‘नीली गिटार’ संभावना प्रकाशन, हापुड़ से 2022 में प्रकाशित दीपक शर्मा का 22 वां कहानी संग्रह है। ‘नीली गिटार’ में 29 कहानियाँ संकलित हैं। दीपक शर्मा जी ने इसे अपने पाठकों के नाम और उन शब्दों के नाम समर्पित किया है, जो इन कहानियों को मुकम्मल करते हैं। दीपक बहुपठित, अति संवेदनशील लेखिका है, अङ्ग्रेज़ी की प्रोफेसर और अङ्ग्रेज़ी साहित्य की सुधी पाठक भी। एक नज़र में यह कहानियाँ पारिवारिक दुराभिसाधियों, सामाजिक अन्याय और नारी उत्पीड़न, संवेदनशील पिताओं की मुंह बोलती तस्वीर लगती हैं, जबकि यहाँ हर शब्द ध्वन्यात्मक है, हर वाक्य दूरगामी संकेत लिए है, हर घटना एक इतिहास खोलती है। दीपक लिखती हैं,
“अमेरिकी कथाकार हेमिंग्वे का मानना था कि लेखक यदि अपने विषय में पूरी जानकारी रखता है, तो उसे वे सब पृष्ठ पर लाने की आवश्यकता नहीं रहती। पाठक उसके द्वारा छोड़ दी गई सामग्री को भी पकड़ लेता है। उनकी मान्यता थी कि पाठ का अनुपात हिमखंड का आठवाँ भाग लिए उस नोक के बराबर होना चाहिए, जो पानी की सतह के ऊपर दिखती है, जबकि उस हिमखंड का सात बटा आठ भाग पानी की सतह के नीचे छिपा रहता है। यह सच है।”
‘नीली गिटार’ की कहानियाँ स्त्री विमर्श के अनेक पहलू लिए हैं। यहाँ उस काव्यशास्त्रीय, नाट्यशास्त्रीय आलोचन परंपरा को चुनौती दी गई हैं, जो मानती है कि नायक धीरोदात्त, धीरप्रशांत आदर्श पुरुष ही हो। उसे विनम्र, मधुर भाषी, युवा, चतुर, त्यागी, कुलीन, ईमानदार, निस्वार्थ, बुद्धिमान, साहसी, वीर और कलाप्रिय होना ही चाहिए। उसमें ऐसे गुण हों कि उसे स्टार, सेलेब्रिटी, चैम्पियन कहा जा सके। वह समाज के लिए अनुकरणीय हो। दीपक शर्मा के यहाँ काव्य शास्त्र के मानदंड फीके पड़ गए हैं, नायक का स्वरूप पूरे का पूरा बदला हुआ है। दीपक के यहाँ नाक पर गुस्सा रखने वाले, धैर्यहीन धीरोद्धत्त पति, पुत्र अपने निकृष्टतम रूप में मिलते हैं। हिंसात्मक प्रवृतियाँ उनकी धमनियों में अंडर करेंट की तरह अनुस्यूत है। ‘सख्त जान’ का पति कुन्दन विवाह की प्रथम रात ही पत्नी के कान पर थप्पड़ मार उसे बहरा बना देता है। ‘घोडा एक पैर’ में पति पत्नी को पीटने के लिए पेटी या छड़ी का इस्तेमाल करता है। उसके बीमार होने पर कभी अस्पताल नहीं जाता। पत्नी की मृत्यु, उसके शव को घर लाने की सूचना भी उसे क्लब में ही मिलती है। ‘अरक्षित’ की स्त्री दायें– बाएँ, इधर- उधर हर तरफ से सुरक्षा कर्मियों से घिरी होने के बावजूद अरक्षित है, क्योंकि उसका पति डी. आई. जी. है और उसका पुलसिया हाथ पत्नी को पीटने में माहिर है।
