विंड चाइम – (कहानी – शोभना श्याम)
अपने संचित गुस्से को बेटे पर उंडेलने की अधीरता इतनी अधिक थी कि होटल से विशाल के घर तक का रास्ता काटना मेरे लिए मुश्किल हो गया था। इससे पहले मैं जब-जब भी अमेरिका आई हूँ, तब रास्तों की हरीतिमा; सफेद, गुलाबी, जामुनी  पुष्प-गुच्छों से लदे वृक्षों, किसी परीलोक से कॉटेजनुमा घरों और चमचमाती सड़कों की खूबसूरती में इस प्रकार खो जाती हूँ कि मुझे कभी गंतव्य पर पहूँचने की जल्दी नही रही। लेकिन इस बार तो मैं आक्रोश के समंदर में गोते लगा रही थी सो मेरा ध्यान न तो कुदरत की किसी नेमत पर था, न मानव निर्मित दर्शनीय इमारतों पर। यहाँ तक कि मुझे पता ही नही चला, मैं कब बड़बड़ाने लगी थी। तब पता चला जब आलोक ने मुझे टोका,
“रश्मि क्या हो गया है तुम्हें? अपने आप से क्या बतिया रही हो? हमेशा तो तुम रास्ते के दोनों ओर लगे पेड़ पौधों को निहारा करती थी और बच्चों की तरह चहक-चहक कर मुझसे, “वो वाला घर देखो, वो… वो वाली खिड़की ..कितनी सुंदर है इस घर की दीवार कैसी लेस की तरह बनी है, इस पेड़ के पत्ते देखो-कितने चिकने और सुंदर है न, वाओ ये फूल ….”, कह-कह कर मेरा सर खा जाती थीं। और आज…।”
“तुम बस कुछ मत बोलो! तुम्हीं ने तो बच्चों को इतनी छूट दी शुरू से, “इनडिपेंडेंट बनाओ..अपने निर्णय लेने की छूट दो, बच्चों को बाँधो मत, बच्चों को ये …बच्चों को वो…। अब देख लिया न अपनी इस सो कॉल्ड साइकोलॉजी का परिणाम। जब बड़े का ये हाल हैं तो छोटा न जाने क्या गुल खिलायेगा?”
“चिल करो यार, इतना गुस्सा? आज मेरे बेटे को भगवान ही बचाये। अरे पहले उससे मिल तो लो! तुमने सीधा उसके घर जाने की बजाय होटल में ठहरने की जिद की। अपने बेटे का इतना बड़ा घर होते हुए भी मेरे इतने सारे रुपयों का कुन्डा करा दिया। खबर मिलने से लेकर, भारत से यहाँ आने तक खूब गुस्सा निकाल चुकी हो, अभी तक तुम्हारा मन हल्का नही हुआ? देखो तुम्हारे रास्ते के दोस्त! ये भी परेशान है आज।“
आलोक जबरदस्ती हँस रहे थे। मुझे मालूम है धक्का तो उन्हें भी लगा था। बस काबू रखें हुए थे । तभी तो मेरे कहते ही अमेरिका की इतनी मंहगी टिकट बुक करा दी।
टैक्सी विशाल के घर पहुंच गई थी। मैंने बिना अमेरिका के सामान्य शिष्टाचार के अनुरूप टैक्सी-ड्राइवर को धन्यवाद दिए, बिना आलोक के आने का इंतज़ार किये धड़धड़ाते हुई विशाल के घर के अहाते की सीढ़ियाँ चढ़कर दनादन मुख्य द्वार की घंटी बजा डाली।लगभग भागते हुए विशाल ने दरवाजा खोला होगा, यह उसकी फूली हुई सांस बता रही थी।
“मॉम आप लोग? बिन बताये अचानक? मुझे बता देते तो मैं लेने आ जाता, कितनी महँगी होती है टैक्सी यहाँ।”-विशाल मेरे पैर छूते हुए बोला ।
“पहले तू ये बता, सात महीने हो गए और तूने हमें बताना तक जरूरी नहीं समझा? हम मर गए थे क्या तेरे लिए ……..?”
“ऐसा मत कहो मॉम, मैंने सोचा था कि…”
“सोचा ही कहाँ तूने कुछ?”
