Friday, April 17, 2026
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रोचिका अरुण शर्मा की कहानी – चूना-कत्था मीठा पान

आज वह एक अरसे के  बाद घर से बाहर निकली थी | जहाँ एक तरफ मन में  तूफ़ान उठ रहे थे वहीं उसके कुरते का चटख रंग उसके गालों पर उभर कर आ रहा था |  मन में उदासी किन्तु कदमों में उत्साह और वह अगले ही पल मुम्बई लोकल ट्रेन के लिए  टिकट खिड़की के सामने  खड़ी थी | 
चर्च गेट स्टेशन की टिकट लेकर वह रेलवे प्लेटफॉर्म की तरफ बढ़ गयी | मन में एक संशय  था कि कहीं गलत ट्रेन में न बैठ जाऊँ | लेकिन उसकी सतर्कता उसका  आत्मविश्वास दर्शा  रही थी | डिब्बे के बाहर तक लटकी हुई महिलाओं से लदी लेडीज ट्रेन धड़-धड़ करती हुई प्लेटफॉर्म की और बढ़ रही थी | उसने अपने मैजेंटा रंग के दुपट्टे के दोनों छोरों को पकड़ कर अपनी कमर से आगे की और खींचा | कंधे पर टंगे बैग को भी आगे किया मानो वह किसी अन्य नौकरीपेशा महिला की तरह रोजमर्रा की जिन्दगी में लोकल ट्रेन से सफ़र करने की आदी हो | ट्रेन के रुकते ही डिब्बे के अन्दर और बाहर महिलाओं के बीच हो रही धक्का-मुक्की को देख कर उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे वह कहीं भगदड़ में फँस  गयी हो | लेकिन वह कहाँ डरने वाली थी , बचपन में दादी के साथ कभी-कभार जब मेले में जाती थी तो वहाँ भी तो ऐसा ही भीड़-भड़क्का हुआ करता था | जिस प्रकार वह लोगों के बीच से जगह बना कर अपने पसंद के झूलों एवं दुकानों तक पहुँच जाया करती थी | आज भी वह उस धक्का-मुक्की में शामिल हो लोकल ट्रेन के अन्दर पहुँच गयी  और बैठने के लिए सीट ढूँढने हेतु अन्य महिलाओं से आगे  बढ़ गयी थी | सीट तो नहीं मिली लेकिन वह ट्रेन की छत से बीच में लटकी चेन में लगे  हेंडल  को पकड़ कर खड़ी हो गयी | ट्रेन में बैठी अन्य महिलाओं के चेहरे, उनके हेयर स्टाइल देखती उनकी बातों को गौर से सुनती वह अपने छरहरे बदन एवं गौरवर्ण पर गुमान कर मन ही मन स्वयं की तुलना उनसे कर रही  थी | 
लोकल अपनी गति से आगे बढ़ती जा रही थी | अब कौनसा स्टेशन आयेगा यह जानने के लिए उसकी नजर गेट  के ऊपर लगे रूट मैप पर थी | तभी अगला  स्टेशन आया और दफ्तर जाने वाली बहुत सी महिलायें ट्रेन से उतर गयीं, मालूम हुआ यह अंधेरी स्टेशन था | काफी सीटें एक साथ ही खाली हो गयी थीं | उसने भी  झट से एक खाली सीट लपक ली  | खिड़की के पास बैठी वह प्लेटफॉर्म पर आती-जाती भीड़ को देख रही थी कि ट्रेन रवाना हो गयी | एक के बाद एक स्टेशन आया-गया  और अब वह पहले से अधिक सतर्क हो गयी थी | उसे अगले स्टेशन मरीन लाइंस पर उतरना था | वह डिब्बे के दरवाजे के पास आ खड़ी हुई थी | हवा के साथ उसके खुले बाल लहरा रहे थे और उसके चेहरे पर मुस्कराहट थी  | मन में कुछ पुरानी यादें ताजा हो आयीं | पतिदेव को कहाँ खुले बाल पसंद हैं, जब कभी वह किसी दम्पति  को  मोटर सायकिल  पर जाते देखती और महिला के खुले  बाल हवा में लहराते तो वह स्वयं को उनमें ढूँढने की कोशिश करती  | बाइक की पीछे की सीट पर बैठी  अपने पति की कमर में हाथ डाले उसके कंधे पर ठोडी टिकाये बतियाती अपने लहराते बालों को हाथों से सहला कर ठीक करती वह स्वयं को कल्पना मात्र में ही देख पाती थी | पतिदेव को तो यह सब छिछोरापन लगता था | तभी ट्रेन की गति कम हुई, अगला स्टेशन  नजर आने लगा था उसने  पास में खड़ी महिला से पूछा “मरीन लाइंस है न ?” 
