पुस्तक – श्रुति शाह कॉलिंग ( हिंदी उपन्यास)
लेखक – हरीश बी. शर्मा ( बीकानेर)
प्रकाशन – गायत्री प्रकाशन, बीकानेर
मूल्य – तीन सौ निन्यानवे रु. मात्र
‘कोई तेरी मुलाकात को आया और खुश न हुआ, लानत है तेरी मुलाकात पर…’ (हरीश बी शर्मा)
पेशे से पत्रकार, जाने माने नाटककार, जिनके नाटकों का देश भर में मंचन हुआ है, जाने माने साहित्यकार और अंतस से मायड़ भाषा प्रेमी हरीश बी शर्मा का उपन्यास श्रुति शाह कॉलिंग’ पढ़ते हुए लगा कि कितना तो सही शेर लिखा की आदमी हो या किताब पढ़ कर, गर खुश न हुआ गया, तो लानत ही है।
इससे पहले हरीश जी का राजस्थानी कथा संग्रह ‘बाजौट’ बहुत पहले पढ़ चुकी थी। राजस्थानी के आधुनिक कथा संग्रहों में बाजोट की बोल्ड विषय की कहानियां हमेशा रेखांकित कि जायेगी ।
पिछले दिनों जोधपुर में एक सम्मान समारोह के लिए पधारें हरीश जी ने आत्मीयता पूर्वक अपना हिंदी उपन्यास ‘श्रुति शाह कॉलिंग’ और ‘कथारंग’ वार्षिकी का अंक भेंट में दिया।
उपन्यास को आधुनिक युग का महाकाव्य कहा जाता है. इसका कारण यह है कि इस विधा में महाकाव्य की भाँति संपूर्ण जीवन को समेटने तथा भूत, भविष्य और वर्तमान को एक साथ संबोधित करने की महती संभावनाएँ निहित हैं. यही कारण है कि आधुनिक उपन्यास से हम यह भी अपेक्षा करते हैं कि वह समकालीन जीवन और जगत की तमाम स्थूल हलचलों और सूक्ष्म धड़कनों को एक साथ समेट कर चले और साथ ही अपनी विश्वदृष्टि द्वारा यथार्थ को लोक मंगलकारी स्वरूप भी प्रदान करे. हम उपन्यासकार से आज यह अपेक्षा करते हैं कि वह हमारे संसार को हमारी नजर से देखे और औरों को दिखाए. उससे यह भी उम्मीद की जाती है कि वह वैचारिक ही नहीं, वास्तविक धरातल पर हमारे साथ खड़ा हुआ और सक्रिय दिखाई दे।
‘श्रुति शाह कॉलिंग ‘ लेखक हरीश बी शर्मा जी का वर्तमान और यथार्थ पर आधारित 464 पेज का वृहद उपन्यास है।
लेखक के बारे में एक बार पढा था कहीं कि, “म्हैं नीं तो कोई तो लिखसी, फेर म्हैं ही क्यूं नीं…” से अपनी बात शुरु करने वाले हरीश जी खुद के लिए गद्य को अपनी स्वरूचि की विधा बताते हुए पद्य को तुलनात्मक रूप से खुद के लिए कठिन बताते हैं। वे कहते हैं कि कविता की दो पंक्तियां रचना उनके लिए भारी काम है बनिस्पत अगर वे अपनी लय में हों तो देखते ही देखते वे नाटक और कहानी कुछ भी रच दे। लेखक की अपनी कलम के प्रति ऐसी वफादार बात और अपने रचने पर ऐसा आत्मविश्वास वाकई तारीफ की विषयवस्तु है।
और इसी लेखकीय आत्मविश्वास से हरीश जी ने ‘श्रुति शाह कॉलिंग’ उपन्यास को रचा है।
अमूमन उपन्यास में कई पात्र होते हैं, उनकी भी अलग-अलग कहानियां होती हैं. ये सारी कहानियां मिलकर मुख्य कहानी को आगे बढ़ाने का काम करती हैं।
इस उपन्यास में पात्रों की रेल-पेल है लेकिन कहीं भी ऐसा नहीं है कि कोई एक पात्र भी मुख्य कहानी से इतर या भटका हुआ हो। लगता है जैसे माला में एक साथ पिरोये मोती ।
