Wednesday, February 11, 2026
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हरकीरत हीर की ग़ज़लें

हरकीरत हीर की ग़ज़लें
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1)
ज़िंदगी इतनी हमने जानी है ।
आँसुओं में छुपी कहानी है ।
हों कटे पर तो उड़ नहीं सकते
ये बदल देंगे सोच ठानी है ।
सोच लेना ये ज़ुल्म करने से पहले
आँख रब से भी जा मिलानी है ।
जो कभी दरमियाँ थी सूख गई
फिर लता प्रेम की उगानी है ।
चाँद भी है करीब पास तू भी
झील भी हो गई रूमानी है ।
जो क़लम में मिला हुनर मुझको
रब ये तेरी ही मेहरबानी है ।
ज़िंदगी देख ली बहुत रो के
अब ये हँसते हुए बितानी है ।
क्यों करे है गुरूर तू इतना
कब ये ठहरी बता जवानी है ।
गर भुला तुम चुकी थी हीर उसे
आँख से फिर बहा क्यों पानी है ।
2)
ढूँढते हम मुहब्बत किधर आ गए
दर्दो-गम,अश्क दामन में भर आ गए ।
वो करें ना करें हमसे उल्फ़त मगर
रख के हम फूल उनके हैं दर आ गए।
जिस शहर में न था कोई उनका पता
छोड़ कर हम उन्हें, उस शहर आ गए।
दिख रहा दूर तक बस अँधेरा घना
इश्क़ के हम ये किस मोड़ पर आ गए।
ख़ुश्क सी रात है, ग़मज़दा चाँद भी
हर्फ़ भी मुझसे ज्यूँ रूठकर आ गए।
लाख  चाहा कि उनको भुला दें मगर
ख़्वाब में वो हमें फिर नज़र आ गए।
कुछ ख़ुशी तो मिले चंद पल ही सही
सोचकर बस यही हम इधर आ गए।
टूट जाता हमारा ये रिश्ता न यूँ
क्यों किसी ग़ैर की बात पर आ गए?
थे बिताए जहाँ कुछ मुहब्बत के पल
सामने फिर वही क्यों शजर आ गए !?
चाह थी उड़ने की आसमाँ में मगर
याद हमको कटे अपने पर आ गए।
हाथ आई न दौलत कभी यूँ मगर
‘हीर’ जीने के हमको हुनर आ गए ।
3)
ऐ ख़ुदा! है दुआ इतनी, इकराम हो
तेरा नाम ही सुब्ह अर शाम हो ।
प्यार करना ख़ता गर थी, दोनों की थी
फिर फ़क़त क्यों मुझी पर ये इल्ज़ाम हो?
तोहमतें दीं, नहीं मुझ में पाकीज़गी
गर हूँ बदनाम मैं , तुम भी बदनाम हो।
इम्तिहां क्यों भला आग से दूँ गुज़र
मैं नहीं हूँ सिया अर न तुम राम हो ।
है दुआ तू बढ़े बेटी आगे सदा
ज़िंदगी में कभी ना तू नाकाम हो
हक़ की आवाज़ रखना सदा तू बुलंद
हर किसी माँ का बेटी को पैग़ाम हो ।
बस थी चाही जगह दिल में, चाहा ये कब
घर की तख़्ती पे भी ‘हीर’ का नाम हो ?
4)
प्यार की दास्ताँ अनलिखी रह गई
उम्र भर आँख में इक नमी रह गई
कब हुआ ,क्या हुआ,क्यों हुआ पूछ मत
था कहीं जिस्म, अर जाँ कहीं रह गई
दर्द दिल में दबाते रहै हम मगर
नज़्म अश्कों में’ भीगी हुई रह गई
खेल है ज़िंदगी जानतते हैं मगर
क्यों हमीं से फ़क़त खेलती रह गई
क्यों न पूछा ख़ुशी तूने’ मेरा पता
क्या बता घर मेरे थी कमी रह गई ×
जब कभी नाम उसका लिया बज़्म ने
दिल में’ इक हूक सी ज्यूँ  उठी रह गई
यूँ तो’ नज़्में हुई हैं मुकम्मल मगर
बस तिरे नाम की अधलिखी रह गई
इस क़दर दर्द ने ‘हीर’ बेंधा जिगर
इक कली उम्र भर अधखिली रह गई।
(बज़्म -सभा, गोष्ठी)
5)
हँस के ग़म सारे सँभाले हमने
जीने के रस्ते निकाले हमने ।
ज़िंदगी में न कभी स्वाद मिला
डाले तो ख़ूब मसाले हमने ।
‘चुप रहो’ जब से कहा तुमने तो
जड़ लिए लब पे थे ताले हमने।
ज़िंदगी खेल भी खेले क्या क्या
देखे हैं रंग निराले हमने ।
सी लिए होंठ मिटाकर ख़ुद को
पी लिए ग़म के पियाले हमने।
जोड़ या तोड़ ख़ुदा अब मुझको
कर दिया तेरे हवाले हमने ।
ज़िंदगी चित से कभी पट न हुई
सिक्के तो खूब उछाले हमने।
क्यों अँधेरे ही उगे ,जबकि सदा
बोए हैं ‘हीर’ उजाले हमने।
हरकीरत ‘हीर’
गुवाहाटी (असम, भारत)
मो. 8638761826
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2 टिप्पणी

  1. प्रिय हरकीरत जी एक से बढ़कर हरएक शेर
    उम्दा सरल भाषा शैली में लिखे हर अशआर उम्दा जिंदगी

    जिंदगी चित् से पट ना हुई
    सिक्के तो बहुत उछाले हमने।।

    दर्द दिल में दबाते रह गए हम
    नजम मगर अश्कों से भीगी रह गई।

    जो कलम में मिला हुनर मुझको
    रब तेरी बड़ी मेहरबानी है।

    प्रिय हर गजल में मकते के सारे शेर बहुत ही खास ,अहम हे
    आपको हार्दिक बधाई सुंदर गजल के सृजन के लिए ,पुरवाई का आभार

  2. आपकी सभी गजलें बहुत अच्छी है हरकीरत जी। सभी शेर चन्दा हैं। गजलों की ज्यादा जानकारी हमें नहीं लेकिन हाँ! कुछ शेर बहुत अच्छे हैं। बहुत बहुत बधाइयाँ आपको ।

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