प्राननाथ
चरन स्पर्श।
मकर संक्रान्ति पर नत्थू आया था। अचानक सामने पाकर मैंने उससे पूछा कि कहाँ से भूल पड़ा रे तू? वह बोला, “बुआ, मैं तुम्हें लिबाने आया हूँ, जल्दी से तैयार हो जाओ।” उसके उतावलेपन को देखकर मुझे हँसी आ गई। मैंने कहा कि मैं गैल में थोड़े बैठी हूँ, जो तेरे साथ चल दूँ। उसके आने से मुझे बहुत खुशी हुई थी। चलो, कोई तो है जो मुझे लिबाने आया। माँ के गुजरने के बाद से गाँव का कोई आदमी मेरे यहाँ नहीं आया। ब्याह-शादियों की चिट्ठी-पत्री आ जाती है, सो मैं भी चली जाती हूँ।
पानी पिलाने के बाद मैंने पूछा, “नत्थू, पहली बार तू मेरे यहाँ आया है, तुझे मेरा घर मिल गया?” वह विजयी भाव से बोला- “बुआ, पूछते-पूछते तो लोग लंका पहुँच जाते हैं, ये तो अपना ही क्षेत्र है। गाँव में घुसते ही मैंने एक आदमी से घर का पता पूछ लिया था।”
उसे देखकर मैं इतनी खुश थी कि कुछ पूछो न। मैं उससे बहुत सारी बातें करना चाहती थी। माँ की बात चल पड़ी, तो मैंने उससे कहा, “नत्थू जब से माँ गुजर गई तब से मायके के दर्शन दुर्लभ हो गये थे। तुझे देखकर मेरा जी जुड़ा गया।” वह मुझे आश्वस्त करता हुआ बोला, “बुआ, कभी ये मत कहना कि मायके का रिश्ता खत्म हो गया। मैं हूँ, तुम मुझे भाई समझो या भतीजा, मौके पर हमेशा साथ खड़ा मिलूँगा। बहन-बेटियों की संकरात मायके में होती है, इसीलिए संकरात तुम्हें वहीं मनानी है। दो दिन के लिए चली चलो, त्योहार बाद मैं तुम्हें छोड़ जाऊँगा ।
प्राननाथ, बहुत ठंड पड़ रही थी। भैंस को कई बार इधर से उधर बाँधना पड़ता था। एक ठौर पर बंधी रहने से वह झुरा जाती है। इसकी उसार कौन करता? भैंस के कारण कहीं आ-जा नहीं पाती हूँ। मैंने उससे कह दिया था कि भैया तेरा आना हो गया, मेरा जाना हो गया। आज मुझे खुशी है कि मायका सूना नहीं है। मेरा बीरन है, जो मेरी चिन्ता करता है। समझ लेना कि मैं मायके में ही संकरात मना रही हूँ। शाम को वह लौट गया था।
उसके साथ चली जाती, तो सारी सहेलियाँ मिल जाती। ब्याही बरी बिटियाँ इस त्योहार पर मायके आती हैं। अम्मा थी, तब लगातार जाती रही, अब जाना नहीं हो पाता है। एक बार तो आप ही मुझे छोड़ आए थे। आपके जाने के बाद सब अस्त-व्यस्त हो गया। आप आओगे, तभी यह सब हो सकेगा। यह त्योहार मुझे बहुत प्रिय है। इसकी बहुत-सी यादें मेरे साथ जुड़ी हैं।
बचपन से ही यह त्योहार हमारे लिए खास रहा है। पहले का जमाना भी क्या जमाना था। दीवाली के बाद ज्वार-बाजरा की फसलें घर आ जाती थीं। जाड़े भर इसकी रोटियाँ खाते-खाते उकता जाते थे। इस अनाज की रोटी भी क्या रोटी थी। एक कौरा से ही मुँह भर जाता था। गेहूँ की रोटियाँ खाने को तरस जाते थे। पूड़ियाँ तो हमारे लिए आकाश कुसुम थी। पहले गेहूँ की पैदावार ज्यादा कहाँ होती थी। खेतों में कठिया गेहूँ होता था, पर उपज न के बराबर थी। वो तो गेहूँ की नई किस्में आ गईं, सो लोगों के पेट भरने लगे, नहीं तो आज के समय में पता नहीं क्या होता? उस समय गेहूँ ढूँढ़ने से भी न मिलता था। थोड़ा-बहुत गेहूँ, माँ रिश्तेदारों के लिए सेंतकर रखती थी। कोई आ गया, तो उन्हें ज्वार-बाजरा की रोटी थोड़े खिलाते।
