कविताएँ, आलेख, कहानी, दोहे, बाल कविताएँ एवं कहानियाँ देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित | 'जो रंग दे वो रंगरेज' कहानी-संग्रह प्रकाशित | चार साझा कहानी-संग्रहों में भी कहानियाँ शामिल | गांधी हिन्दुस्तानी साहित्य सभा एवं विष्णु प्रभाकर प्रतिष्ठान, दिल्ली द्वारा “काका कालेलकर सम्मान वर्ष २०१६ सहित अनेक सम्मान प्राप्त । सम्प्रति - डाइरेक्टर सुपर गॅन ट्रेडर अकॅडमी प्राइवेट लिमिटेड | संपर्क -
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रोचिका जी!
आपकी कहानी *चूना- कत्था मीठा पान* पढ़ी। शीर्षक काफी रोचक लगा।
कहानी पढ़ कर समझ आया कि समय व स्थितियाँ सब कुछ सिखा देती हैं।
शादी के बाद पहली बार मुंबई शहर में,लोकल ट्रेन, में अपनी पति को देखने के लिए रोज आना-करते हुए उसे काफी कुछ अनुभव हो गया था ।अस्पताल में आई सी यू के बाहर ,सारे दिन बैठे रहकर उसने जिंदगी के कई नए अनुभव पाए। किडनी ट्रांसप्लांट वाले मरीज की पत्नी से जब उसकी बात होती है तब उसे एक नए तरह का अनुभव होता है।
किस तरह परिवार के किसी मुखिया की,पति की लंबी व असाध्य बीमारी के कारण परिवार परेशान होता है,सड़क पर आ जाता है। और जब उम्मीद की कोई किरण नजर ही नहीं आती तो कामना करती है कि जो होना है वह एक बार में हो जाए।
फिर चाहे वह पति ही क्यों ना हो।
उसके अंदर मंथन शुरू हो जाता है।
उसके पति उसे कभी कहीं घुमाने नहीं लेकर गए थे। तीन सालों में वह घर में ही रही। बाहर जाने के नाम पर कई बहाने थे ।वह अपने मन का कुछ भी नहीं कर सकती थी। उसे वह समय भी याद आता है जब अपने पति के मित्र के कार्यक्रम में उसने पान खाया था तो उनके पति ने उसे कितनी बुरी तरह से डांटा था, बेइज्जत किया था और उस समय उनके द्वारा कहे गए शब्द उसके दिल को चीर गए थे।क्या पान सिर्फ वैश्या ही खाती हैं?
जब पता चलता है कि एक हफ्ते बाद पति की छुट्टी हो जाएगी तो मार्केट जाकर पान खरीदती है ‘चूना- कत्था मीठा पान” कहते हुए और घर के लिए भी बंधवा लेती है यह कहते हुए कि-
*“एक हफ्ते यही रूटीन रखूँगी, जी भर के जी लेना चाहती हूँ जिन्दगी …न जाने कल क्या हो”* |
वह जानती थी कि पति के आने के बाद फिर न जाने क्या स्थिति बने।
कुछ पुरुषों की बहुत ही घटिया मानसिकता होती है। वे स्त्रियों को अपनी इच्छाओं पर जीने के लिए मजबूर करते हैं। और जब वक्त उन्हें थोड़ी देर की भी आजादी देता है तो वे भी अपने जीवन को अपनी नजर से पूरा जीने का प्रयास करती हैं।
कहानी पढ़ने में जितनी साधारण लगती है वास्तव में इतनी साधारण है नहीं। दुनिया चाँद पर भले ही पहुँच गई हो लेकिन पुरुषों की मानसिकता स्त्रियों को लेकर सहजता से बदलती नहीं।
बेहतरीन कहानी के लिये रोचिका जी को बधाई।
रोचिका अरुण शर्मा की चूना कथ्था-मीठा पान बहुत सुंदर मर्मस्पर्शी कहानी है। बधाई