उसे धीरललित कह सकते हैं। उसके अंदर खतरनाक यौन कामनायेँ हैं। जिसे काव्य शास्त्र मुग्धा नायिका कहता है, वह कहाँ है ? यहाँ तो नही है। परकीया तो है, पर वह मध्या, प्रौढ़ा है, 40 के आस-पास। ‘बुरा उदाहरण’ का पुरुष पत्नी की सौतेली माँ से ही अवैध संबंध बनाए है। ‘जमा मनफी’ और ‘मुरदा दिल’ की निजी सेक्रेटरी रम्भाएँ बॉस की वैयक्तिक केयर टेकर, गर्ल फ्रेंड, सब कुछ हो गई हैं और पत्नियां इस अवमानना से आंखे मूँदें पड़ी हैं। ‘फांसी काठ’ में भी नायक चालीस की उम्र में पत्नी स्वर्णा के बावजूद सत्ताईस वर्षीय रंभा से चोंच भिड़ा रहा है। ‘आधी रोटी’ में माँ के सिर पर बाप- बेटे दोनों ने अवैध और अमान्य प्रेम की तलवार लटका रखी है। पति उसके लिए अपमानित करने वाले सम्बोधन लिए हैं। पत्नी कहीं ‘आधी रोटी’ हो गई है, कहीं ‘झंकवैया’ और कहीं ‘बिटर पिल’। ‘बिटर पिल’ के सेवा निवृत पुरुष की मनोविद ही उसकी प्रेयसी, गर्ल फ्रेंड, अंतरंग मित्र है। ‘महसूल घर’ का महेंद्र चाचा बेटी की सहपाठिन का बलात्कार करता है। ‘सवारी’ में मंगला और प्रियंका का बलात्कार होता है। नायक का यह खलनायक रूप पितृसत्ताक को चुनौती है। क्या स्त्री मात्र भोग्या है ?
पुरुष अगर पुत्र है, तो कुपुत्र और हत्यारा है। ‘ज्वार’ में इकलौते बेटे द्वारा कसबापुर का घर बेच मुंबई में फ्लैट लेना और विदेशी लड़की से शादी करना माँ को मन: रोगी बना देता है और माँ से छुटकारा पाने के लिए पुत्र उसे नींद की गोलियां दे सदा के लिए सुला देता है। वह अगर संरक्षक, आश्रयदाता या प्रेमी है तो परोपकारी, देश भक्त, उच्च पदस्थ अधिकारी होते हुये भी 15 वर्षीय भांजे को आश्रिता के संपर्क में देख उस आश्रिता लड़की की ही हत्या का जुगाड़ कर सकता है। अगर डॉक्टर है तो ‘मुमूर्ष’ के चिकित्सक की तरह मरे हुओ का आपरेशन कर अर्थ जुटा रहा है।
यह नायक बनाम खलनायक अपराधप्रिय और कानूनहंता है। ‘बुरा उदाहरण’ का अपराधी पुरुष अस्पताल में इसलिए दाखिल होता है कि कानूनी कार्यवाही से बच सके। ‘फांसी काठ’ में स्पष्ट है कि करोड़पतियों के लिए कोई सज़ा नहीं होती, हत्यायेँ करवाना उनके क्षेत्राधिकार में आता है।
दीपक की स्त्री ने पीछे मुड़कर देखना छोड़ दिया है। उस पर अपने पौरुष या दौलत की धौंस नहीं जता सकते। वह स्वाभिमानी, उच्चशिक्षित, कामकाजी, अधिकार सजग, सशक्त स्त्री और संविधान सतर्क है। ‘सख्त जान’ का पति कुन्दन विवाह की प्रथम रात ही पत्नी के कान पर थप्पड़ मार उसे बहरा बना सकता है तो पत्नी उषा भी सुबह उसका घर सदा के लिए छोड़ सकती है। ‘बुरा उदाहरण’ की शशि दुराचारी पति पर पिता की आत्महत्या का इल्ज़ाम पति पर लगाते हुये वकील करके उसके खिलाफ पुलिस वारंट निकलवा देती है और उसकी सोतैली माँ बृजबाला बैंक के लॉकर और रुपए के अधिकार के प्रति सजग है। ‘फांसी काठ’ की स्वर्णा तो पिता से पति की रम्भा की हत्या करवा कत्ल केस में पति को ही फंसा अपना बदला ले रही हैं। ‘काष्ठ प्रकृति’ की नायिका को ससुराल वाले जला देते हैं, 90 प्रतिशत जलने के बावजूद वह वनस्पति शास्त्र की भाषा में कहें तो अपनी काष्ठ प्रकृति के कारण अंदर से मज़बूत है। ‘जमा मनफी’ और ‘मुरदा दिल’ की (विवाहित, बच्चों वाली मध्यमा परकीयाएं) रम्भाएँ निजी सेक्रेटरी हो बॉस की वैयक्तिक केयर