मेरे आदरणीय, पिता तुल्य, गुरू तुल्य, अति प्रिय साहित्यकार गुलशन मधुर जी का ग्यारह फरवरी को निधन हो गया। जाना सभी का निश्चित है लेकिन जब कोई चला जाता है तब एक अजीब सी कसमसाहट होती है। तब लगता है काश उनसे फोन पर और बात कर ली होती या उनसे ज्यादा मुलाकाते की होतीं। 
गुलशन जी का नाम बचपन से अपने पिता से ऐसे सुना था जैसे किसी स्टार की बात हो रही हो। हमेशा अपने पिता की आँखों में उनके लिए वैसी ही चमक देखी थी जैसे मनपसंद हीरो हिरोइन को देख लेने पर आम जनता में होती है। २००७ में अपने माता पिता के कारण ही पहली बार गुलशन जी से मिलना हुआ था।
ढीली ढाली पतलून, ऊपर कुर्ता नुमा शर्ट, क्लीन शेवड, लम्बाई बहुत ना होते हुए भी बहुत ऊंचा कद। जब मुझे बताया गया कि गुलशन जी वॉइस ओफ अमेरिका में काम करते थे, तब मैंने भी बड़े हर्ष से बताया था उन्हें कि, “मैंने भी दिल्ली में कई बार रेडियो और टीवी पर कार्यक्रम दिए हैं”। उनके ऊंचे कद वाले व्यक्तित्व ने मेरा ऐसे ही स्वागत किया जैसे बड़प्पन वाले लोग करते हैं। बाद में जब उनके काम के विषय में अधिक जाना तो अपने पर बहुत शर्म आई, लेकिन गुलशन जी के व्यवहार ने मुझे कभी छोटा नहीं लगने दिया।
गुलशन जी की रेडियो की सहकर्मी सुमन गुप्ता जी उन दिनों मेरी सहकर्मी थीं। वो अकसर मुझे गुलशन जी के कार्यक्रमों की बातें और उनके मस्त स्वभाव के किस्से बताया करती थीं। मैं भी चाव से सुनती थी क्योंकि अपने पिता की आँखों में गुलशन जी के लिए चमक जो देखी थी। 
२००७ में जब शहर से थोड़ी दूरी पर उनके घर (एशबर्न, वर्जीनिया) में जाना हुआ था तब उनका घर बहुत दूर लगा। लेकिन किसे पता था कि कुछ वर्षों बाद मैं उनके ही इलाके में रहने लगूँगी।
उस पहली मुलाकात में ही उनसे गहरा रिश्ता जुड़ गया। उनका घर किताबों से लदा हुआ था। घर में उनकी पत्नी शन्ना जी थीं और शन्ना जी को दो बिल्लियाँ। शन्ना जी को देख कर लगा कि कोई विदेशी महिला हैं। आकर्षक सुनहरे बाल, विदेशी परिधान, लेकिन जब बात की तब ऐसा अपनापन और पंजाबी लहज़ा कि लगा कि मैं दिल्ली में ही हूँ। २००७, शादी के बाद अमेरिका में मेरा पहला साल था। मेरे माता पिता भी मुझसे चंद दिनों के लिए इसीलिए मिलने आए थे कि मेरे नए देश में होने से व्यथित थे। तब तक ड्राइविंग लाइसेंस भी नहीं मिला था। गुलशन जी के घर मेरे पति ललित ही लेकर गए थे। 
जब तक शन्ना जी के हाथों का बना स्वादिष्ट खाना खत्म हुआ तब तक मेरे माता पिता की जो भी पुरानी जान पहचान मधुर दम्पत्ति से थी वो ऐसा लगा ललित और मुझसे हो गई। शन्ना जी में ऐसा वात्सल्य भाव है कि एकदम ही हम उनके सगे हो गए।
