कहानी: मुहल्लेदार
- दीपक शर्मा
इंदुबाला का समस्त जीवन मेरी आंखों के सामने बीता था। उस की आकस्मिक मृत्यु भी मैं ने प्रत्यक्ष देखी थी।उन्नीस सौ पचपन के आसपास जब उस का जन्म हुआ तो मैं पांचवी कक्षा में पढ़ता था।
उस दिन जब मैं स्कूल से लौटा था तो मेरी चचेरी बहन ने बताया था,”मां और चाची पड़ोस में गयी हैं। लाला जी के घर पर बेटी हुई है।” बाद में मुझे पता चला,इंदुबाला ललाइन के आठवें व अंतिम गर्भ की परिणति थी। ललाइन के पिछले सात गर्भों में केवल एक गर्भ ही बचा रहा था— सात वर्ष पहले जन्मी इरावती का। परंतु दुर्भाग्यवश इरावती की वाणी व कर्णशक्ति ने अपनी उपस्थिति का प्रमाण कभी दिया न था तथा लाला व ललाइन की एक स्वस्थ व निरोग शिशु की अभिकल्पना इंदुबाला के जन्म पर ही पूरी हो सकी थी।
इसीलिए इंदुबाला का जन्म मुहल्ले भर के लिए कौतुक व हर्ष का विषय रहा था।
मुहल्ले में रहने के अपने बड़े फ़ायदे हैं। पड़ोस विविध रहता है तथा बिना किसी बिचौलिए के हम अपने से सर्वथा भिन्न लोगों से तालमेल बिठा सकते हैं। सरकारी कौलोनीज़ अथवा निजी आवासीय क्षेत्रों / बहुमंज़िलीं इमारतों में रहने वालों को यह सुविधा उपलब्ध नहीं रहती।वहां लगभग एक ही आय- वर्ग के लोग आस- पड़ोस में रहते हैं तथा एक समान समस्याओं से जूझते रहने के कारण एक- दूसरे के अनुभवों में विशेष वृद्धि नहीं कर पाते।
मुहल्ले में ऐसा नहीं होता।एक बहुत धनी व्यक्ति की बगल में एक अति सामान्य परिवार भी पूरी निर्भीकता तथा स्वेच्छाचारी जीवन- चर्या के साथ बात कर सकता है तथा दोनों ही परिवार एक- दूसरे के घर में झांकने व दखल देने के अपने अधिकार स्वच्छंदता से प्रयोग में ला सकते हैं।
इंदुबाला के पिता,लाला बृजलाल, हमारे मुहल्ले के सर्वाधिक धनी व्यक्ति थे। एक बड़े बर्फ़खाने के मालिक। आज तो एक मामूली किराने की दुकान पर भी आपको एक फ़्रिज नज़र आ सकता है परंतु उन दिनों कई खाते-पीते घरों अथवा समृद्ध हलवाइओं के पास भी फ़्रिज न रहते थे और हमारा आधा शहर इन्हीं लाला बृृजलाल के बर्फ़ के कारखाने से बर्फ़ मंगाया करता था।
इस के विपरीत मेरे पिता एक स्कूल में अध्यापक थे तथा हमारे पुश्तैनी मकान में हमारे साथ रह रहे मेरे ताऊ एक रेलवे क्लर्क।
संयोगवश पैंतालीस खिड़कियों वाले इंदुबाला के तिमंज़िले विराट मकान की एक खिड़की आठ खिड़कियों वाले दुमंज़िले हमारे अति सामान्य मकान की एक खिड़की के समतल रही। अपनी-अपनी व्यस्तताओं के साथ इंदुबाला और मैं अक्सर अपने-अपने घर की उन समतल खिड़कियों में आ बैठते।
