अपनी छोटी सी बगिया के फूलों से बातें करना, पत्तों को सहला ना मालतीजी के लिए टॉनिक का काम करता, और वह दिन भर तरो ताज़ा, स्फू र्ति से लबालब भरी रहतीं। प्रतिदि न सुबह-शाम नियमित रूप से मालती जी अपनी छोटी-सी बगिया की दे खभाल में गुज़ारती, जब भी फ़ुरसत में होतीं, अपने फूलों और पेड़ों से बतियाने बगिया में खिंची चली आतीं। रमेश के जाने के बाद अब ये पेड़ पौधे ही उनके दुख-दर्द को बाँटते।मालती जी को लगता मानो र मेश का मुखड़ा हर फूलों में मु स्कुरा रहा हो।
रमेश और मालती ने मिलकर दस साल पहले अपने घर को सजाया था। रमेश को तो बाग़वानी का नशा सा था।वे इतने शौक़ीन थे कि हर क़िस्म के फल और फूलों के पेड़ लगा डाले थे। सड़क से आते जाते लोगों को भी रात की रानी की भीनीं-भीनीं ख़ु शबू, जुगनू की तरह चमकते जूही के सफ़ेद फूल ख़ूब आकर्षित करते। अड़ोस-पड़ोस या राहगीर रास्ते में चलते वक्त टोक ही देते, ”भाई सा ब आपके घर के पास से गुजरने पर खुशबू का झोंका मन को आह्लादित कर देता है।”
तब तो मानो उनका सीना चौड़ा हो जाता चेहरे पर जीत की मुस्कान खींच जाती। हरसिंगार, अपराजिता, गु लाब, बेला कुछ नहीं छोड़ा…जब भी कहीं घुमने जातें कोई न कोई पे ड़ ख़रीदकर या फिर चुरा कर साथ ले आते।लगभग पाँच सौ रंग बिरंगे गमले जिन्हें बड़ी ही ख़ूबसू रती से घरके बाहर भीतर रंगोली की तरह सजाया था।जो आता तारीफ़ कि ए बिना नहीं रह पाता।
मालती जी कभी गमले की गुढ़ाई कर ती तो ,कभी पत्तों पर पड़े धूल को पानी के छींटे से साफ़ करती, तो कभी अनार से लदे पेड़ को बाँ हों में भर कर हौले से सहला दे ती और कभी तो खीज जाती इतनेसारे गमलों का जंजाल छोड़ कर चले गए …गर्मी में पानी डालने में पसी ने छूट जाते हैं।पानी कीक़िल्लत वो अलग…।जब तक बगीचे में रहती दिन दुनिया से बेख़बर रमेश का सा निध्य महसूसकरती।
आज फिर सुबह से ही बहू शिप्रा औ र बेटे में तू -तू मैं -मैं हो रही थी…जब भी ऐसा कुछ होता मा लतीघर से बाहर आकर अपने पौधों से बतियाने लगती…।बच्चों को एक स् पेस देना चाहती।मियाँ बीबीके उल झे धागे में खुद उलझना नहीं चा हती।
अचानक उनकी नज़र अमरूद के उस पे ड़ पर गई ,जिसे रमेश ने बेटे रा हुल से लगवाया था।कीड़ा लग गया था या पता नहीं क्यों उसके सारे प त्ते झुके हुए मरियल से प्रतीत हुए ।मानो कह रहें हों बचालो मुझे…।
तभी शिप्रा बैग थामे बाहर जाते हुए लगभग चिल्लाते हुए बोली “मम्मी !सँभालो अपने बेटे को मैं चली…। ”
मालती कुछ समझ पाती तब तक शिप्रा गेट से बाहर जा चुकीं थी।
मालती जी ने बेटे को डाँटते हुए पूछा, “क्या किया तूने राहुल?” ले किन वह ऑफिस के कार्य में तल्ली न था।
“अरे! बेटा शिप्रा…?”