उपन्यास के केन्द्रीय पात्र के रुप में निखिल चौधरी का सशक्त व्यक्तित्व है। जो सिद्धांत वादी, उसूलों का पक्का, साथ ही संवेदनशील, दोस्तों का दोस्त और औरतों की दिल से इज्जत करने वाला शानदार व्यक्तित्व का धनी पात्र है जिसके जीवन में काफी उतार चढ़ाव आते हैं लेकिन अपने मां के आशीर्वाद, और दोस्तों के साथ से वो एक ऐसे स्थान पर पहुंच जाता है जहां पर पहुंचना हर किसी के बस की बात नहीं होती है।
निखिल के दोस्त गिरधर, रोहन, ओम, दीपक और बाद में अजय उसके जीवन के वो बैक-बोन होते है कि वो नहीं होते तो शायद निखिल चौधरी, निखिल चौधरी नहीं बन पाता।
“जिंदगी के फलसफे बड़े अजीब है। जिसे जो चाहता है वो उसे नहीं चाहता है। उसकी जो चाहत है, उसे मिल नहीं पाती। इस तरह हर वह व्यक्ति जो चाहता है, क्या उसे वह सब मिल पाता हैं। क्यों टूट जाता है चाहतों कि सिलसिला? सभी को जिंदगी मिलने के बाद भी जिंदगी नहीं मिलने का मलाल है। इस मलाल में जाने कितनी जिंदगियों की तलाश में भटकते रहते हैं, जिंदगी खत्म हो जाती है। यही यहां का जलवा है, यही जमाल है।” ( उपन्यास का एक अंश)
कितना तो सच न।
और ये सच पूरा सही सही बैठता है श्रुति शाह पर।
बैंक अफ़सर श्रुति के रेंडम-कॉल से शुरु हुई कहानी परत दर परत पाठक को अपने में डुबोती चली जाती है। श्रुति का किरदार कहीं कहीं चौंकाता है तो कहीं-कहीं ये अहसास भी कराता है कि जीवन कि जिस भटकन को सभी अपने-अपने में लिये, जो जिए जा रहे है काश श्रुति कि तरह ही हिम्मत करें तो शायद कुछ मनचाहा पा जाये। सही गलत से इतर श्रुति को हालांकि तलाश अपनी चाहनाओं कि है और इसके लिए वो समर्पित भाव से निखिल के साथ अपना सब कुछ बांटती है लेकिन सच्चाई को स्वीकारते हुए। यद्यपि इस लालची संसार में उसके भी हाथ आखिर खाली रह ही जाते है। और सुख के सही मायने समझ आने पर श्रुति भी अपने जीवन की दिशा को असीम शांति की ओर बढ़ा देती है।
उपन्यास के अन्य किरदार सुप्रिया देवी, आदित्य, रिंकी, आयाम और विशेष किरदार पाकिस्तान के मशहूर शायर बेदिल अहसास के साथ उपन्यास का कथानक आगे बढता जाता है, और घटना दर घटना श्रुति की, निखिल की, गिरधर की, दूसरे दोस्तों की और सुरभित संन्यासी की कहानियों को समेटता हुआ पाठक को बांधे रखता है। वरना सोशल मीडिया के स्क्रोल समय में कहां इतना बड़ा उपन्यास पूरा पढा जा सकता है।
वर्तमान और पिछले सालों की राजनीतिक घटनाओं को आधार बनाते हुए लेखक ने नाना परांजपे के नेतृत्व रुप में उस परिदृश्य को उकेरने की कोशिश की है कि जिनके वास्तविक किरदार से भारत के दिल दिल्ली पर एक आम आदमी खास स्थान पर बैठा और लगातार दो बार बैठा। हूबहू वहीं जोड़ – बाकी, गुणा – भाग के साथ राजनीति की कुछ अंदरुनी पर भयावह सच्चाई उजागर हो रही ऐसा लगा। जो शायद आम आदमी समझ भी नहीं सकता, लेकिन लेखक और पेशे से पत्रकार हरीश जी ने उन्हें बहुत सूक्ष्म दृष्टिकोण से उभारते हुए कहानी को रोचक बनाया।
