आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने हमारे सोचने और काम करने के तरीके को पूरी तरह बदलकर रख दिया है। लोग मेटा, जेमिनी, को-पाइलट, डीप सीक, और ओपन एआई चैटबॉट का जमकर इस्तेमाल कर रहे हैं। इंसान जिस काम को घंटों में करते हैं उसे आर्टिफिशिल इंटेलिजेंस की मदद से मिनटों में कर लिया जाता है। अधिकतर लोग आज के समय में एआई पर निर्भर होने लगे हैं। कंपनियां इसका सबसे ज़्यादा फ़ायदा उठा रही हैं। तकनीक जैसे-जैसे बढ़ रही है, लोगों को नौकरी का संकट सताने लगा है। प्रोफेशनल्स इस बात से परेशान हैं कि एआई के कारण कहीं उनकी नौकरियां न चली जाएं।
And much it grieved my heart to think
What man has made of man.
– William Wordsworth
अंग्रेज़ी के रोमांटिक कवि विलियम वर्डस्वर्थ (1770-1850) की कविता ‘लाइन्स रिटन इन अर्ली स्प्रिंग – (1798) में कवि कहते हैं – “मेरा मन यह सोच कर उद्वेलित हो उठता है / कि इन्सान ने इन्सान को क्या बना दिया है।” और इस कविता के अंत में वे एक बार फिर कहते हैं – “क्या यह सोच कर मुझे दुखी नहीं होना चाहिये / कि इन्सान ने इन्सान की क्या हालत कर दी है।”
विलियम वर्डस्वर्थ जब पैदा हुए थे उस समय ब्रिटेन के राजा थे जॉर्ज तृतीय और उनके मरने से 13 वर्ष पहले महारानी विक्टोरिया गद्दीनशीन हो चुकी थीं। 1770 में ही बंगाल में अकाल के साथ ईस्ट इंडिया कंपनी का राज स्थापित हो चला था। मगर हैरानी की बात यह भी है कि 1943 में बंगाल के अकाल के साथ ही ब्रिटिश हुकूमत का बोरिया बिस्तर भी बंधना शुरू हो गया।
सवाल यह उठता है कि विलियम वर्डस्वर्थ जिस काल में रहे, वो तो इंग्लैण्ड का विश्व-विजेता बनने वाला काल था। पूरी दुनिया में अंग्रेज़ों का राज था। फिर भला कवि को किस से किस बात की शिकायत थी। दरअसल आम आदमी के लिये अतीत हमेशा हसीन होता है… महान होता है। आम आदमी हर काल में संघर्ष ही कर रहा होता है। हर काल में धोबी, मोची, सफ़ाई कर्मचारी, दिहाड़ी मज़दूर, मिल में काम करने वाले आदि आदि होते ही हैं। कभी भी ऐसा नहीं होता कि सब लोग ठाठ की ज़िन्दगी बिता रहे हों। हालांकि वर्डस्वर्थ स्वयं एक ख़ुशहाल जीवन व्यतीत कर रहे थे, मगर उनका कवि हृदय अपने आसपास के समाज, माहौल और स्थितियों को संवेदनशील ढंग से देख रहा था। यदि वे आज होते तो ना जाने उनकी कविताओं में कितना दर्द होता।
हम एक तरफ़ तो चाँद और मंगल ग्रह पर जा रहे हैं तो दूसरी तरफ़ पूरी दुनिया में मज़हब को लेकर युद्ध हो रहे हैं। आतंकवाद की घटनाएं और मशीन द्वारा इंसान का काम छीन लेने की घटनाओं ने भी सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस का आतंकवाद इस समय आम आदमी पर कहर बन कर फूट रहा है। जनवरी 2022 से फ़रवरी 2025 के बीच ब्रिटेन में अलग-अलग बैंकों की 1,530 ब्रांचें बंद हो गई हैं। 66 और ब्रांचों के बंद होने की घोषणा हो चुकी है यानी कि तीन साल में 1,590 ब्रांचें बंद।
ब्रिटेन में डिपार्टमेंट स्टोर, सुपर-मार्केट और किताबों की दुकानों पर भी ताले लग रहे हैं। सैंकड़ों हज़ारों लोगों की नौकरियां जा रही हैं। इस सबके पीछे आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस और ऑनलाइन बैंकिंग और शॉपिंग जैसे वीभत्स राक्षस खड़े हैं। एक मज़ेदार स्थिति यह है कि एक ही मार्केट में साथ-साथ तीन दुकानें हैं – एक रेडिमेड कपड़ों की, दूसरी जूतों की और तीसरी रोज़मर्रा की ज़रूरत की चीज़ों की। ये तीनों दुकानदार एक दूसरे की दुकान से कुछ नहीं ख़रीदते, बस ऑनलाइन अमेज़न या किसी अन्य स्त्रोत से सामान ख़रीद लेते हैं। दुकाने धड़ा-धड़ बंद हो रही हैं।