“कूल मम्मा डोन्ट वरी …तुम तो जा नती हो ऐसी ही है ग़ुस्सा ठंडा होगा तो आ जाएगी”
“अरे!बेटा आज उसका जन्मदिन है…जा बेटा उसे ले आ।”
“तुम किस मिट्टी की बनी हो माँ! शिप्रा का बर्ताव तुम्हारे प्रति इतना रूखा है फिर भी तुम्हें…।”
माँ के जिद्द के कारण राहुल सी ढ़ियों से उतर कर सीधे नैनी झील के किनारे पहुँच गया। शिप्रा एक बेंच पर बैठी मिल गई।
उसे पता था यहीं आकर उसका गुस्सा ठंडा होता था। धीरे से बग़ल में बैठ गया। अभी कुछ कहता कि तभी एक नाव वाला आकर आग्रह करने लगा, चलो सर जी एक राउंड लगा लो सुबह से बोहनी नहीं हुई। नाव वाले के सामने वह अपनी भद्द नहीं उड़ाना चाह रहा था इसलिए इशारे से उसे जाने को कहा। उसके थोड़ी दूर जा ने पर शिप्रा से कहा, “चलो यार ग़ु स्सा थूक दो एक राउंड लगा लेते हैं, उसकी बोहनी हो जाएगी। तुम्हारे बर्थडे पर एक उपकार हो जाएगा ।” शिप्रा का ग़ुस्सा बिलकुल गुब्बारे की हवा की तरह था।शिप्रा ने आवाज़ दे कर नाव वाले को बुला या और उठ खड़ी हुई।
मालती कुछ बुरा होने की सोच बे तहाशा दौड़ी चली आ रही थी…दोनों को नाव पर बैठते देख वापस घर आ गई।
पाँच साल हो गए अब तक दोनों दो से तीन नहीं हो पाए थे। शायद यही वजह है कि शिप्रा चिड़चिड़ी-सी हो गई है। बात-बात पर खीज जाती है और अपने ग़ुस्सा पर क़ाबू नहीं कर पाती। इनके रिश्ते में मिठास एक बच्चा ही घोल सकता है। लेकिन सारे दवा, उपाय, टोटके, मन्नत आदि शून्य बटा सन्नाटा ही सिद्ध हो रहे थे।
शाम को डॉ शांति जो रमेश की मा मी लगती थीं उन्हें मालती ने घर पर बुला लिया था।फ़ोन पर सब समझा दिया था।
डॉ शांति ने शिप्रा की सारी रि पोर्ट देखी फिर राहुल को समझाया । उनका समझाने का तरीक़ा ऐसा था कि राहुल अपनी जाँच करवाने को तै यार हो गया। शिप्रा भी यही चाहती थी। कुछ दिनों की जाँच प्रक्रिया से गुजरने के पश्चात राहुल में कुछ कमियों का पता चला। शिप्रा ने काफ़ी परिपक्वता दिखाई। राहुल को महसूस नहीं होने दिया कि उस में कोई कमी है। घर का माहौल ख़ु शनुमा रखनेकी कोशिश करती। मालती जी को आत्मग्लानि होती ख़ुद से कहती सीखो कुछ अपनी बहू से तू नेतो गाहें बेगाहे तीर चलाने और तंज कसने का कोई मौक़ा नहीं छो ड़ा था…। राहुल ने ट्रीटमेंट में भी पूरा सहयोग दिया, लेकिन ढाक के तीन पात दिन पर दिन, साल दर सा ल निकल गए। लेकिन शिप्रा की गोद न हीं भरी।
आज एक बार फिर डॉ शांति को मा लती ने बुलाया था।प्रत्यारोपण प द्धति आई.वी.एफ पर गहन बातचीत हुई उन्होंने इसके लिए दिल्ली और मुंबई जैसे बड़े शहर का नाम सुझाया। दिल्ली नज़दीक रहेगा सो दिल्ली पर सहमति बनी। राहुल बेहद उ त्साहित था, कहता, “विज्ञान के आ गे भगवान को भी हार माननी पड़ेगी देखना शिप्रा ।”
सुबह देर तक शिप्रा को सोते दे खकर राहुल ने कहा-“क्या बात है आज तुम बोहनी कराने नहीं गई?” उस दिन के बाद शिप्रा ने नियम बना लिया था। उस नाव वाले की पहली सवारी बनने की।
“हाँ!वो अल्मोड़ा गाँव गया हुआ है। उसकी पत्नी पेट से है। भगवान करे इस बार बेटा हो, तीन बेटियाँ पहले से हैं। इस बार आने दो उसे चाहें जो हो जाए उसकी नसबंदी क रवा दूँगी।” शिप्रा ने कहा।
“तुम कौन होती हो? उनके मामले में दख़लंदाज़ी करने वाली…कब से बोल रहा हूँ ऑफिस में छुट्टी की अर्ज़ी देने के लिए दिल्ली में डॉ शां ति आंटी ने बात करके रखा हुआ है। लेकिन तुम्हें तो हमारी कोई फ़िक्र ही नहीं।”
शिप्रा ने राहुल के बालों से खे लते हुए प्यार की मुहर लगाते हु ए कहा-“अरे!यार चलेंगे जल्दी क्या है।”
“क्या बात है आज बहुत रोमांटिक हो रही हो ऑफिस नहीं जाना क्या?”
