मिले हैं।” मैं आगे ये भी कहना चाहती थी कि आप ऑफिस आती ही कितनी कम थीं कि मुझे याद रखतीं, पर तबियत का लिहाज़ कर चुप रह गई।
“अच्छा!” उन्होंने अंकल की ओर देखा।
“अरे ये शीला बेटी है। ग्राम पंचायत स्कूल में टीचर थी बहुत पहले। अब हैड मास्टरनी बनकर आई है दुबारा।”
“अच्छा!” एक फीकी सी मुस्कान उनके होंठों पर दो पल को ठहरी और लोप हो गई।
पता नहीं क्यों मुझे कुछ अच्छा-सा नहीं लगा। उनके इस ‘अच्छा’ कहने में कुछ तो अजीब था। थोड़ी देर इधर-उधर की, दुनियादारी की बातें, स्कूल की ऑफिस की बातें, गाँव की, शहरों की बातें करके मैं घर चली आई।
पहले तो मैंने सोचा था कि मैं दोबारा यहाँ नहीं आऊँगी। आंटी का व्यवहार मुझे अजीब सा लग रहा था। लेकिन जब चलते-चलते आंटी ने मुझसे कहा “फिर आते रहना बेटा। अच्छा लगा तुम्हारा आना।” तो उनकी आवाज में एक अजीब तरह का दर्द, एक पीड़ा, एक बेबसी और उलझन सी थी। जिसकी वजह से मुझे लगा कि कुछ है आंटी के मन में जो वह मुझसे कहना चाह रही हैं लेकिन कह नहीं पा रही हैं। इसलिए मुझे वापस ज़रूर आना चाहिए। वैसे भी मैं गाँव में शाम को क्या करती! तो मैंने सोचा एक-दो दिन बाद मैं फिर आ जाऊँगी। हमने हमारे मोबाइल नंबर भी एक दूसरे को दिए थे। घर पहुँचते ही मेरे पास आंटी का फोन आ गया “क्या कर रहे हो बेटा? आज तुम्हें देखकर बहुत अच्छा लगा। कितना अच्छा लगता है जब लड़कियाँ अपनी मेहनत से नौकरी हासिल करती हैं और उसका आनंद उठाती हैं।”
“बिल्कुल सही बात है आंटी। आपने भी तो यह आनंद उठाया है। आपने भी तो नौकरी की है इतने साल।”
“हम्म्म…” पहले एक संक्षिप्त सा जवाब आया और फिर उन्होंने आगे कहा “कभी बैठेंगे तो लंबी बात करेंगे इस पर। अभी रखती हूँ फोन।”
“ठीक है आंटी! मिलते हैं जल्दी! नमस्ते!”
मुझे समझ नहीं आ रहा था कि आंटी क्या कहना चाह रही हैं और क्या नहीं कह पा रही हैं। अगले कुछ सप्ताह मेरे बहुत व्यस्त निकले। एक तो इंस्पेक्शन था। मेरे पास गाँव के तीन स्कूल का चार्ज और था और सब में इंस्पेक्शन था। इसके अलावा संसद में चल रही बहस में कुछ आंकड़े भी चाहिए थे तो उसके लिए भी हमें कुछ निर्देश मिले थे जिनकी तैयारी करने में तीन-चार हफ्तों का समय निकल गया। इस बीच मुझे पता तो चला था कि साँई आंटी की तबीयत ठीक नहीं है पर मैं चाह कर भी नहीं जा पाई और ना फोन कर पाई। महीने भर से घर भी नहीं जा पाई थी तो मैं सारा काम निपटाकर पन्द्रह दिन की छुट्टी लेकर घर चली गई।
लौट कर आई तो पता चला साँई आंटी दस दिन अस्पताल में रहकर आई हैं। उनके बीपी और शुगर आउट ऑफ़ कंट्रोल हो गए थे। और इसी वजह से उनके और दूसरे अंगों की कार्य प्रणाली पर भी असर आ रहा था। उन्हें खाने पीने के सख्त परहेज बताए गए थे।
स्कूल से फ्री होते ही मैं दोपहर में ही उनके घर चली गई। मुझे लगा कि शहर में रहने की वजह से मुझे जो अतिरिक्त जानकारी है उसे उनसे साझा करती हूँ। शायद उससे उनको कुछ फायदा हो।
वहाँ जाकर मैंने देखा अंकल बहुत जी जान से आंटी की सेवा कर रहे हैं। जितनी जानकारियाँ मुझे थी बीपी शुगर को लेकर के, उससे कहीं अधिक जानकारी उन्होंने इंटरनेट के द्वारा खुद अर्जित कर ली थी। सुबह शाम आंटी को लेकर के सैर पर जाना, तरह-तरह के जूस बनाकर उनको देना। ऐसा लग रहा था कि जैसे आंटी की जान उनके खुद के लिए जितनी कीमती है उससे कहीं ज्यादा अंकल के लिए कीमती है। मुझे अंकल का यह प्रेम देखकर बहुत अच्छा लगा और साथ ही मेरे मन में कहीं एक टीस भी उठी।
