Wednesday, March 25, 2026
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सुषमा सिन्हा की कहानी – शाबास बेटू !!

माह जून आते ही ट्रांसफर की खबर हवाओं से आने लगी। माही जानती है कि इस शहर में उसकी पोस्टिंग अवधि पूरी हो चुकी है और उसका ट्रांसफर होना निश्चित है। वह भी राज्य के किसी दूसरे शहर में। उसे यह भी पता है कि नए शहर में उसे, बिलकुल अकेले ही रहना है। किसी भी दूसरे शहर में उसके साथ जाने वाला, रहने वाला कोई नहीं है। अपनी नौकरी, अपना काम-धंधा छोड़कर भला उसके साथ कोई जाए भी तो कैसे और क्यों? माही ने अपनी इच्छा और जिद से नौकरी की है। घर पर तो कहा ही गया था कि हमारे यहाँ औरतों का नौकरी करने का रिवाज नहीं है और तुम्हें जरूरत भी क्या है नौकरी करने की? उसे यह एहसास है कि नौकरी से संबंधित सभी समस्याएँ सिर्फ और सिर्फ उसी की हैं और उन्हें संभालना और संभलना भी उसे ही है। 

माही की नौकरी लगी थी जब, तब माँ पापा के साथ रही। पहली पोस्टिंग में सास-ससुर साथ रहे। अब तक उसे ऐसी कोई दिक्कत महसूस नहीं हुई! पर अब सास-ससुर रहे नहीं और घर पर बेटू को उसके डैडी के भरोसे छोड़ना संभव नहीं। उनका प्राइवेट कंपनी का काम है। महीने में बीस दिन का टूर, उन्हें समय ही कहाँ है? कई बार वह बेटू को माँ-पापा के पास छोड़ने की बात सोचती है। पर उसे इस बात की भी चिंता होती है कि कहीं मम्मी-डैडी दोनों के बिना बेटू के व्यक्तित्व पर कोई प्रतिकूल असर न पड़ जाये। कहीं उसमें आत्मविश्वास की कमी न हो जाये। वह बेहतर समझती है कि स्वाभिमान के साथ जीने के लिए किसी भी व्यक्ति में आत्मविश्वास का होना बहुत जरूरी है। वह महसूस करती है कि उसका बेटू के साथ रहना या बेटू का उसके साथ रहना भी बेहद जरूरी है। वह बढ़ती बच्ची के प्रति अपनी जिम्मेदारी महसूस करती है। साथ ही वह बेटू को भी बाहर काम करने वाली माँ के साथ, अकेले रहने संबंधी जिम्मेदारियों से भी अवगत कराना चाहती है। उसे थोड़ा-थोड़ा सेल्फ डिपेंड भी बनाना चाहती है ताकि उसकी अनुपस्थिति में वह अपना ख्याल खुद रख सके। 

माही को अपने ऑफिस की कार्यपद्धति और ऑफिस के माहौल का भी ध्यान आता है। अक्सर ऐसे काम भी आ जाते हैं कि इधर-उधर जाना, रात-बिरात लौटना होता है। सरकारी नौकर चौबीसों घंटे ऑनड्यूटी होते हैं। किसी काम के लिए मना करने या अपनी मजबूरियाँ बताने का मतलब है पुरुष सहयोगियों से स्त्री-पुरुष बराबरी संबंधी ताने सुनना – “जब बराबर वेतन मिलता है तो काम भी बराबर का ही होना चाहिए न।” हालाँकि सामने से तो कोई कुछ नहीं कह सकता क्योंकि माही काम के मामले में कभी किसी से पीछे नहीं रही! पर स्त्रियों की जरूरतें और मजबूरियाँ जब अधिकतर घर के लोग ही नहीं समझते तो बाहर कौन समझता है? पुरुषों की जरूरतें हों तो छुट्टियाँ उचित और स्त्रियों की जरूरतें हों तो ऐसी टिप्पणियों के साथ अनुचित करार दिया जाता है कि औरतों के साथ काम करना बहुत मुश्किल है। वे घर और ऑफिस दोनों जगह रहना चाहती हैं…!” अधिकतर वरीय अधिकारी भी पुरुष ही हैं और उनके घर-परिवार और बच्चों की जिम्मेदारी उनकी घरवाली संभालती हैं। अधिकतर पुरुषों को यह भी लगता है कि नौकरी उन्हीं का क्षेत्राधिकार है। औरतें उसमें सेंध मार कर आती हैं। ऐसे पुरूषों को स्त्रियों के साथ काम करना ना गवार गुजरता है। वे गर्व से यह बताने से भी नहीं चूकते कि हमारे घर की स्त्रियों को नौकरी करने की इजाजत नहीं है और जरूरत भी क्या है? बहुत सारे काम होते हैं घर के। 