पन्द्रह दिन पहले से ही आशा लग जाती थी कि संकरात आने वाली है, पेटभर के पकवान खाएँगे। एक-एक दिन गिनते थे। सचमुच उस रात इतना खाते थे कि पेट में जगह न बचती थी। भुनसारे लोटा लेकर भागते थे। आज समय ऐसा है, चाहे रोज पूड़ी-पराठे खाओ।
मैं बताऊँ प्राननाथ, समय तो वही है। पहले गेहूँ ढूंढे नहीं मिलता था, अब ज्वार-बाजरा नहीं मिल रहा है। आज लोग ज्वार की महेरी खाने को तरस रहे हैं।
इस संकरात को मैंने भाँति-भाँति के पकवान बनाए थे। पकवान तो थे पर खाने वाला कोई नहीं। लछमन की पत्नी उरमिला की तरह मैं भी सोचती रही, ‘खिलाऊँकिसे मैं अलोना-सलोना।’ आप आए नहीं, मैं अकेले कैसे खा लेती? सरबत चाची को बुला लाई थी। हम दोनों ने एक साथ बैठकर खाया था। चाची मेरे पकवानों की तारीफ कर रही थी।
सुबह हम लोग नदी में बुड़की (डुबकी) लगाने गए थे। मौज-मस्ती के साथ रास्ता गुजर गया। लोग लमटेरा गाकर अपना उल्लास प्रकट कर रहे थे। इस अवसर पर लमटेरों की धुन सुहानी लगती है। सरबत चाची का गला भी सुरीला है। मैंने कहा, “चाची लमटेरा तुम भी गाओ।”
वे बोलीं, “अगर तू सम भरवाएगी तो मैं गाऊँगी।” मैंने हाँ कह दिया। चाची ने अलग-अलग धुनों में लमटेरा गाए थे। उन्होंने राग छेड़ दिया-
छप्पर छाऊँ गिर पड़े रे देवा-ऽ, तिल छाऊँ-ऽ उड़ जा-ऽ ए….ऽऽऽऽ ..।
लौं-ऽ गन मड़ड्या छवाय दे-हो-ऽऽऽऽ, मोरी महक मढ़ी लौ… रे-ऽऽऽऽ
अब जाय हो, निभा लइयो-ऽ ऽ
निभा लइयो रे गहबहियाँ मोरी देहियाँ… दरद न रे-ऽऽऽ होय हो… निभा लइयो
दूसरी धुन में उन्होंने इसे गाया था-
महादेव बाबा बड़े रसिया
बड़े रसिया रे वे तो, गौरा सें, जोरें बैठे गाँ-ऽ ठ हो-ऽ
महादेव बाबा हो- ऽऽ
आज भी मेरे दिलो-दिमाग में उन लमटेरों की गूंज सुनाई देती है। उस गूँज से मेरे मन में एक हुड़क सी उठती है। झाड़ू-बुहारी करते हुए मैं गुनगुनाती हूँ और प्रसन्न होती हूँ।
तुम तो जानते हो बुड़की के बाद खिचड़ी होती है। घर आकर मैंने खिचड़ी पकाई। सरबत चाची से बोल दिया था कि रोहू लला को खिचड़ी खाने भेज देना। लला खिचड़ी खा गए थे। त्योहार ही तो है, जहाँ लोग एक-दूसरे के घर जाकर खाते-पीते हैं और खुशियाँ मनाते हैं।
तुम इस त्योहार में तो आ नहीं पाए। आगे होली का त्योहार आने वाला है, उसमें जरूर आना।
आपकी
रमकल्लो


लखनलाल पाल जी
रमकल्लो की पाती महादेव बाबा बड़े रसिया बहुत ही मर्मस्पर्शी रचना है.
संक्रांति त्यौहार का मन पुत चित्रण इस रचना में हुआ है.
हमने आप की लगभग सभी पाती शृंखला ओं को पढ़कर अपनी राय जाहिर की है किन्तु इस इस रचना के तेवर निराले हैं.
