विकलांगता और वैवाहिक जीवन
- शबनम परवीन
शोध सार
विकलांगता के सन्दर्भ में यदि वैवाहिक जीवन पर विचार किया जाये तो कई ऐसे अनगिनत और अनसुलझे पहलू है जो असंख्य प्रश्न के रूप में सामने आते है। विवाह दो व्यक्तियों के आपसी समझ का दूसरा नाम है जिसे दोनों को ईमानदारी व तत्परता से निभाना होता है। विवाह केवल विकलांगजनों हेतु ही नहीं अपितु सकलांगजनों हेतु भी एक गंभीर निर्णय है। अदालतों में दर्ज़ लाखों तलाक के केस इस बात का प्रमाण है कि विवाह बेहद पेचीदा मामला है जिसे आपसी सूझ-बूझ से निभाया जा सकता है। विकलांग व्यक्ति का अपना जीवन ही कई समस्याओं से घिरा होता है ऐसे में एक दूसरे जीवन के साथ ताना बाना बुनना जटिल और सरल की परिधि से परे विशुद्ध रूप से द्वंदात्मक परिस्थिति के अंतर्गत आता है।
बीज शब्द : विकलांगता, विवाह, अन्तर्द्वन्द्व, सकलांगजन
प्रस्तावना
भारत देश की बहुत बड़ी आबादी का 2.68% हिस्सा विकलांगजनों का है। भारत में विकलांगता के कई प्रकार हैं। विकलांग व्यक्ति कहीं सुनहरे भविष्य का निर्माण कर रहें हैं तो कहीं भयावह वर्तमान भी जी रहें हैं। विकलांगता की कई चुनौतियाँ होती है जिसमें से जीवन के विभिन्न आवश्यक पहलुओं में विवाह भी शामिल है। “भारतीय समाज में यदि परिवार एक सबसे छोटी और महत्वपूर्ण इकाई है तो इसका अस्तित्व विवाह द्वारा ही रहता है। विवाह की संस्था सभी समाजों में होती है। इसका मूल है प्रजनन द्वारा मनुष्य जाति की बिरादरी को बनाये रखना। यदि प्रजनन ही न हो तब सम्पूर्ण मनुष्य का अस्तित्व ही खतरे में पहुँच जाता है। जीवन साथी अथवा पति या पत्नी को प्राप्त करने के प्रत्येक समाज में कुछ वैध तौर-तरीके होते हैं। इन तरीकों को समाज अपनी स्वीकृति देता है।”1 सामाजिक दृष्टिकोण से विवाह की यह परिभाषा है परन्तु विवाह का अर्थ इस परिभाषा से कहीं अधिक व्यापक है। विवाह न केवल सामाजिक व्यवस्था को बनाये रखने की एक पद्धति मात्र है अपितु यह दो मनुष्य की आपसी समझ,पसंद, विश्वास आदि की भी नींव है। विवाह की जैसी भूमिका सकलांग व्यक्ति के जीवन में है ठीक वैसी ही भूमिका विकलांग व्यक्ति के जीवन में भी है।
विवाह की भूमिका भले ही सकलांग और विकलांग व्यक्ति के जीवन में समान हो परंतु इसका रूप दोनों के जीवन में सर्वथा भिन्न है। विकलांग व्यक्ति के जीवन में अन्य चुनौतियों की तरह ही विवाह का प्रश्न भी जटिल होता है। एक विकलांग व्यक्ति की विकलांगता का प्रकार, उसकी असमर्थताएं, उसका आत्मविश्वास आदि ये सभी बिंदु उसके वैवाहिक निर्णय को अधिक द्वंदात्मक बना देते हैं। विकलांग व्यक्ति विकलांग ही जीवन साथी चाहे यह आवश्यक नहीं है, कई परिस्थितियों में विकलांग व्यक्ति का दूसरे विकलांग व्यक्ति के प्रति उपेक्षा का भाव स्पष्ट देखा जा सकता है। परन्तु हर बार उपेक्षा ही कारण हो यह आवश्यक नहीं बल्कि यह विचार कई कारणों से होता है। विकलांग व्यक्ति का सकलांग जीवन साथी चाहने का मुख्य कारण यह होता है कि सकलांग जीवन साथी उसकी विकलांगता को संभाल ले वहीं दूसरी ओर विकलांग व्यक्ति विकलांग जीवन साथी यह सोच कर पाना चाहता है कि एक विकलांग दूसरे विकलांग को बेहतर समझ सकता है। यहाँ यह सभी कारण तर्कपूर्ण और गंभीर हैं।
