1 – मुँडेर
बचपन से अब तक छत की
वह मुंडेर मुझे याद आती है।
मुंडेर मेरी छत की है या
तेरी यादों के साये की है
आज तक मैं समझ ना पाया
मुंडेर से कभी तुम्हें कभी क्यारियों में पानी देते
पंछियों को दाना डालते
बकरी के बच्चे को दुलारते
सूप में गेहूँ फटकारते
आंगन को लीपते
गोबर के कंडे थापते
सूर्य को अर्ध्य देते
गीतों को गुनगुनाते
चुपचाप मैं देखा करता था।
तब लगता था मानो
सब कुछ पा लिया हो
गाँव से पलायन के बाद
शहर की ऊंची इमारतों के बीच
जैसे मेरी छत की मुंडेर
कहीं खो सी गई है
मैं इस शहर मे अजनबियों के बीच
तुम्हारी यादों का पन्ना
जो कभी मुंडेर पर
अपने मन के पृष्ठ पर लिखा था
आज तक भुला नहीं पाया हूँ
काश!बचपन से जवानी की वो मुंडेर
फिर से अपने आंगन में दोहराओ
मैं अपनी मुंडेर से उसी मंजर को
पुन: महसूस कर सकूं…
2 – खजुराहो
प्रस्तर पर उकेरी प्रतिमायें भारतीय शिल्प की पताकायें
नर-नारी के अन्तरंग प्रेम-सम्बन्धों की शाश्वत कथायें
चन्देलकालीन शिल्पकारों की कला का है गौरवगान
राष्ट्रसंघ विरासत सूची में शामिल हो, रखा देश का मान
पाषाण में जीवंत मिथुन देव की अनंत मूक प्रतिमायें
मानव धर्म के आध्यात्मिक रहस्य को अपने में समाये
आनन्द ही नहीं है चरम लक्ष्य संदेश देती देव प्रतिमायें
पशु पक्षियों की आकृतियाँ, प्रकृति से सम्बन्ध निभायें
ईश्वर की आराधना ही जन्म-मरण के चक्र से बचायें
आत्म कल्याण की भावना काम-भाव से मुक्त कराये
खजुराहो की यश पताका, दिगदिगन्त तक फहराये
जग में अमर रहे कलाकारों की कृतियों की गाथायें


दोनों ही कविताएं अच्छी है आपकी। बधाई आपको।