यह समुची शृंखला विरह रस से ओतप्रोत है और प्रेम के विरह पक्ष का सशक्त चित्रण इसमें मिलता है.
संगीत में आरोह और अवरोह होते हैं लेकिन यहां रोह और अधोरोह की भी हमें झांकीं मिलती है.
रमकल्लो के विरह का रोह से आगाज़ होता है और आरोह से अवरोह तक पहुंच कर विश्राम नहीं लेता अपितु वह अधोरोह तक पहुंच जाता है.
इसके अलावा आप ने विगत और समसामयिक परिवेश का अंतर स्पष्ट किया है, चाहे वह खान-पान की चीजें हो या माहौल जिसका आप ने सफल चित्र खींचे हैं.
भोलेनाथ बड़े रसिया हैं यह हम सब जानते हैं किन्तु उन्हें पाने के लिए माता भगवती को तपस्या करनी पड़ी थीं तब तक उन्हें चैन नहीं मिला. आप की रमकल्लो को भी उनके प्राण नाथ मिलें यही शुभकामना.
आप की रमकल्लो का विरह कब समाप्त होगा इस की हमारी निगाहों को प्रतीक्षा है.
इस पाती के लिए आप को बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं .
सादर
प्रोफेसर विजय महादेव गाडे जी, आपकी समीक्षा ने इस रचना में विशेष निखार ला दिया है।
बड़ी बात तो ये है सर कि संगीत में आपकी परख बहुत गहरी है। इसमें मैं इतना ही जानता हूं कि ये लमटेरा है जो बुंदेलखंड में मकरसंक्रांति पर्व पर गाए जाते है। मैं भी इन्हें गुनगुना लेता हूं पर इसकी शास्त्रीयता से अनभिज्ञ था। लोकधुन के आरोह, अवरोह, रोह तथा अधोरोह पर आपकी यह पकड़ मुझे आश्चर्यचकित कर गई।
ऐसी प्रतिक्रियाएं रचना से कम आनंददायक नहीं है। बढ़िया प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत-बहुत आभार सर
—— मुसीबतें ,दुख-दर्द, यादें, संघर्ष और विरह कहानी के कथानक को मार्मिक बनाते हैं। साहित्य के संसार में विरह एक ऐसा कुआं है , जितना दर्द निकालोगे, उतना ही वह और भर जाएगा। रामकल्लो का विरह भरा जीवन पाठक को द्रवित करता है। विरह , उसको मांज रही है, कर्मशील बना रही है, उसको तोड़ नहीं रही । लखनपालजी की भाषा भी कोमल कांत, पात्रानुकूल और आंचलिक है। शैली भी रोचक और प्रवाहमय है।चरित्र पाठक की चेतना से आत्मीयता बना लेता है। बंधुवर ! मेरी हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं !!
डॉ हरनेक सिंह गिल जी , आपकी टिप्पणी रमकल्लो जैसे पात्र के लिए सुखद अहसास से भर देता है। आपकी टिप्पणी रमकल्लो को पात्र नहीं बल्कि व्यक्ति के रूप में खड़ा कर रहा है। बढ़िया टिप्पणी के लिए आपका बहुत-बहुत आभार सर
—— मुसीबतें ,दुख-दर्द, यादें, संघर्ष और विरह कहानी के कथानक को मार्मिक बनाते हैं। साहित्य के संसार में विरह एक ऐसा कुआं है , जितना दर्द निकालोगे, उतना ही वह और भर जाएगा। रामकल्लो का विरह भरा जीवन पाठक को द्रवित करता है। विरह , उसको मांज रही है, कर्मशील बना रही है, उसको तोड़ नहीं रही । लखनपालजी की भाषा भी कोमल कांत, पात्रानुकूल और आंचलिक है। शैली भी रोचक और प्रवाहमय है।चरित्र पाठक की चेतना से आत्मीयता बना लेता है। बंधुवर ! मेरी हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं !!