तीन दिन पहले बिल गेट्स (माइक्रोसॉफ़्ट कंपनी के मुखिया) ने एक ऐसी घोषणा कर दी है कि मन दहश्त से भर गया है। उनका मानना है कि तीन क्षेत्रों की नौकरियों को छोड़ कर आर्टिफ़िशयल इंटेलिजेंस तमाम लोगों की नौकरी को खा जाएगी। उनके अनुसार केवल तीन क्षेत्र ऐसे हैं जिनकी नौकरियां बची रह सकती हैं।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने हमारे सोचने और काम करने के तरीके को पूरी तरह बदलकर रख दिया है। लोग मेटा, जेमिनी, को-पाइलट, डीप सीक, और ओपन एआई चैटबॉट का जमकर इस्तेमाल कर रहे हैं। इन्सान जिस काम को घंटों में करते हैं उसे आर्टिफिशिल इंटेलिजेंस की मदद से मिनटों में कर लिया जाता है। अधिकतर लोग आज के समय में एआई पर निर्भर होने लगे हैं। कंपनियां इसका सबसे ज़्यादा फ़ायदा उठा रही हैं। तकनीक जैसे-जैसे बढ़ रही है, लोगों को नौकरी का संकट सताने लगा है। प्रोफेशनल्स इस बात से परेशान हैं कि एआई के कारण कहीं उनकी नौकरियां न चली जाएं।
जैसे-जैसे जनरेटिव एआई और अधिक शक्तिशाली टूल के रूप में उभर रहा है, कई दिग्गजों ने चिंता जाहिर की है कि इसका हमारे काम करने के तरीके पर बहुत बड़ा असर पड़ने वाला है। उनका मानना है कि कुछ सेक्टर्स में AI इंसान की बुद्धिमत्ता को भी पार कर सकता है।
बिल गेट्स ने आज के युग को “फ्री इंटेलिजेंस” का युग बताया, जहां आर्टिफ़िशिल इंटेलिजेंस न सिर्फ़ हर क्षेत्र में प्रवेश करेगा, बल्कि उसे एक्सेस करना भी बेहद आसान होगा। उनका कहना है कि इससे मेडिकल ट्रीटमेंट से लेकर ऑनलाइन एजुकेशन तक हर क्षेत्र में क्रांति आ जाएगी।
दरअसल कोरोना काल ने जब ‘घर से काम’ का सिस्टम शुरू करवा दिया तो इन्सान के दफ़्तर जाने की सोच में ही एक क्रांतिकारी तब्दीली आ गई। मुझे याद है कि जब मैं दिल्ली में कॉलेज और विश्वविद्यालय की पढ़ाई कर रहा था तो साथ ही साथ स्कूल टीवी पर एक्टिंग भी किया करता था। उस समय स्कूल टीवी में अंग्रेज़ी, केमिस्ट्री और फ़िज़िक्स के लेक्चर हुआ करते थे। मैं अंग्रेज़ी भाषा के कार्यक्रमों में भाग लिया करता था। जब स्कूल टीवी की क्लास होती थी तो अध्यापक वहां केवल बैठे रहते थे। यह बात आज से पचास साल पहले की है। यानी कि ऑनलाइन पढ़ाई के बीज उस समय से ही पड़ने शुरू हो गये थे।
अंग्रेज़ी में एक कहावत है, “Today’s poetic imagination, is tomorrow’s scientific truth!” यानी कि आज जो कवि की कल्पना की उड़ान है वो आने वाले कल की वैज्ञानिक सच्चाई हो सकती है। कवि चांद पर सदियों पहले पहुंच चुका था, जबकि इन्सान ने पहली बार वर्ष 1969 में चांद पर पाँव रखा जब अमरीका के नील आर्मस्ट्रांग और बज़ ऑल्ड्रिन ने इस उपलब्धि को हासिल किया। कहानियों और कल्पनाओं में इन्सान के अंगों का प्रत्यारोपण सदियों पहले हो गया था। मगर वैज्ञानिकों ने इसे भी सच कर दिखाया।
इन्सानी फ़ितरत भी ख़ासी विचित्र होती है। इन्सान तकनीकी प्रगति के लाभ तो उठाना चाहता है मगर उससे पैदा होने वाले नुक्सानों से बचना भी चाहता है। इन्सान साइकिल, मोटर साइकिल, कार, रेल और विमान में यात्रा का आनंद तो उठाना चाहता है मगर हादसों से डरता है। इन्सान ही कोरोना जैसे वायरस पर अनुसंधान करता है और जब कोरोना वायरस फैल जाता है तो उसके लिये वैक्सीन ईजाद करने में जुट जाता है। कोरोना काल के दौरान ना जाने कितने व्यापारिक संस्थान बंद हो गये। एअरलाइन तक का भट्टा बैठ गया।
1957 में बी.आर. चोपड़ा ने एक फ़िल्म बनाई थी ‘नया दौर’। इस फ़िल्म में दिलीप कुमार, वैजयन्ती माला, अजित, जीवन और जॉनी वॉकर ने अभिनय किया था। साहिर के गीतों को मधुर धुनों में बांधा था ओ. पी. नैय्यर ने। यह शायद पहली हिन्दी फ़िल्म थी जिसमें मशीन बनाम इन्सान का टकराव दिखाया गया था। टांगेवालों के जीवन पर बस के आगमन का क्या असर पड़ता है – यह टकराव ही इस फ़िल्म की कहानी थी। आर्टिफ़िशल इंटेलिजेंस के साथ आम इन्सान के रोज़गार के टकराव की आहट सुनाई देने लगी है।
मुझ जैसे सीधे-सादे आदमी को एक बात समझ नहीं आ रही कि बिल गेट्स आम आदमी के दर्द को महसूस करके उसे आने वाले ख़तरे से सावधान कर रहा है या फिर तालियां पीट-पीट कर ख़ुश हो रहा है और कह रहा है, “देखो, मैंने और मेरे जैसे जीनियस लोगों ने तुम जैसे रेंगने वाले लोगों के जीवन का सत्यानाश करने का जो खेल शुरू किया है वो जल्दी ही अपने पूरे निखार पर आने वाला है। तब तुम्हारे पास ना काम होगा और ना ही पगार। चीज़ों के दाम बढ़ते जाएंगे और तुम्हारी जेबें ख़ाली होती रहेंगी। फिर एक दिन ऐसा आएगा… ना ग़रीब बचेगा और ना ही ग़रीबी!”