टेकर, गर्ल फ्रेंड, सब कुछ हो सकती हैं तो स्वकीयाओं ने भी मन के घावों से, अवमानना से आंखे भी मूँद ली हैं- “सच कहती हूँ, स्वीट हार्ट, जब तक मैंने चिंता की बहुत कष्ट पाया। चिंता छोड़ी तो सब मिला, मिल रहा है। ‘बाँकी’ की टी. वी. अभिनेत्री बुआ भले ही फेस लिफ्टिंग के चक्कर में कुरूप हो जाती है। लेकिन हिम्मत नहीं हारती। वह टी. वी. के लिए नाटक, संवाद आदि लिख ट्राफियाँ जीतने लगती है।
लगभग हर कहानी मृत्यु का संत्रास लिए है। ‘बुरा उदाहरण’ की बड़की अपनी सोतैली नानी से उत्पन्न पिता की बेटी की तालाब में डुबो कर हत्या कर देती है और नाना आनंद मोहन अपने ऑफिस की छठी मंजिल से कूद कर आत्महत्या कर लेता है। ‘सवारी’ में मंगला बुआ को सामूहिक बलात्कार एड्स देता है और जान ले लेता है और डॉ. प्रियका रेड्डी की बलात्कारी हत्या कर देते हैं। ‘पंखा’ में माँ की कैंसर से मृत्यु हुई थी। ‘कुनबेवाला’ में 1944 में तपेदिक ग्रस्त पिता स्वर्ग सिधारे थे और माँ को उन की संगति के उपहार स्वरूप यह रोग मिला और वह भी 1950 तक ही इस दुनिया में रही। ‘सख्त जान’ में संगीत के प्रति अनुराग होने के कारण माँ को आत्महत्या करनी पड़ती है। ‘भुलावा’ में रश्मि आत्म हत्या करती है। ‘मुमूर्षु’ में मर रहे पिता और संवेदनशील बेटी की मन: स्थिति है।
उनके पात्र निम्न वर्ग के हों, मध्यवर्ग के या उच्च वर्ग के- अर्थतन्त्र सबका गड़बड़ा रहा है। ‘बुरा उदाहरण’,‘ढलाई घर’ के पात्र अपने वेतन का आधा या चौथाई अपनी माँ और बहनों के लिए भेजते हैं। आनंदमोहन इंजीनियर होते हुये भी ससुराल के घर में जीवन बिता देता है। ‘चिकौटी’ में कामकाजी स्त्री या गृहिणी सब मायके का रिश्ता बचाने या निभाने के लिए पति से चोरी कुछ राशि बचा कर रखती हैं। ‘सख्तजान’ में आर्थिक तंगी के कारण माँ लंगड़े लड़के से बेटी की शादी कर देती है। ‘चम्पा का मोबाइल’ में गरीबी के कारण चम्पा की मंदबुद्धि से शादी कर दी जाती है।
वर्गीय भेदभाव प्रेमियों के लिए होता नहीं, लेकिन उन्हें इसे समझना और निभाना पड़ता है। ‘रवानगी‘ की स्त्री को आज 1959 की अपनी स्नातकोत्तर कक्षा का जवाहर/ पहला प्यार याद आ रहा है। लेकिन नायिका जानती है कि ड्राइवर के बेटे को स्मृतियों में जगह दी जा सकती है, जीवन में नहीं।
मानव मनोविज्ञान की अनेकानेक परतें यहाँ खुल रही हैं। ‘बुरा उदाहरण’ का नायक अस्पताल में भी युवा नर्स के सुंदर, कोमल स्पर्श को दिवास्वप्न में देखता- महसूसता है। ‘ज्वार’ की स्त्री का मन: संतुलन मुंबई के छोटे से फ्लैट में आने, ठौर- कुठौर होने पर गड़बड़ा जाता है। ‘बिटर पिल’ के नायक को लगता है कि बेटी और पत्नी ने उसे जीते जी दीवार में चिनवा दिया है, बाहर निकलने के सभी दरवाजे गायब हो चुके हैं। ‘चम्पा का मोबाइल’ की चम्पा का पिता अपाहिज है और पति मंदबुद्धि। ऐसे में वह मृत माँ से बिना बैटरी और सिम का मोबाइल ले घंटों बतियाती, अपने दुख सांझे करती है, अपने मन का विरेचन करती है। ।