“हाँ मरीन लाइंस ही है |” 
फिर पहले की ही तरह उसने अपना दुपट्टा और हैंड बैग आगे की ओर खींचा, सुना था ट्रेन में चढते-उतरते समय भीड़ एवं धक्का-मुक्की का फायदा उठा कर कई बार लोग पर्स छीन लिया करते हैं | इसीलिए वह सचेत हो कर ट्रेन के रुकते ही डिब्बे के अन्दर चढने वाली महिलाओं की भीड़ को चीरते हुए बाहर प्लेटफॉर्म पर उतर कर ब्रिज की सीढ़ियों की तरफ बढ़ गयी थी | ब्रिज पार कर सीढियां उतर कर  बॉम्बे  हॉस्पिटल तक का रास्ता उस ने पैदल तय किया | 
हॉस्पिटल पहुँच कर पेश्येंट फैमिली मेंबर का कार्ड दिखा कर वह लिफ्ट से ऊपर गयी और आय सी यू के बाहर लगी बैंच तक पहुँच गयी | वहाँ बैठे अन्य लोगों के साथ बैठ कर पिछले पाँच दिनों की ही तरह बतियाने लगी | 
 “तुम्हारे कौन हैं जो एडमिट हैं आय सी यू में ?”
“मेरे पति हैं, बाइक चलाते समय एक्सीडेंट हो गया था, दिमाग में मार लगी है |” दबे से स्वर में वह बोली |  
वहाँ बैठे सभी का कोई न कोई आय सी यू में था और वे उन अपनों के ठीक होने की प्रतीक्षा कर रहे थे | उदास और लटके हुए चेहरे, कभी-कभार आपस में बतियाते तो  उनकी आँखें भी नम हो जाती थीं | 
दोपहर में वह हॉस्पिटल से बाहर निकलती और सामने बने लिबर्टी  रेस्टोरेंट में जा कर अपनी पसंद का कुछ खा लेती | पुनः हॉस्पिटल में आ कर बैठ जाती और रात को आठ बजे लोकल पकड़ कर गोरेगांव  तक का सफ़र तय करती  | घर पहुँच कर नहा धो कर खाना पकाती और खा कर सो जाती | अगली सुबह से फिर उसकी वही दिनचर्या शुरू हो जाती | 
वैसे डॉक्टर जवाब दे  चुके थे कि उसके पति के बचने की उम्मीद कम ही है | ससुराल पक्ष एवं मायके के रिश्तेदार भी एक-एक बार अस्पताल आ कर मिल गए थे | अब भला अपना कामकाज छोड़ कर  कौन बीमार की तीमारदारी करने रोज-रोज अस्पताल आता ? रात के समय तो पति के लिए अस्पताल में सोने वाला कोई न था और दिन के समय वह रोज आ कर बैठ जाती | डॉक्टर बोलते तो प्रेस्क्रिप्शन ले कर अस्पताल के बाहर बने मेडिकल स्टोर से दवा ला कर दे देती | हाँ, असपताल का खर्च पति द्वारा लिए मेडिक्लेम के भरोसे था | मेहनती पति रात-दिन रुपयों के जोड़-घटाव में जिन्दगी गुजार रहा था और एक दिन तेज बारिश में सड़क पर बने  गहरे गड्ढों में भरे पानी के कारण उसे गड्ढा होने का अहसास ही न हुआ | बाइक का अगला पहिया गड्ढे में फँस गया और उसका संतुलन बिगड़ गया | वह धड़ाम से सड़क पर आ गिरा | उस समय रात का एक बजा था | मुसलाधार बारिश में कुछ गिने-चुने लोग ही सड़क पर थे | किसी ने पुलिस को सूचना दी कि सड़क पर कोई पड़ा है | तब जा कर उसे अस्पताल में दाखिल  किया गया | शरीर पर कुछ ख़ास चोट नहीं लगी थी किन्तु दिमाग में अंदरुनी चोट से खून जम गया था और वह अचेत अवस्था में ही अस्पताल में लाया गया था | 