समाज को संस्कारित करने का सबसे श्रेष्ठ माध्यम होता है साहित्य। समाज को सही मार्गदर्शन देने में साहित्य की हर युग में अपनी भूमिका रही है। यह कहना है राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के अध्यक्ष कवि-नाटककार डॉ. अर्जुन देव चारण का। और इस उपन्यास से लेखक उन मूल्यों को भी साथ साथ लेकर चलता है जो उसके संस्कारों, उसके व्यक्तित्व में भी है। अपनी मां भाषा का मान कैसे रखा जा सकता है, हिंदी उपन्यास होते हुए भी हरीश बी शर्मा घटनाओं का ऐसा मोड़ और साथ ही जोखिम लेकर बैठाते है कि मुख्य पात्र का विदेश के एक सभागार में उद्बोधन राजस्थानी में होता है और उसे पढ़ते हुए राजस्थानी होने के नाते मेरे पाठक मन को मायड़ भाषा के लिए गर्व और अलहदा अहसास तो जरूर हुआ, और यहीं एक लेखक सफल हो जाता है।
हरीश जी की भाषा पर पकड़ मजबूत है। उपन्यास में जगह-जगह राजस्थानी मुहावरों, कहावतों का बखूबी इस्तेमाल किया गया है जिससे लेखन की सुंदरता में नई आभा बन पड़ी है।
सहज, सरल और अनुभूत कोमल भाव भाषा से उपन्यास पाठक को अपनी तरफ आकर्षित जरूर करता है।
एक जगह लेखक कहता हैं कि “हम सभी अपनी-अपनी हार से डरे हुए हैं…” कहानी का विस्तार और अंत बस इसी हार और जीत के पेंडुलम के मध्य हुआ है।
कहानी श्रुति के प्रेम और निखिल के प्रेम को अलग कोणों से उभारती है, लेकिन दोनों का ही अपना- अपना सच है, और अपना-अपना भूतकाल।
वास्तविक मानवीय कमजोरियां भी कहानी में है, तो आधुनिक होते समाज का सच भी।
संवेदनाओं के क्षण भी है , तो कठोर वास्तविकता भी कहानी में है।
बाबाओं और आश्रमों का कच्चा चिट्ठा भी है तो उसूलों और सिद्धांतों पर चलने वाले अच्छे पात्र भी हैं। कहीं-कहीं जरूर किसी पात्र की मनोदशा को रेखांकित करते हुए लेखक डगमगाये है, पर आगे चल कर वही पात्र फिर से उभर कर कहानी को संभालता हुआ भी दिखा।
इक्कीसवीं सदी का उपन्यासकार अपनी रचना से की जाने वाली अपेक्षाओं से भली प्रकार परिचित है और इनके प्रति जागरूक भी। हमारा उपन्यास अब काल्पनिक आदर्श के युग से बहुत आगे निकल इस वास्तविक दुनिया की सच्चाइयों को उन लोगों के साथ खड़ा होकर भोग और बखान कर रहा है जो सदियों कथा-रचना के पात्र तो रहे, लेकिन श्रेष्ठ पुरुष के रूप में नहीं बल्कि आम पुरुष के रूप में। अब उपन्यास का रचाव देश-दुनिया के पारंपरिक केंद्रों से हटकर उस जगह पर आया है जहाँ वे तमाम लोग, मुद्दे, विषय या समुदाय विद्यमान हैं जिन्हें शताब्दियों तक सभ्यता-विकास के आपाधापी भरे युगों में उपेक्षित रखा गया या कहा जा सकता है कि निरंतर उपस्थित होते हुए भी अनुपस्थित बने रहने के लिए विवश किया गया। आज बदले हुए समय में ये लोग, मुद्दे, विषय और समुदाय अपनी उपस्थिति को जोरदार ढंग से रेखांकित कर रहे हैं और अपनी लोकतांत्रिक अस्मिता को पुन: प्रतिष्ठित कर रहे हैं. इससे साहित्य और संस्कृति की पहले से चली आ रही परिभाषाएँ और व्याख्याएँ काफी हद तक निरस्त हुई हैं या बदल गई हैं।
इसलिए ही उपन्यास का एक पात्र कहता है कि “व्यक्ति को अपनी मान्यताओं को आजमाइश में डालते रहना चाहिए।”
हर घटनाक्रम के बदलने के साथ या कहें कि उपन्यास के घटनाक्रम के बीच बीच में लिखी दो लाइनें उसके कथानक की रोचकता को बढाने का काम करती जा रही थी।