हर ग्राम- शहर में बाजारवाद की हवा तो चली ही है। ‘अच्छे हाथों में’ का लाला महापालिका चुनाव जीतने के बाद पूरे मुहल्ले को मिटाकर, बेघर करके वहाँ होटल बनाने की योजना लिए है।
उनकी कहानियाँ अतीत की स्मृति हैं, फ्लैश बैक में हैं। वर्षों बाद, दशकों बाद नायक अथवा नायिका स्मृतिलोक में ऐसे डुबकिया लगा रहे हैं, जैसे यह कल की ही बात हो। ‘महसूल घर’ का भाई बहन की मृत्यु के 64 वर्ष बाद महेंद्र चाचा द्वारा किए गए उसके बलात्कार की पीड़ा महसूस कर रहा है। ‘रवानगी‘ की स्त्री को 1959 की अपनी स्नातकोत्तर कक्षा के जवाहर से पहला प्यार याद आ रहा है। ‘सवारी’ में 2019 में 1967 की यादें कुनमुना रही हैं। ‘कुनबेवाला’ में माँ, बहन और नाना की मृत्यु के वर्षों बाद अपने 84 वें जन्मदिन पर नायक अतीत की स्मृतियों में तैरने लगता है।
इन कहानियों के पार्श्र्व में हमें कहानीकार के गहन अनुसंधान वृत्ति भी मिलती है। ‘सवारी’ में वेस्पा स्कूटर खरीदा जाता है और दीपक शर्मा लिखती हैं-
“हाँ वौस्प, ततैया ही होता है। सुनते हैं इसके इतालवी मालिक पियाज्जियों ने जब पहली बार इसको तैयार अवस्था में देखा तो बोला ‘सेम्बरा उना वेस्पा’ (यह तो ततैया, वौस्प जैसा है) ततैया की ही भांति इसका पिछला भाग इसके अगले चौड़े भाग के साथ बीच में तंग रखी गयी इस कमर जैसी सीट के साथ जुड़ा रखा गया है।”
कहीं वे साबुन के कारखाने की बारीकियाँ बता रही हैं और कहीं कॉस्मेटिक सर्जरी की हर बारीकी में जा रही हैं।
विज्ञापन और जीवन में अंतर है। विज्ञापन की दुनिया आम व्यक्ति पर कहर ढा सकती है, यह दीपक की ‘सवारी’ कहानी से स्पष्ट है। 1967 में , जब लड़कियां साइकल और लड़के मोटरसाइकल चलाते थे, तब विज्ञापन देख पिता प्रोफेसर मंगला को स्कूटर ले देता है और गाँव के सुनसान रास्ते पर वह सामूहिक बलात्कार की शिकार हो जाती है।
‘बसेरा’ नौकरी पेशा स्त्री की दुश्वारियों और संकल्पों का लेखा- जोखा भी है और वक्त के साथ कदम मिलाने वाला संवेदनशील, प्रगतिशील पुरुष भी। ‘कुनबे वाला’ में पालतू कुत्ते की संवेदनशीलता चित्रित है। धार्मिक विश्वासों के कारण पात्र दुर्गा सप्तशती या हनुमान चालीसा में मन: शांति ढूंढ रहे हैं।
सूत्रात्मता उनके कथ्य और शिल्प दोनों को अतिरिक्त ऊर्जा दे रही है।
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अस्पताल एक ऐसी परिकथा के दैत्य का साम्राज्य है जिसका आतिथ्य आपको अपना भोज बनाने के लिए आतुर रहता है।
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स्वप्न चित्र कब आ अतीत को अंक में भर लें, भविष्य कब वर्तमान को निगल डाले, कोई भरोसा नहीं। दुस्वप्न कब किसी मीठे सपने को आन दबोचें, कुछ पता नहीं ।
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बुरे व्यक्ति वह कर गुजरते हैं जिसके दायरे में अच्छे व्यक्ति केवल सपना देखा करते हैं।