गुलशन जी ने शायद मन ही मन उस दिन मुझे गोद ले लिया था। हर साहित्यिक सम्मेलन आदि की खबर वह मुझे देते थे। मेरे घर से दूर दूसरे शहर (मैरिलैंड) में बहुत बड़ा मुशायरा था जिसमें मैं गुलशन जी के साथ गाड़ी में बैठ कर गई। तब हर सड़क मुझे नई लगती थी, हर नाम अटपटा लगता था। गुलशन जी सारे रास्ते मुझे सड़कों के नाम और दिशा समझाने की कोशिश करते रहे। उनकी पूरी कोशिश थी कि मैं जल्द से जल्द सब कुछ सीख जाऊं। उन्हें कभी लाइमलाइट में आना अच्छा नहीं लगता था। कभी भी कुर्सी पर, मंच पर आने की इच्छा नहीं रखते थे। बड़प्पन क्या होता है, यह उनके साथ कई बार कवि गोष्ठियों में जाकर मैंने जाना। 
उस पहले मुशायरे के सफर तक उन्होंने मुझे बताया कि उन्हें पुराने फिल्मी गीत बहुत पसंद हैं। उन्होंने यह भी बताया कि वह अपनी पुरानी गाड़ी बदलने में इसीलिए कतरा रहे हैं क्योंकि नई गाड़ियों में सीडी की जगह तो होती है पर कैसेट की नहीं। वह अपनी संजोई कैसिटों के बिना ड्राइव नहीं करना चाहते थे।
ऐसी छोटी छोटी बातें बताती हैं कि बड़े लोग कितने सरल होते हैं। उनके साथ कई बार गाड़ी में सफर करके मैंने उनके बारे में और जीवन के बारे में बहुत कुछ जाना। इस उपभोक्तावादी समाज में जहाँ हम हर नई चीज़ के पीछे भाग रहे हैं, जहाँ गाड़ी, घर ज़रूरत के हिसाब से नहीं बल्कि दिखावे के लिए लिए जाते हैं वहाँ वह ऐसे इंसान थे जो अपनी पुरानी गाड़ी में इसीलिए खुश थे क्योंकि उसमें पुराने गानों की टेप चलती थी।  ये बात तब की है जब यूट्यूब ने हर ज़माने के गानों को अपने भीतर नहीं समाया था और स्मार्ट फोन ने हर अन्य तकनीक को निगल नहीं लिया था। 
उस मुशायरे में जायज़ सी बात है कि मुझे कोई नहीं जानता था। मैं भी बस सुनने ही गई थी। लेकिन गुलशन जी ने छोटी सी पर्ची पर मंच संचालक को कुछ लिख कर दिया और मुझे उस सभागार में सत्कार सहित मंच पर बुलाया गया। उनकी उस एक पर्ची के कारण आज तक सोलह सत्रह साल बाद भी मुझे कई मुशायरों/ सम्मलनों में बुलाया जाता है।
२००८- २००९ में ई मेल का अधिक चलन था। मैं डिफैंस वालों के लिए ई हिन्दी कोर्स बनाया करती थी। कई बार अनुवाद आदि में अटक जाती थी तो गुलशन जी को बेझिझक ई मेल करती थी और वह हमेशा बिना किसी विलम्ब के सुझाव के साथ जवाब देते थे।
गुलशन जी अपनी आवाज़ के लिए दिल्ली रेडियो, आकाशवाणी और वॉइस ओफ अमेरिका आदि के लिए तो जाने ही जाते हैं। साथ ही वह अनुवादक भी हैं। ‘हैं’ इसलिए कह रही हूँ कि उनका काम तो हमेशा ही जीवित रहेगा ना! वह कई यूरोपीयन पत्र पत्रिकाओं के लिए फ्री लांस कार्य किया करते थे। जब भी उनसे मिलना होता था वह अपनी लाइब्ररी में कागजों किताबों के बीच ही उलझे-सुलझे होते थे। उनकी लाइब्रेरी से मैंने एक बार दो पुस्तकें उधार ली थीं। उन्होंने बहुत प्रेम से दी थीं पर थोड़ी सख्ती से कहा था,  “वापिस ज़रूर कर देना।”