जब उसे इस हादसे की खबर लगी तो वह बदहवास सी हो गयी  और समझ न पायी क्या करे क्या नहीं ? पिछले तीन बरसों के विवाह में घर की दहलीज उसने कम ही पार की थी  | छोटे शहर से ब्याह कर मुम्बई के  माचिस की डिब्बियों से फ़्लैट में बंद हो गयी थी | उसके पति को तो जैसे कोई शौक ही नहीं | कभी उसे घर से बाहर ही नहीं ले गया |  छुट्टी के दिन बंद फ़्लैट में बैठ कर वह टीवी देखता और वह रसोई में पका कर उसके सामने हाजिर कर देती  | यदि वह उसे सैर पर चलने के लिए कहे तो वह कहता “छुट्टी के दिन तो सुबह देर तक सोने दो और शाम के समय के लिए भी बहाना तय था यार  मच्छर काटते हैं फिर उमस भी खूब है बाहर |”
वह तो बस सब्जी-राशन में ही सैंडविच हो गयी थी | लेकिन अचानक से अस्पताल तक कैसे जाऊँ उसका रुआँसा स्वर पड़ौसियों के दरवाजे के सामने रो पड़ा था | मराठी पड़ोसन ने उसकी बात सुन-समझ कर अपने पति की मदद से उसे अस्पताल तक पहुँचाया |
करीब पंद्रह दिन में आय सी यू के बाहर बैंच पर बैठे लोगों से उसकी दोस्ती हो गयी थी | आज एक चालीस वर्षीय महिला की चहल-कदमी कुछ बढ़ गयी थी | उसके माथे की रेखाएं बता रही थीं कि वह बहुत परेशान है | कुछ देर बाद वह महिला उसके करीब आ कर बैठ गयी थी | उसने हिम्मत जुटा कर उस  से पूछा “ आपके कौन हैं जो यहाँ एडमिट हैं ?” 
“पति हैं मेरे”
“क्या हुआ है उन्हें ?”
“किडनी ट्रांसप्लांट” 
मन ही मन वह सोच रही थी कि सुना तो बहुत है किडनी ट्रांसप्लांट के बारे में पर हकीकत में होता क्या है यह उसे नहीं मालूम | फिर भी उसने सांत्वना के भाव दिखाते हुए कहा “फ़िक्र न करें सब ठीक होगा”
दूसरी महिलायें भी उसे हिम्मत  बंधा रही थीं | 
करीब चालीस बरस की एक अन्य महिला बोली “ मैं तो पिछले छः महीने से समझो यहीं रह रही हूँ | मेरा जवान बेटा लोकल ट्रेन से गिर गया था तब से कोमा में है | बेटी रेलवे में नौकरी करती है वही इसका इलाज करवा रही है |”
इसी प्रकार के सब मरीज यहाँ पर आय सी यू में थे जिनके बचने की उम्मीद कम ही थी | उसने स्वयं को हिम्मत बंधाई तभी डॉक्टर ने आय सी यू से बाहर निकलते समय उसे प्रेस्क्रिप्शन थमा दिया और वह दवा  लेने चली गयी | 
जब लौट कर आयी तो वहाँ  अजीब सी खामोशी पसरी  थी | वह दवाइयाँ नर्स को थमा कर चुपचाप बैंच पर बैठ गयी |  थोड़ी देर में उसे मालूम हुआ कि जिस पुरुष की किडनी ट्रांसप्लांट की गयी थी उसके शरीर ने किडनी को रिजेक्ट कर दिया है | डॉक्टर मरीज को सँभालने में लगे थे | आय सी यू के बाहर-अन्दर नर्सों का आना-जाना लगा हुआ था | सभी महिलायें उस चालीस वर्षीय महिला के इर्द-गिर्द  थीं | वह भी उन्हीं के साथ बैठी उस महिला के चेहरे पर आये भावों को पढ़ रही थी | उसके माथे पर फ़िक्र की रेखाएं पहले से अधिक गहरा  गयी थीं और वह गहन सोच की मुद्रा में थी | थोड़ी देर में वहाँ बैठी महिलाओं में से एक-एक कर सब चलते बनीं | कोई टॉयलेट गयी तो कोई डॉक्टर के कहने पर दवा लेने तो कोई खाना खाने | उसने उस महिला के काँधे पर हाथ रख कर  धीमे स्वर में कहा “फ़िक्र न करें इश्वर सब ठीक करेंगे”