वैवाहिक निर्णयों के संदर्भ में विकलांगजनों की द्वंदात्मक स्थिति को ‘कंचन सिंह चौहान’ की कहानी “जाने किसकी खुशी तलाशी है” के माध्यम से समझा जा सकता है कहानी की नायिका एक प्रसिद्ध गायिका होने के बावजूद अपनी विकलांगता के कारण वैवाहिक निर्णय लेने में स्वयं को असमर्थ महसूस करती है। जब स्वयं विकलांगता से ग्रस्त नायक नायिका से उसके प्रेमी को छोड़ने पर प्रश्न करता है कि” आपको नहीं लगता कि आपको ऐसा नहीं करना चाहिए था?” नायिका उत्त्तर देती है कि ”नहीं, कभी नहीं। उस ज़िन्दगी को चुनकर रोज़-रोज़ शिकायतों में जीने से बेहतर हैं ये कभी-कभार की शिकायतें।” स्त्री कुछ देर ठीक सामने शून्य को घूरती ख़ामोश बनी रही और फिर शून्य में देखती हुई बोली, “मैं देखती थी कि उसकी माँ उसे प्यार से खाना लगाकर देती, उसके कपडे सही जगह पर रखती, उसका कमरा सही करती, उसकी हर बेतरतीबी को तरतीब देती और वो बेपरवाह-सा बहुत खुश रहता. ख़ुद को तरतीबियत में पा कर। उसे घर का बना खाना अच्छा लगता था। माँ के हाथ का।”
“मै उसे इतनी तरतीब से कहाँ रख पाती। मुझे तो ख़ुद हर पल चाहिए था कोई जो मेरी बेतरतीबी संभाल सकता।” इसलिए वह कहती है कि “He is my man but I didn’t find myself for being his lady” यहाँ प्रेम और साथ के बावजूद नायिका का अपने प्रेमी के साथ रिश्ता सामान्य नहीं है क्योंकि नायिका प्रेमी की आवश्यकताओं व इच्छाओं के सम्मुख स्वयं को असमर्थ पाती है। इसी कहानी का नायक जो कि विकलांग होने के बावजूद एक एथलीट (खिलाड़ी) है, वह सभागार में प्रेरणादायी और बेहद प्रभावशाली स्पीच देते हुए विकलांगों का मनोबल बढ़ाता है परन्तु वैवाहिक निर्णय लेने में उसकी भी स्थिति नायिका जैसी ही है।
अपनी प्रेमिका को सीढ़ियों से गिरने पर उसे उठा न सकने की विवशता के कारण वह ग्लानि महसूस करने लगता है और यह एक छोटी सी घटना उसे एक बड़ा फैसला लेने हेतु विवश कर देती है। वह नायिका से कहता है कि “मैंने सोच लिया कि वह मुझे कितना भी ग़लत समझे. मैं बिना कुछ कहे उसकी ज़िन्दगी से निकल जाऊँगा। मुझे हमेशा से पता था कि मेरे साथ और मेरे प्रेम के अलावा उसे कुछ भी नहीं चाहिए लेकिन आप की ही तरह,
“I didn’t find myself perfect for being her man.”2