उस पहली मुलाकात के बाद मुझे कभी लगा ही नहीं कि शन्ना जी और गुलशन जी से पहचान नई है। लगभग हर वर्ष माता पिता दिल्ली से कुछ दिनों के लिए मिलने आते थे और कभी गुलशन जी के घर तो कभी हमारे घर खूब मिलना जुलना होता था। ऐसी बैठकों में गुलशन जी को मैं अंकल कह कर सम्बोधित करती थी और शन्ना जी को आंटी। चाहे शब्द अंग्रेज़ी के हों पर हम जब बड़े हो रहे थे तब यह शब्द हमारे लिए अनौपचारिक रूप वाले चाचा, मामा, मौसी बूआ जैसे ही थे। ऐसी बैठकों में अंकल की कविता होती थी और आंटी की मधुर आवाज़ में गीत। मधुर जी से तो कवि गोष्ठियों में मेरा मिलना हो जाता था पर आंटी से तब ही मिल पाते जब मेरे माता पिता आते। 
२०१२ में मैं पहली बार माँ बनी, २०१३ में हम गुलशन जी के घर से १० मिनट की दुरी पर आ गए। अंकल के घर अपने एक साल के बेटे आयूष को जब लेकर गई तब अलग ही मधुर दम्पत्ति से मिली। ऐसी ऊर्जा, ऐसा प्रेम का संचार जैसे वात्सल्य का झरना फूट पड़ा हो। 
अपने बच्चे के भाग्य पर बड़ा नाज़ हुआ था तब। शन्ना जी ने आयूष को गोद मे लेकर गीत भी गाए और बच्चा भी मंत्र मुग्ध हो उन्हें देखता रहा। २०१४ में दूसरा बेटा अर्जुन हुआ, अंकल आँटी ही एक दो बार मिलने आए। मेरे माता पिता जब भी आते वो ज़रूर मिलते लेकिन वो कुछ साल जब बच्चे छोटे थे, मैं किसी से अधिक नहीं मिल पाई।
हर कुछ महीने में अंकल का शिकायती फोन या ई मेल आता था कि मैं उनसे मिलती नहीं हूँ। वो तो समझ जाते थे कि बच्चों के साथ मुश्किल हो जाता है। लेकिन मैं नहीं समझ रही थी कि २००७ से २०१६ में बहुत बदलाव आ गया है। गुलशन जी को अपनी उम्र के बारे में बात करना पसंद नहीं था, इसलिए शायद मुझे भी लगा कि वह सदा वैसे ही रहेंगे जैसे मुझे पहली बार मिले थे। लेकिन उम्र किसे छोड़ती है?
अब कवि गोष्ठियों में मैं ड्राइव करती थी और अंकल नई सड़कों को ना जानने की बात करते थे। २०१६ में मेरा कविता संग्रह “विस्थापित मन” प्रकाशित हुआ जिसके कवर पेज पर गुलशन जी ने ही प्राक्थन लिखा। मेरे लिए बहुत बड़ी बात थी कि गुलशन जी मेरी किताब पर लिख रहे हैं। मैंने जब किताब में उनका परिचय देना चाहा तो उन्होंने साफ इंकार कर दिया।
हाल ही में जब मेरे पिता जी ने उन पर एक कार्यक्रम करना चाहा, तब भी उन्होंने बड़ी विनम्रता से मना कर दिया। उन्होंने पत्रकारिता का भी बहुत काम किया लेकिन कभी अपने आप को प्रचारित नहीं किया। 
कोविड के बंदी के दिनों में उन्होंने प्रेमचंद की कहानियों को यू ट्यूब पर अपनी आवाज़ के साथ रिकोर्ड किया। केवल सपाट कहानी नहीं, बकायदा संगीत आदि के साथ जैसे हम बचपन में रेडियो नाटक सुना करते थे वैसे। उसे भी उन्होंने विज्ञापित नहीं किया। मैंने कई बार उन्हें विज्ञापन का महत्व बताना चाहा लेकिन उन्होंने कभी समझना ज़रूरी नहीं समझा।