माही कभी हिम्मत जुटाती कि जहाँ भी रहूँ, बेटू को साथ ही रखूँगी, चाहे जैसे भी हो! पर थोड़ी ही देर बाद उसकी हिम्मत जवाब देने लगती। एक छोटी-सी बच्ची के साथ, एक नये शहर में अकेले रहने की कल्पना से ही वह परेशान हो जाती। समय, समाज, परिस्थितियाँ सब उसे बेतरह डराते। इधर आ रही बुरी खबरों से भी वो हर बार थोड़ा और ज्यादा बेचैन हो जाती। कामवाली भी कोई अच्छी मिले ना मिले। इसकी आशंका के साथ नए शहर में नई कामवाली पर बच्ची को छोड़ना भी उसे असंतोषजनक लगता। उसे बार-बार यह ख्याल भी आता कि बस तीन वर्ष की बात है। फिर वह छट्ठी कक्षा में चली जाएगी और थोड़ी बड़ी भी हो जाएगी तब आगे देखा जाएगा। यही सोच कर माही ने अपने वरीय अधिकारियों से अनुरोध भी किया था कि उसकी बेटी अभी छोटी है। पति की नौकरी भी इसी शहर में है। माता-पिता भी यहीं रहते हैं। अतः उसे इसी शहर में कहीं पोस्टिंग दे दी जाए ताकि वह अपने काम के साथ पारिवारिक जिम्मेदारियाँ भी बेहतर ढंग से निभा सके! पर ऐसा नहीं हो पाया। हाँ, यह सहूलियत जरूर दी गई कि ट्रांसफर ज्यादा दूर नहीं किया गया। 

नई पोस्टिंग वाला शहर इस शहर से 125 किलोमीटर की दूरी पर है। पहले दिन माही ने सुबह जाकर जॉइन किया और शाम को लौट आयी। फिर एक दो दिन में अपनी पुरानी जगह का काम समेट कर वहाँ गयी। चार-पाँच दिन एक होटल में ठहरी। फिर किराये पर एक मकान ले कर थोड़ा व्यवस्थित हुई और बेटू के स्कूल में दाखिले के बारे में पता करने लगी। लेकिन, इस नए शहर को देख कर वह सकते में आ गयी। सोचने लगी कि एक बड़े शहर के एक बढ़िया स्कूल से हटा कर इस कस्बानुमा शहर के स्कूल में बेटू को पढ़ाना सही होगा क्या? ऐसा करना कहीं उसके साथ, उसके भविष्य के साथ अन्याय तो नहीं हो जाएगा? यह एक बड़ा-सा प्रश्न उसके सामने खड़ा हो गया। वह कोई निर्णय नहीं ले पा रही। इस उधेड़बुन में उसे एक और ऑप्शन नजर आने लगा कि क्यों न वह बेटू को, उसी स्कूल के हॉस्टल में डाल दे जहाँ अभी वह पढ़ती है। उसका स्कूल शहर का एक बहुत बढ़िया स्कूल माना जाता है। दूसरे राज्यों से भी बहुत सारी बच्चियाँ इस स्कूल के हॉस्टल में रह कर पढ़ती हैं। वहाँ अपने हम उम्र बच्चों के साथ रह कर पढ़ेगी, खेलेगी, सीखेगी। भाई भी बोल रहा था कि पढ़ाई के मामले में इससे अच्छा कहाँ और क्या मिलेगा?

खुद से कई-कई दिनों की जद्दोजहद के बाद आखिरकार माही ने बेटू को हॉस्टल में डालने का निर्णय ले ही लिया। बेटू को भी समझाया। थोड़ी-सी घबराहट के साथ वह भी हॉस्टल जाने के लिए तैयार हो गयी। तब उसके डैडी ने जा कर उसके स्कूल के प्रिंसिपल से बात की। प्रिंसिपल ने टेस्ट की बात कह कर दाखिले के लिये हामी भर दी। माही और उसके डैडी निश्चित समय पर उसे टेस्ट दिलाने ले गये। बेटू के साथ उन्हें भी हॉस्टल घूम कर, देख-समझ कर तसल्ली करना जरूरी लगा कि हॉस्टल कैसा है, वहाँ व्यवस्था कैसी है, बच्चे कैसे रहते हैं। सब देखने और ठीक-ठाक लगने के बावजूद भी माही के मन में एक घबराहट बनी रही। बार-बार खुद को तसल्ली देती रही कि हटाना तो अपने वश में है। जब भी ऐसा-वैसा कुछ होगा या बर्दाश्त न करने जैसी कोई बात होगी, तभी वापस ले लेगी। कुछ पैसे ही तो बर्बाद होंगे न!

कुछ ही दिनों बाद बेटू के दाखिले संबंधी खबर आ गयी। दो-तीन दिनों में सारी तैयारियाँ कर, भरे मन से, उसके डैडी एवं घर के अन्य लोगों के साथ, माही बेटू को ले कर हॉस्टल के लिए निकलने लगी। गेट पर कामवाली की बच्ची मनीता और धोबी की बच्ची रानी बेटू को विदा करने आयीं। दोनों ही बेटू से छोटी उम्र की हैं। बेटू इनके साथ खूब खेलती है। वे बेटू को एक साथ डर और हसरत से देखने लगीं। बेटू ने उनको देखा और एक उदास मुस्कुराहट के साथ कहा- “मैं हॉस्टल में पढ़ने जा रही हूँ। तुमलोग भी मन लगा कर पढ़ना।” उनसे हाथ मिला कर और हाथ हिला कर बाई-बाई किया और माही की उँगली पकड़ कर बढ़ चली। स्कूल के हॉस्टल में एक बड़े-से हॉल में नये बच्चों के लिये लाइन से दोनों तरफ पलंग लगे थे। बेटू को दिये गये बेड के आसपास उसका सारा सामान व्यवस्थित कर माही ने उसका बेड भी बना दिया। उसकी बगल वाले बेड पर उसकी ही हम उम्र एक और नई बच्ची अपने माता-पिता के साथ आयी। उनसे परिचय के बाद माही ने उस बच्ची से बेटू का परिचय करवाते हुए कहा कि आप दोनों ही यहाँ नए हो, एक दूसरे का ख्याल रखना। लगभग दो घंटे माही वहाँ बेटू के साथ रही। शाम होते ही हेड वार्डन आ कर पेरेंट्स को जाने के लिए कहने लगी। अंदर से बेहद घबराई माही बेटू को हिम्मत बँधा, समझा कर, प्यार कर, किसी तरह वापस आ गयी। सबके होते हुए भी बेटू के बिना घर एकदम से खाली लग रहा। रात होते-होते माही की बेचैनी बढ़ने लगी। पूरी रात वह सो नहीं पायी। बेटू ने खाना खाया होगा या नहीं, कहीं रो तो नहीं रही होगी, …परेशान तो नहीं होगी। उसके बारे में सोच-सोच कर उसका मन छटपटाता रहा। जैसे-तैसे सुबह हुई। दिन भर खुद को समझाती हुई माही का मन आखिरकार नहीं माना और शाम होते ही वह उसके स्कूल पहुँच गयी। 