यहाँ नायक व नायिका दोनों ही अपने अपने क्षेत्र में महारथी है, दोनों ही विकलांगजनों हेतु मील का पत्थर है परंतु विकलांगता से उत्पन्न उदासीनता, क्षीण मनोबल व अन्य कई असमर्थताओं के कारण वैवाहिक निर्णय दोनों के लिए ही एक चुनौती है। कहानी में दोनों पात्र सकलांग पात्रों के साथ वैवाहिक निर्णय लेने में स्वयं को असक्षम व अयोग्य पाते है ऐसे में एक प्रश्न यह उठता है कि क्या इनके प्रेमी-प्रेमिका यदि सकलांग न हो कर इन्हीं की तरह विकलांग होते तब भी क्या निर्णय इतना ही कठिन होता है, क्या विकलांग को विवाह सम्बन्धी निर्णय लेने में तभी समस्या होती है जब दूसरा पक्ष सकलांग होता है, इन प्रश्नों का उत्तर ‘जया जादवानी’ की कहानी “जो बचा, वह शब्द नहीं था” में निहित है। कहानी का नायक मूक बधिर है। अपनी समस्याओं आदि को समझते हुए वह निर्णय लेता है कि वह अपनी ही विकलांगता जैसी लड़की को अपना जीवन साथी बनायेगा जिसके लिए वह मन मस्तिष्क से पूर्णतः तत्पर है उसे अपने इस फैसले पर कहीं कोई शंका नहीं है हालांकि वह इतना रसूखदार है कि उसका परिवार उसके लिए सकलांग लड़की भी चुन सकता है बावजूद इसके वह अपने निर्णय पर अडिग है। सगाई के बाद जब नायक नायिका कुछ क्षणों के लिए एकांत में मिलते है तब नायिका को पहली बार पता लगता है कि नायक उसी की तरह मूक बधिर तो है परन्तु साथ में उसकी एक आँख पत्थर की है, उस छोटे से क्षण में इतनी बढ़ी घटना घटती है जिस से नायक पूरी तरह टूट जाता है। नायक के शब्दों में “अब मैंने उसे रोकने की कोशिश छोड़ दी, चुप खड़ा रहा। एक लंबी हिचकी उसके मुँह से निकली और उसने सख्ती से अपने होंठ भींच लिए। अब उसने सीधे मेरी आँख में देखा तो मैं सिहर उठा। उसने अपनी ऊँगली ऊपर की और सगाई की अंगूठी उतार मेरे मुँह पर फेंक दी।
वह जा रही है, मैंने उसे रोका नहीं। जब वह चली गई, मैंने अपना चेहरा सहलाया। मैंने देखा- मेरी पत्थर की आँख में एक आंसू अटका है। फर्श पर अंगूठी बज रही है…निःशब्द….।”3 कहानी की यह घटना यह दर्शाती है कि विकलांग भी दूसरे की विकलांगता को अपनाना नहीं चाहता है ऐसे में सकलांग और विकलांग का मेल व उनके बीच की उलझनों को काफी हद तक समझा जा सकता है।
विकलांग व्यक्ति वैवाहिक निर्णय लेते समय जितना किंकर्तव्यविमूढ़ की स्थिति में होता है उतना ही वैवाहिक जीवन में प्रवेश के पश्चात् होता है। विकलांगता के कारण वह कई बार उचित-अनुचित से परे केवल सामाजिक प्रतिष्ठा को सर्वोपरि मानते हुए सब कुछ सह जाता है। ‘मनीषा कुलश्रेष्ठ’ की कहानी “कठपुतलियाँ” में रामकिसन अपने से काफी कम उम्र की पत्नी सुगना के अवैध संबंधों को इस तरह स्वीकार कर लेता है वह कहता है कि “किसी का भी हो चाहे सुगना के गर्भ का बच्चा, वह सुगना को नहीं छोड़ सकता। यह निश्चित था कि बच्चा उसका नहीं है, लेकिन कठपुतली नचाते-नचाते रामकिसन जान गया था कि उसकी यह जो मायाविनी-जीवंत कठपुतली है ‘सुगना’, वह मुक्त भी है, अनुरक्त भी। उसमे त्याग भी है, मोह भी। न सही सती धर्म, लेकिन सेवा है, सहिष्णुता है। उसमे जीवन है. जीवन की हलचल है। मादकता है तो अथाह ममता भी।
वह अंत तक कहता रहा, “बाई, रहने दे मेरा घर उजड़ जाएगा। दूसरी बार।”4
रामकिसन यदि सकलांग होता तब भी उसकी यही प्रतिक्रिया होती यह कहना मुश्किल है। रामकिसन भीतर ही भीतर यह सोचता है कि लोग जानेंगे तो यही सोचेंगे कि मैं अपाहिज हूँ इसलिए मेरी पत्नी दूसरे के प्रति आसक्त हो गई इस तरह के कई प्रश्न उसे कचोट रहे हैं। रामकिसन सुगना के अवैध सम्बन्ध के साथ-साथ अपनी हीन भावना को भी आड़ दे रहा है। उसकी विकलांगता के आगे उसका पुरुषत्व भी छोटा जान पड़ता है क्योंकि एक विकलांग व्यक्ति को तथाकथित सभ्य समाज उसकी अन्य विशेषताओं से परे उसकी विकलांगता से अधिक जानता है।
एक विकलांग का सकलांग को छोड़ना जितना कठिन है एक सकलांग का विकलांग को छोड़ना उतना ही सरल है हालाँकि सदैव ऐसा ही होता यह कहना अपवाद होगा परन्तु अधिकतर ऐसा ही देखा गया है कि सकलांग विकलांग के साथ जीवनयापन करने से बचता है।
‘रमेश खत्री’ की कहानी “मैं तलाक ले रही हूँ” में एक ऐसे सकलांग दंपति का जीवन दिखाया गया है जिन्होंने घर परिवार से लड़ झगड़ कर प्रेम विवाह किया और भविष्य के सपने संजोये परन्तु एक सड़क दुर्घटना में बाइक से गिरने पर कहानी के पुरुष पात्र उत्कर्ष के पैर टूट जाते हैं जिस से वह एक ही क्षण में सकलांग से विकलांग की श्रेणी में आ जाता है। इस दुर्घटना के बाद उसका जीवन पूरी तरह से बदल जाता है। वह शारीरिक से कहीं अधिक मानसिक पीड़ा सहता है। उत्कर्ष की पत्नी जो अब एक विकलांग की पत्नी है एकाएक उसके सोचने का ढंग बदल जाता है “मेरे मन में न जाने कब चोर रास्ते से यह विचार घुस आया। उस दिन मै उत्कर्ष को अपने साथ ले जाकर उसके घर छोड़ते हुए बोली, “लो सम्हालो अपने बेटे को।” मैं भी अकेली क्या करती, कब तक करती उसकी देखभाल; और कैसे अपने जीवन की नाव को पार लगाती, आखिर मुझे भी तो अपने बारे में सोचने का अधिकार है। मैंने यह सोचकर मन कड़ा कर लिया, ‘जो मेरे साथ आया था अपने पैरों पर चलकर वह आज जा रहा है इस व्हील चेयर पर….उस समय वो बस टुकुर-टुकुर देखता रहा मुझे। मेरी तरह ही वह भी अजीब मनोदशा में होगा, मैं जानती हूँ, इन दिनों वह अपने आपको बोझ मानने लगा था मुझ पर। मैं भी क्या करती….कितना तो देखभाल करती फिर भी वह न जाने कौनसी दुनिया खोया रहने लगा।”5
जिस रिश्ते को उत्कर्ष की जीवनसंगिनी ने प्रेम के आधार पर शुरू किया प्रेम के नज़रिए से ही देखती थी अब इस सड़क दुर्घटना के बाद अचानक उस रिश्ते को वह तर्क के आधार पर देखने लगी। उत्कर्ष के साथ अब जीवन बिताने में उसे लाभ-हानि के बोध होने लगा और अंततः उसने उसे छोड़ने का निर्णय लिया साथ ही अपने उज्ज्वल भविष्य की तैयारी भी करने लगी।
सकलांग का विकलांग के प्रति उपेक्षित नज़रिए का एक अत्यंत अमानवीय उदहारण ‘धर्मवीर भारती’ की कहानी “गुलकी बन्नो” के माध्यम से देखा जा सकता है। जिसमें गुलकी का पति उसे इस कदर मारता है कि उसकी पीठ पर कूबड़ निकल आता है उसे घर से निकाल कर वह दूसरा विवाह कर लेता है और गुलकी भिक्षावृति हेतु विवश हो जाती है। परन्तु जब उसके पति की दूसरी पत्नी को गर्भावस्था में घर के कामकाज के लिए नौकर की आवश्यकता होती है तब गुलकी का पति उसे यह कहते घर वापस लाता है कि “इसे ले तो जा रहे हैं, पर इतना कह देते हैं, कि आप भी समझा दें उसे कि रहना है तो दासी बनकर रहे। ना दूध की ना पूत की, हमारे कौन काम की पर हाँ औरतिया की सेवा करे, उसका बच्चा खिलावे, झाडू-बुहारू करे तो दो रोटी खाये पड़ी रहे। पर कभी उससे जबान लड़ाई तो खैर नहीं। हमारा हाथ बड़ा जालिम है। एक बार कूबड़ निकला, अगली बार परान निकलेगा।6
यहाँ दो उदाहरणों के माध्यम से यह समझा जा सकता है कि स्त्री हो या पुरुष, शिक्षित हो या अशिक्षित, धनी वर्ग हो अथवा मध्यम परन्तु विकलांगता जीवन की दशा दिशा बदल देती है। हीनता का भाव, अस्तित्व का संकट यह सभी ऐसे बिंदु है जो व्यक्ति की सोचने समझने की शक्ति को क्षीण कर देती है साथ ही व्यक्ति में मनोबल का सर्वथा अभाव हो जाता है।
उपरोक्त उदाहरणों में जहाँ वैवाहिक जीवन विकलांगता के कारण समाप्त हो गया वहीं ऐसे भी उदाहरण है जहाँ विकलांगता से वैवाहिक जीवन की एक नई शुरुआत हुई है हालांकि ऐसे उदाहरण विरले ही मिलते है जहां सकलांग और विकलांग जीवन साथी एक दूसरे का साथ पूरी ईमानदारी के साथ देते है। बावजूद इसके कई बार परिस्थितियां इतनी जटिल हो जाती हैं कि मनोविज्ञान के बड़े से बड़े सिद्धांत भी विफल हो जाते हैं।
इस तरह की पेचीदा समस्या को ‘प्रदोष मिश्र’ की कहानी “आँखें” में देखा जा सकता है। वैज्ञानिक निहाररंजन औए एलिजा एक ऐसे भंवर में फंसे है जिसमें रहना और निकलना दोनों ही कठिन है। प्रयोगशाला में विस्फोट के कारण जब निहाररंजन नेत्रहीन हो जाता है तब एलिजा उसके समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखती है ताकि वह अपने पूर्व प्रेमी की स्मृतियों को भुला सके जो बलात्कारी था। वह स्वयं को अपने भावी नेत्रहीन पति की सेवा में इतना तल्लीन कर लेना चाहती है कि उसे पीछे का कुछ भी याद न रहे। निहाररंजन ने उसके प्रस्ताव में निहित समर्पण व आत्मविश्वास से संतुष्ट होकर प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। परन्तु दुर्भाग्य यह कि निहाररंजन को उसके पूर्व प्रेमी की ही आँखें लगाई जाती हैं। निहाररंजन के जीवन का यह सुख एलिजा के जीवन का स्थायी दुख बन जाता है। निहाररंजन के लाख समझाने पर भी मनोविज्ञान की अध्यापिका होने के बावजूद एलिजा इस अन्तर्द्वन्द से बाहर नहीं निकल पाती है और अंततः यह रिश्ता विवाह के दस्तखत से तलक के दस्तखत में तब्दील हो जाता है।
निहाररंजन के जीवन में जिस मनोवैज्ञनिक ढंग से एलिजा का आगमन हुआ उसी पेचीदगी के साथ उसका जीवन से जाना भी हुआ। जिस प्रकार निहाररंजन ने विवाह का प्रस्ताव स्वीकार किया उसी प्रकार तलाक की अर्ज़ी भी उसे माननी पड़ी, निहाररंजन कहता है कि “ एक बात याद रखियेगा कि कभी-कभी अपने मनोविज्ञान के साथ समझौता नहीं करने से घर टूट जाता है। तिनकों को जोड़-जोड़कर आशियाना बनाने के लिए वैचारिक धरातल पर सूझ-बूझ और समझौते की जरूरत होती है। ”
“यानी?”