एक दिन गर्मी की शाम में हमारे घर के पेड़ कि छांव में गुलशन जी, रेखा मैत्रा और मैं बैठे थे। मेरे मन में एक विचार चल रहा था जो कविता का रूप नहीं ले पा रहा था। मैंने गुलशन जी को विचार बताया, उन्होंने सुना, पसंद किया, फिर मुझे समझाते हुए कहा, “ कभी अपना विचार ऐसे नहीं बाँटना जब तक उसे लिख ना लो”। ऐसी सूक्ति में अपनी समझ वो अकसर सांझा किया करते थे। कुछ इस अंदाज़ में कहते थे कि हमेशा याद रहती थी और याद रखने को मन भी करता था। केवल कविता, साहित्य की ही नहीं, गुलशन जी से मुझे जीवन के बारे में बहुत कुछ जानने को मिला। ऐसी समझ जो शायद जीवन को करीब से देखने के बाद आती है, वह  उनकी सुक्तियों से बहुत मिली है मुझे।
छोटी छोटी बातों पर गहन चिंतन करते थे। समाज में भ्रष्टाचार आदि से काफी परेशान रहते थे, लेकिन इन सबके साथ बहुत सहज रहते थे। कोई मुखौटा नहीं लगाते थे। अगर कहीं जाने का मन नहीं होता था, तो बता देते थे कि मन नहीं है।
एक बार मुझे ग्रोसरी स्टोर में मिल गए और मैंने उन्हें बता दिया कि मेरे बच्चों को उस स्टोर की पेस्ट्री पसंद है। फिर क्या था, उस दिन के बाद कभी ऐसा नहीं हुआ कि मैं गुलशन जी से मिली हूँ और उन्होंने मुझे बच्चों के लिए पेस्ट्री ना दी हो। यदि मेरे माता पिता उनसे कहीं बाहर खाने पर मिलते तो भी उनके हाथ पेस्ट्री ज़रूर भिजवाते थे। 
एक बार हमें कवि गोष्ठी में जाना था और उनके परिवार में शायद बड़ी बहन के पति का देहांत हो गया था। उनकी बड़ी बहन भी हमारे साथ गई थीं। शायद शन्ना जी की बहन थीं। वह स्वंय दुखी थे लेकिन मेरा मन द्रवित है यह उन्हें कैसे पता चल गया, पतानहीं?
मुझे आफिस में किसी ने कुछ बिन बात कह दिया था और मैं इस बात से दुखी थी कि मैं सबके सामने रो दी। बहुत छोटी सी बात थी, अब याद भी नहीं, लेकिन गुलशन जी ने सारी बात ऐसे सुनी थी जैसे इससे बड़ा दुख तो कभी हो ही नहीं सकता। मुझे सांत्वना दी थी और अपनी किसी कविता की पंक्तियाँ सुनाई थीं जिनका अर्थ था कि आँसू सबके सामने छलक गए तो क्या खराबी है? उनके शब्दों में या उनके कहने के अंदाज़ में ऐसा कुछ था कि मैं एकदम ठीक हो गई। अब अगर दूसरों के सामने आँसू छलक जाते हैं तो शर्मिंदा नहीं होती। 
गुलशन जी मुझे किसी स्टोर में या कभी सड़क पार करते मिल जाते थे तो बहुत अच्छा लगता था। ऐसी ऊर्जा मिलती थी जैसे बचपन से मिलती है। ‘बचपन’ इसलिए कहा, जब तक बड़े बुज़ुर्ग आस पास रहते हैं तब तक अपना बचपन भी आस पास लगता है। 
जानते हैं कि नई पौध आती है पुरानी चली जाती है पर कुछ लोग ऐसे होते हैं जो कभी पुराने लगते ही नहीं हैं। उम्र उन लोगों को जितना भी कुछ कह ले, उनके होने से आस पास वालों को ऊर्जा ही मिलती है। मेरे लिए वैसे ही थे गुलशन मधुर जी।