बच्चों का प्ले टाइम था। बेटू ने माही को दूर से देखा और दौड़ कर आयी। माही ने उसे गले लगा कर प्यार किया। अभी उसे ठीक से देखा भी नहीं कि वह गुस्से में बोल पडी- “मम्मा !! मैं यहाँ नहीं रहूँगी…. रात को मच्छरों ने खूब काटा। आया जी ने मच्छरदानी नहीं लगायी। फैन भी नहीं चल रहा था। मैम ने कहा कि खराब है, कल बन जायेगा….और…और मुझे दूध भी नहीं मिला……।” अपनी नाजो से पली बच्ची की बातें सुनकर माही स्तब्ध रह गयी। उसने बेटू को ध्यान से देखा। उसकी आँखें डबडबाई-सी थीं। वह बहुत उदास लग रही थी और थोडी दुबली भी। हाथ, पैर, चेहरे पर ढेर सारी फुंसियाँ हो गई थीं… मच्छरों के काटने से एलर्जी हो गई थी शायद। माही उसे ले कर तुरंत हॉस्टल वार्डन के पास भागी और सारी बातें बताते हुए लगभग गिड़गिड़ा उठी- प्लीज, थोड़ा ध्यान रखें। छोटी है, अभी अपना ख्याल नहीं रख सकती। आज मच्छरदानी जरूर लगवा दीजिएगा। उसके खाने-पीने और दूध का भी ध्यान रखिएगा, प्लीज।उसके कमरे की वार्डन, 26-27 वर्ष की एक लड़की अनामिका ने माही को समझाने की कोशिश की और पूरा भरोसा दिलाया- “मैम, आप चिंता न करें। कल पहला दिन था। बहुत सारे बच्चे आये हैं। थोड़ी असुविधा हुई है। धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा। आप निश्चिन्त रहें। यहाँ तो इससे भी छोटी-छोटी बच्चियाँ आई हुई हैं……।”  
उसकी बातें सुन-समझ कर माही थोडा शांत हुई। लौटते समय सबसे छुपा कर वहाँ की आया को थोड़े पैसे भी दिए और उससे भी बेटू का ध्यान रखने और मच्छरदानी लगा देने का अनुरोध किया। थोड़ी देर बाद वह बेटू को समझा कर, प्यार कर, तसल्ली दिला कर कहा- “दो-तीन दिन देख लो बेटू, वापस तो जिस दिन हमलोग चाहेंगे, उसी दिन चल चलेंगे।उस शाम माही बेहद दुःखी मन से वापस आयी। फिर रात भर जागती और बेचैनी से करवटें बदलती रही। कहीं उससे कोई गलती तो नहीं हो रही। सोचते-सोचते सुबह हो गयी। आज उसे वापस काम पर जाना था पर उसने सोचा कि आज पहले बेटू से फिर मिलेगी। जब तक बेटू व्यवस्थित न हो जाए, वह वापस नहीं जाएगी और यदि आज भी वह परेशान दिखी तो उसे वापस ले कर घर आ जायेगी। 