हालांकि बिल गेट्स अभी भी कुछ क्षेत्रों को ऐसा मान रहे हैं जहां लोगों की नौकरी बची रहेगी। मगर साथ ही साथ चेतावनी भी दे रहे हैं कि यह तो फ़िलहाल आर्टिफ़िशल इंटेलिजेंस का शुरूआती दौर है, आगे-आगे देखिये होता है क्या। एक सवाल मन में यह भी आ रहा है कि क्या कल्कि भगवान सफ़ेद घोड़े पर अवतार लेंगे या फिर किसी आर्टिफ़िशल इंटेलिजेंस के किसी यंत्र से निर्मित होकर अवतरित होंगे… फ़िलहाल तो हमारे पास सवाल ही हैं… इनके जवाब तो भविष्य के गर्भ में छिपे हैं।
राष्ट्र कवि प्रदीप का लिखा एक गाना याद आ रहा है
देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान कितना बदल गया इंसान हाय वक्त बाद भी दंगा कहीं पर झगड़ा कहीं पर दंगा।
आज का संपादकीय जो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मानव के मौजूदा हालातो में व्यवहार पर एक महत्वपूर्ण तथ्यात्मक आलेख भी है और संपादकीय भी।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर बिल गेट्स माइक्रोसॉफ्ट के संस्थापक ने जो टिप्पणियां की है वे निश्चित रूप से डराने वाली और सावधान करने वाली हैं। मानव मेधा का और विशेष रूप से युवा वर्ग का इस पर निर्भर करना एक बहुत ही खतरनाक रुझान है।
कहीं ना कहीं इसके दुष्परिणाम भविष्य में हमें भुगतने पड़ेंगे।यहां पर एक बात और कह दूं जो संपादकीय में बहुत प्रमुखता से उठाई गई है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर इतना भी निर्भर ना हो जाए कि आप अपनी अपनी सोच भूल जाए।
हाल ही में राष्ट्रीय पुस्तक न्यास ने नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेले में एक विशेष सत्र का आयोजन किया जिसमें चार भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों को बुलाया और उन सभी का संदेश समवेत स्वरों में एक ही बात थी विशेष रूप से युवा वर्ग को जो उसे समय काफी बड़ी संख्या में वहां मौजूद थे कि आप चैट जी पी टी या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का सूचनात्मक प्रयोग करिए ।सूचना लेने के लिए प्रयोग करिए। लेकिन उस पर निर्भर अगर आप हो जाएंगे तो आप कहीं नहीं पहुंचेंगे।
और हां, यह आलेख हमें इसी बात के लिए बताता है कि हम अगर कहीं पहुंचना चाहते हैं तो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर बहुत ही ध्यान से इसका प्रयोग करें हां यह जरूर अलग बात है कि उसे आने वाली खतरे जैसा कि बिल गेट साहब ने बताया है उसके लिए कम से कम भारत को अवश्य सावधान रहना होगा क्योंकि यह एक जनसंख्या बहुल क्षेत्र है और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में भारत का जो रोल है वह काफी काफी पीछे है अपने दूसरे पड़ोसी देशों के। यहां एक बात और है कि भले यह पांचवीं अर्थव्यवस्था है। बड़ी ,पर यह, अर्थव्यवस्था आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के सामने बेहद बौनी साबित होगी अगर भारत सरकार ने इस पर कोई प्रभावी कदम नहीं उठाई।
यह संपादकीय एक जिम्मेदारी से लिखा गया बहुत ही समीचीन संदर्भों को रेखांकित करता हुआ शानदार संपादकीय है ।जिसके लिए पूरे पत्रिका समूह को बधाई और विशेष रूप से
संपादक महोदय को।
भाई सूर्यकांत शर्मा जी आपकी टिप्पणी महत्वपूर्ण है। संपादकीय को समझने में सहायक है।
आज का संपादकीय – इंसान ने अपनी क्या हालत कर ली है! ने डरावने सच को उजागर किया है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मानव निर्मित एक ऐसा दानव है जो इंसान को ही खा जाएगा। यद्यपि इसकी कुछ चीजों से मैं रूबरू हुआ हूं जैसे AI Meta, एक और अभी आया है उसका नाम भूल रहा हूं। ये उल्टे-सीधे सवाल करो तो उल्टे सीधे जवाब देता है। इसके बाद के जितने आपने नाम गिनाए है (मैं उन्हें नहीं जानता हूं) और उनके काले कारनामों के बारे में जानकारी दी है वह रूह कंपाने वाली है। आपने इस दानव की दानवीयता का जैसा विश्लेषण किया है वह रोंगटे खड़े कर देता है।