मुझे ऐसी सेवा टहल कभी नहीं मिली थी।
एक आत्मनिर्भर, साहसी और समझदार महिला होने के नाते शायद यह मान लिया गया था कि मैं अपनी देखभाल बेहतर तरीके से कर सकती हूँ।
आंटी मुझे बहुत प्रेम से बुलाती रहीं और  इसलिए मैं लगभग रोज ही थोड़ी देर के लिए चली जाती थी। बीपी शुगर मेरे भी थोड़े बॉर्डर लाइन पर ही थे। तो अंकल जो भी कुछ चीज़ आंटी के लिए बनाते थे आंटी उसमें से मेरे लिए भी बचाकर रख लेती थीं। एक आत्मीय संबंध हमारे बीच पनपने लगा था।
रोज़ मैं देखती थी कि अंकल उनकी छोटी-छोटी बातों का कितना ख्याल रख रहे थे। कहीं उन्हें खरोच नहीं लगनी चाहिए। कहीं उनका मन दुखी नहीं होना चाहिए। उनके जीवन का एक ही उद्देश्य लग रहा था कि बस आंटी स्वस्थ रहें और खुश रहें। इस बीच पता नहीं कब अंकल की तुलना अपने पति से करने की बात मेरे मन में सिर उठाने लगी। जब भी मैं अंकल को उनकी सेवा करते हुए, ध्यान रखते हुए देखती तो मुझे अपने पति की याद आती और अंकल की तुलना में वे मुझे लापरवाह और बेपरवाह से लगते। और मेरे मन में एक खीज सी उत्पन्न होती। एक तो मैं कोई बहुत ज्यादा बीमार नहीं पड़ी और हल्की-फुल्की कोई बीमारी कभी मुझे हुई भी तो मुझे याद नहीं पड़ता कि इस तरह, एक बच्चे की तरह मेरी देखभाल की गई हो। अब सप्ताहंत पर मेरा घर जाने का मन नहीं करता था और न ही मैं अपने पति से आने के लिए कहती थी। 
आखिरकार एक दिन वो खुद ही चले आए।
इस दौरान मैं कुछ उखड़ी उखड़ी और असहज ही रही। आखिरकार उन्होंने पूछ ही लिया “क्या हो गया शीलू? आजकल तुम बहुत व्यस्त रहती हो! ना घर आ रही थी ना मुझे आने के लिए कह रही थी। मैं आना चाह रहा था तो रोक रही थी। क्या बात है? कोई परेशानी है? कोई नाराजगी है? क्या चल क्या रहा है? मुझे बड़ा अजीब लग रहा है!”
“नहीं ऐसा तो कुछ नहीं है! बस व्यस्तता ही है। तुम यहाँ आते तो बोर ही हो जाते, इसलिए मना कर दिया।”
“तुम्हें मेरी कसम है शीलू। किसी भी तरीके की कोई परेशानी हो तो मुझे बताओ। मुझे अच्छा नहीं लग रहा है। और हाँ तुम लाख मना करो मैं तो ऐसे ही आता ही रहूँगा। समझी तुम!”
पति की इतनी चिंता इतना अधिकार भरा व्यवहार मेरे मन में इतने दिन से चल रही उठा पटक को कुछ देर के लिए शांत कर गया। दो-तीन दिन रहकर के वो वापस चले गए।
उनके जाने के बाद मैं साँई अंकल के घर गई। उस दिन आंटी काफी ठीक लग रही थीं और बाहर बरामदे में ही पौधों की सेवा टहल करती मिल गईं।
“अरे आज बहुत मौके से आई तुम! अंकल बाहर गए हैं तो खूब समय था मेरे पास। देखो मैंने आज कटिंग की है कुछ पौधों की। और ये सारे पौधे कटिंग से लग जाते हैं। तुम्हें चाहिए तो ये कटिंग्स ले जाओ। अपने घर में लगाओ चाहे स्कूल में लगाओ। बरसात आने वाली है बहुत आसानी से लग जाएँगे।” उन्होंने एक मुड्ढा मेरी ओर सरका दिया और एक पर खुद बैठ गईं।
“ठीक है आंटी मैं यह सब ले जाऊँगी। स्कूल में हम एक कार्यक्रम कर लेंगे जिसमें बच्चों से ये पौधे लगवा लेंगे।”