“यानी, हम लोग तलाक लेने के लिए आखिरी बार मिलने जा रहें हैं। इससे अधिक और हो ही क्या सकता है? मेरी इन आँखों से एलिजा की मुक्ति एकमात्र इसी से सम्भव हो सकती है।”7
गाड़ी से उतरते हुए हमने देखा कि निहार पाकेट से रूमाल निकालकर अपनी आँखें पोछ रहा था। ” इस कहानी में निहार के जीवन में एलिजा के आने और जाने से निहार के मन मस्तिष्क में जो अन्तर्द्वन्द उत्पन्न हुआ उस से निहार जीवनभर प्रभावित रहेगा। एलिजा ने मात्र अपने मनोविज्ञान पर विचार किया। जब वह विवाह के लिए निहार के पास आई तब भी अपने अतीत से पीछा छुड़ाने के लिए और जब वह गई तब भी अतीत से पीछा छुड़ाना ही उसका उद्देश्य रहा। परन्तु जिस अतीत से एलिजा लगातार भागती रही उस अतीत में निहार की कोई भूमिका नहीं रही। एलिजा मात्र अपनी मुक्ति का मार्ग तलाशती रही और जितना एलिजा मुक्त हुई उतना ही निहार की अंधकार में वापसी हुई। एक साथी का अपने दूसरे साथी के प्रति दृष्टिकोण वैवाहिक जीवन का आधार है।
विवाह की नींव साथ, समझ, विश्वास व धैर्य है जिसे सहचर कहानी के बंशी के माध्यम से समझा जा सकता है। ‘मैत्रेयी पुष्पा’ की कहानी “सहचर” में छबीली के गैंग्रीन होने पर उसके पैर काट दिए जाते है तब उसका पति बंशी जिसने अब तक का जीवन केवल माता पिता के दबाव में बिताया साथ ही विवाह उपरांत पिता की मार भी खाई परन्तु वह हिम्मत करता है और दूसरी शादी के मंडप से भाग कर छबीली के पास पहुच जाता है। “एक दिन बंशी उसके पिता को गाँव के सुनार की दुकान पर दिखा था लेकिन वे उसकी सूरत नहीं देखना चाहते थे, सो नहीं मिले उससे…. फिर भी मन नहीं माना, उसके जाने के बाद सुनार से उसके आने का कारण पूछने लगे। सुनार ने तुरंत वह सोने की आरसी निकालकर सामने रख दे—“जाए बेंच गऔ बंशी, कह रऔ हतो कें वौ छबीली कौ पाँऊ बनबावे कें लाने पूना जारऔ।”8 बंशी जैसे जीवन साथी मील के पत्थर के रूप में उभर कर आते है।
केवल सकारात्मक दृष्टिकोण किसी भी विकलांग को हीनता का शिकार होने से बचाने के साथ-साथ उसके ढहते अस्तित्व को भी संबल दे सकता है। व्यवहारिक रूप में बंशी जैसे पात्र कम ही मिलते है। अधिकांश परिस्थितियों में विकलांगता वैवाहिक जीवन हेतु एक अडचन ही बन जाती है। जीवन उतर-चढ़ाव का प्रतिरूप है जिसे स्वीकार करना आवश्यक है वैवाहिक जीवन में यह स्वीकृति अधिक महत्व रखती है क्योंकि यहाँ बात एक व्यक्ति की न हो कर एक पूरे परिवार की होती है।