“मॉम! पहले बैठो तो।“
तब तक आलोक भी ड्राइवर को पैसे देकर आ चुके थे।”आप लोगों का समान कहाँ है?”उनके साथ समान न देख कर विशाल ने आलोक के पैर छूते हुए पूछा जिसका जवाब मैंने दिया, “होटल में! अब यहाँ तो माँस-मच्छी बनता होगा, सो…।”
“अरे मॉम! पापा! बैठो तो।” विशाल ने हम दोनों को बैठा कर, पानी लाकर दिया।
“नहीं, मैं नहीं पिऊँगी इस घर का पानी, मैं लाई हूँ अपने साथ।” कहकर मैंने अपने पर्स से पानी की बोतल निकालकर दिखा दी विशाल को। मुझे लगा था कि विशाल इससे आहत होगा। यही तो चाहती थी मैं। आखिर उसने भी तो मुझे कितनी चोट पहुँचाई है। लेकिन देखा कि वह तो इत्मीनान से मुस्कुरा रहा है। उसकी मुस्कुराहट ने आग में घी डालने का काम किया। शायद यह पहली बार होगा कि एक माँ अपने बेटे की मुस्कुराहट से जल उठी हो। मेरे जैसी माँएं तो बेटे की एक मुस्कान के लिए जाने क्या क्या करती हैं और मैं हूँ कि…।
“कोई बात नहीं मॉम, पानी पीने से मतलब है, कोई सा भी हो। मेरे घर का पानी तो आप बाद में भी पी लोगी। पर मॉम ये पानी होगा तो अमेरिका का ही? भारत से तो अटैची में छिपा कर नहीं लाईं हो न?”
“बेटा हो भी सकता है, अंडरएस्टीमेट मत कर अपनी माँ को। प्राण जाये पर धर्म न जाये।”
आलोक ने ताना कसा और दोनों बाप-बेटे फिर हँस दिए। मुझे जलाने में जैसे मज़ा आ रहा था दोनों को। मैं खुद अपने लिए हैरान थी मेरी खुद को आधुनिक समझने वाली समझ कहाँ चली गयी थी।
विशाल मेरे पास बैठ कर लाड़ से मेरे गले में बाहें डालते हुए बोला, “फिर तो गंगाजल भी लाई होंगी न मॉम ? लाओ मुझे दो, अभी अपना पूरा घर शुद्ध करता हूँ।”
“हट परे! मुझसे बात मत कर।“
“अरे… मैं भी तो अशुद्ध हो गया न, ये तो मैंने सोचा ही नहीं।चलो थोड़ा गंगाजल अपने ऊपर भी छिड़क लेता हूँ फिर तो ठीक है न।
“तुझे मजाक सूझ रहा है, तुझे मेरी पीड़ा नजर नहीं आ रही।”मैंने तड़प कर कहा।
“मॉम पहले मेरी बात तो सुनो।“ कहते हुए विशाल मेरे पैरों के पास कालीन पर ही बैठ गया |
“सुनने को क्या बचा है विशाल ?” मैंने मुँह दूसरी और घुमाते हुए कहा।“ एक विधर्मी और विदेशी लड़की से शादी करते हुए तुझे अपनी माँ का जरा भी ख्याल नहीं आया। अपने देश से न सही, यहाँ भी हिन्दू लड़कियों की कमी तो नहीं होगी। तेरे चाचा भी तो चालीस साल से यहाँ है मगर बच्चों की शादियां हिन्दुओं में ही की हैं। उन्होंने बताया था कि यहाँ सिख भी बहुत है जिनमे से कई ने राधास्वामी पंथ अपनाया हुआ है वो लोग नॉन वेज नहीं खाते। क्या उनमे से तुझे कोई लड़की नहीं मिल सकती थी।ये क्या समझेगी हमारी तहजीब, हमारी संस्कृति को। तूने तो हमें बताया तक नहीं। क्या सोचा था कि हम कभी यहां आएंगे ही नहीं सो हमें पता चलेगा ही नहीं ? तू ये भूल ही गया था न कि यहाँ हमारे  इतने रिश्तेदार और जानने वाले हैं।
“मॉम ऐसा कुछ नहीं है जैसा आप सोच रही हो। मैंने इसलिए नहीं बताया था कि वह हमारी संस्कृति और तहज़ीब में थोड़ा रच-बस जाये तो ले कर आऊँगा आपके पास, आपके अनुरूप बहु बना कर ।… सच्ची! आप को यकीन न हो तो टिकट देख लो, अगले महीने हम इंडिया आने ही वाले थे।” आलोक ने सिर्फ इतना कहा, विशाल यार! विदेशी में भी तुझे चीनी लड़की मिली। जानता नही चीनी चीजों की …।”