*रमकल्लो के निहितार्थ*
वे भी क्या दिन थे। संकरात की हाड़ कपकपा देनेवाली ठंड। मौं अँधेरे बुड़की लेना। सूरज के निकलने पर आग पर घी, गुड़ मिला तिल चटकाना। बड़े मंदिर पर सीधौ(लाग) दे आना। दूसरे मंगताओं को खिचड़ी दान -पुन्न करने के बाद ही पेट पूजा की इजाजत मिलती थी…
बुंदेलखंड में खासतौर पर संकरात की परवी का बड़ा महत्व माना गया है। यही बुड़की भी कही जाती है। सूरज निकलने से पहले नदी, तालाब, झील, पोखर, बावड़ी आदि में स्नान की पवित्र परंपरा वर्षों से विद्यमान है। यमुना, सिंध पहूज, कुआरी, चंबल, वेतवा आदि नदियों के अलावा स्थानीय नून नदी, मलंगा जैसी छोटी नदियाँ, नाले यहाँ प्रवाहित होते रहे हैं। संकरात के रेला मेला इन्हीं नदियों के तट पर रचते बसते थे। इन्हीं नदियों की कच्छरों में, ठंडी रेती में, बालू के समसार पहाड़ों में, माटी की टौरियों में लमटेरा की धुनें दूर-दूर तक गूँजतीं सुनाई देती हैं-
‘महादेव बाबा बड़े रसिया $$”
*रमकल्लो की पाती* को पढ़ाते हुए निरंतर यह महसूस कर रहा हूँ कि पाती के बहाने लेखक ने लोक संस्कृति के उत्स को उकेरने का पूरा प्रयास किया है। उसे संजोए रखने के जतन भी रमकल्लो के माध्यम से बताएं हैं।चाहे पाकपकवान दूसरों के खिलाने की बात हो, बुड़की स्नान या दान-पुण्य आदि की बातें हों ये परंपराएँ बुंदेलखंड में बहुत प्राचीन काल से अस्तित्व में रहीं हैं।
इस पाती का दूसरा एक पक्ष और भी है-
बुंदेलखंड में सावन तथा संकरात के त्योहारों पर विवाहित स्त्रियाँ ससुराल से मायके बहुतायत में आती हैं। रक्षाबंधन और मकर संक्रांति ऐसे दो त्यौहार माने गए हैं जिनमें वृद्ध माताओं से लेकर नई नवेली भी अपनी ससुराल से मायके आतीं है। मायके में दो-चार दिन रहकर त्यौहार मनातीं हैं। संगी साथी-सहेलियों से मिलती हैं। सामाजिकता को विस्तार देतीं हैं, जैसा की रमकल्लो अपनी पाती में जिज्ञासा व्यक्त करती है।
संकरात में जो लमटेरा गीत गाए जाते हैं, कहीं-कहीं यही लमटेरा, रमटेरा भी हैं। वास्तव में ये ऋतुपरक लोकगीत हैं। इन ऋतुपरक गीतों में आस्था है, ईश्वर का वर्णन है, प्रेम है और विरह-बिछोह की आकुल अभिव्यक्ति भी समाहित है। कभी-कभी ये गीत लोकमुख से सुनने में इतने माँसल लगते हैं कि सुनकर शर्म आ जाए। लेकिन उस मांसलता के भीतर जो पवित्रता भरी हुई है, जो निश्छलता और निष्पापता, निष्कपटता भरी है वह अप्रितम है, अनूठी है। अभिनंदनीय है, अनुकरणीय है। इसीलिए ‘रसिया’ शब्द की जो मादकता है, उस मादकता का जो सौंदर्यबोध है उसे बड़े-बड़े ‘षटपदी’ नहीं समझ सकते। रसिया की रसआर वही पी सकता है, जो अंतर्मुखी हो, उत्सवधर्मी हो, तभी वह रसिया के रस को आत्मसात् कर पाएगा। अन्यथा टापता रह जाएगा।
हालांकि लमटेरा की भाँति ‘रसिया’ भी लोकगीत की एक विधा का नाम है जो विशेष रूप से उत्तर भारत में प्रचलित है। रसिया गीतों में मुख्य रूप से प्रेम, विरह, और सामाजिक जीवन की बातें कही जाती हैं। इन गीतों की एक विशेष शैली होती है जिसमें अक्सर दो पक्ष होते हैं – एक पुरुष और एक महिला, जो एक दूसरे से प्रश्न पूछते हैं और उत्तर देते हैं। यह प्रश्नोत्तर शैली रसिया गीतों को और भी रोचक बनाती है। रसिया गीत लोक संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और अक्सर त्योहारों, मेले, और अन्य सांस्कृतिक आयोजनों में गाए जाते हैं। ये गीत न केवल मनोरंजन का साधन हैं बल्कि सामाजिक संदेश भी देते हैं।