इस बार के संपादकीय का विषय जितना गंभीर है उसकी पड़ताल भी उतनी ही गहन है। आपने इसे मथकर रख दिया है। विलियम वर्ड्सवर्थ से लेकर ब्रिटिश साम्राज्य का चक्कर लगाते हुए फिल्म नया दौर, चांद पर पहुंचने की उपलब्धि और बिल गेट्स का सचेत करना कि ये आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस लगभग सारी नौकरियां खा जाएगा। ये मानव की प्रगति यात्रा खुद उसके लिए दुखदाई बनती जा रही है। बिल गेट्स का नौकरी खाने वाला कथन भय पैदा करता है।
सचमुच इन मशीनों के आगे मनुष्य लाचार सा दिख रहा है। वह भी ऐसे इंसान के हाथों की मशीन जो इंसानों को अपनी तिजोरी की हुंडी समझता है। उसे दया, ममता कहां।
चलो देखते हैं क्या होता है। फिलहाल तो मानव का भविष्य अंधकार में जाता हुआ दिखाई दे रहा है।
तेजेन्द्र सर जी, आपका यह संपादकीय भय अवश्य पैदा करता है पर साथ में आगाह भी कर रहा है कि संभल सको तो संभल जाओ वरना मैंने तो लिख दिया है। मेरे कान में नील का डोरा।
वैज्ञानिक तकनीकी की जानकारी कराता यह संपादकीय ज्ञानवर्धक है। इसके लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद सर।
प्रिय भाई लखनलाल पाल जी, संपादकीय के अंत में मैंने कल्कि अवतार की बात भी की है… एआई को हमारे ज़माने में केवल एअर इंडिया समझा जाता था… मगर आज शैतानी ताकत जैसा कुछ…
अरे सर आज के वैज्ञानिक युग में कल्कि अवतार की धारणा को महज आस्था के रूप में देखा जाता है। किसी तरह की पराजित मानसिकता से पार पाने का एक संबल। इसीलिए मैंने इस पर ध्यान न दिया। संपादकीय फिर से पढ़ी तो उसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर एक व्यंग्य नजर आया मुझे। मान्यता है कि अवतार भी युग के अनुरूप होते हैं। हो सकता है कि कल्कि भगवान इसी तरह की तकनीक के साथ इस धरती पर अवतरित हों। कल्कि भगवान के अवतार की कल्पना घोड़े पर सवार वाली की गई है। हां तो हो सकता है कि वे इसी इंटेलिजेंस के सफेद घोड़े पर सवार होकर अवतार लें। और पूरी दुनिया को चमत्कृत कर दें। फिर तो डरने की कोई बात ही नहीं है। न नौकरी जाएगी और न परेशान होंगे। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से भयमुक्ति की यह सोच बुरी नहीं है।
आपके बारे में यह बढ़िया बात है कि आप लौट कर रचना को दोबारा भी पढ़ लेते हैं।
आज के माहौल पर आपके सरोकार विचारणीय हैं लेकिन सवाल यह हैं कि आम आदमी इसका कैसे मुक़ाबला करे ?
यह एक ज्वलंत मुद्दा है भाई प्रदीप जी।
ज्वलंत समस्या पर सम्पादकीय है
मुश्किल घड़ी तो है ,बेरोजगारी का भयानक दौर आने वाला है, बिलगेट्स को भी जान मेनार्ड केन्ज को पढ़ना पड़ेगा ।
सम्भवतः कृषि से सम्बंधित काम बचे रहेंगे शहर ही गाँव में तब्दील होंगे ।
Dr Prabha mishra
प्रभा जी हमारी पीढ़ी ने स्टीम इंजिन से Artificial Intelligence की यात्रा देख ली है… शायद कल्कि भी आने ही वाले हैं…
आदरणीय संपादक जी,
अभी भारत में नवरात्रि चल रही है, सप्तमी तिथि को मां कालरात्रि की पूजा आराधना की जाती है,जिन्होंने महिषासुर का वध किया। इनकी उत्पत्ति के लिए दुखी ,पीड़ित देवताओं ने अपना-अपना अंश -दान किया।उनके क्रोध और भय की घनीभूत भावना ही कालरात्रि देवी के रूप में साकार हुई।
मुझे भारतीय मनीषियों के
की बुद्धिऔर कल्पना शक्ति पर पूर्ण विश्वास है इसके पहले कि मानव सृष्टि नष्ट हो अवश्य मनुष्य के सम्मिलित प्रयास से इस ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ‘नामक दैत्य को नियंत्रित कर लिया जाएगा।
यदि ऐसा ना हो सके तो ‘महा प्रलय’ तो निश्चित है ही!
भविष्य में होने वाले काष्टो से आतंकित हो ,उससे बचने का प्रबंध करने के विषय में मेरी मां एक कहानी सुनाया करती थी, फसल कटने पर किसी किसान में अनुमान लगाया कि उपज के आधार पर अगली फसल से पहले , शायद परिवार के लिए 7 दिन का अन्न कम पड़ेगा। उसे दिशा में उन्हें भूसे पर निर्वाह करना पड़ेगा सब ने मिलकर निश्चित किया कि चलो पहले सात दिन (अन्नकी कमी के),भूसा खाकर काट लेते हैं और फिर आनंद से अन्न का भोजन करेंगे! सोचिए कि उन सात दिनों में ही परिवार की क्या दशा हो गई होगी?अन्न का उपभोग करने के लिए कोई बचा ही नहीं!