”नहीं मैं माँ के पास जा रही हूँतुम्हें भी चलना है।”
फ़ोन में शिप्रा का पाँच मिस्ड कॉल देख मालती जी ने शिप्रा को फ़ोन लगाया। पिछले पंद्रह दिनों से दोनों बेटा बहू अल्मोड़ा अपनी माँ के पास गए हुए थे।
“हैलो, शिप्रा वो मैंने फ़ोन दू सरे कमरें में चार्ज पर लगाया हु आ था। मामा मुन्ना, सपरिवार आया हुआ है।उसके बच्चे दिन भर मेरे मो बाइल पर गेम खेलते रहते हैं। जल्दी डिस्चार्ज हो जाता है।”
“मम्मी कल हम नैनीताल आ रहे हैं ।”
“हाँ, तो आ जाओ किसने रोका है, शां ति आंटी तुम लोगों के विषय में पूछ रही थी,आओ तो बात कर लेना।”
दिन के क़रीब तीन बजे दरवाज़े की घंटी बजी…
मालती जी ने घर का दरवाजा खोला तो भौंचक रह गई और सवालों की झड़ी लगा दिया। राहुल के पीछे शिप्रा बाँहों में एक नवजात बच्चे को लि ए अंदर प्रवेश कर रही थी।
“अरे! ये कौन है? कब, कैसे, तूने कुछ बताया नहीं“ सवालों की बौछारों को राहुल ने शांत किया।
“माँ शिप्रा की बोहनी उस नाव वा ले की पत्नी ने दुनिया छोड़ कर कर दिया क़ानूनन अब ये हमारी है।”
“गाँव में सुविधा की कमी और कमजो री के वजह से वह नन्ही परी को ज न्म दे कर चल बसी।” शिप्रा ने नन्ही परी को मालती के गोद में देते हुए कहा, “मम्मी अब दिल्ली जाना कैंसि ल …।”


अच्छी कहानी है सविता जी!
अभी पढ़ी। प्रेरणास्पद भी है। हमारे भी कुटुंब में दो बेटियांँ गोद ली हुई हैं एक धानी-दो साल की।
आईवीएफ दो बार फेल होने के बाद।और एक तो कॉलेज में है २२साल की। उस समय आईवीएफ तकनीक नहीं थी पर उसने बहुत इलाज करवाया पर कोई फायदा नहीं हुआ था।
और बेटी गोद लेने के दो-तीन साल बाद उसे बेटा भी हो गया। शादी के सत्रह साल बाद।
ममता का भाव जब अंतर से जागता है तो कोख भी जी उठती है। दोनों भाई- बहन बहुत अच्छे से रहते हैं और माता-पिता भी कोई भेद नहीं करते ।बेटी जानती है कि उसे गोद लिया गया है पर वह भी बहुत अच्छे से रहती है।
उसके सामने घर के सदस्य कोई चर्चा नहीं करते इस विषय पर। और वह लोग तो यह कहते हैं कि अगर सिद्धि नहीं होती तो हमें बेटा मिलता ही नहीं।
किसी मासूम की जिंदगी संवर जाए इससे बड़ा कुछ और क्या हो सकता है!
बहुत-बहुत बधाइयांँ आपको सविता जी।
अच्छी कहानी सविता जी।