*रमकल्लो की पाती* के लेखक डॉ० लखन लाल पाल ने सांकेतिक रूप में लमटेरा या रसिया लिखकर लोकगीत परंपरा का भी संवर्द्धन किया है।
वस्तुतः कोई कथा इसलिए ही नहीं लिखी जाती कि उसे किस्सागोई खड़ी करना है, बल्कि इसके साथ ही एक चरित्र को विकसित करना होता है और उस चारित्रिक विकास के माध्यम से संस्कृति-संस्कार व जीवनमूल्यों को भी जीवंत बनाए रखना होता है।
*रमकल्लो की पाती* यही कार्य बखूबी कर रही है।
डॉ० रामशंकर भारती
3 जून 2025
सायं-5:48
आदरणीय डॉ रामशंकर भारती जी, आपकी टिप्पणी पाती को विस्तार देती है। नदियों ,तालाबों का स्नान हो या लोकधुन में गाए जाने वाले लमटेरा, सभी को आपने उनके महत्व को रेखांकित कर दिया है। बुंदेलखंड के ये रीति-रिवाज यहां की पहचान है। इस पहचान को व्यक्त करती आपकी यह टिप्पणी विशेष है।
इस विस्तृत प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत-बहुत आभार भारती जी
सर जी!
पूरी टिप्पणी लिखने के बाद पोस्ट करने के बजाय डिलीट हो गई। लिंक में लिखने की यह सबसे बड़ी तकलीफ है कि आपने कॉपी करने में जरा भी देर की और थोड़ी भी लापरवाही हुई तो सब गड़बड़।
आपकी रमकल्लो से हमने दोस्ती कर ली है। सात एपिसोड पढ़ते पढ़ते आठवें में पक्की दोस्ती हो गई। बहुत सारी समानताएँ हैं हम दोनों में।
पत्र के जमाने में पत्र पोस्ट करते ही इंतजार शुरू हो जाता था चाहे वह माता-पिता को लिखा हो बहन, भाइयों को लिखा हो या किसी भी रिश्तेदार को।
बेचारी हमारी सखी! पाती लिख-लिख कर परेशान है। जवाब ही नहीं।पाती से ही संतोष कर लेती बेचारी। मुलाकात का आभास हो जाता कम से कम कि आज प्राणनाथ की पाती आई है। थोड़ी तो सुध ली। और फिर बताती कि प्राणनाथ ने क्या-क्या लिखा है, उस हिसाब से जवाब देती।
उससे पता मांगना पड़ेगा कि शहर में कहाँ रहते हैं? किस कंपनी में है ?कंपनी के मालिक से मिलना पड़ेगा जो छुट्टी ही नहीं दे रहा। रमकल्लो के प्राणनाथ की तरफ से एक एप्लीकेशन लगाना पड़ेगा।
भतीजे के आने की खुशी अनंत है। मायके का तो कोई अजनबी भी आ जाए तो अपना सा लगता है। सारा लाड़ और दुलार उस पर उलट देने का मन करता है। पर अकेली जान
रमकल्लो क्या-क्या करे।
संक्रांति का अच्छा जिक्र है।संक्रांति में यहाँ भी लड़कियाँ मायके आती हैं । अब नई-नई शादी होती है तभी तक का रहता है सब। फिर तो अपने घर की परेशानियाँ ही दिखने लगती हैं।
हमारे यहाँ भी ससुराल में 7 तरह के लड्डू बनते थे।आटा ,बेसन, चाँवल,मूँग, तिल्ली,सेव और ज्वार की लाही के। अब तो खाने वाले भी नहीं रहे और आजकल बाजार ज्यादा चलने लगा है। फिर मीठे से परहेज।
सुबह से नर्मदा स्नान होता था फिर मंदिरों और दूर तक लगी भिखारियों की लाइन में दान। कच्ची खिचड़ी और लड्डू का।
ज्वार की रोटी हमारे यहाँ भी ठंड में बहुत बनती थीं। अब इस बार की पाती में ज्वार की रोटी की बात हो गई है तो ज्वार की रोटी पर एक संस्मरण लिखेंगे।
लमटेरा लोकगीत वाली बात समझ में नहीं आई। लमटेरा का क्या अर्थ है?
