Monday, May 25, 2026
होमकहानीसीमा असीम सक्सेना की कहानी - पुंजी

सीमा असीम सक्सेना की कहानी – पुंजी

दरवाजे पर खट-खट की आवाज सुनकर मेरी ऊॅघती हुई आंखो पर बिखरे हुए ख्वाब टूट गये और मैं हड़बड़ा कर दरवाजा खोलने दौड़ी। उफ, यह दरवाजा भी कितना दुखदायी है, नींद तो कभी पूरी ही नहीं करने देता। रात भर मुन्ना जगाता है और सुबह से यह दरवाजे की खटखट। जिन्दगी तो इसी सब के बीच झूल रही है। दरवाजा खोला तो देखा कि बाहर पुंजी खड़ी थी, मैंने उसे घूरते हुए देखा तो वह मुझे अनदेखा कर, हल्की सी स्माइल करते हुए साइड से निकल गयी। 
मेरी झल्लाहट का उस पर नाम मात्र का भी असर न पड़ा। उसे तो आना है और वह यूँ ही आती रहेगी। उसकी आंखे बंद होने से खुलने भर तक ही शान्ति रहती है, अन्यथा हर दस मिनट में वह यहां आ टपकती है। वैसे भी घर का मेन दरवाजा सुबह साढ़े पांच बजे जो खुलता है, तो रात को दस बजे से पहले बन्द ही नहीं होता, अरे सवाल ही नही उठता जी कि पल भर को भी बंद हो जाये ।  
कभी दिन में सोने का मन करे, तो पहले कुंडी लगानी पड़ती पर दरवाजा बन्द करते ही खटकने लगता और सारी नींद चौपट हो जाती । आज भी बहुत नींद आ रही थी। मुन्ना सो रहा था। मैं भी लेटी हुई थी। पलकंे भारी हो रही थी और शरीर ढ़ीला पढ़ रहा था। 
गर्मियों की लू चलने वाले दिनों में बिना कुंडी बन्द किये नहीं रखा जा सकता था, क्योंकि जैसे ही दरवाजा खुलता, लू अपना कमाल दिखाने लगती। 
दरवाजे धाड़ धाड़ करके खुलते बन्द होते। कुंडी लगाकर जैसे ही बैठती, कि दरवाजे पर खटखट होने लगती और नीचे वाले पोर्शन में रहने के कारण दरवाजे को खोलने और बंद करने की जिम्मेदारी मेरी ही रहती थी। सारे काम छोड़ कर दरवाजा खोलने को दौड़ना पड़ता था। इस कारण अक्सर उसकी नींद पूरी नहीं हो पाती थी। 
ऊपर मकान मालकिन अपने परिवार के साथ रहती थीं। नीचे वाले दो कमरे किराये पर उठाकर बाकी में अपना सामान भरकर ताले डले हुए थे। ऊपर कई लोग रहते थे। मतलब दो भाई जिनके बीवी बच्चे, अम्मा जी, दो बहनें सब साथ ही रहते थे। इसलिए कभी कोई आता, तो कभी कोई जाता, इसलिए दरवाजा बंद करते ही खटकने लगता था। जब भी कोई आता, वह दरवाजे को यूॅं ही खुला छोड़ कर चला जाता।  
उफ! यह दरवाजा न हुआ जान की मुसीबत हो गया। सबसे ज्यादा तो इस काम वाली की बेटी पुंजी ने तो दुःखी कर रखा है, न खुद चैन से बैठती है, न मुझे बैठने देती है। 
पुंजी के पिता मेहनत मजदूरी करते थे, वे सुबह ही निकल जाते थे और मॉं एक स्कूल में आयागीरी का काम करती थीं, वह भी ऊपर अम्मा जी का काम करके चली जाती, पुंजी अकेली बेटी थी उन दोनों की।  
पुंजी को ऊपर अम्मा जी के पास छोड़ जाती थी। वह उनके छोटे मोटे काम करती रहती । 
वैसे वह घर बाहर दोनों ही जगह के काम करती रहती दिन भर, पल में बाहर जाती, फिर ऊपर आती, फिर अपने घर जाती और फिर दौड़ के ऊपर पहुॅच जाती अम्मा जी के पास। ऊपर जितने भी काम होते। उनमें से अधिकतर कामों के लिए उसे ही आवाज दी जाती और वह फुदकती हुई उन सब कामों को चुटकियों में निपटा देती। अभी उसकी उम्र ही क्या है। ज्यादा से ज्यादा 12 या 13 साल ही रही होगी, फिर भी उसके काम बड़ी तल्लीनता और लगन के साथ होते। ये देखकर लगता ही नहीं किसी बच्ची ने यह सब काम किये हैं। 
