Sunday, April 19, 2026
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विनय सिंह बैस का लेख – चंदा तेरे कितने रूप!!

चंद्रमा पूजनीय है क्योंकि हमारे शास्त्रों में चंदा को ब्रह्माजी का मानस पुत्र कहा गया है। चंद्रमा को लंबी आयु का आशीर्वाद प्राप्त है, इसलिए सुहागिन स्त्रियां कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि (करवा चौथ) को पति की लंबी आयु के लिए निर्जला व्रत रखती हैं और चंद्रमा से अपने सुहाग की लंबी उम्र का वर मांगती हैं। चूंकि चंद्रमा मन का भी कारक ग्रह है, अतः चांद का आशीर्वाद महिलाओं के चंचला स्वभाव को स्थिर भी करता है। 
चंदा अपने एक रूप में ‘शापित’ भी है क्योंकि ऐसी मान्यता है कि अपनी खूबसूरती के दर्प में चंद्रमा ने एक बार भादों मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के दिन भगवान गणेश के बेडौल उदर और निकले हुए दांतों का उपहास कर दिया था। तब गणेश जी ने उसे श्राप दिया था कि वह तिल-तिल कर घटते हुए समाप्त हो जाएगा और जो भी उसे उस दिन (कलंक चतुर्थी) चंद्रमा को देखेगा, उस पर झूंठा कलंक लग जायेगा।
भगवान गणेश के इस श्राप से भगवान कृष्ण तक नहीं बच पाये। एक बार भूलवश मुरलीधर ने कलंक चतुर्थी के दिन चंद्रमा को देख लिया था, तो उन पर भी स्वयमंतक मणि की चोरी का आरोप लग गया था। हालांकि बाद में भोलेनाथ की कठोर तपस्या करके चंद्रमा ने शंकर भगवान की जटाओं पर स्थान पाया और साथ ही लंबी आयु का वरदान भी पुनः प्राप्त कर लिया। 
हमारे कवियों ने चंद्रमा का कुछ अलग ही रूप देखा है। उन्होंने कभी रूपवती नायिका की तुलना चंद्रमा से करते हुए उसे “चौदहवीं के चांद ” की उपमा दी है तो कभी उसे “पूर्णिमा” कहकर उसके रूप वर्णन में चार चांद लगाये हैं । किसी कवि ने चंद्रमा को बालक के रूप में अपनी मां से झिंगोला सिलाने का बाल- आग्रह करते हुए भी देखा है । सदियों से माताओं ने अपनी लोरी में चंदा को मामा कहा है तो बच्चों ने चंद्रमा में बुढ़िया को सूत काटते हुए देखा है।
वैज्ञानिक चंदा को बिल्कुल अलग रूप में देखते हैं । वे कहते हैं कि चंद्रमा पृथ्वी का एकमात्र प्राकृतिक उपग्रह है और यह उपग्रह पृथ्वी से लगभग 3,84, 400 किलोमीटर दूर है । वे यह भी कहते हैं कि चंद्रमा पर बिल्कुल अंधेरा है और वह सूर्य की रोशनी से प्रकाशित होता है। उसकी सतह पर गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी से 6 गुना कम है तथा चंद्रमा, पृथ्वी का चक्कर लगभग 27 दिनों में पूर्ण करता है। 
हमारे अपने चंद्रयान ने चंद्रमा पर पानी खोज निकाला था। अभी कुछ ही  समय पूर्व चंद्रयान-3 के विक्रम लैंडर ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव में सफल लैंडिंग करके इतिहास रच दिया है। अब प्रज्ञान रोवर चंद्रमा के नित नए राज दुनिया को उजागर कर रहा है। 
सुनते हैं कुछ लोग चंद्रमा पर जाने की एडवांस बुकिंग भी करा चुके हैं।
शास्त्रों, कवियों, वैज्ञानिकों द्वारा परिभाषित चंद्रमा के इतर एक मेरा खुद का भी चांद है जिसके चारों ओर मैं सदैव चक्कर काटता रहता हूँ। मेरे चंदा की मुझसे कोई भी शारीरिक और मानसिक दूरी नहीं है। उस चंदा का (गुरुत्व)आकर्षण इतना अधिक है कि मैं उस से दूर कभी जा ही नहीं पाता। मेरी चंदा  मेरी लंबी आयु और आरोग्यता के लिये प्रतिवर्ष करवाचौथ का व्रत रखती है और मैं पूरे वर्ष उसके सौंदर्य और सतीत्व की आभा से आलोकित होता रहता हूं।
विनय सिंह बैस
नई दिल्ली, 8920040660
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2 टिप्पणी