उन्होंने भयंकर बीमारियों का सामना किया, कई व्यक्तिगत आघात सहे पर उनका अंश मात्र भी किसी को महसूस नहीं होने दिया। उनका चिंतन, उनकी उदासी, उनकी कलम ने कई बार दिखाई पर मुझे हमेशा उन्होंने वात्सल्य, प्रोत्साहन, आशावादिता ही दिखाई। 
गुलशन जी ने लम्बा जीवन जीया, मैंने उस जीवन को पूरा ना देखा ना जाना। किंतु उनके जीवन का जितना छोटा सा अंश मुझे मिला वह मेरे लिए बहुत बड़ा है। एक ही व्यक्ति में पिता और मित्र दोनों को देखना सहज नहीं है; लेकिन गुलशन जी ने इसे सहज बनाया। मेरे हिस्से के गुलशन जी, किसी सुंदर गुलशन की मधुर याद बन कर मेरे साथ हमेशा महकते रहेंगे और मुझे आगे बढ़ने की सीख देते रहेंगे।
उनकी याद को शत शत नमन।
आस्था नवल
वर्जीनिया यू एस ए
asthanaval@gmail.com


2 टिप्पणी

  1. बहुत मीठा और आत्मीय लेख है – सीधे मन से लिखा गया ।
    गुलशन जी के व्यक्तित्व के कई अनछुए पहलू जानने को मिले ।
    मेरा दुर्भाग्य रहा कि उनसे अधिक मुलाक़ातें न हो सकी, सिर्फ़ फ़ोन पर बातें हुई लेकिन उन की सरलता और सहजता ने हमेशा प्रभावित किया ।
    उनका जाना हिंदी जगत के लिए अपूरणीय क्षति है ।

  2. आदरणीय आस्था नवल जी!
    आपको पढ़कर गुलशन जी को बेहतर समझ पाए। रेखाचित्र की तरह आपने उनकी वेशभूषा,रहन-सहन, व्यवहार,स्वभाव सदाशयता, विनम्रता, सह्रदयता , सरलता व सहजता का जिस तरह से वर्णन किया है उसके बाद उन्हें न जानते हुए भी जानना इतना कठिन नहीं रहा।
    तेजेन्द्र जी ने बिल्कुल सही कहा था ,वाकई
    हम उनके बारे में नहीं जानते थे।60 से 70
    का दशक हमारे लिए इन सभी चीजों से
    बहुत दूर था। छात्रावास में रहते हुए रेडियो
    सुनना संभव नहीं था इसके अलावा बुक्स
    और उपन्यास वगैरह पढ़ने में इतनी रुचि
    थी कि छुट्टियाँ भी उसी में निकल जाती थीं।
    पर आप जिस तरह से उनके संसर्ग में रहीं और जिस तरह से आपने उन्हें अपनी स्मृतियों से चुन-चुनकर शब्दांजलि स्वरूप यहाँ प्रस्तुत किया वह एक बेटी कर सकती है। वे पितातुल्य नहीं अपितु पिता ही थे। अभिव्यक्ति की गहन तीव्रता महसूस हुई।शब्द जीवन्त हैं पढ़ते हुए साथ छूटने की पीड़ा महसूस हुई। जैसे मानो कोई अपना ही गया हो।
    ऐसे लोग वाकई व्यक्तिगत नहीं होते।राष्ट्रीय संपत्ति की तरह वे देश की पहचान होते हैं।
    साहित्य के क्षेत्र में भी उनका अमूल्य
    योगदान रहा। उनका जाना साहित्य जगत में एक महत्वपूर्ण और कीमती कलम का थम जाना जैसा नुकसान है।
    आपको पढ़ने के बाद उन्हें न जानने जैसा कुछ भी नहीं रहा। साहित्य के इस महान पुरोधा को हमारी ओर से सादर श्रद्धांजलि। ईश्वर दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करे।

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