स्कूल कभी जाती ही नही। हर साल स्कूल में नाम लिखाया जाता, किताबें, कापी,नया पेंसिल बाक्स नया बैग सब कुछ दिलाया जाता फिर वह एक दो दिन स्कूल जाती, उसके बाद उसका मन ही नही करता। उसका मन तो घर के कामों में लगता और ऊपर नीचे के चक्कर लगाने में लगता था।  सुबह की चाय से लेकर, दोपहर का खाना, और कभी कभार रात का खाना भी ऊपर ही खाती।
ऊपर सब लोगों को उससे जितना आराम था, मुझे उतनी ही उससे परेशानी। पर मैं क्या कर सकती थी। किरायेदार थी, झेलना ही था। 
अब कहॉं तक रोज-रोज मकान ढूॅंढ़ने के चक्कर में पड़ो फिर अच्छे मकान जल्दी मिलते भी कहॉं हैं। यहॉं इस दरवाजे की टेंशन छोड़कर बाकी तो सब आराम ही है। अच्छी लोकेशन है। सैपरेट पोर्शन है और जरूरत पड़ने पर ऊपर सब लोग मदद करने में भी पीछे नहीं हटते। 
फिर मुन्ना भी अभी छोटा है। उसे लेकर कहॉं भटकेंगे मकान देखने को, जानते हुए भी, इनके ऑफिस से आते ही कान खाने शुरू कर देती। दिन भर कितनी बार दरवाजा बन्द किया, कितनी बार खोला, सब बताती। 
नीद पूरी न होने का दुखड़ा तो सबसे पहले रोती। 
आज भी दिन में सोने को नही मिला और यह पुंजी इसने तो खास तौर से जीना हराम कर दिया है। न जाने कितनी ताकत है, इस जरा सी लड़की के  पैरों में सुबह से रात तक करीबन 50 चक्कर जीने के लगा ही लेती होगी, फिर भी कभी उसके चेहरे से थकान नही झलकती। 
मैं कहती रहती, पर इनके कानों पर जूं तक न रेंगती। इन्हें कुछ भी  फर्क न पड़ता, न ही वे प्रतिक्रिया स्वरूप कुछ कहते। एक कान से सुनते और एक कान से निकाल देते। चाय पीने के बाद सोफे पर लेट जाते थे। वे भी क्या करते और कब तक मेरी गाथा सुनते। मेरी परेशानी समझते तो थे, परन्तु इनके पास कोई उपाय भी तो नही था। 
हम दोनों ही अभी मकान बदलने से रहे, क्योंकि मुन्ना अभी बहुत छोटा है उसके साथ मकान बदलना काफी मुश्किलों भरा काम होता है। रोजमर्रा के जरूरी काम ही बड़ी मुश्किल से निबटाये जाते थे, क्योंकि एक लोग उसे पकड़ने के लिए सभालने के लिए तो होना ही चाहिए।
यह रोज मेरे किये नाटक को मेरी आदत समझकर सुनते क्यांेकि वे अभी सिर्फ किराये पर ही मकान लेने की पोजीशन में ही थे। इतनी तो महॅंगाई है, फिर बच्चे को पालने का खर्चा कम नही होता, दूध का,दवाई का। रोज क्या, आये दिन तो उसे बीमारी लग जाती। 
स्वयं का मकान खरीदने लायक इतने रु0 तो अभी हैं नहीं, केवल अपनी नौकरी का ही भरोसा है। परिवार से मदद की तो कोई उम्मीद नहीं, बल्कि उनके लिए ही करना पड़ता है। 
पति का परिवार गॉंव में है। वहॉं बस मैं होली, दिवाली भी बड़े बेमन से जाती थी। गॉंव का माहौल मुझे कतई पसन्द नहीं था। पता नहीं आखिर मैं स्वयं व अन्य सबसे क्या उम्मीदंे पाले हुए थी। मेरे झींकने खीजने का कोई भी असर न तो इन पर होता और न ही रा पुंजी पर। 