भविष्य की चिंता और सुरक्षा के उपाय तो आवश्यक है परंतु उनकी चिंता में आज को नष्ट करना भी बुद्धिमत्ता नहीं है। पौराणिक और ऐतिहासिक कहानी हमें इसी बात के लिए तैयार करती हैं कि विकास और विनाश साथ-साथ चलते हैं मनुष्य की बुद्धि उसकी सबसे बड़ी मित्र तो है ही साथ ही वह उसके विनाश का भी कारण बनती है।
पंचतंत्र की वह कथा भी तो कुछ ऐसी ही है जिसमें पांच ब्राह्मण विद्वानों ने पुनर्जीवन देने वाली अपनी विद्या का उपयोग कर, सिंह को पुनर्जीवित किया और चार विद्वान शिष्य नष्ट हो गए!!!
तो मानवता के सामने मुंह बाए खड़ी इस दानवीर समस्या के बारे में मेरा तो विचार है कि
मेर”रहिमन चुप ह्वै बैठिए, देखि दिनन को फेर”
सरोजिनी जी यह भी एक रवैया हो सकता है… सब को अपनी अपनी सोच के अनुसार कुछ करना होगा।
आपकी हर संपादकीय गंभीर विमर्श लिए होती है ।इस बार की संपादकीय में कृत्रिम मेधा पर बहुत गंभीरता से चिंतन किया गया है और यह चिंता भी जताई गई है कि यदि हम इस मेधा के सामने अपने को बेहतर तरीके से तैयार न कर सके तो निश्चय ही यह संकट का हेतु बनेगी। बिल गेट्स की चेतावनी संपादक की भी चेतावनी मानी जानी चाहिए ।
वास्तव में संपादक ने बिल गेट्स की चिंता को कृत्रिम चिंता माना है ।इसीलिए वह कह सका है कि ‘पता नहीं बिल गेट्स इस चिंता के बहाने हम पर हंस रहा है या कि हमें सावधान कर रहा है ।’
दोनों बातें हैं । वह थोड़ा हंस भी रहा है और थोड़ा चिंतित मुद्रा में सावधान भी कर रहा है,क्योंकि अंततः वह भी इंसान है और उसके बच्चों के बच्चे भी इंसान ही पैदा होंगे।
आपका सादर
डॉ०गंगाप्रसाद शर्मा’गुणशेखर’
भाई गंगाप्रसाद जी, यह हम सब की चिन्ता है। भविष्य बहुत ही अनिश्चित है।
AI के कारण बड़ी ही धीमी गति से जॉब जा रहे हैँ, बॉसेस अपने कर्मचारियों को घटा रहे हैँ, AI के सहारे एक आदमी से कई आदमियों का काम करवा रहे हैँ। दूसरी ओर नये किस्म के फेक साहित्यकार भी पैदा हो रहे हैँ इसके कारण । ये खतरा विकराल रूप धारण करने वाला है एक दिन।
सही कहा आलोक भाई। आभार।
तकनीकी विकास के दौर में इंसान के मन में चिंताओं का घना कोहरा छा रहा है। विभिन्न क्षेत्रों में तकनीक ने इंसान का जीवन व दिनचर्या आसान तो बनाई है लेकिन सिर पर आशंकाओं का टोकरा भी साथ ही लाद दिया है। सामाजिक पारिवारिक अस्थिरता। शून्य होता भावनात्मक पक्ष। असली नकली पर क्षीण होता विश्वास। अच्छा या बुरा सब भविष्य के गर्भ में हैं।
ज्वलंत मुद्दों पर लिखे संपादकीय हमेशा महत्वपूर्ण जानकारियां थमा जाते हैं।
हार्दिक आभार सुधा… यह एक ऐसी समस्या है जिस पर विचार करना ज़रूरी है।
सादर नमस्कार सर
इस संपादकीय के लिए जितना भी साधुवाद दूँ… कम होगा..। आपके एक एक शब्द निराट सत्य है। मैं… इस विषय को आपके विचार को पूर्णरूप से सहमति देती हूँ। सचमें, इस AI और चैट gpt से मुझे इतनी नफरत है.. कि मैं कह नहीं सकती ..। यह पाश्चात्य संस्कृति सबसे बड़ा राक्षस है। जितने वैज्ञानिक उपकरण बनाए गए, जितने प्रगति के नाम पर अत्याधुनिक वस्तुएँ उपयोग में आई… उससे आदमी केवल कुप्रकृति की और ही गया… बस चलता चला गया।
*इस सबके पीछे *आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस और ऑनलाइन बैंकिंग और शॉपिंग जैसे वीभत्स राक्षस खड़े हैं।*
आपकी यह लाइने सम्पूर्ण सत्य है। मैं हृदततल से सहमत हूँ। इससे सचमें जो सर्वनाश हो रहा है.. इसकी कल्पना नहीं की जा सकती।
*उनका मानना है कि कुछ सेक्टर्स में AI इंसान की बुद्धिमत्ता को भी पार कर सकता है।*
यह सबसे अधिक भयाबह है। क्योंकि एक कहाबत है.. ‘खाली दिमाग़ शैतान का घर’… यहाँ रचनात्मकता मर चुकी है..। मैं विस्तार से बताऊँगी भी तो क्या बताऊँ.. आप तो ज्ञान का भंडार है। स्कूलों में छोटे छोटे बच्चों को भी चैट gpt और AI का प्रयोग सिखा या जा रहा है.. इसका विरोध करो तो आप शत्रु बन जाएँगे। बच्चों को अभी से useless बनाने का प्रबल प्रयास किया जा रहा है। तो यह, घोर विनाश का युग है।