हिंदी व अंगरेज़ी के मेरे अनेक निबंध वहीं पूरे होते। जीव-विज्ञान तथा भूगोल के मेरे विविध रेखाचित्र वहीं संवरते। गणित व भौतिक-विज्ञान के कई कठिन सवालों के हल मुझे वहीं जा कर हासिल होते। इंदुबाला की अनेक गुड़ियाओं के परिधान मेरे सम्मुख बदले जाते। उस की स्वांग भरी रसोई में छत्तीसों पकवान उस के खिलौनेनुमा बर्तनों व चूल्हों पर मेरी उपस्थिति में तैयार होते। उस की कढ़ाई व बुनाई अपनी-अपनी विशिष्टता बहुत बार मेरी आंखों के समक्ष ग्रहण करतीं।
जब मेरी इंटरमीडिएट की परीक्षा निकट आयी तो मैं ने उस कमरे को अपने अनन्य प्रयोग के लिए खाली करवा लिया। पढ़ाई में मैं शुरू ही से तेज़ रहा था और मेरी मांग सब को उचित ही लगी थी। किंतु जैसे ही मैं ने उस कमरे में नियमित रूप से सोना-पढ़ना और उठना-बैठना आरंभ किया मेरे कमरे का अवलोकन मेरे चचेरे भाई- बहनों के साथ-साथ इंदुबाला के लिए भी वर्जित कर दिया गया।
अब इंदुबाला जब भी उस कमरे में आती,ललाइन अथवा उस के घर की कोई नौकरानी अवश्य उस के संग रहा करती, उस के संग- संग ही बैठती और उस के संग-संग ही उठ जाती। जब-तब इंदुबाला उन्हें चकमा देने में सफल भी हो जाती।
खिड़की में बिताए गए उस के वे पल बेशक बहुत संक्षिप्त व दुर्लभ रहा करते फिर भी मेरे लिए पुलक व प्रेरणा का एक बड़ा गट्ठर यदा- कदा छोड़ ही जाते।
मैं देर तक उन्हें टटोलता व पलोसता और फिर दुगुने वेग से पढ़ाई में जुट जाता। बहुत पढ़ कर मैं एक बहुत बड़ा डाक्टर तुरंत बन जाना चाहता ताकि तीसरी मंज़िल में बैठी इंदुबाला के कमरे की खिड़कियों के समतल मैं अपने दोमंज़िले मकान में अपनी मनपसन्द नयी मंज़िल बनवा सकता।
परंतु यह विडंबना नहीं थी तो क्या थी जो मेरे मेडिकल काॅलेज में मेरे गुरू रहे मेरे भाावी ससुर की नज़र मुझ पर पड़ी और वहीं टिक गयी। शाम को वह अपना निजी क्लीनिक चलाते थे और हमारे कस्बापुर के आंख- कान- नाक के सभी साधन- सम्पन्न और गंभीर रोगी उन्हीं के यहां अपना इलाज करवाते थे। रोगियों की परिचर्या की उचित व्यवस्था के लिए फिर उन्हें सहायक व सहचारी रखना भी अनिवार्य रहता।
अभी मैं उनका विद्यार्थी- सहायक ही था कि उन्हें मेरे हाथ की निपुणता भा गयी और उन्हों ने अपनी पांच बेटियों में सब से बड़ी, मधुलता,की शादी मेरे संग कर दी। मधुलता के आते ही इंदुबाला पर चौकसी व चौकीदारी खत्म हुई और मुझ पर शुरू।
मधुलता कमरे में मेरे प्रविष्ट होते ही मेरी खिड़की के कपाट बंद कर देती। कहती, ‘छिछोरी यह लड़की इतनी ताक- झांक करती है! ललाइन इसे जल्दी ही ब्याह क्यों नहीं देती?’