इस गम्भीर समय में मुझे आलोक का ये बेहूदा मजाक और भी तिलमिला गया, लेकिन विशाल ढीठ की तरह हो-हो कर हँस दिया। मैं लगभग बड़बड़ाने लगी ,”कितना गुरूर था मुझे अपने दिए संस्कारों पर, सब टूट गया, मेरा बेटा सब कुछ भुला बैठा।“
“मॉम! पहले अपनी बहु से मिल तो लो, उसने मेरे लिए नॉनवेज छोड़ दिया है। अंडा भी घर में नहीं बनता, शादी से पहले ही आपकी बताई रेसिपी से बना खाना खाकर कहती थी कि हमें पता होता कि वेज खाना भी इतना टेस्टी हो सकता है, तो नॉन वेज क्यों खाते। आपकी स्वधर्मी बहु तो रोज़ अंडा खाती थी।“
“अब रहने दे, एक स्वधर्मी गलत निकली तो क्या …विधर्मी, विधर्मी ही होती है, वह क्या समझेगी हमारे रीति-रिवाजों, हमारे खानपान, रहन सहन को? वैसे वो और बच्चे हैं कहाँ?”
“चिल्ड्रन-पार्क में गई है बच्चों को लेकर…. मॉम! स्वधर्मी तो ढाई साल और तीन महीने के दो बच्चों को छोड़कर एक अँगरेज़ के साथ चली गयी थी। इसने मेरे टूटे घर और दिल दोनों को संभाला है। वो तो स्कर्ट और शॉर्ट्स ही ज्यादा पहनती थी यह तो ऑफिस  के अलावा ज्यादातर सलवार सूट पहनती है और मंदिर जाते समय साड़ी।”
“साड़ी और मंदिर? मंदिर जाती है ?”
“हाँ मॉम, तुम्हारे बेटे के लिए करवा चौथ का व्रत भी रखा था इसने। हमारे रीति-रिवाजों के बारे में पढ़ती और पूछती रहती है…. अगर वो हमारे जैसा होने की कोशिश कर रही है तो हमें भी तो कुछ-कुछ उनके जैसा बनना चाहिए न ?” विशाल ने फायर प्लेस के पास सजी बुद्ध की प्रतिमा और दीवार पर सजे चाइनीज़ नॉट वर्क से टकराती मेरी नज़रों को भाँपते हुए कहा।
अब तक मेरी नज़रें सारे घर का मुआयना और पिछली बार की सज्जा से इस सज्जा की तुलना करने लगी थीं। मुझे अब ध्यान आया कि मुख्य दरवाजे पर इस बार क्रिश्चियन रीथ नहीं, भारतीय बंदनवार लगी थी। ड्राइंग रूम में एक दीवार पर मड एन्ड मिरर वर्क की बड़ी सी पेंटिंग थी तो दूसरी पर ड्रैगन की ट्रिप्टिक। ड्राइंग रूम और डाइनिंग के बीच बनी आर्क के एक पिलर पर दो राजस्थानी कठपुतलियां लटक रही थी,और दूसरे पर स्लीक सा चाइनीज़ कैलीग्राफिक पैनल। एक कौने में ढेर सरे पौधे लगे थे, कुछ राजस्थानी टेराकोटा के घोड़े हाथी आदि की आकृतियों के तो कुछ चीनी मिटटी के  गमलो में। एक साइड टेबल  के कवर पर चौसर बना हुआ था और किनारों पर कौड़ियां लगी थी। कुल मिलाकर घर की साज़-सज्जा में भारतीय, पाश्चात्य और चीनी सजावट का अभिजात्यपूर्ण मेल था।
तो ये संयोग नहीं था कि इस बार इस बार दीपावली पर सब रिश्तेदारों को विशाल की ओर से बड़ी सुरुचि और सुंदरता से सजे दिवाली के गिफ्ट पैक दीपावली से दो दिन पहले ही मिल गए थे। उन सबने जब फोन करके मुझे यह बताया तो मुझे अपने बेटे के प्रति गर्व और प्यार दोनों उमड़ आये थे, साथ ही हैरान भी थी क्योंकि  विशाल इतने बरस से अमेरिका में है,  उसने पहले तो कभी ऐसा नहीं किया। तभी विशाल  मेरा हाथ पकड़कर उठाते हुए बोला, “मॉम इधर आओ, आपको कुछ दिखाना है।“