*दरअसल कोरोना काल ने जब ‘घर से काम’ का सिस्टम शुरू करवा दिया तो इन्सान के दफ़्तर जाने की सोच में ही एक क्रांतिकारी तब्दीली आ गई।*
यह तो परम सत्य है। मृत्यु भी सहज थी इस समय और जो बच गए उनकी आत्मा, उनके विचार, उनका विवेक सबकुछ का भयंकर अवस्था में इस AI युग में अंत होना सुनिश्चित है।
मैं आपके संपादकीय के लिए… बहुत प्रतीक्षा करती हूँ। क्योंकि केवल नया नहीं.. वह पढ़ती हूँ.. वह मुझे मिलता है आपके लेख में जिससे मैं हरपल संघर्ष करती हूँ… चाहती हूँ ये सबकुछ जो हो रहा है… एक ऐसा पल आए कि अकस्मात crash हो जाए… और लोग फिरसे… भगवान की दी हुई बुद्धि और विवेक का उपयोग करे… रचनाशील बने.. आत्मनिर्भर ही नहीं… भगवान के दिए हुए इस शरीर का सदुपयोग करे।
आप प्रशंसनीय हैं
अनिमा जी, आप पुरवाई के संपादकीयों की प्रतीक्षा करती हैं… यदि किसी कारण आप तक संपादकीय पहुंचने में थोड़ी देरी हो जाए तो आप जल्दी से याद दिलाती हैं। आपको इस सप्ताह का संपादकीय अपने दिल के करीब लगा… जान कर अच्छा लगा। धन्यवाद।
आदमी मशीन तो बन ही गया है लगभग, अब मशीन खाएगा, मशीन ओढेगा।
रिंकु जी, यही डर है।
मैं खुद AI सीख रही हूं , पहले एक डर था पर ज्यों क्यों सीखती गई, वह डर रोमांच में बदलता गया। मुझे पता है कि AI समुद्र की वह तेज लहर है जो तेजी से बढ़ रही है और उस पर सर्फिंग सीख लेना ही, हमें भविष्य के लिए तैयार कर सकता है।
हर नई तकनीक कुछ नौकरियां लील लेती है पर कुछ नई नौकरियां भी पैदा होती हैं। यह चक्र चलता रहता है, प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी , इसमें कोई संदेह नहीं पर इंसान की जिजीविषा उसे नई राह सुझा ही देगी , इसमें कोई संदेह नहीं।
यह संपादकीय तथ्यों से भरपूर , तकनीक के अनकहे पहलू बताने वाला , आज के समय में सार्थक है। आपको साधुवाद।
आस्था आपने समस्या को नये कोण से देखा है… आपको संपादकीय पसंद आया यह अच्छा है कि युवा पीढ़ी पुरवाई के संपादकीयों के साथ जुड़ पा रही है।
बहुत विचारपूर्ण। सचमुच यह एक गंभीर चिंता का विषय है कि कहीं कृत्रिम बुद्धिमत्ता मानवीय मेधा को ही कालांतर में विस्थापित न कर दे। शुरुआती रुझान आने शुरु हो चुके हैं। साईबर वर्ल्ड ने वास्तविक दुनिया में जबरदस्त दखलंदाजी शुरु कर दी है। आपका संपादकीय इस आसन्न खतरे से बखूबी आगाह किया है। आभार।
अरविंद भाई, प्रयास तो यही है कि समस्या को समझा जाए ताकि इससे निपटा जा सके।
आपने सामयिक और बहुत गंभीर विषय उठाया है बड़े भाई। और मुमकिन है कि इसका सदुपयोग की जगह इसका दुरुपयोग ज़्यादा हो। कहीं सुगमता से उपलब्ध यह कृत्रिम बुद्धिमत्ता मानवीय मेधा को ही कालांतर में विस्थापित न कर दे।कई सोशल मीडिया पर पोस्ट आते हैं जिनकी गुणवत्ता और वास्तविकता पर विश्वास नहीं होता है! और साईबर क्राइम का अंदेशा अलग से बना रहता हैं आपका संपादकीय आलेख इस खतरे की तरफ़ ज़रूर ही आगाह किया है। आभार के साथ।
भाई कन्हैया जी, यही डर हम सब को परेशान कर रहा है। आपकी टिप्पणी ज़रूरी है।
अपने शोध पर पहले हम पहले खुश होते हैं और फिर जब उसका स्याह पहलू देखते हैं तो रो देते हैं और फिर बर्बादी की खुलती हुई खिड़कियों के लिए मातम मनाते हैं। हर दशक में उपलब्धियां इतनी आगे होती है कि पुरानी की उपयोगिता को नकारने लगते हैं। अब देखना हैं कि अगला विनाश का द्वार कब खुलेगा।
रेखा जी, आपका सवाल वाजिब है। डर तो लगा ही है।