शाम होने से थोड़ा पहले ही माही स्कूल पहुँच गयी। पूरी रात सोचने के बाद उसने निर्णय लिया कि कल स्कूल के प्रिंसिपल से मिल कर बात करेगी। पर प्रिंसिपल से मुलाकात नहीं हो पायी। तब वह प्रिंसिपल की सेक्रेटरी से मिली। उसे अपना परिचय देते हुए बेटू की समस्याओं के बारे में बताया। सेक्रेटरी साहिबा ने तुरंत हॉस्टल वार्डन को बुलाया और माही की ओर इशारा करते हुए कहा- “मैम, जो कह रही हैं, उसका ध्यान रखें।” 
यह वही लड़की अनामिका थी जो कल मिली थी। उसने भी माही को देखते ही पहचान लिया और बताने लगी- “मैम, अब वह ठीक है। कल मच्छरदानी भी लग गयी थी और उसे दूध भी मिला था। हाँ, परसो तो नहीं पर कल रात वह थोड़ा रोयी थी।फिर उसने माही से अनुरोधपूर्वक कहा- “प्लीज मैम, आप उससे इस तरह रोज-रोज न मिलें वरना मेरे लिए प्रॉब्लम हो जाएगी। बच्चे पहली बार घर छोड़ कर आते हैं। उन्हें नए माहौल में एडजस्ट करने में थोड़ी-सी दिक्कत होती है। दूसरे बच्चों के साथ घुलने-मिलने में भी थोड़ा समय लगता है। पर धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा। फिर आप देखियेगा, वह घर भी नहीं जाना चाहेगी। आप निश्चिंत रहें।” 
माही ने उसकी सभी बातें सुनी और सहमत भी हुई पर बेटू से मिले बिना वह निश्चिन्त हो कर लौट ही नहीं सकती। वह वहाँ से निकल स्कूल के गेट पर खड़ी हो गयी। थोड़ी ही देर में बच्चियाँ खेलने के लिए बाहर आने लगीं। तभी बेटू अपने बगल वाले बेड की उसी बच्ची के साथ मैदान की तरफ जाती दिखी। कुछ बातें करती हुई और उछल-उछल कर चलती हुई। उसकी चाल देख कर माही ने थोड़ी राहत महसूस की। उसे आवाज़ देनी चाही पर खुद को रोक लिया, सोचा थोड़ी देर उसे यूँ ही वॉच किया जाये। इस बीच अगर बेटू की नजर पड़ गई तो ठीक। वरना गार्ड को भेज कर बुलवा लूँगी। वह यह सब सोच ही रही थी कि उसने देखा बेटू उस बच्ची श्वेता के साथ भागती हुई उसकी तरफ ही आ रही है। माही को संतोष हुआ कि उन दोनों की आपस में दोस्ती हो गई है। माही ने बेटू को गले लगाया। उस बच्ची को भी प्यार किया और उनकी ओर देखने लगी। बेटू कल की अपेक्षा उसे थोड़ी ठीक लगी। वह अपनी धुन में बताये जा रही थी- “मम्मा, कल मच्छरदानी लगा दी थीं आया दीदी ने और दूध भी मिला था हमदोनों को। पर पंखा नहीं चल रहा था… मैम ने कहा है कि कल बन जायेगा। बहुत गर्मी लग रही थी…..मम्मा!” बेटू अभी बता ही रही थी कि वह बच्ची श्वेता बोल पड़ी- “आंटी, कल रात ये रो रही थी।” माही ने बेटू की ओर ध्यान से देखा और पूछा‌‌- “क्यों रो रही थी बेटा?” इस पर बेटू ने कुछ नहीं कहा पर श्वेता ने फिर कहा- “इसे मम्मी की याद आ रही थी।‘’ सुन कर माही का मन भर आया पर उसे जाहिर न करते हुये उसने बेटू को खूब प्यार किया और पढ़ाई, करियर, समय, डिसिप्लिन इत्यादि के बारे में समझाया। उसकी सहेली को भी प्यार किया और फिर कहा कि तुम दोनों एक दूसरे का ख्याल रखना बेटा, समय से खाना, खेलना और पढ़ाई भी खूब मन लगा कर करना।‘’

बेटू को समझा कर माही घर लौटी और दूसरे दिन अपनी नौकरी वाली जगह पर आ गयी। ऑफिस में दिनभर यंत्रवत् काम करती रही पर मन बेटू के पास ही टंगा रहा। हॉस्टल में बच्चों से मुलाकात का दिन तय किया गया है पर उसके लिये अभी उसे लगभग तीन सप्ताह इंतजार करना है। लाख खुद को समझाने के बावजूद यहाँ आ कर माही की बेचैनी थोड़ी और बढ़ गई। उसे बार-बार लग रहा है कि कहीं गलत कदम तो नहीं उठा लिया। कुछ दिनों के बाद, एक शाम जब किसी तरह से मन नहीं माना तब उसने भाई को फ़ोन किया- “भाई, कल एक बार बेटू के पास चले जाना न। मेरा मन जाने कैसा-कैसा हो रहा है!” 
ठीक है! चला जाउँगा पर मुझे यह बिलकुल भी अच्छा नहीं लग रहा है कि तुमने उसे हॉस्टल में डाल दिया है।‘’ उसने कहा।  

दूसरे दिन रात को भाई ने फोन पर माही को बताया- ‘’जानती हो दीदी, शाम को बेटू के स्कूल गया था तो प्लेग्राउंड में ही उससे मुलाकात हुई। उसकी आँखें सूजी हुई थीं। पूछ्ताछ करने पर उसने बताया कि कल सुबह से ही उसकी आँखों में इंफेक्शन है। खुजली भी हो रही है। वार्डेन मैम ने कोई दवा दी है। फिर मैंने वार्डेन मैम से मिल कर उस दवा के विषय में जानकारी ली तो पाया कि बेटू को सही दवा नहीं पड़ रही। मुझे बहुत गुस्सा आया और मैंने वार्डेन को अच्छे से सुना दिया। फिर एक परिचित डॉक्टर से पूछ कर दूसरी दवा ला कर वार्डेन को दिया। ध्यान से समय-समय पर डालने के लिए कह कर आया हूँ।‘’ माही पर भी थोडी नाराजगी जताते हुये उसने फिर कहा- गर्मी की छुट्टीयों में जब बेटू आएगी तो उसे वापस नहीं जाने दूँगा।”

माही ने चुपचाप उसकी बातें सुनी और अंदर ही अंदर बहुत परेशान हुई। पर अपनी हालत वह किसी से भी नहीं बता पा रही। दो-तीन दिनों तक वह स्कूल के आफिस में फोन कर बेटू का हाल-समाचार लेती रही। जल्द ही बेटू की आँखें ठीक हो गयीं। माही बेजान मशीन की तरह हर काम करती और खुद को समझाती रहती कि यह बेटू के जीवन का बेहद महत्वपूर्ण समय है। अभी कठिन जरुर है मगर आने वाला समय आसान हो जाएगा। इस दुनिया में अच्छे से जीने के लिए बहुत सारे समझौते करने होते हैं और अपनी इच्छानुसार कुछ पाने के लिए बहुत कुछ खोना भी पड़ता है। इस बीच माही को बेटू कि लिखी हुई दो चिट्ठियाँ मिलीं जो उसने इंग्लिश में जैसे-तैसे अपने टेढ़े-मेढ़े हैंडराइटिंग से पोस्टकार्ड पर लिखी थी। दोनों के मजमून लगभग एक से ही थे- 
हाइ मम्मा,
हाउ आर यू
आइ एम मिस्सिंग यू वेरी मच। प्लीज कम सून एंड ट्राइ टू मीट मी. टेक मी होम। आइ वांट टू स्टे विद यू। माइ एक्जामीनेशंस आर आलसो स्टार्टिंग फ्रॉम 5th जुलाई एंड आइ हैव नॉट स्टडीड एनी थिंग।  आइ डोंट नो व्हाट आइ विल डू इन द एक्सअम्स। 
सो टेक द परमिशन फ़ॉर गोइंग होम फ़ॉर थ्री डेज। प्लीज प्लीज प्लीज एंड सेंड मी पार्सल ऑल्सो।

नीचे बेटू ने अपना नाम नहीं लिखा था। शायद भूल गई हो, माही ने सोचा और बेटू की बेचैनी से वह भी बेचैन हो गई। फ़ोन पर बेटू से बहुत-सी बातें की। उसे सांत्वना दी और घर पर कह कर उसका पार्सल भिजवा दिया।  

दिन गिनते-गिनते आखिरकार 27 तारीख आ गयी। बेटू के मनपसंद का खाना-पीना और उसकी प्रिय जिनी (पालतू डॉगी) को ले कर माही उसके स्कूल पहुँच गयी। बेटू और जिनी एक दूसरे को देखते ही खुशी से लिपट गये। इस बार जब माही बेटू से मिली तो वह थोड़ी ठीक-ठाक लगी। उसकी फ्रेंड से बातें करने से पता चला कि बहुत सी बातें बेटू ने उसे नहीं बताया है। उसकी फ्रेंड ने बताया- “आंटी, मनु को रात में डर लगता है। रोती है कभी-कभी। अभी भी कई बार मच्छरदानी नहीं लगी होती है। पँखा अब तक भी नहीं बना….” माही को थोड़ा अजीब लगा। 
बेटू, आपने फोन पर बताया नहीं मुझे?” माही ने पूछा।
मच्छर नहीं काटता है, मम्मी और अब गर्मी भी नहीं लगती है। लेकिन, नहाने के लिए पानी कम रहता है न तो आया जी थोड़े थोड़े पानी से नहला देती हैं। सिर पर पानी सप्ताह में सिर्फ दो बार ही डालना होता है। इत्यादि-इत्यादि….।” बेटू ने बहुत सी बातें सामान्य तरीके से बतायी।

इस बार बेटू से मिल कर, माही को बहुत ज्यादा परेशानी जैसी कोई बात नहीं लगी। तीन घंटे की मुलाकात का समय खत्म होने के बाद माही घर लौट आयी और फिर दूसरे दिन भी उससे मिलने गयी। दोनों ही दिन, बेटू ने एक दो बार यह जरूर कहा कि घर ले चलो मम्मा। मैडम से परमिशन ले लो। दो दिन के बाद फिर पहुँचा देना। पर हमेशा के लिए यहाँ से ले चलो’, ऐसी कोई बात उसने नहीं कही। उसने कहा- मैं आपका इतना सारा पैसा बर्बाद नहीं करूँगी मम्मी। मैं जानती हूँ कि आप मेरे भविष्य के लिए, मेरी पढ़ाई के लिए कितनी मेहनत करती हो। मैं इस साल भर यहीं पढ़ लूँगी पर अगले साल मुझे जरूर डेस्कॉलर बना देना।
मेरी छोटी सी बच्ची कितनी समझदार हो गयी है।” उसे प्यार करते हुए माही ने कहा। उसका मन भर आया। पर उसे बेटू की बातों से थोड़ी शांति भी मिली। मुलाकात के समय खत्म होने के बाद माही प्रिंसिपल के कमरे में गयी। वहाँ किसी से मुलाकात नहीं हो पायी। तब हॉस्टल वार्डन से मिली और मच्छरदानी और पँखे के बारे में फिर कहा। वार्डन ने पहले की तरह फिर तसल्ली दी कि जल्द ही बनवा लिया जाएगा, मैम। वैसे उस हॉल में पाँच पँखे लगे हैं। एक ही पँखा खराब है तो गर्मी उतनी नहीं रहती है। फिर भी माही ने उससे बेटू का ध्यान रखने के लिए पुनः अनुरोध किया और वापस घर आ गयी।

दुसरे दिन माही अपने काम पर लौट आयी। बेटू अब लगातार उसके साथ इस तरह बनी रहती जिस तरह वह साथ रह कर भी कभी नहीं रहती थी। अब कभी-कभी माही की सोच में यह भी आने लगा कि 11 मई से बेटू की गर्मी की छुट्टियाँ शुरू हो रही हैं। उसके बाद अगर बेटू वापस हॉस्टल जाना चाहेगी तभी भेजूँगी। अगर नहीं जाना चाहेगी, तो नहीं भेजूँगी। डेस्कॉलर करवा लूँगी। लेकिन, उसके अंदर से ये आवाज़ भी आती रहती कि अगर बेटू हॉस्टल में एक बार सेटल हो जाए तो उसकी जिंदगी बन जाएगी। घर पर तो कोई रूटीन मेंटेन होती ही नहीं। दौड़-धूप वाले गेम्स भी नहीं हो पाते हैं। खेलने की जगह और दोस्त नहीं हैं आसपास। वहाँ अपने हम उम्र की लड़कियों के साथ, उनके बीच रहने से बहुत-सी बातें सीखेगी। अपना ख्याल रखना, सबके साथ रहना, खुद से पढ़ना, बुक संभालना, स्कूल जाना इत्यादि। अगर उसका अगला ट्रांसफर कोशिश कर के इसी शहर में हो जाता है तो उसे डेस्कॉलर करवा लेगी। साथ रहते हुए उसका टेंथ हो जायेगा और फिर प्लस टू के लिए उसे बाहर भेज देगी। 

अनेक तरह की आशंकाओं, सम्भावनाओं में डूबती-उतराती माही दिन गिनती रही। 11वीं तारीख आते ही वह छुट्टी ले कर सुबह-सुबह ही वापस आयी और बेटू के स्कूल जा कर उसे घर ले आयी। जितने दिन बेटू घर पर रही, उत्सव सा माहौल रहा। मनीता और रानी भी उसके आगे-पीछे घूमती रहतीं। बेटू उन्हें हॉस्टल की कहानी सुनाती, पढ़ाई का महत्व समझाती और टीचर-टीचर खेलते हुए उन्हें पढ़ाती भी। इस बीच में माही उसे एक सप्ताह के लिए अपने कामवाले शहर भी ले गयी। ऑफिस टाइम में अपने मकान मालिक के यहाँ बेटू को पहुँचा देती और शाम में वापस ले आती। वहाँ उसकी हम उम्र दो बच्चियाँ हैं जिनसे बेटू की अच्छी दोस्ती हो गयी। देखते-देखते छुट्टियाँ बीत गयीं और बेटू के वापस हॉस्टल जाने का दिन आ गया। सब लोग उदास थे। पर इस बार बेटू ने खुद कहा- “मम्मा, इस बार मैं अपनी फ्रेंड से प्रॉमिस कर के आई हूँ। इसलिए जाना तो होगा ही। पर एग्जाम के बाद मुझे डेस्कॉलर बना देना।” 
ठीक है, बेटू, पर तुम मन लगाने की कोशिश करना बेटा और पढ़ाई पर भी ध्यान देना।” माही खुश हो कर बोली। 
हाँ मम्मा !” बेटू ने कहा तब माही एक तसल्ली से भरी घर लौट आयी। उसे बेटू की बातें सुन कर गर्व महसूस हुआ कि उसकी छोटी सी बच्ची को भी प्रॉमिस का मतलब पता है। जबकि कई बार बड़े-बड़े लोग भी इस शब्द की गरिमा का ख्याल नहीं रखते। 

बेटू को वापस हॉस्टल पहुँचाने के बाद माही भी अपने काम पर वापस आ गयी। एक दिन अचानक बेटू का फोन आया, रुआँसी आवाज़ में उसने कहा- मम्मा, मेरा एग्जाम आ रहा है और मैं बिलकुल नहीं पढ़ पा रही हूँ। मुझे घर ले चलो….वहाँ पढ़ लूँगी और एग्जाम के पहले मुझे यहाँ पहुँचा देना.. अगर तुमने ऐसा नहीं किया तो मैं फेल हो जाउँगी।‘’ 
माही उसकी बातों से ज्यादा उसकी आवाज़ सुन कर परेशान हुई। पर आफिस से छुट्टी लेना अभी सम्भव नहीं था। उसने बेटू को बहुत समझाया। जैसे सभी बच्चियाँ पढ़ रही हैं बेटू, वैसे ही आप भी पढ़ो, जैसा सबका एग्जाम होगा आपका भी वैसा ही होगा। परेशान न हो। फिर भी बेटू परेशान ही रही तो माही ने कहा‌- ‘’ठीक है, बेटू, इस बार एग्जाम दे लो। उसके बाद आप बोलोगी तो हॉस्टल से निकाल कर डेस्कॉलर बनवा दूँगी।‘’  
‘’ठीक है, मम्मा!’’ बेटू ने कह तो दिया पर बहुत उदास स्वर में।
एग्जाम के दो दिन पहले माही ने अपनी छोटी बहन को फोन कर कहा कि वह बेटू से जा कर मिल ले। वह बहुत टेंशन में होगी। समझाना उसको कि परेशान ना हो। यह हाफ इयरली एग्जाम है। अगर अच्छा नहीं भी हुआ तो कोई बात नहीं। अगले एग्जाम में खुद को सुधार लेगी। रात में छोटी बहन ने माही को फोन पर बताया कि वह शाम को स्कूल गई थी। बेटू खेल रही थी। उसे देखा तो दौड़ कर आई। देखने से ठीक-ठाक लग रही थी पर पूछने पर बोली कि अच्छा नहीं लगता यहाँ, मेरा मन नहीं लगता है। मम्मी बोली हैं एग्जाम के बाद डेस्कॉलर बना देंगी। तब माही ने कहा- “हाँ, मैं सोच रही हूँ। मुझे भी यहाँ बिल्कुल अच्छा नहीं लगता। कुछ नहीं कर पा रही हूँ। न ठीक से खाना-पीना और न ही कुछ कंस्ट्रक्टिव ही कर पा रही। हमेशा लगता रहता है, पता नहीं बेटू ने खाया होगा या नहीं। उसे दूध मिला होगा या नहीं। वो खुश होगी या उदास। रोती तो नहीं होगी…बहुत मुश्किल से दिन बीत रहे हैं। सोच रही हूँ, एग्जाम के बाद तक भी, अगर बेटू कम्फर्ट नहीं महसूस करेगी तो  इसी महीने के अंत तक उसे घर ले आऊँगी।” 
हाँ, यह ठीक रहेगा दीदी। सही सोच रही हो। हम सब को भी बहुत बुरा लगता है उसके बिना और उसके बारे में सोच-सोच कर मन दुखी रहता है। हम सब मिलकर उसको और उसकी पढ़ाई देख लेंगे। तुम बिलकुल परेशान मत होना।छोटी बहन ने खुश होते हुये कहा।
माही ने जैसे-तैसे दिन काटे और बेटू की परीक्षा के कुछ दिनों बाद यह सोच कर उससे मिलने स्कूल गयी कि शायद अब उसका मन थोड़ा-थोड़ा लग गया हो।  पर इस बार उसे बेटू और भी ज्यादा उदास दिखी। रोती हुई कहने लगी- “मम्मा, मुझे घर ले चलो, मैं घर पर बहुत अच्छे से पढूँगी। मैं यहाँ ठीक से नहीं पढ़ पा रही हूँ… मेरा एग्जाम भी अच्छा नहीं हुआ….!’’ माही चुपचाप उसकी बातें सुनती रही। 
‘’मुझे घर की भी बहुत याद आती है… जिनी भी मुझे ढूँढ्ती होगी। मुझे मनीता और रानी के साथ खेलना है.. और उनको भी पढ़ाना भी है। प्लीज, मम्मा, मैं आपकी सब बात मानूँगी। TV भी नहीं देखूँगी…..।‘’
अच्छा बेटू, ठीक है। पर आज तो संडे है न। कल सुबह जब स्कूल खुलेगा, तब आ कर प्रिंसिपल मैम से बात करूँगी। आज रात तक तुम अपना सामान सँभाल लेना। पर सुबह क्लास नहीं छोड़ना, बेटा। क्लास के बाद मैं तुम्हें घर ले चलूँगी।” माही ने खुद को संभालते और उसे बाहों में भर कर समझाते हुए कहा।
ठीक है, मम्मा! …अब तुम घर जाओ…. कल जरूर आ जाना। मैं अपनी फ्रेंड्स को बताने जाती हूँ..!” बेटू बहुत खुश हो, चहकती हुई बोली और दौड़ती हुई बच्चों के झुंड में शामिल हो गयी।
बेटू की बातें सुन कर अब तक खुद को कठोर बना रही माही बेहद कमजोर महसूस करने लगी। 

घर आ कर माही ने बेटू के डैडी से बात की और कहा कि कल ही वह बेटू को हॉस्टल से वापस ले आयेगी और माँ-पापा के घर पर रखेगी। बेटू वहीं से अपना स्कूल करेगी। माँ के घर पर भी यह बात सबको बतायी। सब बहुत खुश हुए और आखिरकार एक ऐसी निश्चिन्तता-भरी सुबह हुई जिसका सबको इंतजार था। माही नियत समय पर स्कूल पहुँची और प्रिंसिपल मैम को आवेदन दे कर बेटू को डेस्कॉलर बनाने का अनुरोध किया। थोड़े ना-नुकुर के बाद प्रिंसिपल मैम सहमत हो गयीं और बताया कि नियमानुसार फीस वापस नहीं हो सकेगी। माही ने कहा कि कोई बात नहीं और तेजी से बेटू को लेने हॉस्टल की ओर भागी। बेटू का क्लास खत्म हो चुका था। वह हॉस्टल के बाहर बरामदे में खड़ी मम्मा का इंतजार कर रही थी। माही को देखते ही उछल पड़ी और लिपट गयी। मम्मा-बेटू ने सब सामान संभाला और घर वापस आ गयी जहाँ सभी उसके इंतजार में थे।

दूसरे दिन माही बेटू को स्कूल भेज कर उसके कमरे में उसकी चीजें व्यवस्थित करने लगी। उसकी किताबें-कॉपियाँ सँभालते हुए उसे बेटू के लिखे हुए कुछ पन्ने मिले जो लाइन वाली, छोटी कॉपी से फाड़े हुए दो- तीन पन्नों में, पेंसिल से, ऊपर-नीचे, टेढ़ी-मेढ़ी हैंडराइटिंग से आधी हिंदी, आधी इंग्लिश में जैसे-तैसे लिखी हुयी थी। पहले पन्ने का शीर्षक था-

श्वेता के बारे में
श्वेता आजकल नकचढ़ी हो गई है। वह मेरे साथ अच्छा बिहेव नहीं करती है। बहुत सेल्फिश भी हो गयी है। सिर्फ अपना सोचती है। जब तक मेरे पास टक (जिसमें बच्चे अपने खाने-पीने का सामान रखते हैं) था और सोनिया के पास नहीं था। तब तक वह मेरे साथ रहती थी। अब जब मेरा टक खत्म हो गया और सोनिया का नया टक आ गया तब उसने मेरे साथ रहना बंद कर दिया है और सोनिया के साथ रहने लगी है। मैं उसे अब अच्छी तरह समझ गई हूँ जिसके पास भी कुछ अच्छी चीजें होती हैं श्वेता उसी के साथ रहने लगती है और मुझ पर बिलकुल भी ध्यान नहीं देती। मैं कुछ बोलती रहती हूँ पर वह आंसर भी नहीं देती जैसे कि सुनी ही नहीं हो। उसकी इन्हीं सब बातों के कारण अब मुझे वह अच्छी नहीं लगती। उसे सब कहते हैं कि वह ड्राइंग अच्छा करती है। वैसे वह करती भी अच्छा है और क्लास में पढ़ाई भी अच्छा करती है। पर उसे घमंड बहुत हो गया है। जब पहली बार उससे मिली थी तो बहुत अच्छी लगती थी पर अब वह बिगड़ गयी है। वह मुझे भी अब पसंद नहीं करती शायद। इसीलिए अब मैं उसके साथ नहीं रहूँगी। कुछ भी गलती हो तो वह मुझपर चिल्लाती है। मुझे उसके साथ नहीं रहना। घर पर मेरी जो दोस्त हैं, वे मुझे बहुत प्यार करती हैं। चाहे मेरे पास उन्हें देने के लिए कुछ हो या न हो। वे मुझे इम्पोर्टेंस देती हैं और यहाँ श्वेता मुझे बिल्कुल भी इम्पोर्टेंस नहीं देती। नेहा अच्छी है। श्वेता की तरह नहीं करती। पहले मेरी तीन फ्रेंड थी। फिर जब सोनिया चली गई तो दो हो गई। अब बस एक ही दोस्त रह गई नेहा। मुझे बहुत बुरा लग रहा है। मम्मी ने श्वेता से मेरी दोस्ती कराई थी। पर अब वह पहले जैसी नहीं है।

दूसरा पन्ना- 
आज मम्मी आने वाली हैं। मुझे खुश रहना चाहिए। मैं आज खुश रहना चाहती हूँ। मैं दुखी या उदास दिखूँगी तो मम्मी को अच्छा नहीं लगेगा वह परेशान हो जाएंगी। मैं श्वेता के कारण दुखी नहीं रहना चाहती। वह मेरी दोस्त नहीं हो सकती। दोस्त वह होता है जो दुख और सुख में दोनों में साथ देता है पर श्वेता केवल सुख में ही मेरे साथ रहती है और दुख में वह मुझे छोड़ कर चली जाती है। ऐसी दोस्त, दोस्त नहीं कहलाएगी। मम्मी को नहीं पता उसने मुझे गलत लड़की से दोस्ती करवाई है। पर मैं श्वेता से दोस्ती रखना चाहती हूँ अगर वह मुझसे अच्छे से बिहैव करे तब। मैं आज नहाने के समय तक उसका बिहैव चेक करूँगी। हो सकता है उसके बारे में मैं गलत सोच रही होऊँ और वह ऐसी नहीं हो।


तीसरा पन्ना
आज एग्जाम की दो कॉपियाँ दिखाई गयी हैं। मैं एक सब्जेक्ट में फेल कर गयी हूँ। मैं ठीक से पढ़ नहीं पा रही हूँ। प्लीज गॉड, मुझे बाकी सभी एग्जाम में पास कर देना। मैं आपसे प्रॉमिस करती हूँ कि सेकंड टर्म में बहुत अच्छा रिजल्ट करूँगी। प्लीज गॉड, अब किसी सब्जेक्ट में  फेल मत करना और किसी किसी में अच्छा मार्क्स भी दे देना जैसे 69, 63, 71, 75 ऐसा मार्क्स भी दे देना। मैं आपसे इतना प्रॉमिस कर रही हूँ प्लीज, बाकी सभी सब्जेक्ट में मुझे पास कर देना। मैं एक अच्छी लड़की बनकर दिखाऊँगी। सबसे अच्छे तरीके से बात करूँगी जो सब कहेंगे वही करूँगी। अगर आपने ऐसा नहीं किया तो मम्मी बहुत गुस्सा करेगी और मुझसे बात करना बंद कर देगी। प्लीज गॉड, आप कुछ करो ना मैं आपसे प्रॉमिस करती हूँ। मैं बहुत मन लगाकर पढूँगी प्लीज..!  

इन पन्नों को पढते-पढते माही की आँखों से आँसू बह निकले। उसके शरीर की सारी शक्ति अचानक से खत्म हो गयी और वह वहीं जमीन पर धम्म से बैठ गयी और फूट-फूट कर रो पडी- “सॉरी बेटू …वेरी सॉरी ….!!” थोड़ा संभलने के बाद हॉस्टल में अपनी नन्ही-सी बच्ची की मनःस्थिति और उसकी संवेदनाएँ महसूस कर वह एक संतोष से भर गयी- “बेटू, आप मेरी बहुत बहादुर बेटी हो, आपने इतनी छोटी उम्र में जीवन का इतना कठिन-कठिन पाठ पढ़ लिया …शाबास बेटू !!”

सुषमा सिन्हा
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3 टिप्पणी

  1. मन को भावुक कर देने वाली माँ और बेटी के संबंधों की अति सुंदर कहानी। माँ के मन के अंतर्द्वंद का बहुत सटीक चित्रण इस कहानी में किया गया है।

    • कृष्ण कुमार गुप्ता जी,
      आपकी प्रतिक्रिया से मेरा उत्साहवर्धन हुआ। आपका हार्दिक आभार।

  2. कृष्ण कुमार गुप्ता जी,
    आपकी प्रतिक्रिया से मेरा उत्साहवर्धन हुआ। आपका हार्दिक आभार।

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