लेखकीय कौशल की जिस एक गति से उपन्यास शुरू होता है उसी गति को कायम रखते हुए अपने अंत तक पहुंचता है और कहीं भी ढील की गुंजाइश नहीं होती है, एक सम तार से बंधी कहानी पाठक मन को आगे की ओर बहा ले जाती है। तभी आज के भागते समय में 464 पेज का उपन्यास पूरा पढ़ा भी जाता है।
बहुत सारे आरोह-अवरोह से गुजरते हुए यह उपन्यास अपने पाठक में यह कौतूहल जगाने में कामयाब रहता है कि अंत क्या होगा और उपन्यास का जो अंत लेखक करता है, वो न सिर्फ पाठक की परिकल्पना से परे है बल्कि आदर्श अंत भी कहा जा सकता है जब लेखक अपने गांव के लोगों से ऑर्गेनिक खेती करने की शर्त पर गांव में ही रहने की मंजूरी देता है।
इस रूप में लेखक ने एक साहित्यकार होने के अपने राष्ट्रीय सरोकारों का भी निर्वाहन किया है, जिसे मैं लोक मंगल के भाव से पहले व्यक्त कर चुकी हूं। आज जिस तरह से खेतों में अंधाधुंध पेस्टीसाइडस का इस्तेमाल हो रहा है, उससे हार्मोंस असंतुलन और कैंसर जैसी बीमारियों के मरीज बढ़ रहे हैं। अगर प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहन मिलता है तो किसानों को फसल के लिए नया बाजार मिलेगा और स्वास्थ्य पर भी विपरीत प्रभाव नहीं पड़ेगा।
अन्त में उपन्यास की ही यह अंतिम पंक्तियां कि… “समाप्त कुछ भी नहीं होता, लेकिन पड़ावों से भरी जिंदगी में जहां भी ठहराव आए, वही मंजिल है।”


*कोई तेरी मुलाकात को आया और खुश न हुआ, लानत है तेरी मुलाकात पर…’* (हरीश बी शर्मा) हरीश बी शर्मा जी का यह वाक्य हमें बहुत पसंद आया। महत्वपूर्ण भी है। तुलसीदास जी का एक दोहा याद आ गया।
“आवत ही हरषे नहीं,
नैनन नहीं सनेह।
तुलसी तहाँ न जाइये,
चाहे कंचन बरसे मेह।।
हमने पहली बार जाना कि उपन्यास को आधुनिक महाकाव्य कहा जाता है। हालांकि हमें नहीं लगता और न ही हम इस बात को मानते। सिर्फ बहुत सारी कहानियों को लेकर उपन्यास महाकाव्य का रूप नहीं ले सकता। साहित्य के हर स्वरूप के हर अंग की,अपनी एक पहचान है कहानी और उपन्यास समकक्ष है।कहानी में एक कथा होती है और उपन्यास में कई कहानियाँ।
यही अंतर महाकाव्य और खंडकाव्य में है। जो अंतर ह्रदय और मस्तिष्क में है वही अंतर पद्य और गद्य में है।
महाकाव्य की अनेक विशेषताएँ हैं। सिर्फ एक विशेषता को लेकर तुलना नहीं की जा सकती। ऐसा हम सोचते हैं।
जैसा कि आपकी समीक्षा से पता चला उपन्यास की लंबाई कुछ ज्यादा तो है।
उपन्यास की समीक्षा से अधिक रोचक हमें लेखक का परिचय लगा जो आपके द्वारा बताया गया। राजस्थान के प्रति हमारे मन में व्यक्तिगत रूप से बहुत अपनापन है।
लेखक को इस उपन्यास के लिए बहुत-बहुत बधाइयाँ और बेहतरीन समीक्षा के लिए आपको भी बधाइयाँ व शुभकामनाएँ संतोष जी।
शुक्रिया नीलिमा मैम। आपकी पठनीय क्षमता की मैं व्यक्तिगत तौर पर बहुत बड़ी प्रशंसक हूं, और आपके द्वारा लेखक को दी जाने वाली टिप्पणियां, सुझाव और प्रोत्साहन की कायल। आपने समय निकाल कर इस समीक्षा को पढा आपका हार्दिक आभार। इस राजस्थानी की तरफ से आपको वंदन और स्नेह।