Sunday, June 23, 2024
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कविताएँ बोधमिता की

1    रात
रात ये निःशब्द है,
फिर भी शोर कर रही;
कितनी बेचैनियों को,
ले कर है चल रही !!
रात  ये  सुनसान  सी,
सज-धज  के  बैठ गई;
कितनी  उमंगों  को,
ख़्वाहिशों से जोड़ रही !!
रात ये निस्तब्ध सी,
सन्नाटे तोड़ती ;
कितने जज़्बातों में ,
हौसलों को फूंकती !!
रात अपने आँचल में,
  तारे   समेटती ;
ओढ़ शीतलता को,
ओस  ये  बिखेरती !!
रात   निःशब्द   है,
रात   सुनसान   है,
रात   निस्तब्ध   है,
जितनी ये प्यारी है ;
उतनी अजीब है।।
रात  ये  अजीब है
रात  ये  अजीब है …
2. बरसात
स्याह आसमान से,
जो बूंद बूंद झर रही;
 मन  प्रसन्न  हो रहा,
 गीत  कोई  गा  रहा।
देखो आज भीग कर,
सूर्य  की  ये  रश्मियाँ;
नाचती  सी  आ  गयी,
बन धरा पर बिजलियाँ।
कौंधते  आकाश  से,
हिल  के  पेड़  पूछता;
कौन   सी   दिशा   में,
जा  रहे  हो  तुम देवता।
मेघराज  के लिए,
अब  नहीं  तरसना;
कागजों की नाव पर,
सवार  होगा  बचपना।
मुंडेर  पर  चढ़े, कुछ
खेल  के  मैदान  में ;
बहक रहे हैं कुछ मन,
यौवनी  उल्लास  में।
फैलाए पर वो अपने ,
घोंसलों  में  बैठ  गए;
सह  रहे  थे  धूप  जो,
आराम वो फरमा रहे।।
नाम : बोधमिता
१०४ अंसल प्रधान एन्क्लेव , E -8 एक्सटेंशन , बावरियाकलां , भोपाल
फोन नं  7000500170
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