वह तो यूॅं ही हर समय अपना आना जाना जारी रखती। जब आती तो मेरी गोद में अगर मुन्ना होता तो एक नजर उस पर जरूर डालती थी। शायद उसका मन, उस को गोद में खिलाने का करता था, पर मेरी घूरती ऑंखों को देखकर वह चुपचाप ऊपर चली जाती और मुन्ने को गोद में लेकर प्यार भी न कर पाती। 
एक बार पति को ऑफिस के किसी काम से दो दिन के लिए कानपुर के टूर पर जाना पड़ा। आज तक कभी रात को अकेले रहने का मौका न पड़ा था। इस घर में तो पहली ही बार रूकना पड़ रहा था। अतः मैंने ऊपर वाली अम्मा जी से कहा कि, ‘‘आज आप मेरे पास सो जायें, मुझे अकेले डर लगता है।’’ 
वे बोलीं, ‘‘बेटी डरने की क्या बात है? हम सब तो ऊपर हैं ही, जरूरत पड़ने पर आवाज लगा लेना। वैसे मैं तो आ जाती किन्तु मुझे कहीं दूसरी जगह नींद नहीं आती।’’ 
‘‘ठीक है, कोई बात नहंीं, मैं आवाज दे दूॅंगी, वैसे शायद इसकी जरूरत न पड़े।’’ 
आज मुझे अपने और पराये का अर्थ पता चल गया था। अगर उनकी अपनी बहू व नाती होता तो क्या वे ऐसे ही करतीं।
वह यूॅं मना कर देती या फिर बच्चे के साथ अकेला छोड़ देती। 
आज मुझे अपनी सासू मॉं की आज बहुत याद आ रही थी, कि कैसे मुन्ने को कलेजे से लगाये रखती थीं। एक पल को भी नजरों से दूर या अकेला न रहने देती थी। मैं जब यहॉ आ रही थी, तो फूट-फूट कर रो पड़ी थीं और कहा बहू मुन्ने का ध्यान रखना। सुबह जल्दी लल्ला के सामने ही सब काम निबटा लिया करना, फिर शाम को लल्ला के आने पर ही मुन्ने को उसके पास छोड़कर अपने कार्य करना। 
दिन भर तुम उसके साथ ही रहना। मैं उनकी बात को गॉठ में बॉध लाई थी और वैसा ही करती भी थी, पर अब तो दो दिन इनको बाहर जाना है। हम लोगों ने यह घर भी यही देखकर किराये पर लिया था, कि भरी पूरी फैमिली है। कभी जरूरत पड़ी तो अवश्य साथ देंगे, पर यह शहर है यहॉं कोई किसी का अपना नहीं होता। अगर गांॅव में किसी एक ने आवाज दी तो पूरा का पूरा गॉव ही इकटठा हो जाता था। 
खैर! पति को तो जाना ही था सरकारी काम था मना भी तो नही कर सकते। सो मैंने दिल पक्का कर लिया, जो भी होगा देखा जायेगा। फिर सरकारी काम से मुंॅह  फेरने का मतलब सौ तरह की मुसीबतांे को दावत देने के समान था। 
यह चले गये। मैने रात को दरवाजा बन्द किया और सोने को आ गई कमरे का दरवाजा भी दो बार उठके देख लिया, कि सिटकनी ठीक से लग गई है या नही। 
मैंने मुन्ने को ठोंक-ठोंक कर सुला दिया, पर मुझे तो नींद ही नहीं आ रही थी। न जाने कहां गायब हो गई थी। वैसे तो ऑखें नींद से बोझिल रहती थी। जैसे ही मुन्ने को सुलाया और मुझे निद्रा देवी ने मुझे आ घेरा। पर आज तो 12 बज गये, और नींद मुझसे कोसों दूर थी। 
सब ओर शान्ति छा गई थी, कि तभी अचानक से मुन्ना चौंक कर जाग गया और उसने रोना शुरू कर दिया। मैं जितना उसे सुलाने की कोशिश करती, वह और जोर से चीखता। 
मैं घबरा गई, कि अचानक से इसे क्या हो गया। अच्छा खासा सो रहा था। वह चीख रहा था और मैं भी उसके साथ हैरान, परेशान हो रही थी, कि अब क्या करूॅगी
