Saturday, April 18, 2026
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पारुल सिंह कविताएँ  

1

मेरी प्यारी सौतन,

मैं तुम्हारा पति लौटाना चाहती हूँ

ये अब पति की तरह बिहेव करने लगा है।

ये रेड पर्पल और ब्लू पर्पल मे फर्क़ जानता था

अब ये हरे रंग को भी मेहरून कहने लगा है

डार्लिंग कहूँ तो हुँ कहता है, जान कहूँ तो लुक देता है

ऊपर से बातें भी शुरू सम्बोधन रहित करने लगा है

मेरी प्यारी सौतन,

मैं तुम्हारा पति लौटाना चाहती हूँ

ये अब पति की तरह बिहेव करने लगा है।

2

तुम्हारे प्यार में आकंठ डूबी स्त्री ने कभी बढ़ कर

तुम्हारे हाथ को चूम लिया हो,

कभी छोड़ कर जाते हुए पीछे से तुम्हें बाहों में भींच कर

अभी ना जाओ का इसरार किया हो।

तो ये जीवन तुम्हारे लिए पूर्ण है।

पुरुषोचित व्यवहार समझ कर

जो नीरस, और सूखा जीवन,

तुम बिता कर जाने वाले हो

उसे पूरा करने तुम्हें फिर आना होगा।

संसार में जीत हार की दौड़ में

पुरुषों ने जो कमाया वो उनका दम्भ था।

किसी फूल की नाज़ुकी को तुमने महसूस किया है

तो तुमने अपनी जीत से बड़ा अहसास जी लिया।

किसी नदी के ठंडे पानी को सहलाने दिए हों,

अपने नंगे पैरों के तलवे,

किसी स्त्री को गीला करने दिए हो अपने होठों से उसके होठ

तो वो इस दुनिया की उन सब ठंड़को से ठंडी ठंडक है।

जो पुरुषों ने किसी से बदला लेने पर

अपने सीने में महसूस की हो।

पुरूष होकर वो सब जो तुमने

नही कहा किसी स्त्री से,

वो सब जो तुम नहीं सुन पाए किसी स्त्री से,

वो प्यार भरे शब्द ही

चारों दिशाओं में शताब्दियों तक जीवंत रहने वाले हैं,

अहंकारी तलवारों की टन्कारें

आकाशगंगा नहीं सहेजती मित्र………..

3

ख़ुद को ही बैठा कर पलकों पर

ख़ुद से ही पूछा करते हैं..

“आप थक गयी होंगी

मैं आपके लिए क्या कर सकता हूँ ?”

एक काल्पनिक प्रेमी

हर उम्र के लिए जायज़ है

वरना कोई शायर

क्यूँ यूँ ही लिख जाता..

“….. सिर्फ़ सेहत के सहारे ज़िंदगी कटती नहीं”

4

जंगली लड़की

बहुत बेपरवाही से

खोंस लेती है जंगली फूल

बिखरे बालों में।

चल पड़ती है,

नंगे पाँव

टेढ़ी मेढ़ी पगडंडी पर

लापरवाह

 

 

 

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