डॉ. अर्चना शर्मा कहती है कि “विविधता संसार की संरचना का अंग है, हमें अपने जैसा मिल ही नहीं सकता क्योंकि यही तो विचित्रता है उस निर्माता की. कि करोड़ों रचनाएँ एक-दूसरे से नहीं मिलती अब यही समझना होगा कि यह जो शारीरिक विषमता कमी प्रकृति में है और किसी को भी प्राप्त हो सकती है। ईश्वर ने इसलिये हमारे अंदर दान, करूणा, क्षमा जैसे गुणों को प्रदान किया है, जिसको अपनाकर हम उसके समानता के सिद्धांत को अपनाकर प्रकृति की सेवा कर सकते हैं, और यही उसकी चाहत है।”9
विकलांगता के कारण वैवाहिक जीवन में अनेकानेक समस्याएँ उत्पन्न होती है जिससे अधिकांश विवाह असफल हो जाते हैं जिससे एक साथी तो जीवन की नई राहों पर निकल जाता है परन्तु दूसरा साथी कुंठा, क्षोभ, आत्मग्लानि जैसी नकारात्मकता का शिकार हो जाता है। ऐसी परिस्थिति में दंपति को विकलांगता को एक चुनौती के रूप में स्वीकार कर उसका सामना करना चाहिए।
निष्कर्ष
विवाह जीवन भर चलने वाला रिश्ता है जिसे सम- विषम परिस्थितियों में निभाने के लिए दोनों साथी एक दूसरे से वचनबद्ध होते है। यह केवल वचनों व शर्तों पर आधारित न हो कर प्रेम, विश्वास व साथ पर आधारित होता है। विकलांगता के संदर्भ में दोनों का एक दूसरे के प्रति दृष्टिकोण महत्वपूर्ण है। दोनों के विकलांग होने अथवा किसी एक साथी के विकलांग होने पर दूसरे साथी का साथ ही जीवन जीने का संबल बनता है। विकलांग व्यक्ति हेतु वैवाहिक निर्णय जितना कठिन होता है दूसरे साथी के साथ से यह निर्णय बहुत हद तक सरल हो सकता है।
संदर्भ सूची
- भारतीय सामाजिक व्यवस्था, एस.एल.दोषी, पी. सी. जैन, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली, संस्करण- द्वितीय, पृ- 185,
- तुम्हारी लंगी, कंचन सिंह चौहान, राजपाल एण्ड सन्ज़, नई दिल्ली, संस्करण-प्रथम, पृ- 21
- जीवन संग्राम के योद्धा, संपा. संध्या कुमारी, राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत, नई दिल्ली, पृ- 228
- रंग-रूप रस-गंध, मनीषा कुलश्रेष्ठ, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण- प्रथम, पृ- 120
- जीवन संग्राम के योद्धा, संपा. संध्या कुमारी, राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत, नई दिल्ली, पृ- 233
- मेरी प्रिय कहानियाँ, धर्मवीर भारती, पृ- प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण- प्रथम, पृ- 98
- विकलांग विमर्श की कहानियाँ, संपा-डॉ. विनय कुमार पाठक, डॉ. राजेश कुमार मानस, नीरज बुक सेंटर, नईदिल्ली, संस्करण-प्रथम, पृ-157
- जीवन संग्राम के योद्धा, संपा. संध्या कुमारी, राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत, नई दिल्ली, पृ- 173
- विकलांग-विमर्श विविध सोपान, संपा- डॉ. आनंद कश्यप,पंकज बुक्स, नई दिल्ली, संस्करण- प्रथम, पृ- 35

शबनम परवीन
ईमेल – [email protected]
Mobile: +91 87002 17039