‘इंदुबाला अभी बच्ची है,’ मैं तत्काल उत्तर देता, ‘देखने में बड़ी लगती है क्योंकि ललाइन ने इसे खूब बादाम- मेवे खिला रखे हैं, वरना वह तो अभी चौदह की भी नहीं हुई ।’
विश्वंभर को मेरे पास लाला जी स्वयं लाए थे। बोले थे,’ललाइन के गांव से आया है। इंटर में खूब ऊंचे अंक पाया है। इसे अपनी तरह डाक्टर बनवा दो।’
उन दिनों मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश पाने के लिए किसी प्रवेश परीक्षा की आवश्यकता नहीं रहती थी। इंटर या इंटर की समानक परीक्षा में जो कोई भी जीव-विज्ञान के साथ ऊंचे अंक पा लेता,उसे चिकित्सा-विज्ञान की पढ़ाई के योग्य मान लिया जाता।
विश्वंभर को जैसे ही दाखिला मिला, मधुलता ने मेरे समूचे परिवार के सामने घोषणा कर दी,’लाला जी की दूरदर्शिता प्रशंसनीय है।बिना किसी प्रयोजन के किसी पर उन की कृपादृष्टि पड़नी असंभव है। विश्वंभर को अब वह डाक्टर के साथ-साथ घर-जमाई भी बनाएंगे। उन्हें विश्वंभर में अवश्य ही घर-जमाई के सभी प्रत्याशित गुण नज़र आ गए हैं।’
मैं निश्चय से कह नहीं सकता परंतु कभी- कभी संदेह होता है मानो मधुलता ही ने ललाइन से कह कर विश्वंभर को उस के गांव से बुलवाया था और मेरी खिड़की के सामने वाला कमरा विश्वंभर को दिलाया था।
इंदुबाला अब भी उस कमरे में आती-जाती। सुविधा व उचित अवसर देख कर मधुलता उस कमरे का सर्वेक्षण मुझे भी जब-तब करा देती हालांकि तब तक मैं अपनी पारिवारिक ज़िम्मेदारियों के प्रति अत्याधिक सचेत हो चुका था और इंदुबाला के प्रति मेरी प्रेमातुरता अब ढलान पर थी।
पुत्रविहीन अपने ताऊ के देहांत हो जाने के कारण अपनी दो बहनों के साथ-साथ ताऊ की कुंवारी बची तीन लड़कियों के विवाह भी मेरे ज़िम्मे आन पड़े थे।
सौभाग्यवश इसी बीच मेरे ससुर ने अपने क्लीनिक के साथ एक छोटा नर्सिंग होम भी खोल लिया था और उन की कमाई का एक अच्छा अंश मुझे मिलने लगा था।दिन के पहले छः घंटे मेरे अस्पताल में कटते तो शाम के सात घंटे ससुर के साथ क्लीनिक व नर्सिंग होम पर।
उधर लाला जी के दिन भी फिर लिए थे। बर्फ़ का कारखाना जब खटाई में पड़ने लगा था तो उन्हों ने बर्फ़ बनाने की मशीनें बेच कर छपाई की दस ट्रैडल मशीनें खरीद डालीं थीं और जब कारखाने के पुराने कर्मचारियों को उन की पुरानी तनख्वाहों पर उन्हें खपत करना चाहा था तो वे विद्रोह कर बैठे थे। हार कर लालाजी ने नई तनख्वाहों पर जब उन्हें रखा भी,तब भी उन की पटरी सही न बैठ पायी थी।छपाई का काम भी उन्हें प्रयाप्त मात्रा में उपलब्ध हो नहीं पाता था और उन का छापाखाना उन्हें प्रत्याशित आय से वंचित ही रख रहा था।
ऐसे में मेरे ससुर ने एक नयी परियोजना मेरे सामने रखी, ‘तुम्हारे पड़ोसी की प्रैस तो चलती नहीं,उसे कहो अपनी वह कारखाने वाली इमारत हमें बेच दे।हमारे नए नर्सिंग होम के लिए। हम वहां नए सिरे से आधुनिक उपकरणों वाला सर्वसाधन- सम्पन्न नर्सिंग होम शुरू करेंगे तो हमारी कमाई दिन दुगुनी, रात चौगुनी हो जाएगी…’