प्रत्युत्तर में वह महिला मानो बिफर पड़ी थी “अब जो होना है हो जाए | वडाला से रोज इधर आ कर बैठने का और कितने दिन दफ्तर से रजा करेगा ? बच्चों का भी स्कूल- कॉलेज डिस्टर्ब हो रहा है | पिछले दो महीने में मेंटली, फ़ाइनेन्शियली और फिजिकली टायर्ड हो गया है और कितने दिन परेशान होने का |”
उसे अपने कानों एवं आँखों पर भरोसा नहीं हो रहा था कि जो वह सुन और देख रही है वह सच है | भला कौन महिला अपने पति की मृत्यु के बारे में सोच सकती है ? सभी ठीक होने के लिए ही तो प्रार्थना करते हैं | लेकिन उसका यह कहना कि जो होना है बस अब  हो जाए | उफ्फ्फ ! शायद यह  समझ चुकी है कि अब उसका पति बचने वाला नहीं | क्या ज़िंदगी की यही कटु हकीकत है ?  प्यार सिर्फ हर्फों में होता है ? उसे तो शायरी और प्रेम कहानियाँ  पढ़ने का बहुत शौक है | और उसके नजरिये  में प्यार, रोमांस बगैर ज़िंदगी कब्रिस्तान में दफनाई गयी लाश सी होती है | जो धीरे-धीरे हर पल गल कर मिट्टी होती जा रही है | 
“मैडम प्लीज़ ये दवाइयाँ ले कर आइये” नर्स ने प्रेस्क्रिप्शन उसकी ओर बढाया तो उसकी तंद्रा टूटी | प्रेस्क्रिप्शन हाथ में लेकर वह यंत्रवत लिफ्ट से नीचे उतर गयी | लिबर्टी  रेस्टोरेंट में  मसाला उत्तप्पम खाया और लौट कर दवाइयाँ नर्स को थमा दीं | 
शाम को नियत समय पर स्टेशन पहुँच गयी  और ट्रेन पकड़ ली | यह ट्रेन शाम को एक स्टेशन पहले चर्च गेट स्टेशन से रवाना होती है इसलिए इसमें बैठने के लिए अक्सर जगह मिल ही जाती है | एक घंटे तक उसके मन में आज विचारों का मंथन चलता रहा कि कैसे उस महिला ने कह दिया “अब जो होना है हो जाए और कितने दिन दफ्तर से रजा करने का” स्टेशन आया और वह गोरगाँव उतर गयी | रात का खाना खाते-खाते आज उसने टीवी चला लिया | 
टी वी पर फिल्म आ रही थी बाज़ार | उसने यह फिल्म पहले भी कई बार देखी थी | फारूख शेख की चूड़ी बिल्लोरी …….सुप्रिया पाठक का देख लो आज हम को जी भर के ……शबाना आजमी का पान चबा कर हैदराबादी लहजे में बोलना | आँखों के सामने फिल्म के दृश्य चल रहे थे और अंतस में वह दृश्य जब वह पति के ख़ास दोस्त के ब्याह में अपने पति के साथ गयी थी | उसके ब्याह के दो माह बाद ही की तो बात है | बारात में सजी-धजी वह स्वयं अपने पति के अन्य दोस्तों और उनकी पत्नियों के संग कोकटेल पार्टी  में थी | दूसरी तरफ  से मटन सींख कबाब सिकने की बू आ रही थी | पाश्चात्य संगीत की धूम-धूम, बूम-बूम संग आधुनिक शैली में सजे स्टेज पर कई नृत्य-संगीत प्रेमी हाथों में शॉट्स ग्लास लिए झूम रहे थे | उसके पति को इस प्रकार का माहौल पसंद नहीं था इसलिए वे दोनों मैरिज  हॉल में एक कोने में सबसे अलग-थलग खड़े होकर खाना खा रहे थे | तभी उसके पति का ख़ास दोस्त विशाल वहाँ आया और बोला “चलो न उधर बर्फ का गोला है वह खाते हैं |” वे दोनों उसके पीछे हो लिए |
बर्फ के गोले के पास ही पान की स्टाल भी थी | 
“एक पान दीजिये न” उसने गुलाबी  रंग की लिपस्टिक लगे होठों से मुस्कुराहाट बिखेरी  |
पान वाले ने उसे पान थमाया और उसने उसे अपने मुंह में दबा लिया | धीरे-धीरे चबाते हुए जैसे बगुला मछली को धीरी-धीरे चोंच के अन्दर लेता है वैसे ही उसे अपने मुंह में पूरा भर लिया | थोड़ी ही देर में उसके गुलाबी  होठों पर पान की लाली चढ़ आयी थी और उन लाल  होठों के बीच खिलखिलाते उसके दांत देख कर पति के दोस्त ने पूछा  “आपको पान पसंद है ?” 
जी, उसने हामी में गर्दन हिलाते हुए जवाब दिया |
दोस्त ने गोला हाथ में लिया हुआ था, पति ने आइसक्रीम और वह मुंह में पान चबाते हुए उनके साथ आगे बढ़ रही थी | तभी किसी अन्य मित्र ने पति के दोस्त को आवाज़ लगाई | वह उस की तरफ बढ़ गया तो मानो पति को एकांत मिल गया | “बिलकुल वही लग रही हो तुम ?”
“वही कौन ?”  
“वही” पतिदेव ने आँखें तरेरी  |
उसकी आँखों में आश्चर्य का भाव और भी अधिक बढ़ गया था |
“कोठे वाली और कौन ? मुझे नहीं पसंद तुम्हारा यह पान खाना” 
तुम्हें मालूम है वे पान क्यों खाती हैं ?
वह चुप रही | उसका मुंह भी शायद पान चबाना रोक कर अब बंद था |
“वे वेश्याएं अपने होठों को लाल रंगती हैं पुरुषों को रिझाने के लिए क्योंकि इस प्रकार लाल होठ औरत की योनी के समान दिखने लगते हैं |”
उसके पति की तल्खी बढ़ गयी थी और उसका तमतमाया हुआ चेहरा देख कर वह लगभग थर-थर काँपने लगी थी |
उसने अपनी नजरें इधर-उधर दौड़ाईं और सामने रखे डस्टबिन की तरफ बढ़ गयी | डस्टबिन में मुंह का पान थूका और बोली “तुम नाराज न हो, आगे से कभी न खाऊँगी , बस आज गुस्सा थूक दो |”
फिल्म में गीत चल रहा था “करोगे याद तो हर बात याद आयेगी ……” उसकी आँखें उस पुरानी घटना को याद कर भर आयी थीं | वह लगभग फूट-फूट कर रो पड़ी थी |
थोड़ी देर बिस्तर पर पड़ी-पड़ी फिल्म देखती रही और न जाने कब आँख लग गयी | सुबह थोड़ी देर से जगी और झटपट तैयार हो कर रोज की ही तरह स्टेशन पर जा कर लोकल पकड़ ली | मन थोड़ा रुआँसा सा था , पति की फ़िक्र भी खाए जाती थी | न जाने कितने दिन और लगेंगे उन्हें ठीक होने में ? अब थोड़ा हाँ -ना तो बोलने लगे हैं आवाज सुन कर | हे इश्वर उन्हें शीघ्र स्वस्थ कर दे | आखिर उनके सिवा है ही कौन मेरा इस दुनिया में | ट्रेन मरीन लाइंस स्टेशन पहुँच चुकी थी | वह पैदल चल कर अस्पताल पहुँची | आय सी यू के बाहर  समझो मातम पसरा पड़ा था | जब वहाँ  बैठी महिलाओं से पूछा “क्या हुआ आज चुप्पी सी क्यों लगी है ?”
“उस मरीज की डेथ हो गयी |”  एक ने जवाब दिया |
किसकी ?
“वह किडनी ट्रांसप्लांट वाले की |”  
ओह्ह ! उसने आस-पास बैठी सभी महिलाओं के चेहरों को गौर से देखा |
हाँ , वह चालीस वर्षीय महिला यहाँ नहीं है | बेचारी ! क्या करेगी अब पति के बिना ? कैसे रहेगी ? वह मन ही मन सोच रही थी |
“कब हुई डेथ ?” उसने पास बैठी महिला से पूछा |
“शायद रात को ही हो गयी थी | आज तुम तो देर से आयी हो, सुबह ही डेड बॉडी गयी है यहाँ से |” 
“शायद वह समझ चुकी थी कि अब उसका पति और ज्यादा दिन नहीं रहेगा इसीलिए उस दिन …..” इस ख़याल से ही उसका कलेजा काँप उठा था |
काफी देर तक चुप्पी धरे वह बैठी रही | भूख भी लगने लगी थी, आज देरी होने के कारण कुछ पका भी तो न पायी नाश्ते के लिए | मन रुआँसा तो पहले ही था अब भारी भी हो गया था | तभी डॉक्टर राउंड पर आये और आय सी यू के अन्दर चले गए | करीब एक घंटे बाद डॉक्टर  वापिस बाहर आये और उसे देख कर मुस्कुराए  “ आप के पति को डिस्चार्ज करने का समय आ गया है | पहले से काफी रिकवर हो चुके हैं | अब आवाज पहचान जाते हैं | अपने आप खाना निगलने लगे हैं, नली  की आवशयकता नहीं |  बाकी सुधार धीरे-धीरे आयेगा | एक हफ्ते के बाद उन्हें डिस्चार्ज कर देंगे फिर आपको घर ले जा कर उनका खूब ख़याल रखना पड़ेगा | बाकी दवाइयाँ लिख  देंगे, उन्हें समय-समय पर देते रहिएगा |” पुनः मुस्कुरा कर डॉक्टर ने अपनी बात समाप्त की | 
डॉक्टर की मुस्कराहट के साथ-साथ उसके होठ भी मुस्कुरा उठे थे | कुछ देर वहीं बैंच पर बैठी मुस्कुराती रही | किसी ने पूछा “क्या बताया डॉक्टर ने बहुत प्रसन्न नजर आ रही हो ?” 
“जी मेरे पति के स्वास्थ्य में सुधार है और अगले हफ्ते उन्हें डिस्चार्ज कर दिया जाएगा |”
“यह तो सचमुच खुशी की बात है, खुश किस्मत हो तुम और तुम्हारा पति वरना यहाँ आते तो बहुत से मरीज हैं किन्तु स्वस्थ हो कर जाने में समय लगता है और कुछ लोग तो ……” इतना कह उन्होंने बात को वहीं विराम दे दिया था | 
आस-पास बैठे लोग उसे बधाई देने लगे थे और एक बार को वहाँ खुशी ने अपने पैर पसार लिए थे | सुबह से बगैर खाए बैठी थी सो अब उसे तेज भूख सताने लगी थी |  वह खाने के लिए बाहर गयी तो मन ही मन सोचा कि यहाँ पास ही में मनीष मार्केट भी है क्यों न वहाँ हो आऊँ, बहुत नाम सुना है इस बाजार का | कम दाम में अच्छी  चीजें आराम से मिल जाती हैं वहाँ | अब बस एक हफ्ते ही तो अस्पताल आना है | उसके बाद तो उसे घर में ही कैद होना होगा पति की देखभाल के लिए |  
उसने अपने कदम सामने की मुख्य सड़क पर बढ़ा लिए थे | “भैया मनीष मार्केट का रास्ता इधर से ही जाता है ?” 
“जी यहीं से लेफ्ट मारने का” एक राहगीर ने इशारे से बताया | 
तेज कदमों के साथ वह मनीष मार्केट की छोटी-छोटी दुकानों की और बढ़ गयी थी | क्या नहीं था वहाँ ? परफ्यूम से लेकर घड़ियाँ, चप्पल-जूते, साबुनें , इन्नरवेर्स उसकी आँखें मानो चुंधिया गयी थीं | “सही कहते थे पड़ौसी, यहाँ सब कुछ मिलता है | जो चाहिए वह और जो नहीं चाहिए वह भी आप खरीद ही लेंगे |” एक शॉपिंग बैग खरीदा और उसमें अपनी पूरी खरीदी भर कर वह उन तंग-संकरी गलियों से निकल कर  रिक्शा के लिए सड़क  पर आ खड़ी हुई |  धूप तेज थी सो उसने दुपट्टा सर पर रख लिया और आँखों को छोटा कर सड़क के उस पार देखने लगी | “बनवारी पान वाला” उस छोटी सी गुमटी नुमा दुकान पर उसकी नजरें टिक गयीं और कदम भी उस ओर बढ़ गए | हाथ में जो वजनदार शौपिंग बैग था वह उसे हल्का महसूस हो रहा था | दुकान के सामने पहुँच कर वह खुश हो कर मुस्कुराई “एक चूना-कत्था मीठा पान बना दीजिये”
पान वाले ने उसका हुलिया जाँचने हेतु ऊपर से नीचे मुआयना किया  और दो मिनट में पान तैयार कर उसे थमा दिया | मुंह में लगभग ठूंसते हुए उसने पान को चबाना शुरू किया | मन ही मन सोच रही थी “यदि उसका पति  उसे पान खाते देख ले तो जमीन-आसमाँ एक कर देगा” बस सात दिन ही तो बचे हैं फिर घर  में कैद होना है | भैय्या एक पान और दे दो पैक करके उसने मुंह में दबे पान का रस हलक  में उतारते हुए कहा | मन ही मन सोचा “आज शाम को भुट्टा नहीं खाऊँगी यह पान ही खा लूँगी लौटते वक़्त, न जाने यह अवसर फिर कब मिले |”  
“एक हफ्ते यही रूटीन रखूँगी, जी भर के जी लेना चाहती हूँ जिन्दगी …न जाने कल क्या हो”  द्रुतगति से गंतव्य की ओर बढ़ती लोकल में बैठी वह मुस्कुरा रही थी |
अगले  दिन वह लिबर्टी पर खाना खा कर फिर बनवारी पान वाले की गुमटी की ओर तेजी से बढ़ गयी थी | 
रोचिका अरुण शर्मा 
Email Id- [email protected]
संक्षिप्त परिचय 
रोचिका अरुण शर्मा, इंजिनीयरिंग बैक ग्राउंड से हैं एवं गत ग्यारह  वर्षों से हिंदी में निरंतर लेखन कर रही हैं | आपके चार प्रौढ़ कहानी संग्रह  एवं तीन बाल कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं | बाल साहित्य हेतु राजस्थान साहित्य अकादमी द्वारा  “शम्भु दयाल सक्सेना सम्मान” , म,प्र. साहित्य अकादमी द्वारा गजानन माधव मुक्तिबोध (कहानी) पुरस्कार , महाराष्ट्र हिंदी साहित्य अकादमी द्वारा सोहन लाल द्विवेदी बाल साहित्य पुरस्कार समेत अन्य संस्थाओं द्वारा भी विभिन्न प्रतियोगिताओं में पुस्तकें एवं कहानियाँ  पुरस्कृत | डायमंड पब्लिकेशन से प्रकाशित “तमिलनाडु की नारीमन की कहानियाँ” एवं “तमिलनाडु की  बालमन की कहानियाँ” संकलन का सम्पादन भी किया है | बच्चों के लिए लिखी रचनाएँ  पाठ्यक्रम में शामिल | रचनात्मक लेखन हेतु कार्यशालाएँ, मंच सञ्चालन, आकाशवाणी से रचनाओं का प्रसारण | 


रोचिका अरुण शर्मा
रोचिका अरुण शर्मा
कविताएँ, आलेख, कहानी, दोहे, बाल कविताएँ एवं कहानियाँ देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित | 'जो रंग दे वो रंगरेज' कहानी-संग्रह प्रकाशित | चार साझा कहानी-संग्रहों में भी कहानियाँ शामिल | गांधी हिन्दुस्तानी साहित्य सभा एवं विष्णु प्रभाकर प्रतिष्ठान, दिल्ली द्वारा “काका कालेलकर सम्मान वर्ष २०१६ सहित अनेक सम्मान प्राप्त । सम्प्रति - डाइरेक्टर सुपर गॅन ट्रेडर अकॅडमी प्राइवेट लिमिटेड | संपर्क - [email protected]
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2 टिप्पणी

  1. रोचिका जी!
    आपकी कहानी *चूना- कत्था मीठा पान* पढ़ी। शीर्षक काफी रोचक लगा।
    कहानी पढ़ कर समझ आया कि समय व स्थितियाँ सब कुछ सिखा देती हैं।
    शादी के बाद पहली बार मुंबई शहर में,लोकल ट्रेन, में अपनी पति को देखने के लिए रोज आना-करते हुए उसे काफी कुछ अनुभव हो गया था ।अस्पताल में आई सी यू के बाहर ,सारे दिन बैठे रहकर उसने जिंदगी के कई नए अनुभव पाए। किडनी ट्रांसप्लांट वाले मरीज की पत्नी से जब उसकी बात होती है तब उसे एक नए तरह का अनुभव होता है।
    किस तरह परिवार के किसी मुखिया की,पति की लंबी व असाध्य बीमारी के कारण परिवार परेशान होता है,सड़क पर आ जाता है। और जब उम्मीद की कोई किरण नजर ही नहीं आती तो कामना करती है कि जो होना है वह एक बार में हो जाए।
    फिर चाहे वह पति ही क्यों ना हो।
    उसके अंदर मंथन शुरू हो जाता है।
    उसके पति उसे कभी कहीं घुमाने नहीं लेकर गए थे। तीन सालों में वह घर में ही रही। बाहर जाने के नाम पर कई बहाने थे ।वह अपने मन का कुछ भी नहीं कर सकती थी। उसे वह समय भी याद आता है जब अपने पति के मित्र के कार्यक्रम में उसने पान खाया था तो उनके पति ने उसे कितनी बुरी तरह से डांटा था, बेइज्जत किया था और उस समय उनके द्वारा कहे गए शब्द उसके दिल को चीर गए थे।क्या पान सिर्फ वैश्या ही खाती हैं?
    जब पता चलता है कि एक हफ्ते बाद पति की छुट्टी हो जाएगी तो मार्केट जाकर पान खरीदती है ‘चूना- कत्था मीठा पान” कहते हुए और घर के लिए भी बंधवा लेती है यह कहते हुए कि-
    *“एक हफ्ते यही रूटीन रखूँगी, जी भर के जी लेना चाहती हूँ जिन्दगी …न जाने कल क्या हो”* |
    वह जानती थी कि पति के आने के बाद फिर न जाने क्या स्थिति बने।
    कुछ पुरुषों की बहुत ही घटिया मानसिकता होती है। वे स्त्रियों को अपनी इच्छाओं पर जीने के लिए मजबूर करते हैं। और जब वक्त उन्हें थोड़ी देर की भी आजादी देता है तो वे भी अपने जीवन को अपनी नजर से पूरा जीने का प्रयास करती हैं।
    कहानी पढ़ने में जितनी साधारण लगती है वास्तव में इतनी साधारण है नहीं। दुनिया चाँद पर भले ही पहुँच गई हो लेकिन पुरुषों की मानसिकता स्त्रियों को लेकर सहजता से बदलती नहीं।
    बेहतरीन कहानी के लिये रोचिका जी को बधाई।

  2. रोचिका अरुण शर्मा की चूना कथ्था-मीठा पान बहुत सुंदर मर्मस्पर्शी कहानी है। बधाई

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