महादेव बाबा बड़े रसिया तो बहुत अच्छा लगा। बुड़की को यहाँ डुबकी कहते हैं। हम लोग भी 4:00 बजे से उठकर सारे घर की झाड़ू बुहारी करके 5:00 बजे सुबह नर्मदा जी नहाने जाते थे।
सुबह के समय खिचड़ी यहाँ भी घरों घर पकती है।
बनाकर खिलाने का आनंद भी अलग है। संक्रांति के बाद होली भी निकल गई पता नहीं आना हुआ या नहीं प्राणनाथ का!अब देखो देव सोने के बाद त्योहारों की झड़ी लगेगी। शहर से दिवाली पर प्राणनाथ का आना संभव हो।
वरना पता चला कि दिवाली के पहले ही रमकल्लो पाती एपिसोड का अंत हो गया।
प्लीज ऐसा मत कीजिएगा सर जी! वरना अधूरापन रह जाएगा।
इन प्यारी सी पातियों के लिए आपको बधाई।
नीलिमा करैया जी आपकी प्रतिक्रिया रचना को बारीकी के साथ एक एक धागे को खोल देती है। अब लमटेरा लोकगीत को ही ले लीजिए। आपने लिखा है कि लमटेरा का क्या अर्थ है? आपका पूछना बनता है। क्योंकि हर क्षेत्र के अपने लोक व्यवहार एवं लोकगीत होते हैं। लमटेरा भी बुंदेलखंड का लोकगीत है। मैंने इसका अर्थ लंबी टेर के अर्थ में लगाया है। जनमानस जब इसे गाता हैं तो अंतिम अक्षर को लंबी टेर में ले जाते हैं। इसी से इसका नाम लमटेरा पड़ गया होगा।
पाती पर बढ़िया प्रतिक्रिया देने के लिए नीलिमा करैया जी आपका बहुत-बहुत आभार
प्रणाम सर ,
आपके उपन्यास रमकललो की पाती का यह.अंश पढने के लिए फुरसत के पल तलाश रही थी ,बजी मुश्किल से उत्सुकता शांत करती थी।आज पढ ही लिया।इस बार रमकल्बो की पाती में मायके की याद रची बसी थी। संक्ररात के समय गांवों की रौनक देखते.ही बनती है। नयी फसलों का आगमन घर में खुशियां लेकर आता है।सारी बेटियां मायके में सकरात मनाती हैं पर रमकल्लो नहीं जा पाती।उसकी घर गृहस्थी गाय बैलों की देखभाल छोडकर जाना संभव ही नहीं है इसलिए भतीजे को भी लौटा डिया।यहां मन भावुक हो गया कि मां नहीं तो मायका कैसा,पर भतीजा उस कमी को पूरी करने का वादा करती है।वह.संतुष्ट है मानो उसका मायका अभी खतम नहीं हुआ वह तो नये रिश्तों में बंधा हुआ आज भी जिंदा है।चाची के साथ नहाने जाना,घर पर बनाये पकवान उनके साथ मिल बांट कर खाते उसे पति की याद आती है।वह उदास है कि यह सब किसके लिए करे? हम बेटियों के लिए तीज त्योहार मायके की गलियां ,सखी सहेलियां बहुत कीमती धरोहर होती हैं ।मन भावुक गया।अगले अंश की प्रतिक्षा में हूं।बहुत बहुत बधाई, अनंत शुभ कामनाए सर।
पद्मा मिश्रा-जमशेदपुर
आदरणीया पद्मा मिश्रा जी आपकी यह प्रतिक्रिया बता रही है कि रमकल्लो की पाती अपने उद्देश्य को पूरा कर रही है। अगली पाती का इंतजार वाला ये भाव इसको प्रमाणित कर रहा है।
रमकल्लो के मायके और ससुराल के आत्मीय संबंधों पर जो आपने प्रतिक्रिया दी है, वह भावुक करने वाली है। बढ़िया टिप्पणी के लिए पद्मा मिश्रा जी आपका बहुत-बहुत आभार
