कभी-कभी लोग शब्द-विषय देते हैं ।
उन पर कविता कहानी लिखो कहते हैं।
मैं कूल कगारों से बंधी नदिया नहीं हूं।
मैं पत्थर से निकला झरना एक पहाड़ी।
चाह हुई चल पड़ा राह मिली बह निकला।
जो गुनते है मज़ा लेते, सुनते वाह कहते हैं।
कभी-कभी लोग शब्द विषय देते हैं।
उन पर कविता कहानी लिखो कहते हैं।
ख़यालों को बांधने का नहीं हूं मैं कायल।
दर्द बुनता हूं जग के पर नहीं हूं मैं घायल।
दर्द मेरे हों तुम्हारे हों सब महसूस करता हूं।
रोते हो तुम आँसू आँख से मेरी बहते हैं ।
कभी-कभी लोग शब्द विषय देते हैं ।
उन पर कविता कहानी लिखो कहते हैं।।
दूसरों का दर्द महसूस करे इंसान होता है।
दूसरों का दर्द हर ले वो भगवान होता है।
कहने को तो दुनिया फ़ानी आनी जानी है।
दुःख में जो साथ दे उसे मेहरबां कहते हैं।
कभी-कभी लोग शब्द विषय देते हैं ।
उन पर कविता कहानी लिखो कहते हैं।।
तेरे दर्द उठाने मैं तेरे पास चला आऊंगा।
तू न कह सके ज़माने से मैं कह जाऊंगा।
तू मत अपनी ज़बान ख़राब कर यारा –
मुझे तो यूं भी लोग बदज़बान कहते है।


आदरणीय कर्नल सर!
आपकी कविता पढ़ी। आपने सच कहा ,शब्द देकर कविता लिखना संभवत: सबको रुचिकर नहीं लगता।पर यह भी एक प्रक्रिया है। जैसे तात्कालिक विषय होते हैं और इस पर बोलना होता है। पर फिर भी आपने कविता के माध्यम से अपने विचारों को साझा किया यह बहुत बड़ी बात है। आपकी कविताएँ आपके अंतर्मन की संवेदनाओं को प्रकट करती हैं ,जो हमेशा ही दूसरों के दुख और दर्द को बाँटने के लिये व्याकुल रहते हैं, बाँटना चाहते हैं ।आज के समय में यह बहुत बड़ी बात है।जिस समय में संवेदनाएँ क्षीण हो रही हैं उस समय में आपकी यह सोच लोगों को दूसरों के दर्द बाँटने के लिए निश्चित रूप से प्रेरित करेगी।आपने मन की बात कही। नदी की अपनी यात्रा है और झरने का अपना कल- कल नाद प्रकृति के सौंदर्य के साथ आनंद का संगीत भी है।
कुछ पंक्तियाँ जो प्रभावित कर गई-
कभी-कभी लोग शब्द विषय देते हैं
दूसरों का दर्द महसूस करे इंसान होता है।
तेरे दर्द उठाने मैं तेरे पास चला आऊंगा।
तू न कह सके ज़माने से मैं कह जाऊंगा।
तू मत अपनी ज़बान ख़राब कर यारा –
मुझे तो यूं भी लोग बदज़बान कहते है।
आप बलज़बान नहीं हैं सर।
बहुत अच्छा लिखा। बधाई आपको।