“अरे फिर तो और भी बहुत ले जाना। मैं बहुत सारे पौधे निकाल कर दे दूँगी।” फिर अचानक उन्हें याद आया “कहाँ थी तुम दो चार दिन?”
“मेरे पति आए हुए थे सो समय ही नहीं मिला।” बोलते-बोलते ही मुझे ध्यान आया कि मेरे पति को मुझे यहाँ लेकर के आना चाहिए था “वो भी अपने ऑफिस का कुछ काम लेकर के आए थे और एक दिन शाम को हम पहाड़ी वाले मंदिर पर चले गए। एक दिन हाट में चले गए तो समय भी नहीं मिला वरना उनको यहाँ जरूर लेकर आती।” मैंने बात बनाई।
“कोई बात नहीं… फिर कभी सही। पर उनसे मिलकर मुझे अच्छा लगता…” आज फिर आंटी के चेहरे पर वो पहले दिन वाला अजीब सा भाव मुझे दिखाई दिया।
“क्या बात है आंटी? आप कभी-कभी कुछ सोचने लग जाते हो।”
“सोचने से क्या होता है! हम जो सोचते हैं वो सब जीवन में नहीं होता है… और जो हो रहा होता है उसको सोचने से क्या फायदा होता है? कुछ भी नहीं… जीवन को जैसे चलना होता है, जो उसकी नियति होती है वो वैसे ही चलता है…” 
मैं उठकर आंटी के पास जमीन पर बैठ गई। अपने दोनों हाथ उनके घुटने पर रखकर मैंने उनसे पूछा “कभी-कभी ऐसा लगता है मुझे कि आप अपनी जिंदगी में खुश नहीं हो। बच्चों की वजह से शायद…” मैंने खुद ही जवाब भी दे दिया।
“ये दुख तो पहले बहुत होता था। मगर बाद में देखा कि बच्चे बाहर बस जाते हैं। बुढ़ापे में माँ-बाप अकेले के अकेले रह जाते हैं। तो अब यह दुख तो नहीं होता।”
“तो? फिर क्या दुख है आपको जो भीतर ही भीतर गला रहा है आपको? ये बीपी शुगर यूँ ही नहीं बढ़ते हैं आंटी।”
उन्होंने मेरी ओर उदासी भरी एक नज़र डाली और फिर पास में रखी मनी प्लांट की बेल की पत्तियों को सहलाने लगीं।
“अंकल भी कितना प्यार करते हैं आपको। वो कितनी देखभाल करते हैं आपकी। आपको यूँ उदास और बीमार देखकर उनका भी कितना दुख होता होगा। अपने लिए न सही, उनकी खुशी के लिए ही आप खुश रहें।”
“मैं तो जिंदा ही उनकी खुशी के लिए हूँ।” 
“मतलब?”
“कितनी मेहनत करती है एक लड़की एक अच्छी नौकरी पाने के लिए। कितने सपने देखती है कि वो एक अच्छी नौकरी करेगी। पति-पत्नी दोनों मिलकर गृहस्थी की गाड़ी को सुखपूर्वक आगे बढ़ाएँगे… पर सब कुछ पाकर भी हाथ खाली रह गए मेरे।” आंटी ने कातर दृष्टि से मेरी ओर देखा।
बच्चों जैसा भोलापन उनकी आँखों में था और चेहरे पर थी दर्द की तीखी लहर। मैंने उनका चेहरा अपने दोनों हाथों से थाम लिया “क्या कह रही हो आप? आखिर क्या दुख है आपको?”
“मेरे पापा के बहुत अरमान थे हम बहनों को लेकर। तीनों को खूब पढ़ाया-लिखाया और इस योग्य बनाया कि अच्छी नौकरी हासिल कर सकें और हमने की भी।”
“हाँ, सब जानते हैं। फिर? फिर क्या दुख रहा?” मेरा प्रश्न वहीं का वहीं था।
पर आंटी अपनी ही धुन में बात आगे बढ़ाना चाह रही थीं “शादी के समय अंकल का अच्छा भला बिज़नस था कपड़े का। उन्हें मेरे नौकरी करने पर कोई आपत्ति नहीं थी इसीलिए मेरा रिश्ता पापा ने यहाँ तय किया था। क्योंकि पहले दो-तीन रिश्तों में लड़के वालों को मेरी नौकरी में कोई रुचि नहीं थी। उनका कहना था कि करे तो करे नहीं तो न करे, क्या फर्क पड़ता है। पापा को लगता था कि बहुत मेहनत से उनकी लड़कियों ने नौकरी हासिल की है। उस नौकरी की वैल्यू होनी चाहिए, वकत होनी चाहिए। इसलिए ऐसे लोगों के साथ बिल्कुल रिश्ता नहीं करना जिन्हें नौकरी की परवाह न हो।” वो पानी की बोतल उठाकर पानी पीने लगीं और फिर बोतल मेरी ओर बढ़ा दी। मैंने बोतल एक तरफ रख दी और आगे की बात का इंतज़ार करने लगी।