मैं अनिच्छा से उसके साथ हो ली। मैंने देखा, रसोई के साथ बनी पैंट्री अब एक सुंदर पूजाघर में तब्दील हो चुकी थी। आधे हिस्से में मेरे घर में बने पूजाघर से मिलता जुलता वैष्णव पूजाघर और दूसरे हिस्से में नक्काशी किये हुए पैनल्स के बीच गौतम बुद्धा, लाफिंग बुद्धा की प्रतिमाओं और कमल के फूल की आकृति के दीपदान से सजा चीनी पूजाघर। एक तरफ दिया जल रहा था तो दूसरी और सुगन्धित अगरबत्तियां।
मैं कुछ पल को इस पवित्र से वातावरण में मंत्रमुग्ध सी खड़ी रह गयी। जाने कब मेरे हाथ स्वतः ही जुड़ गए थे दोनों के बीचोबीच। पहले जब  विशाल के घर आयी थी तो  रसोई में एक ओर बनी छोटी सी शेल्फ पर भगवान की दो छोटी-छोटी फोटो और एक दिए को देखकर कितना कुड़ी थी,-“ये भी कोई पूजाघर हुआ! न जल का कलश, न घंटी, न तस्वीरों पर माला। एक प्रसाद की कटोरी तक नहीं, अपने खाने के किसी भी बर्तन में नाम मात्र को प्रसाद लगा देना।” इस पर देसी बहु यानि विशाल की पहली पत्नी नेहा ने तुनक कर जवाब दिया , “जैसा देश हो वैसा ही वेश रखना पड़ता है मम्मी जी! यहाँ हमारे आसपास दूसरे धर्मों के लोग रहते हैं यहाँ पूजा के समय घंटे घड़ियाल नहीं बजाए जा सकते।”
“बेटा एक छोटी सी घंटी की कितनी आवाज होगी और तुम्हारा तो इंडिपेंडेंट घर है, आगे पीछे गार्डन, दाएं-बाएं भी गलियारा है। कोई भी घर इससे लगा हुआ नहीं है।“ लेकिन नेहा अनसुनी कर वहाँ से निकल गयी।उसकी मुखमुद्रा देख फिर मेरी हिम्मत ही नहीं हुई कुछ कहने की। आज लाल कपडे से ढकी बड़ी सी चौकी पर मालाओं से सजी लगभग सभी भगवानों की तस्वीरें, नन्हे से सिंहासन पर विराजमान लड्डूगोपाल, ताम्बे का छोटा सा कलश ,चाँदी का दिया, घंटी और प्रसाद की कटोरी। मैं भाव-विह्वल हो रही थी। तभी विशाल ने मुझे वहीँ रखा नन्हा सा ताम्बे का बना हवनकुंड दिखाया।
“देखो मॉम इस नवरात्रि में हमने आपका मिनी हवन किया धूपबत्ती, कपूर और लौंग वाला। विशाल के चेहरे पर गर्वमिश्रित मुस्कान थी और मेरे चेहरे पर झेंपमिश्रित। अतीत की खिड़की फिर से खुल गयी।
पूजाघर पर नेहा का रवैया देखकर मैंने किसी बात पर दखल न देने का इरादा तो कर लिया था, लेकिन नवरात्रि पर मेरा भक्त मन फिर कुलबुला उठा, “नेहा धूपबत्ती और लौंग तो हैं न घर में? आकाश! ऑफिस से आते हुए कपूर लेते आना कल से नवरात्र शुरू हो रहे हैं बस छोटे से दिए बराबर धूपबत्ती की कटोरी बना कर उसमें कपूर जला देंगे, लौंग चढ़ा देंगे बस ! नाममात्र को ही सही, देवी की ज्योत तो हो ही जाएगी।
“उफ़! अब यहाँ हवन भी किया जायेगा विशाल? मम्मी जी प्लीज ये सब आप भारत में ही कर लिया करिये । यहाँ चारों तरफ फायर-अलार्म लगे होते हैं। समझने की कोशिश करिये मम्मी जी ! ज्योत से धुआं होगा और धुएं से अलार्म बज उठेंगे, कितनी एम्बैरेस्मेंट होगी ।”
‘क्या रसोई में परांठे बनाने से ज्यादा धुआं होगा बहुरानी? कहना चाहती थी पर शब्द मुँह में ही रह गए।
मैं नहीं चाहती थी मेरी वजह से बच्चों की गृहस्थी में कोई समस्या खड़ी हो मगर मेरे चुप रह जाने से भी क्या हुआ।दो बच्चे होने के बावजूद विशाल और नेहा के बीच मतभेद बढ़ते गए । नेहा का ऑफिस में किसी अंग्रेज से अफेयर भी इसका एक कारण था। आखिर नेहा चली ही गयी दो-दो बच्चों को छोड़कर।
जिसने भी सुना यही कहा, “कैसी माँ हैं, अपने बच्चों से भी मोह-ममता नहीं।ममता पर प्यार भारी पड़ गया लेकिन क्या ये सचमुच प्यार था या कुछ और ?