  1. परम आदरणीय विनय जी,
    आपका छोटा और बड़ा ही प्यारा *”चंदा तेरे कितने रूप”* लेख पढ़ा।आखिरी गद्यांश पढ़कर चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई। बहुत अच्छा लगा। माधुर्य भाव से ओतप्रोत। सोचा; पहले इसी चाँद की बात क्यों न कर ली जाये। अपने चाँद से तो किसी भी तरह की दूरी नहीं होना चाहिये। आपने सच कहा कि अपने चाँद का (गुरुत्व)आकर्षण संसार के किसी भी (गुरुत्व)आकर्षण से बहुत अधिक रहता है। यहाँ अपन गुरुत्व का अर्थ आपके चाँद के प्रति प्रेम के उच्चतम भाव से लिया जा सकता है, गुरु का अर्थ बड़ा होता है।आपका अंतिम गद्यांश बेहद मधुर और बेहद पवित्र है आप दोनों की ही जोड़ी एक दूसरे के प्रति चाँद रूप में दीर्घायु हो, ईश्वर से यही प्रार्थना है।
    हमने ‘देवों के देव महादेव’ सीरियल में देखा था कि चन्द्रमा को दक्ष का शाप था क्षय होने का। और क्योंकि वह प्रजापति थे तो उनका शाप निरर्थक नहीं हो सकता था लेकिन चन्द्रमा को बचाना जरूरी था इसलिए सब लोगों ने शिव की आराधना की और महामृत्युंजय मंत्र के प्रभाव से चन्द्रमा को बचाया जा सका ।उस समय शिव जी ने चन्द्रमा को वरदान देते हुए कहा कि दक्ष के शाप को मैं खत्म नहीं कर सकता लेकिन मैं तुम्हें वरदान देता हूं की 14 दिन तुम्हारा क्षय होगा और फिर 14 दिन में अमावस्या के बाद हर दिन तुम्हारा रूप बढ़ता जाएगा और पूर्णिमा के दिन तुम पूर्ण स्वरूप में रहोगे। अमावस्या के बाद दूज वाले स्वरूप को शिव जी ने अपने शीश पर धारण किया। दूज के चाँद का बहुत महत्व है ।मुस्लिम धर्म में भी दूज के चाँद को देखकर व्रत खोला जाता है।
    गणेश जी वाली कहानी हमें नहीं पता थी। पर हम यह बात जानते हैं कि भादों मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को चाँद देखने से चोरी का दोष लगता है। यह भी सत्य है कि कृष्ण भगवान को भी भी चोरी का दोष लगा था।यह कहानी भी पता है।
    सौंदर्य को लेकर आपने चाँद के प्रति जितना भी कहा वह सब लगभग सत्य ही हैं।
    वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अपने सत्य हैं और वह प्रैक्टिकल है इसलिए सर्वमान्य हैं। अच्छा लिखा आपने बहुत-बहुत बधाइयाँ आपको विनय जी

  2. नीलिमा जी, बहुत बहुत आभार।
    आपकी टिप्पणी ने लेख को और अधिक समृद्ध किया है, पूर्णता प्रदान की है।

    पुनः आभार और अभिवादन

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