Wednesday, May 22, 2024
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विजय सिंह नाहटा की दो कविताएँ

1 – जो सहसा लुप्त हुए
जो सहसा लुप्त हुए
वो ही सबसे ज्यादा
गाए गये किंवदंतियों में ।
जो बने रहे भरे-पूरे जीवंत
जीवन की कामचलाऊ
उधेङबुन में डूबे हुए
पाठयक्रम की तरह
शब्दश: जीते हुए
जीवन को परीक्षा की तरह
फिर नहीं दिखाई दिए
कभी किसी उद्धरण में ।
जिन्होंने ताबङतोङ तोड़े-मरोड़े
कायदे-कानून
नियमों के राजमार्ग से हटकर
बनाई अपनी अलग पगडंडियाँ
सुर्खियों में रहे सनसनीखेज खबर से।
जिन्होने जिया जीवन को उसकी
नैसर्गिक आभा तले
संगीत की एक लय में गुथे
कालांतर मे वे न रहे उल्लेखनीय
औ’ यकायक विलुप्त हुए ।
जब अंध रूढियों से ठसाठस
भर गयी समूची पृथ्वी
और संवेदना कराहती रही मोटे
जिल्दों तले
जब अच्छाइयों ने चमक खो दी
और अब हैरतअंगेज न रही उनकी आमद
तब एक दिन आततायियों ने
घेर लिया शहर
और कुछ भी विस्मय न हुआ
और –; जो येन केन तख्तापलट
घोषित हुए
वो ही समवेत स्वर में
विजेता की तरह गाये गये।
2 – शब्दकोश में रखे शब्द
शब्दकोश में रखे शब्द
उदास औजारों की तरह
निष्क्रिय पड़े रहते — ज्यों ;
कारखाने के भीतर झांकती
अंधेरे में रेंगती
एक अचल संभावना ।
कौनसा पुर्जा कसा जाएगा
और यकायक लौट जायेगी
पृथ्वी की गुम मुस्कराहट
कौनसी भाषा जिसमे समा जाएंगे सारे चीत्कार
सुबह अभी कहाँ
और,  बंद हैं दिशाएं
किस जीवन सरोकार में
डुबाया जायेगा  कोरा जिस्म
किस रचना का आंचल भरेगा
कैसा कौनसा आदिम शब्द
किस बिम्ब को बींध बींध  लाएगा
वह कौन सा बिरला शब्द
वह यह नहीं जानते
महज —;
बचाए रखते आत्मा का उजास
बावजूद इसके यह बोध जिन्दा रहता शिद्दत से
कि एक शब्द उठेगा धरती को चीरता हुआ
आकाश की ओर झुका झुका डाली की तरह
गाहे बगाहे उसे याद आता ठौर : बंधी जिससे
अपनी नियति  : प्रारब्ध अपना
एक दिन –‘
टूटना है उसे जीवन के हक में सनसनी की तरह
और सन्नाटे को चीरकर
फिर किसी कविता की पंक्ति में
खिलना है धूप की तरह।
विजय सिंह नाहटा
विजय सिंह नाहटा
संपर्क - nahatavijay60@gmail.com
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