आज सब को लगता है,लालाजी ने अपने कारखाने की इमारत मेरे ससुर को कौड़ियों के दाम बेची थी लेकिन सन उन्नीस सौ सत्तर की जून की उस तारीख में,जब कि भारत- पाक के दूसरे युद्ध के बादल आकाश पर मंडराने लगे थे,एक लाख बीस हज़ार की रकम खूब बड़ी मानी गई थी।
नर्सिंग होम के साथ-साथ मधुलता ने मेरे मकान में एक पूरी नई मंज़िल व नए आकार की सीढ़ियां जोड़ने की अपनी आठ- वर्षीय योजना को भी साकार रूप दे दिया।उस तीसरी मंज़िल का ढांचा इतना आधुनिक व जटिल रहा कि कहीं कोई भी खिड़की किसी दूसरे मकान की किसी खिड़की के समतल अथवा समक्ष न रही।
मैं, मधुलता और हमारे तीन बच्चे अब अपने इसी पृथक गृह के आत्मलीन निवासी बन गए।और सन उन्नीस सौ चौहत्तर में लालाजी ने जब इंदुबाला को विश्वंभर के साथ विवाह-सूत्र में बांधा तो मेरे ह्रदय की धड़कन निरंतर अपनी सामान्य गति से जारी रही।
हां, जिस दिन वह त्रासदी घटी,उस दिन अवश्य ही मेरे ह्रदय में तूफ़ान आया था।वर्षों बाद मैं फूट-फूटकर रोया था।क्यों कि इंदुबाला को काल समय से पहले अपने साथ खींच ले गया था।
अपने विवाह के अगले वर्ष ही इंदुबाला ने दो जुड़वां बेटों को जन्म दिया था।लाला और ललाइन फूले नहीं समाए थे। विश्वंभर के परिवार से भी कई जन उन्हें बधाई तथा आशीर्वाद देने आए थे परंतु लालाजी ने लड़कों का नामकरण उन के प्रस्थान के बाद ही सम्पन्न करवाया।
मेरे पिता ने उन से कहा भी, ’नामकरण के समय तो विश्वंभर के परिवार- जनों का उपस्थित रहना अनिवार्य था।’ परंतु लाला जी हमेशा की तरह अपने को बचा ले गए थे, ‘बेचारे रेलवे स्टेशन से कोसों दूर एक पिछड़े गांव में रहते हैं।उन असुविधाजनक परिस्थितियों में आने- जाने से उन का बहुत-सा धन व समय बरबाद होता। इसीलिए यथोचित रकम मैं ने उन्हें भिजवा दी है।’
नामकरण समारोह के अवसर पर ही लालाजी ने वह वृहत भोज आयोजित किया था। भोज से पहले पूजा की व्यवस्था की गयी थी।
पूजा जैसे ही सम्पन्न हुई थी, लगभग सभी लोग मेज़ पर आवाज़ लगा रहे व्यंजनों पर टूट पड़े थे। चप्पल खो जाने के कारण मैं भोज में सम्मिलित न हो सका था।
“आइए, डाक्टर साहब,” लालाजी अब मुझे इसी प्रकार संबोधित किया करते थे l मुहल्ले के दूसरे लोगों की तरह उन की ओर से भी अब मेरे आदर- सत्कार में कभी कमी न रहा करती।
“मैं हाथ धोकर अभी आता हूं,” अपनी गुम हुई चप्पल के विषय में मैं ने उन्हें कुछ न कहा।मेरा दस- वर्षीय बड़ा बेटा मेरे घर से बहरहाल मेरे लिए दूसरी चप्पल लेने जा चुका था।