जितेन्द्र भाई: आजकल के हालात को देखते हुए आपके टाइमली सम्पादकीय के लिए बहुत बहुत साधुवाद। सब से पहले तो आपके कोटशन “Today’s poetic imagination is tomorrow’s scientific truth” के बारे में कहना चाहूँगा कि 11 जुलाई, 1969 को जब अपॉलो 11 से नील आर्मसट्रॉंग को चाँद पर रात के 8 बजकर 17 मिनट पर उतरना था, उन दिनों मैं मॉन्ट्रियाल में था। चाँद पर उतरने से बहुत पहले, अमरीकन टी.वी. स्टेशन सी.बी.एस. इत्यादि उन उन कवियों, कविताओं और लेखों का व्याख्यान कर रहे थे जहाँ जहाँ पर मनुष्य को चाँद पर जाने का वर्ञन किया गया हो। सारा दिन, इन लेखों को असली उड़ान से कंपेयर किया जा रहा था। वैसे देखा जाये तो इस सफ़ल यात्रा के बाद स्पेस रिसर्च और डिवैलपमैञ्ट नें बहुत ज़ोर पकड़ लिया था।
जिस तेज़ी से आम रहने सहन में औटोमेशन दैनिक जीवन का एक अटूट हिस्सा बनता जा रहा है, उस के साथ साथ इस विकास के दुषपरिणाम भी सामने आरहे हैं। किसी भी जॉब में यदि काम करने वाले अपने को बढ़ती हुई टैक्नॉलौजी के साथ साथ अपनी स्किल को नहीं बढ़ायेंगे तो नौकरी जाने के बहुत चाँस हैं। यही नहीं; अब जब एक मशीन दस दस अदमीयों का काम सँभाल सकती है तो फिर बेरोज़गारी तो बढ़ेगी ही। औनलाइन शॉपिंग, ग्रोसरी सैल्फ़ चैकिंग, बैंकिंग और अन्य सुविधाओं के आने से आराम तो बहुत हो गया है, लेकिन इसके साथ साथ साइबरक्राइम भी कितना बढ़ गया है। अब तो साइबरक्राइम से लोगों को बचाने का भी एक बहुत बड़ा धन्धा बन गया है। इस सब के बाद भी अभी भी बहुत से ऐसे लोग हें जो इन सभी विद्याओं को न जानते हुये, किसी भी फ़्रॉड के शिकार हो जाते हैं।
अब बात आती है ए.आइ. की। बहुत सुख है इस नये ख़िलौने का; बशर्ते कि यह किसी ग़लत हाथों में ग़लत काम के लिये प्रयोग में न जाए।; और ग़लत काम में पड़ने के इसके बहुत चांस हैं क्योकि इस दुनिया में ख़ुराफ़ाती दिमागों की कमी नहीं है और अपनी ग़ऱज़ को पूरा करने के लिये और घर बैठे लोगों को ठग के मुफ़्त का पैसा ऐंठने के लिए, ऐसे लोग सब कुछ कर सकते हैं।
विजय भाई, आपने हमेशा की तरह संपादकीय को बहुत से कोणों से देखा और परखा है। आपकी टिप्पणी हमेशा की तरह सार्थक है।
आदरणीय भाई,सादर प्रणाम
आज का संपादकीय बहुत अच्छा और सजग करने वाला है।आज के.परिवेश में आपकी यह चिंता जायज.है कि एक दिन.मनुष्य मशीनों की कैद में होगा।मै तो Al के नाम से.ही डरती हूं,लेकिन मेरे परिवार का सबसे छोटा दस वर्षीय स्वस्तिक धडल्ले से प्रश्न पूछता है,और जवाब भी मिलता है।लेकिन जैसा कि आपने नया दौर फिल्म के माध्यम से बताया कि मशीनें कितनी भी बुद्धिमान हों ,मानवीय क्षमता बुद्धिमत्ता से पराजित होंगी ही। यह एक वैज्ञानिक क्रांति है जो.पूरी दुनिया को अपनी गिरफ्त में ले रही है।बिल गेट्स का कहना है कि तकनीक की यह क्रांति लोगों के रोजगार छीन लेगी।आपने अपने संपादकीय में कहा है कि बिल गेट्स का मानना है*बिल गेट्स ने आज के युग को “फ्री इंटेलिजेंस” का युग बताया, जहां आर्टिफ़िशिल इंटेलिजेंस न सिर्फ़ हर क्षेत्र में प्रवेश करेगा, बल्कि उसे एक्सेस करना भी बेहद आसान होगा। उनका कहना है कि इससे मेडिकल ट्रीटमेंट से लेकर ऑनलाइन एजुकेशन तक हर क्षेत्र में क्रांति आ जाएगी।* क्या इससे सजगता जरुरी हैं? मानवीय गुणो, संवेदनात्मक दृष्टिकोण से चीजों को जानने परखने का क्या होगा? एक मशीन अपनी तमाम जानकारियों के साथ हमें मूक बना देगी।पता नहीं मै कितना ग्रहण कर पायी ,पर जो भी समझ में आया वह अभिव्यक्त कर रही हूं।मुझे आप सभी क्षमा करें यदि कुछ गलत लिख दी हूंतो।आभार इतने सुंदर, सार्थक, तकनीक और विज्ञान के साथ मानवीयता से जुडे संपादकीय के लिए। सादर प्रणाम।
पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर
बिल गेट्स ने आज के युग को “फ्री इंटेलिजेंस” का युग बताया, जहां आर्टिफ़िशिल इंटेलिजेंस न सिर्फ़ हर क्षेत्र में प्रवेश करेगा, बल्कि उसे एक्सेस करना भी बेहद आसान होगा। उनका कहना है कि इससे मेडिकल ट्रीटमेंट से लेकर ऑनलाइन एजुकेशन तक हर क्षेत्र में क्रांति आ जाएगी।
पद्मा मैं तय नहीं कर पा रहा कि बिल गेट्स जैसे लोग हमें चुनौती दे रहे हैं या हमारा मज़ाक उड़ा रहे हैं… आपकी टिप्पणी सार्थक है। धन्यवाद।
आदरणीय तेजेन्द्र जी!