“शादी के छह महीने बाद मेरी पोस्टिंग यहाँ हो गई थी। शुरू-शुरू में मैं भी अप डाउन करती थी सब कुछ अच्छा चल रहा था कि अचानक ही रेडीमेड कपड़ों का चलन बढ़ गया। लोग रिटेल में कपड़ा कम खरीदने लगे। रिटेल कपड़ों के व्यापार में भयंकर मंदी आने से इनका कारोबार भी डूब गया। पर हमें ज्यादा परेशानी नहीं हुई क्योंकि मेरे पास सरकारी नौकरी थी।”
टप-टप बहते आंसुओं को आंटी ने अपने हाथों से पौंछा “छोटा सा गाँव था, ऑफिस में बहुत ज्यादा काम नहीं था। वैसे भी मैं एक अकेली महिला कर्मचारी थी तो लोग लिहाजवश कुछ काम कहते भी नहीं थे।
व्यापार चौपट होने के बाद अंकल भी यहीं रहने लगे। दिन भर घर में क्या करते, वो मेरे साथ ऑफिस आने लगे। ऑफिस में लोगों से उनकी दोस्ती हो गई। यारी दोस्ती इतनी बढ़ी कि लोगों ने इनको काम बताने शुरू कर दिए। एक समय ऐसा आया कि फील्ड वर्क हो या फाइल वर्क ये हर काम में निपुण हो गए। ऑफिस में अकेली महिला कर्मचारी होने के कारण सभी को मर्यादित रहना पड़ता था। एक दिन हमारे बॉस ने ही मुझसे कहा ‘मैडम आप तो खाली साइन करने आ जाया करो महीने में एक बार। पूरे महीने के साइन करो तनख्वाह लो और घर पर आराम करो। आपके हिस्से का काम तो साँई साब कर ही देंगे।’ और बस मेरा ऑफिस जाना बंद हो गया। बाकी के साल ऐसे ही निकल गए। सोचा था कि डिपार्टमेंटल एग्जाम देकर प्रमोशन लूँगी, आगे बढूँगी पर सब सपने सपने ही रह गए…एल डी सी की छोटी-सी पोस्ट पर सेलरी लेते हुए ज़िन्दगी बीत गई…काम कुछ किया नहीं, नौकरी को जिया नहीं…” 
दो पल को आंटी खामोश हुई तो मैं जैसे होश में आई “आपके पापा ने कुछ नहीं कहा?”
“हम तीनों बहनों की शादी के बाद पापा-मम्मी अपने गुरुजी से दीक्षा ले ली थी और आश्रम में रहने चले गए थे। उनको ये सब बता कर दुखी करने का मन ही नहीं हुआ।”
“आपका दुख अपनी जगह सही है आंटी पर ये भी तो देखो ना कि अंकल कितना चाहते हैं आपको। कितना ध्यान रखते हैं, सेवा करते हैं।”
एक फीकी सी हँसी उनके चेहरे पर पसर गई “वो सच्चाई भी बस मैं ही जानती हूँ…तुम सुनोगी?”
“बताइए…”
“बच्चे हमारे हुए नहीं। मैं मर जाती तो मेरी नौकरी किसे मिलती? बताओ। तुम तो सरकारी नौकरी में हो!” 
“अंकल को…शायद। हाँ उन्हे ही मिलती। वो कोई सरकारी नौकरी में थोड़ी न थे। और आपने भी उन्हे ही नॉमिनी बनाया होगा ना। और किसे बनाते भला?” ज्ञान बघारते हुए मैं ये समझ नहीं सकी कि इस प्रश्न का प्रयोजन क्या है?
“बस इसीलिए मुझे तीन बार ऐसे मारने की कोशिश की गई कि मृत्यु प्राकृतिक लगे। पर हर बार मैं बच गई। पहले तो मेरे जीवन को घुन की तरह खा गए और अब मुझे ज़िन्दा रखने के लिए सेवा इसलिए कर रहे हैं कि मेरे मरते ही पेंशन आधी रह जाएगी।”
मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं आंटी को कैसे सांत्वना दूँ! मुझे बस अपने पति की याद आने लगी थी। बुरी तरह याद आने लगी थी उनकी। मैं दौड़कर उनके गले लग जाना चाहती थी। 