अकस्मात मेरी नज़र सीढ़ियों पर पड़ी। विश्वंभर ऊपर जा रहा था। दबे, नंगे पांव मैं भी ऊपर पहुंच लिया। सोचा वह लालाजी के तर्क से अप्रसन्न रहा होगा और अपने परिवार के प्रति लालाजी की धृष्टता के विरोध में उन के द्वारा दिया गया भोज अस्वीकृत कर देने के इरादे से अपने कमरे में अकेले बैठ कर अपना रोष प्रकट करना चाहता होगा। इसीलिए रूठे विश्वंभर को मनाना मैं ने ज़रूरी समझा।
परंतु मेरे हाथों के तोते उड़ गए जब मैं ने उसे अपने कमरे में जाने की बजाए इरावती के कमरे में प्रवेश पाते देखा। इरावती का चेहरा दरवाज़े की ओर ही था। विश्वंभर को देखते ही उस के स्त्री- सुलभ चेहरे पर आयी हर्ष- लहर ने मुझे चौंकाया भी और गहरा आघात भी दिया।
इधर मेरी पलक अभी झपकी भी न थी कि इरावती के कमरे का दरवाज़ा विश्वंभर को प्रवेश देकर बंद कर दिया गया। तभी सीढ़ियों पर एक आहट हुई और मैं ओट में छिप लिया। आगंतुका इंदुबाला थी।
इंदुबाला के कदम इधर-उधर कहीं न ठिठके। सीधे इरावती के कमरे के दरवाज़े के बाहर जा रुके। दरवाज़ा तुरंत नहीं खुला,किंतु जैसे ही खुला इंदुबाला कमरे के अंदर लपक ली। दरवाज़े की सांकल फिर से चढ़ा दी गई।
सांस रोके मैं लगभग दस मिनट तक वहीं बना रहा।दरवाज़ा जब खुला तो पहले विश्वंभर निकला। उस के हाथ खून से लथपथ थे और वह बुरी तरह कांप रहा था।
“क्या बात है?” मैं ने पूछा, “यह खून कैसा है?”
“मैं कुछ नहीं जानता,” एक उग्र कंपकंपी से ग्रस्त उस की विश्वंभर की आवाज़ अस्थिर हो उठी, “यों ही इधर से गुज़र रहा था कि देखा इंदु और इरा एक दूसरे से गुत्थम-गुत्था हो रही हैं। मैं ने उन्हें अलग करना चाहा तो इरा ने इंदु को घायल कर दिया।”
“कहां?” ताव में आ कर मैं विश्वंभर को इरा के कमरे में घसीट ले गया।
इंदुबाला अचेतावस्था में फ़र्श पर बिछी थी और इरावती मुंह फाड़े उस के पास बैठी थी।
दोनों के शरीर से खून के फव्वारे छूट रहे थे। लपक कर मैं इंदुबाला के पास पहुंच लिया। उस की नब्ज़ देखने। वह निस्पंद थी।उस की आंखों को मैं ने खोला तो वे पल भर के लिए हरकत में आ कर सदैव के लिए पथरा गयीं।
“यह तुम ने क्या किया?” क्रोध से अभिभूत हो कर मैं ने विश्वंभर को कस कर झंझोर दिया, “तुम इरावती के कमरे में आए ही क्यों?”
“मैं ने बताया न! इंदु और इरा झगड़ रहीं थीं।”
“तुम झूठ बोल रहे हो,नीच,” मैं ने विश्वंभर के मुंह पर कई तमाचे जड़ दिए। ताबड़तोड़।
“मैं उधर सीढ़ी पर खड़ा सब देख रहा था,” मैं चिल्लाया, “इस कमरे में पहले इंदुबाला नहीं आयी थी। तुम आए थे…”
“मैं सच कहता हूं, मैं कुछ नहीं जानता,” विश्वंभर ने नीचे झुक कर मेरे पैर पकड़ लिए।
“तुम इस कमरे में आए ही क्यों? पापी?” मैं फिर आपा खो बैठा और अपने पैरों पर झुके हुए विश्वंभर की पीठ पर मैं ने लात जमानी शुरू कर दीं।
जभी इरावती उठ कर हमारे पास चली आई और विश्वंभर को मेरे पदाघात से बचाने का प्रयास करने लगी।
तिस पर मैं गहरे अचंभे में डूब गया। तो क्या इरावती इस पापी से आसक्ति रखती थी? प्रेम करती थी?