इस बार का संपादकीय वाकई चिंता में डालने वाला है।
बिल गेट्स की सोच किस तरह का रुख अख्तियार करेगी यह तो ईश्वर जाने।इंसान हवा में चाहे जितना भी उड़ता रहे लेकिन अंत में उसे पृथ्वी पर ही आना पड़ता है। इंसान को अपने पैर जमीन पर ही रखना चाहिये यही बेहतर है। मशीने जितनी अधिक सुविधा देती हैं, एक छोटी सी लापरवाही या गलती से एक गलत बटन दब जाए और किस तरह का नुकसान हो जाये यह कोई नहीं जानता।
और फिर मशीन भावनाएँ नहीं ला सकती। भाषा में संवेदनाएं पैदा नहीं कर सकती।
Today’s poetic imagination, is tomorrow’s scientific truth!” यानी कि आज जो कवि की कल्पना की उड़ान है…. आपका यह कथन बिल्कुल सही है, रामचरितमानस में जिस पुष्पक विमान का जिक्र है सदियों पहले, आज हवाई जहाज में नजर आता है।
बिल गेट्स के इरादे खतरनाक ही नज़र आ रहे हैं। कई बार लोग परिणाम को नजरअंदाज कर देते हैं।
नए दौर का वह कच्चा पुल होशंगाबाद के ही बुदनी में है। 10 से 15 मिनट की राह पर। और अब पक्का पुल बन गया है।
बेरोजगारी जब बढ़ती है तो अपराध भी बढ़ जाते हैं।
पैसे वाले पैसे कमाएँगे और बैंकों से उड़ाने वालों के दिमाग उनसे आगे चलेंगे।
वाकई गाना यही याद आ रहा है-
देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई है भगवान?
कितना बदल गया इंसान।
और जब भविष्य की बात सोचो तो एक अनजाना सा भय व्याप्त हो जाता है।और वह गाना भी याद आता है भगवान से प्रश्न पूछता हुआ सा-
दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई
काहे को दुनिया बनाई?
ऊपर बैठा भगवान भी सोच रहा होगा-
*मैंने ऐसा तो सोचा ही नहीं था*
वैज्ञानिक तकनीक के अपने खतरे हैं और देशों को लड़ने की पड़ी है। न जिएँगे न जीने देंगे की तर्ज पर।
न जाने आने वाली पीढ़ी के लिये जीवन कितना कठिन होगा? भविष्य कैसा होगा?
हर शनिवार को आपका संपादकीय मस्तिष्क में हलचल मचा जाता है।
अपन सोचते ही रह जाते हैं और रिलैक्स होने के पहले अगले शनिवार को फिर कुछ नया पेंच हो जाता है।
इस जागरूकता के लिए आपको बधाई।
पुनश्च –
पदुम लाल पुन्नालाल बख्शी जी ने अपने निबंध क्या लिखूँ में एक बात बहुत अच्छी कही है और एकदम सच्ची कि वृद्धों को अपना अतीत बहुत पसंद होता है और वे उसको ही सुखद मानते हैं। युवा वर्ग भविष्य की तरफ देखता है और उसी को सँवारने में लगा रहता है। इस तरह वर्तमान काल हमेशा सुधारों का काल ही बना रहता है। और सभी से उपेक्षित रहता है। आज क्या हो रहा है , आज के लिए क्या जरूरी है ?इस पर कोई सोचना, देखना और विचार करना चाहता ही नहीं।
एक गंभीर वैचारिक और विमर्श जैसे विषय पर लिखे संपादकीय के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई।
आदरणीय नीलिमा जी, आपकी टिप्पणी हमेशा की तरह बहुआयामी है। मेरा प्रयास आपको अच्छा लगा… ढेर सी बधाई।
जो बातें अमूर्त अस्पष्ट रूप में उभरती थीं Al के कदम रखते ही शर्माजी ,आपने तो विशद व्याख्या कर दी ‘निश्चित रूप से यह विशिष्ट वैचारिक विमर्श का विषय है , जिस पर आपका संपादकीय बहुत प्रेरणा और ऊर्जा दे रहा है । हार्दिक आभार और बधाई
@ आदित्य
भाई नन्दकुमार जी, इस ख़ूबसूरत टिप्पणी के लिये बहुत बहुत शुक्रिया।
संपादक महोदय इस संपादकीय में ज़ाहिर होती आपकी चिंता बिल्कुल जायज़ है और आपके प्रश्न भी विचारणीय हैं ।
बहुत खौफ का वातावरण है और मनुष्य अपना ही दुश्मन बनता जा रहा है। मुझे अपनी कुछ पंक्तियां याद आ गई,,,,,,,
*इंसान की प्रकृति का पता नहीं
लेकिन प्रकृति की प्रकृति सुहाती है मुझे
इसमें न लालच न दोगलापन है
इसीलिए यह मुझको लुभाती है *।
आशमा जी, आपकी कविता की पंक्तियां सार्थक और अर्थपूर्ण हैं।
बहुत महत्वपूर्ण और ज्वलंत विषय पर आपका सारगर्भित संपादकीय है तेजेंद्र जी।
आपने एक ऐसा संपादकीय लेख लिखा है जो सोचने पर मजबूर कर रहा है
निस्संदेह हम एक विचित्र दुनिया में प्रवेश कर चुके हैं न जाने इसका अंत कैसा होगा!