जवाहरलाल नेहरू जी की पुस्तक,’पिता के पत्र पुत्री के नाम’ यदि भारत का गौरवमय इतिहास पत्रों के माध्यम से पाठक को बताती हैं तो वहीं ‘रमकल्लो की पाती ‘,जो वह अपने परदेसी पिया को लिख रही है, के माध्यम से लखनलाल पाल जी ने अपनी पुरानी परंपराओं को भूलते जारहे समाज की ओर संकेत कर रहे हैं। इन पत्रों में रमकल्लो बीते समय का की यादों का सहारा लेकर निकटस्थ भूत में त्योहारों के मनाए जाने के ढंग पर भी प्रकाश डालती है। समय कभी रुकता नहीं और परिवर्तन समय की गति का चिन्ह है। कथा में कोई प्रवाह तो नहीं है लेकिन यह 25 -30 वर्ष पहले के त्योहारों को मनाए जाने के ढंग का कच्चा चिट्ठा जरूर है। पाठक को यह जिज्ञासा बनी रहती है कि अगली पाती में उस माह में मनाए जाने वाले किस त्यौहार का विवरण आएगा।
आदरणीया सरोजिनी पाण्डेय जी, आपकी बेलाग टिप्पणी लेखक को अनियंत्रित नहीं होने देगी। मतलब सुधार की गुंजाइश बनी रहती है। समीक्षक का यह धर्म है कि लेखक जहां कमजोर दिखे वहां उसको इंगित करते रहना चाहिए।
रमकल्लो ने इस पाती में आगे आने वाले त्योहार का जिक्र कर दिया है। भारतीय महीनों में होली का त्योहार अंतिम त्योहार है। अब तक रमकल्लो का व्यक्तित्व पाठक के सामने आ गया है। इसके बाद उसका कृतित्व सामने आएगा। फिलहाल आगे क्या होगा इसे रहस्य ही बना रहने देना चाहता हूं।
आपकी इस टिप्पणी का मैं हृदय से स्वागत करता हूं। आप टिप्पणी करते रहिएगा।
सरोजिनी पाण्डेय जी आपका बहुत-बहुत आभार
तनक देर जादा हो गई पाती पड़वे में,कछु तो जी अच्छों नई हतो,
वायरल सोऊ चल रओ,
पर जैसेइ पाती पढ़ी, सई के रय , रम कल्लो को भतीजों संक्रांत के लाने लूवां आओ है , हमउन को मायके की याद आ गई,प्रिय लखन जू मां से मायकों ओर सास से सासरो होउत्त है, जेएसइ सावन और संक्रांत आय हती ,मताई के फोन पे फोन आतते
,बेटा कबे आ रई,
अब तो भूले बिसरे एक आदि बार भईया भौजी पूछ लेत बाई में खुस हो जात
अब को इतेक जा पा रओ,घर ग्रस्ति छोड़ के
बेचाई रम कल्लो तो भेसिया की बांदी मायके नई जा पा राई संक्रांत के दीना भोराई हम्माई आजी तिल पिस्के सरसों के तेल में मिला के रातइ में घर देतती
भोर पूरे आंग में लगाकर हम सब भाई बहन मा पापा नहा उत्त थे
मां तिलगुर द्वारे पे चट कात थी
वैसे साईं बताबे राम कल्लो के पाती पड़त पड़त सबरे पाठक
बुंदेलखंड के तीज त्योहारण से गीतन को जानन लगे हैं, लम टेरा
की तान खेञ्च दई
जोइ सोच रए क्कबे बो बेरा आ हे जब रम कल्लो को घर वालो आहे
देखत कबहुंक तो आ हे
आपको भौतइ धन्यवाद कलम चलत रए खबर मिलत रहे
आदरणीया कुंती जी, आपने अपनी बुंदेली बानी में रमकल्लो की पाती की डूबकर समीक्षा की है। रमकल्लो के द्वारा मनाए गए त्योहार सभी की यादें ताजा कर देती हैं तो यह रचना की सार्थकता है। मेरी इस रचना को पढ़कर आपकी यादें ताजा हो गई, मेरे लिए खुशी की बात है। बढ़िया टिप्पणी के लिए आपका बहुत-बहुत आभार
संक्रांति मायके में मनाए जाने की प्रथा क्षेत्र विशेष तक सीमित है। लमटेरा शब्द पहली बार सुना, शायद यह गीत का कोई प्रकार होता होगा!