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10 टिप्पणी

  1. अपनी प्यारी सी छोटी बहन शिवानी को देखकर दिल बाग-बाग हो गया। शिवानी नाम जबान पर आते ही, वह शिवानी चाहे जो हो लेकिन तुम्हारा मुस्कुराता हुआ चेहरा, तुम्हारी मस्ती, तुम्हारा अपनापन! सब सामने याद आ जाता है।ईश्वर तुम्हारी यह मुस्कान बनाए रखे ।
    अब बात कहानी पर।
    कहानी वाकई बहुत गंभीर है ,जैसे कहते हैं न कि चमकने वाली हर वस्तु सोना नहीं होती; वैसे ही स्त्रियों का जीवन। पता नहीं क्यों नियति भी स्त्रियों को लेकर इतनी निष्ठुर क्यों हो जाती है। जो दिखाई देता है, वैसा होता नहीं। समझ ही नहीं पाते कि कौन सी स्थिति में जी रही होगी। मुस्कुराहट के पीछे का दर्द जरा मुश्किल से ही समझ में आता है।
    अमृत की मिठास में लिपटा हुआ जहर दिखाई नहीं देता।
    कहानी पढ़ते हुए अंत का कोई अंदाज भी नहीं लगाया जा सकता था।
    शीर्षक तुमने बिलकुल सही रखा-
    *” ज्यूँ घुंण काठहि खाई”*
    जैसे घुन अंदर ही अंदर लकड़ी को पोला करता जाता है।इसी तरह इस कहानी में साँईं अंकल की पत्नी की स्थिति रही। बेचारी।
    20 साल बाद उसी गांव में उसका दर्द सुनने के लिए ही दोबारा ट्रांसफर हुआ।
    माता-पिता कितने नाजों से अपनी बेटियों को पलते हैं और ससुराल में उनकी कदर ना हो तो जीवन अभिशाप की तरह हो जाता है। माता-पिता का जीवन भर का दर्द हो जाता है
    अच्छी कहानी है शिवानी तुम्हारी, बहुत दिनों बाद तुम्हें पढ़ा लेकिन अच्छा पढ़ा।
    एक बेहद अर्थपूर्ण कहानी के लिए तुम्हें बहुत-बहुत बधाई।

    • नमस्कार नीलिमा दीदी। आपका स्नेह और आशीर्वाद बना रहे।
      कहानी पर आपने बहुत सुंदर टिप्पणी की और कहानी को पसंद किया, इसके लिए बहुत बहुत धन्यवाद

    • नमस्कार रोहित जी
      आपने कहानी बहुत चाव से पढ़ी, समझी और सराही… इसके लिए बहुत बहुत धन्यवाद आपका

  2. बेहतरीन और कथ्य की गंभीरता को जिस ठहरे हुए ढंग से शब्दों में पिरोया है, वह लाजवाब है।
    बधाई स्वीकार करें शिवानी जी।

    • विरेंदर जी आपकी टिप्पणी से उत्साहित हूँ।
      बहुत बहुत धन्यवाद आपका

    • ऐसा भी होता है
      गाँवों में सैकड़ों कहानी किस्से बिखरे पड़े हैं जो हमें अविश्वसनीय लगते हैं, पर सच होते हैं।
      ऐसे ही किसी किस्से से बुनी गई है ये कहानी भी।बहुत बहुत धन्यवाद आपका

  3. नारी मन को पढ़ने में पारंगत हैं शिवानी. परतों के बीच-बीच बहुत कुछ अनकहा रह जाता है इसी को अनावृत करती है इनकी कहानी. नये विषय पर एक बेहतरीन कहानी. बहुत बहुत बधाई और साधुवाद!

  4. दुनिया मे अपराध के कई रूप हैं को पाप नही पुण्य की तरह दिखते है ।
    शिवानी ने ऐसे अपराध की रग पर उंगली रखी है। उफ्फ ,आह और वाह …

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