यह भी घर पर नहीं हैं। इतनी रात में इसे किस डॉ0 के पास और किसके साथ लेकर जाऊॅंगी, तभी दरवाजे पर खट खट की आवाज हुई मैं और भी घबरा गई, कि इतनी रात में कौन है
मैं कैसे दरवाजा खोलूॅं
इधर मुन्ना भी रो रहा था, जो चुप होने का नाम ही नहीं ले रहा था। अगर मुन्ना सो रहा होता, तो मुझे चुपचाप लेटे रहने का भी बहाना मिल जाता। मैंने कमरे का दरवाजा खोलकर बाहर झॉंका कि शायद ऊपर से ही कोई आ जाये, पर हमेशा की तरह कोई भी नहीं आया था। ना ही किसी ने हॉं ना का जवाब दिया, फिर खट-खट की आवाज के साथ किसी ने कहा
‘‘दरवाजा खोलो भाभी, मैं पुंजी ।’’ 
अरे! इस पुंजी को इतनी रात को भी चैन नहीं। दिन भर तो चैन लेने नहीं देती, अब इतनी रात गये भी आ गयी। आज तो मैं अकेली हूँ । पता नहीं कैसे आयी है। मेरा मन बुरी बुरी भावनाओं से भर गया। 
इधर मुन्ने की रोने-चीखने की आवाजें और उधर दरवाजे पर पुंजी की खटखट। मैं क्या करुं? इसी सोच में थी, कि उस ने बाहर से कहा, ‘‘भाभी दरवाजा तो खोलो, मैं मम्मी को लेकर आयी हूँ। मुन्ना क्यों रो रहा है?’’ 
आज उसने पहली बार भाभी कहकर आवाज दी थी। मैंने दरवाजा खोल दिया। पुंजी और उसकी मॉं बाहर खड़ी थी। दरवाजा खुलते ही वे सीधे अन्दर आ गई। आते ही उन्होंने मुन्ने को गोद में लिया और पूछने लगीं, ‘‘क्या अचानक ही रोने लगा
मैंने कहा, ‘‘हॉं यह सोते से एकदम जग गया और रोने लगा। ’’ 
वह बोली, ‘‘तुम परेशान मत होओ। इसके पेट में गैस भर गयी है। इसलिए यह रो रहा है, अभी ठीक हो जायेगा।’’ 
उसने मुन्ने के पेट पर नारियल का तेल, पानी और हींग मिलाकर मालिश की, व थोड़े से पानी मे अजवाइन खौला कर, वह गुनगुना-गुनगुना पानी एक चम्मच पिला दिया। अब तो मुन्ना एकदम से शान्त हो गया और गहरी नींद में सो गया। यह सब काम पुंजी और उसकी मॉं करते रहे। मुझे तो उठने भी नही दिया। 
फिर पुंजी की मॉं ने मुझसे कहा, ‘‘बीबी जी, आप बिल्कुल भी परेशान मत होओ, पुंजी को अपने पास सुला लो कोई परेशानी होगी तो यह संभाल लेगी।’’ यह कहकर वह चली गईं। 
आज मेरे मन से पुंजी के लिए कोई कड़वाहट नहीं थी। मुझे लग रहा था। अगर आज यह न होती तो क्या होता? मैने पुंजी को बराबर में फोल्डिंग बिछाकर सुला लिया और मैं भी सुकून से सो गई। आज काफी दिनों बाद मुझे अच्छी नींद आई थी। सुबह जब ऑंख खुली तब मैनें देखा मुन्ना और पुंजी दोनों सोते हुए कितने मासूम लग रहे थे।
 फिर इनके ना होने पर पुंजी ने जिस तरह मेरा साथ दिया, उसके लिए मैं, जिन्दगी भर को उसकी एहसान मन्द हो गई और मेरा मन उसकी तरफ से बिल्कुल साफ हो गया था।
सीमा असीम सक्सेना,
बरेली 
RELATED ARTICLES

1 टिप्पणी

  1. बहुत प्यारी और मासूम सी कहानी लगी आपकी सीमा जी!
    कई बार जीवन में ऐसा होता है कि जिनसे अपन परेशानी महसूस कर बचना चाहते हैं,वही वक्त पर बहुत काम आते हैं और अपनी सोच ही बदल जाती है।
    इस प्यारी सी कहानी के लिये बहुत-बहुत बधाई आपको।

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Most Popular

Latest