खैर मैंने  विशाल की गृहस्थी फिर से बसाने के लिए के लिए भारत में खोज शुरू कर दी थी। पहले हमें लगा था कि विशाल का अमेरिका में ग्रीन कार्ड होल्डर होना जो जल्दी ही सिटीजनशिप में बदलने वाला था ,एक प्लस पॉइंट रहेगा लेकिन दो बच्चों का होना माईनस पॉइंट बन गया। हम विधवा ही नहीं एक बच्चे वाली को भी स्वीकार करने को तैयार थे। जब ऐसी लड़की मिली ही थी कि मेरे देवर ने अमेरिका से फ़ोन करके इस चीनी लड़की के बारे में बताया। सुनते ही मेरे तो होश उड़ गए। बच्चों के साथ दोस्ती  वाली मानसिकता को उतार फेंक मैं पारम्परिक माँ बन गयी। मैंने विशाल को बिना बताये ही यहाँ आने का फैसला लिया।
यहाँ आते हुए एक ही बात मन में थी इस चीनी लड़की को विशाल की ज़िंदगी से निकाल कर भारत वाली विधवा लड़की के साथ विवाह पर राजी करुँगी। लेकिन ये पूजाघर, देवी की ज्योत, मंदिर … शाकाहारी खाना …मेरे जलते हुए मन पर पानी के छींटे पड़ने ही लगे थे कि बच्चों का ख्याल आते ही मैं फिर सशंकित हो उठी और अतीत से तुलना बंद कर फिर से विशाल की ओर पलटी,-” ये सब तो ठीक है लेकिन तेरे बच्चे ? इन विदेशियों से तो अपने बच्चे नहीं पलते, फिर ये तो सौतेल….”मेरा वाक्य अधूरा ही रह गया। खिड़की से देखा, सलवार सूट में एक चीनी लड़की डेढ़ साल की टिन्नी को प्रैम में, और चार साल के सोहम को पीठ पर बैठाये चली आ रही है। सोहम उसके सर पर थपकी दे रहा है और वो खिलखिला रही है। दरवाजा खुला ही था । उसके अंदर आते ही विशाल ने उसका परिचय हम से कराया – “मॉम ये शियांग! और शियांग! ये मेरे मम्मी पापा !”
‘शियांग…सुगंध.!’- मैंने कहीं पढ़ा था।तब तक सोहम को सोफे पर लैंड करा, प्रैम पर लटके स्कार्फ को सिर पर ले वह हमारे पैरों पर झुक चुकी थी।
“गॉड ब्लैस यू! ” मेरे कहने के साथ ही डोर वे में लगी विंड चाइम भी झनझना उठी।
शोभना श्या
Email: shobhanashubhi@gmail.com

5 टिप्पणी

  1. बहुत ही प्यारी बनावट संग दो सस्कृतियों के सामंजस्य की कहानी है
    बेटे की समझदारी ने मां और पत्नी के बीच के संस्कारों ले अंतर को पाट दिया। ऐसी समझ टकराव से बचाव की वजह बन जाती है।
    पात्रों का चित्रण सुखदायी।
    शोभना जी, देर से पढ़ी पर बहुत अच्छी लगी आपकी कथा।
    कथानक परिचित होते हुए भी कहने का तरीका अलग।

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