“क्या तुम भी इरावती से प्रेम करते हो?” अपनी लात रोक कर मैं ने विश्वंभर को टोहा ।
“नहीं । मुझे इरा से भी कोई प्यार-व्यार नहीं। केवल इंदुबाला को नीचा दिखाना था मुझे। उस के अंहकार को तोड़ना था मुझे। उसे सताना था मुझे…”
“आप जन यहां क्या कर रहे हैं? क्या बात है? उधर आप की खोज हो रही है,” तभी कई लोग ऊपर चले आए।
“इधर इरावती और इंदुबाला में आपस की कोई बात चल रही थी,” मैं ने स्थिति संभाल ली, “विश्वंभर और मैं निपटा कर अभी नीचे आ रहे हैं। आप लोग जाइए और अपना खाना आराम से खाइए……”
इंदुबाला के प्रति मेरा सारा सम्मोहन, सारा अनुराग अपने पूरे आवेग के साथ लौट आया था और मैं किसी भी दशा में इंदुबाला की देह को पुलिस के हवाले नहीं करना चाहता था।
कई तरह की कानाफूसियों के बावजूद इंदुबाला का दाह-संस्कार बिना किसी अड़चन के सम्पन्न हुआ। लालाजी मुझ से पूरी सच्चाई जान ही चुके थे। विश्वंभर का ऐसी परिस्थितियों में लालाजी के घर पर पड़े रहना अब असंभव था।
मेरे ससुर ने इस समस्या का हल भी ढूंढ निकाला। अपनी तीसरी बेटी हेमलता का विवाह विश्वंभर के संग तय कर दिया। और विवाह करवाते ही अपने जुड़वां बेटों को लाला व ललाइन को सौंप कर विश्वंभर हमारे नए नर्सिंग होम में रेजिडेंट डॉक्टर नियुक्त हो गया।
हां, घर में विश्वंभर की अनुपस्थिति इरावती को इतनी खली कि वर्षों से कोने में दुबकी पड़ी रहने वाली इरावती अब प्रखर व प्रचंड रूप से हिंसक हो उठती। उस का भावावेग दमदार व सशक्त इंजेक्शन लगा देने से कुछ दिनों के लिए अवश्य ही मंद पड़ जाता परंतु उस की स्मरण शक्ति जैसे ही लौटती,वह पुनः विकट रूप धारण कर लेती।
नर्सिंग होम में विश्वंभर से मेरी भेंट लगभग रोज़ ही हो जाती है। हमारे बीच अविभेदनीय भेद हैं। असाध्य दरारें हैं। फिर भी हमारी धन-सुंघू दृष्टि उन सब की उपस्थिति देखी-अनदेखी कर देती है।
आर्थिक सफ़लता जैसी एकार्थिक इकाई के हम समसंयोजक हैं और इसीलिए एक- दूसरे के साथ सहर्ष हाथ मिला लेते हैं। दो बात कह देते हैं। तीन बात सुन लेते हैं।
गुणक व प्रवर्धक हमारी इस नई भौतिक संस्कृति का यह धन-सुंघू अर्थ दंड हमें पूर्ण रूपेण ग्राह्य व स्वीकार्य है ।
दीपक शर्मा
हिंसाभास, दुर्ग-भेद, रण-मार्ग, आपद-धर्म, रथ-क्षोभ, तल-घर, परख-काल, उत्तर-जीवी, घोड़ा एक पैर, बवंडर, दूसरे दौर में, लचीले फीते, आतिशी शीशा, चाबुक सवार, अनचीता, ऊँची बोली, बाँकी, स्पर्श रेखाएँ आदि कहानी-संग्रह प्रकाशित।
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कहानी लेखन के संदर्भ में आपका लेखकीय कौशल से चकित करता है। मानवीय संवेदनाएँ जितनी अधिक आकर्षक,प्रेमिल, मनोहरी एवं लुभावनी प्रतीत होती हैं क्रोध के आवेश में वही संवेदनाएँ कितनी अधिक क्रूर हो सकती हैं इस कहानी को पढ़कर यह महसूस हुआ।
70 के दशक का आपने बहुत जीवन्त खाँचा खींचा है।
इन्दुबाला के सम्मोहन में बंधे डॉक्टर साहब की तंद्रा का इतना दुखदंत होगा यह कल्पना भी न थी।
शीर्षक सार्थक लगा।
इस कहानी के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई।