Wednesday, May 22, 2024
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कमला नरवरिया की कहानी – जिंदगी दोबारा

आज कोर्ट ने उनके रिश्ते पर डिवोर्स की मुहर लगा दी थी।ध्वनि किसी हारे हुए जुआरी की भांति भारी कदमों से उस घर से अपना सामान लेकर निकल रही थी। हा वहीं घर जो कभी उसका अपना था और कभी जिसके कोने – कोने को उसने बडे प्यार व जतन से संवारा था बेडरूम से लेकर बालकनी तक घर की हर चीज मे उसके प्राण बसते थे। बेडरूम में बिछी वह लाल कालीन जिसे वह समीर के साथ दुबई से लाई थी। आज जैसे उसे मुँह चिढा रही थी।बालकनी व लॉन मे लगे फूल – पौधे व लताएं  जिन्हें उसने बडे प्रेम से सींचा था । आज  जैसे मुरझाए से उसे अलविदा कह रहे थे।आंगन में फुदकती चिडिया उसे जाते हुए देखकर चुप थी ड्रॉइंग रुम की दीवार पर टंगी वो मां -बेटे की पेंटिंग जिसे उसने खुद अपने हाथों से बनाई थी आज जैसे अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रही थी। वैसे उसे इस पेटिंग से बहुत लगाव था। उसे बच्चे बहुत अच्छे लगते थे  …  मां बनने की उसकी हसरत …जिसका समीर ने अभी तो हम बच्चे है कहकर गला घोटा दिया था।
समीर के प्यार में डूबी वह उसकी हर बात पर आंख मूंदकर भरोसा करती रही।
और जब तक आँखों से विश्वास की पट्टी हटी तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
जाने ,कब, कहां और कैसे उसकी सबसे बेस्ट फ्रेंड मीता उसके और समीर के बीच आ खडी हुई थी ।
और भरोसे की वह नींव जिसपर उसका रिश्ता खडा था अचानक से भराभराकर गिर गई।
उसनें एक लंबी सांस ली और डबडबायी आंखों पर काला चश्मा चढा कर कार में आकर बैठ गई।
एक बार उसने पलटकर उस घर को देखा जहां समीर अभी भी मीता के साथ दरवाजे पर खडा था।उसे देखकर उसका मन हुआ ।
काश! समीर एक बार उसे जाने से रोक ले तो वह सारे गिले- शिकवे भुलाकर वापस लौट जाये। ड्राइवर ने कार स्टार्ट कर दी । जो सीधी- सपाट सडक पर तेज रफ्तार से आगे बढी जा रही थी और उसी के साथ उसका मन भी कही पीछे छूटता सा जा रहा था।
वह कॉलेज का पहला साल था। जब वह अपने मां पापा से दूर इस अजनबी शहर में पढने आई थी । आँखों मे सुनहरे भविष्य के सपने संजोए थोड़ी खुशी थोड़ी भय से भरी कॉलेज मे पहला कदम रखते ही वह जिस शख्स से टकराई वह समीर था  फिर तो उस दिन के बाद वे दोनों अक्सर कही न कही टकरा जाते कभी लाइब्रेरी, ,कभी कैंटीन ,कभी क्लासरुम में।
” तुम देखकर नही चल सकती हो ।पूरे कॉलेज में क्या सिर्फ मैं ही तुम्हें मिलता हूं टकराने के लिए ।”समीर उससे चिढकर कहता।
“यही बात मैं तुमसे कहूं तो ।”वह भी खीजकर उससे कहती।
थोड़ी सी नोकझोंक के बाद दोनों अपने- अपने रास्ते चल देते।
पता नही अपने आपको क्या समझता है जैसे कही का शहजादा हो।”
वह होस्टल के कमरे में आते हुए बडबडा रही थी ।
तभी मीता वहां आ गई।
” क्या हुआ ध्वनि तुम्हारा इतना मूढ ऑफ क्यों है?” 
मीता ने उससे पूछा।
“अरे कुछ नही वो समीर है ना।”
“हाय वो हैडसमहंक ।” मीता ने चहकते हुए कहा।
“हा वही पता नही अपने आप को क्या समझता है? जब देखो तब मुझसे टकराता रहता है और ऊपर से  मुझ पर इल्जाम लगाता है कि मैं उसे देखकर क्यों नहीं चलती हूं।वो क्या कही का रायसाहब है? जो मैं उसे देखकर चलू ।”ध्वनि ने अपना गुस्सा जाहिर करते हुए कहा।
“हाय! ध्वनि तू कितनी किस्मत वाली है ।जो वो तुझसे टकराता है ।क्या तू नही जानती कॉलेज की सारी लडकिया उस पर अपनी जान छिडकती है।एक तू है जो इतना भाव खा रही है।” मीता ने आहे भरते हुए कहा ।
“तो मैं क्या करु।” ध्वनि ने बेरुखी से कहा।
तू अपना मूढ मत खराब कर चल आज थियेटर में लगी नयी हॉलीवुड मूवी देखकर आते है।
मीता ने उसका मूढ चेंज करने के इरादे से कहा ।
“ठीक है ।”
फिर दोनों मूवी देखने साथ चल दी। दोनों ने साथ में खूब मस्ती की। हॉस्टल तक आते- आते काफी रात हो गई। 
दोनों चौकीदार और वार्डन की नजरों से बचते बचाती  अपने रुम मे पहुंची।
“मीता तू मेरी सबसे बेस्ट फ्रेंड है एक तू ही है जो मुझे इतने अच्छे से समझती है लव यू मीता”
“चल- चल तू इतना ज्यादा रोमांटिक मत हो और तू अपना ये लव यू ना मेरे जीजू के लिए बचाकर रख।”
“पता नही कौन होगे तेरे जीजू।” कहकर वह तकिए को अपने सीने से लगाते हुए करवट बदलकर सो गई।
कुछ दिनों बाद मीता ने चुटकी लेते हुए उससे पूछा
“अरे ध्वनि आजकल तुझसे समीर नही टकरा रहा है।”  
“हा अब उसका यही काम तो रह गया है मुझसे टकराना।”
ध्वनि ने चिढते हुए उससे कहा।
“वैसे मीता वाकई बहुत दिनों से वो मुझे भी दिखाई नही दिया।”
ध्वनि ने थोड़ी सी चिंतित होकर मीता से कहा।
चल मैं पता करती हूं तेरा वो हैडसम हंक कहा है।मीता ने ध्वनि को चिढाते हुए कहा।
मीता की बच्ची आज मैं तुझे छोडूंगी नही ।
वह मीता का पीछा करते हुए दौड पडी तभी सामने आ रहे शख्स से वह टकरा कर जमीन पर गिर गई।
उसने सामने देखा समीर खडा था।
“हाय मैं मर गई अब खामख्वाह साहबजादे के लेक्चर सुनने पडेंगे।”
सॉरी बोलकर उसने अपना पीछा छुडाना चाहा।
“सॉरी तो मुझे तुमसे बोलनी चाहिए।”
समीर के मुँह से सॉरी सुनकर उसे लगा कही वह सपना तो नही देख रही ।
समीर और सॉरी…इंम्पॉसिबल
“एक्चुअली ध्वनि मैं तुमसे ही मिलने आ रहा था।”
क्या उसने चौककर कहा?
“हा मेरी अभी कुछ दिनों से तबीयत खराब थी सो क्लास अटेंड नही कर पाया।”
“क्या तुम मुझे अपने नोटस दे सकती हो?”
उसकी बात सुनकर ध्वनि आत्ममुग्ध सी हो गई और होती भी क्यों न वह क्लास में हमेशा अव्वल जो आती । और क्लास का हर बंदा उससे नोटस लेना चाहता था।
“हा क्यों नहीं?” ध्वनि ने मुस्कुरा कर कहा और उसे अपने नोटस दे दिये।
उस दिन के बाद  से दोनों में अच्छी दोस्ती हो गई। अब उसे  समीर से क्लास की बाकी लडकियां का बात करना अच्छा नहीं लगता । और समीर को लेकर मीता का उसे चिढाना अब उसके हृदय में एक अजीब सी गुदगुदी से भर जाता। किसी अनजानी  सी डोर मे बंधी वह धीरे – धीरे समीर की ओर खींचती जा रही थी।और समीर उसकी ओर।
जिसे मीता भी महसूस कर रही थी।
कॉलेज के आखिरी साल तक आते -आते उनका यह रिश्ता और प्रगाढ़ होता गया ।और कॉलेज की पढाई के बाद उनका एक अच्छी कंपनी में प्लेसमेंट हो गया। इत्तेफाक से समीर और उसका एक ही शहर में प्लेसमेंट हुआ। मीता आगे की पढाई के लिए विदेश चली गयी।
उन्होंने शादी के बंधन में बंधने का निश्चय किया।समीर के परिवार को इस रिश्ते से कोई ऐतराज नही था लेकिन उसके मां पापा समीर से इस शादी के लिए राजी नहीं थे । उनके अनुसार समीर उसके लिए ठीक नही था।
लेकिन अपनी इकलौती बेटी के जिद के आगे उसके मां पापा भी झुक गये।
वह और समीर विवाह बंधन में बंध गए ।
जिंदगी अपनी रौ मे चल रही थी। उसे ऐसा लग रहा था जैसे सारी दुनिया की खुशियां उसके आंचल मे समा गई हो।पर ये खुशियां ज्यादा दिन नही चली।उसकी खुशियों को किसी की नजर लग गई।
एक दिन मीता का फोन आता है कि वह बहुत परेशानी में है । क्या वह कुछ दिन उसके यहां आकर रुक सकती है?
“कैसी बात करती हो मीता यह तुम्हारा अपना ही घर है।जब चाहो तब आ जाओ।”
और सचमुच मीता ने उसकी कही बात को सच कर डाला।उसने समीर पर न जाने कैसा जादू किया कि वह उससे दूर होता गया और एक दिन उसने समीर और इस घर को अपना और उसे बेगाना बना दिया।
वह तो हमेशा उनके बीच होने वाली हंसी – चुहल, मस्तीमजाक और नोकझोंक को सामान्य ही समझती रही।जब तक वह इसके पीछे की सच्चाई को समझ पाती तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
“क्या उसका रिश्ता इतना कमजोर था जो एक ही झटके में टूट गया?आखिर उसके प्यार में कहा कमी रह गई ?”
अनेक प्रश्न उसके मन को मथते रहते और उसका हृदय पीडा से भर उठता।
वह टूटा हुआ दिल और टूटे हुए सपने लेकर इस अजनबी शहर में आ गई। जहां कंपनी ने अपना एक नया प्रोजेक्ट लॉन्च किया था। अपने गम को भुलाने के लिए उसने अपने आपको  पूरी तरह काम में डूबो दिया । फिर भी यादें किसी सांप के फन की तरह सिर उठाकर उसे डसती रहती ।वह हैरान थी कि जिन यादों से पीछा छुड़ाने के लिए वह इस नये शहर में आई थी वह यहां आकर भी उसका पीछा नहीं छोड़ रही थी।
उसका दिन तो फिर भी किसी तरह ऑफिस के काम मे निकल जाता लेकिन शामें खलिश भरी होती, एक उदासी सी तारी रहती। वह बाहर से भले ही मजबूत दिखती लेकिन अंदर से उतनी ही टूटी हुई महसूस करती।
अपनो से जो घाव मिला था धीरे – धीरे वह नासूर बनता जा रहा था उसे अपनी जिंदगी बेमानी सी लगती वह जितना इस दर्द को भूलाने की कोशिश करती वह उतना ही बढ़ता जाता । उसे इस दर्द से मुक्ति का उपाय मृत्यु ही लगती लेकिन मां पापा का ख्याल आ जाने से खुद को रोक लेती।
ऐसे मुश्किल समय में उसे साहिल मिला। किसी पहाड़ी झरने की भांति मन को ठंडक सा पहुंचाता वह लडका बेहद सौम्य व शांत स्वभाव का था ।उसकी बच्चों सी निश्छल हंसी उसे बहुत अच्छी लगती।वह भी उसी के साथ इस प्रोजेक्ट पर काम कर रहा था। 
इस मानसिक अवसाद से उभरने मे साहिल ने उसकी बहुत मदद की। उसकी सलाह पर ही वह डॉक्टर निखिल लालवानी से मिलने को तैयार हुई। जिनकी काउंसलिंग और दवाओं से वह धीरे – धीरे इस अवसाद से उभर रही थी । साहिल की जिंदादिली और सकारात्मक सोच उसे जीवन के प्रति अधिक कृतज्ञ बनाती लेकिन अपनों द्वारा ठगे जाने से प्रेम और विश्वास जैसे अमूल्य भावों से उसका विश्वास उठ चुका था यही कारण था जब साहिल ने उसे प्रपोज किया तो वह उसे स्वीकार नहीं कर पाई।
“सॉरी साहिल अब मेरा प्रेम शब्द से विश्वास उठ चुका है। शायद अब मैं फिर कभी किसी से प्रेम नही कर पाऊँगी।”
“ध्वनि मैं उस दिन का तुम्हारा इंतजार करुंगा ।जब तक तुम्हारा प्रेम शब्द में फिर से विश्वास नही लौट आता।”
यह उसकी और साहिल की आखिरी बातचीत थी।
उसके कुछ दिनों बाद उसका प्रमोशन हो गया और वह दुबई चली गई।
इस बीच अनेक ऋतुएं गुजर गई।अनेक घटनाक्रम घटित हो गए।
ध्वनि पूरे दस साल बाद भारत आई । वो भी कंपनी की कंट्री हेड बनकर। कंपनी ने उसकी मेहनत और कार्यशैली से प्रभावित हो कर उसे ये जिम्मेदारी सौंपी थी।और वो इस जिम्मेदारी को इस शिद्दत से निभा रही थी कि उसने अपने स्वास्थ्य को भी इग्नोर कर दिया था। परिणाम स्वरूप वह ऑफिस में काम की अधिकता की वजह से बीमार पड़ गई। डॉक्टरों ने उसे दवाओं के साथ कुछ समय के लिए काम से ब्रेक लेने और किसी हिल स्टेशन पर जाने की सलाह दी।जिसे मानने के लिए वह कतई तैयार नहीं थी।लेकिन मां- पापा के अधिक जोर देने पर वह इस शर्त पर राजी हो गई कि आप लोगों को भी मेरे साथ चलना होगा। पापा ने उसकी शर्त मानते हुए रिजोर्ट बुक से लेकर पचमढ़ी आने – जाने की सारी अरेजमेंट कर दी । लेकिन पचमढ़ी प्रस्थान से एक दिन  पहले मां का बाशरुम मे पैर फिसल कर गिर जाने से उसका पैर फैक्चर हो गया । इस स्थिति में उनकी देखभाल के लिए पापा को घर पर रुकना पडा।  लिहाजा उसने भी अपनी पचमढ़ी ट्रिप कैंसिल करना चाही लेकिन पापा के हठ के सामने उसकी एक न चली मजबूरन उसे अकेले ही पचमढ़ी जाना पडा।  मुबंई से भोपाल बाया पिपरिया होते हुए वह पचमढ़ी पहुंच गई। वहां वह साउंड ऑफ नेचर नाम के रिसोर्ट मे ठहरी । रात ज्यादा हो चुकी थी पचमढ़ी घूमने का शेडयूल दूसरे दिन का तय था ऐसे में थकान मिटाने के लिए वह रिसोर्ट मे बने रेस्टोरेंट में कॉफी पीने चली आई । जहां उसने वेटर को एक स्पेशल कॉफी लाने को कहा। जब बिल देने की बारी आई तो उसे बताया गया कि आप हमारे रिसोर्ट की  स्पेशल गेस्ट है इसलिए आप से पैसा नहीं ले सकते है ऐसा हमारे साहब का ऑर्डर है ।
ध्वनि को यह जानने की उत्सुकता बढ गई कि वह शख्स कौन है जिसने उसे अपने रेस्टोरेंट का स्पेशल गेस्ट माना है और क्यों?
क्या मैं आपके साहब से मिल सकती हूं? उसने रिसेप्शन पर  बैठी रिसेप्शनिस्ट  से पूछा।
इसके लिए सर से पूछना पडेगा।
“तो पूछिए न आप अपने सर से।”उसने व्यग्र होकर कहा।
रिसेप्शनिस्ट ने फोन घुमाया फिर कुछ बात की।
“मैम आप रिसोर्ट के टेरैस पर जाइए साहब इस वक्त आपको वहीं पर मिलेंगे।”
वह तेज धडकते हुए दिल के साथ टेरैस पर पहुंची ।वहां पर वह शख्स कुर्सी पर बैठा कोई बुक्स पढ़ रहा था। जिस वजह से उसका चेहरा साफ नजर नहीं आ रहा था।
उसके एक्युज मी  कहने पर उसने पलटकर देखा।
” साहिल तुम” वह चौक गई।
“तुम्हें कैसे पता मैं यहां हूं और यदि पता था तो मुझसे मिले क्यों नहीं ?”उसने एक साथ कई सवाल दाग दिये।
“अरे बाबा सांस तो लेने दो एक साथ इतने सवाल।” “साहिल ने उससे हंसते हुए कहा।
“पहले शांति से यहां आराम से कुर्सी पर बैठो और बताओ क्या लोगी चाय या कॉफी ?मैं तुम्हारे सारे सवालों के जबाव  एक- एक कर दूगा।”
अब दोनों साथ कॉफी पीने लगे मैंने तुम्हें रेस्टोरेंट में कॉफी पीते हुए देख लिया था पर मैं तुम्हें डिस्टर्ब नही करना चाहता था बस इसलिए नही मिला।
लेकिन तुम यहां कैसे?ध्वनि ने उससे पूछा।
“तुम्हारे दुबई चले जाने के बाद मैंने वह जॉब छोड़ दी और अपना खुद का बिजनेस शुरू कर दिया । यह  रिसोर्ट मेरा ही है।”
“अब जब तुम यहां आ गई हो तो तुम्हें पचमढ़ी घुमाने की जिम्मेदारी मेरी।” साहिल ने उससे कहा।
“वाऊ रियली” ध्वनि ने कहा।
उसने हा मे सिर हिलाया।
अगले दिन वह और साहिल पचमढ़ी घूमने निकल पडे।रास्ते मे खडे साल और सागौन के ऊंचे -ऊंचे दरख्त पहाड़ और घाटियां उसके मन में सकून सा भर रहे थे।सबसे पहले वे पाडंव गुफाएं, वी फॉल और उसके बाद सतपुड़ा पर्वत श्रेणी की सबसे ऊंची चोटी धूपगढ़ देखने गये जहां सूर्यास्त के मनमोहक दृश्य ने उसका मन मोह लिया। वापिस लौटते हुए रात हो चुकी थी। दोनों ने साथ में डिनर किया ।दूसरे दिन घूमने जाने से पहले वह साहिल के ऑफिस गई ।वहां दीवार पर खुद की तस्वीर लगी देखकर वह आश्चर्य से भर गई।वह झट से वहां से निकल आई और बाहर गाडी मे बैठकर साहिल के आने का इंतजार करने लगी।
“ध्वनि तुम ऑफिस आई और मुझसे मिले बिना ही यहां चली आई मैं तुम्हें आवाज देता रह गया और तुमने सुना ही नहीं।”
“वो वो मैं अपना पर्स गाडी मे ही भूल गई थी इसलिए थोड़ा जल्दी में थी । “उसने हकलाते हुए कहा।
“इटस ओके ध्वनि।” साहिल ने कहा।
फिर वो दोनों जटाशंकर मंदिर ,हाडी खो  महादेव गुफा  देखने गये । उसके बाद प्रियदर्शिनी पाइंट और राजेंद्र गिरी पहाडी पर भी गए। 
रास्ते में लौटते हुए ध्वनि को भूख लग आई। 
सो उन्होंने वही एक छोटी सी शॉप पर झटपट मैगी नूडल्स खाए।शॉपवाले को रुपए देते समय साहिल के पर्स से कुछ गिर पडा। उसने सबकी नजर बचाते हुए उसे उठाकर देखा वह उसका फोटो था।
वह सोच में पड गई ।
क्या साहिल के दिल में उसके प्रति आज भी कुछ फीलिंग्स है?
लेकिन वह साहिल को बिना कुछ कहे चुपचाप गाडी मे आकर  बैठ गई।
 
रिसोर्ट पहुंच कर वह साहिल को बाय बोलकर अपने कमरे में चली आई।
वह जब से यहां आई थी उसे अपने स्वास्थ्य मे सुधार नजर आ रहा था।
वह महसूस कर रही थी कि नेचर इज द बेस्ट मेडिसिन
अगले दिन वे दोनों जंगल सफारी के लिए निकले। रास्ते में उसने साहिल से उसके बीबी और बच्चों के बारे मे पूछा।
“कोई नही है।” साहिल ने कहा।
“कोई नहीं है से क्या मतलब  है तुम्हारा?” ध्वनि ने उससे पूछा।
“मतलब यही मैंने शादी नही की।” साहिल ने शांत भाव से कहा।
“क्यों?”
“बस यू ही?” 
“यूहीं कुछ नही होता।” ध्वनि ने दोहराया
“बस तुम जो नही मिली।” साहिल ने गंभीर होकर कहा।
उसके बाद दोनों पूरे समय चुप रहे।
रिसोर्ट मे आकर वह पूरी रात बिस्तर पर लेटी अपने और साहिल के बारे में सोचकर करवटें बदलती रही। उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि आज के समय मे भी कोई किसी को इतनी शिद्दत से चाह सकता है ।उसे इन तीन दिनों की एक – एक बात याद आती रही। साहिल ने ऑफिस हो या पर्स हर जगह उसकी तस्वीर रखकर उसकी मौजूदगी को किस कदर जीवंत रखा है।  यहां तक रिसोर्ट का नाम साउंड ऑफ नेचर यानि प्रकृति की ध्वनि भी उसने उसी के नाम से प्रेरित होकर रखा है।
“क्या अभी भी साहिल के निश्छल प्रेम पर अविश्वास किया जा सकता है ?”उसने खुद से सवाल किया ।
 
लेकिन अतीत के पूर्वाग्रह उसे ऐसा करने से रोक रहे थे। 
पूर्व में मिला विश्वासघात आज भी उसके मन में ज्यों का त्यों अंकित था जो उसे आगे बढ़ने से रोक रहा था।
उसे अब यहां रुकना असहनीय लगने लगा।पचमढ़ी ट्रिप  मे अभी दो दिन बाकी थे लेकिन वह आज ही मुबंई के लिए निकल पडी।
साहिल उसे अपनी कार से पिपरिया तक छोडने आया।कार ऊंचे- नीचे घुमावदार संकरे रास्तों से होकर गुजर रही थी। हवा में भी अब थोड़ी सी ठंडक घुल चुकी थी। ध्वनि को कंपकंपी सी होने लगी थी। साहिल ने चुपचाप अपना जैकेट उतारकर उसे ओढा दिया । रास्ते में उसने गाडी एक ढाबे पर रोक दी जहाँ दोनों ने साथ में चाय पी । फिर पूरे रास्ते भर वे दोनों चुप रहे। जल्द ही वे पिपरिया पहुंच गए।वो उसे रेलवे स्टेशन तक छोडने आया। तब तक ट्रेन प्लेटफार्म तक आ चुकी थी। वह जाने लगी ।
” बाय साहिल ने उसे हाथ हिलाकर अलविदा किया।”
उसने कुछ नहीं कहा और वह ट्रेन में चढ गई।उसने मुडकर देखा साहिल अभी भी उसे एकटक देख रहा था। 
“ध्वनि आई लव यू मुझे तुम्हारा लौटकर आने का इंतजार रहेगा ।  “साहिल ने चिल्ला कर कहा।
साहिल …ध्वनि के आँखों से आंसू छलक पडे।
वह ट्रेन से उतरकर उसके गले लग गई।
कमला नरवरिया
कमला नरवरिया
संपर्क - skamla830@gmail.com
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