घर के अंदर पैर रखा ही था कि आँगन में रखे जूठे बर्तनों का ढेर मुझे बुरी तरह चौंका गया…पीली पीली सूखी हुई दाल से सना हुआ कुकर, दूध का भगोना, चाय के दो–तीन बर्तन, तीन कढ़ाई और अनगिनत प्लेट, कटोरियों से बना वो पहाड़ मुझे अंदर तक हिला गया..इसका मतलब आज बाई फिर गोला मार गई! पैरों में अचानक दो दो किलो के पत्थर आकर बँध गए थे, आँगन से मेरे कमरे तक जाना बहुत मुश्किल लग रहा था..
“क्यों दीपक, बाई नहीं आई आज?” सोफे पर पसरकर मोबाईल गेम खेलते हुए पति से पूछा,फिर सहमकर दाएँ–बाएँ देखा..सास ने सुन लिया तो “पति को नाम लेकर नहीं बुलाना चाहिए” विषय पर दिनभर क्लास ली जाएगी,
वो शायद थीं नहीं और दीपक का जवाब भी अब तक आया नहीं था…सोफे के बगल में खड़े होकर मैंने खीजकर पूछा,
“सुन तो लिया ही होगा, क्या पूछ रही हूँ? बाई नहीं आई या देर से आएगी, कुछ बताया ? फ़ोन आया?”
दीपक ने एक नज़र फोन पर से हटाकर मुझे देखा और बेफिक्री से बोले, “उस समय हम लोग थे नहीं घर पर, मंदिर गए थे..शायद आकर लौट गई हो“
जी में आया पूरी ताकत से अपना बैग उठाकर अपने सिर पर मार लूँ…बाई का टाईम तो फिक्स है,उसके आगे–पीछे भी तो मंदिर जाया जा सकता था ना? घिसटते हुए रसोईं तक जाकर,एक गिलास पानी लिया और अपने बिस्तर पर जाकर मैं ढेर हो गई। शरीर की थकान सिर पर चढ़कर आँखों में आँसू बनकर उतरने लगी थी…हर दिन चार बजे उठना, सबका खाना बनाकर, छ बजे घर से दौड़ते–भागते निकलकर मेट्रो पकड़ना, फिर मेट्रो से उतरकर रिक्शा लेकर स्कूल पहुँचना और दिन भर खटकर घर आना..घर? आँसू गाल भिगो गए! कोई पानी तक पूछने वाला नहीं यहाँ..काहे का घर ..बस नाम का ही तो! किसी को एक पाई फिक्र नहीं कि कैसे अपने चौबीस घंटे वाले दिन को अड़तालिस घंटे में बदलकर मैं बौराई सी फिरती हूँ और इसके बदले मेरे हाथ में क्या आता है? दीपक ने बिज़नेस का सपना पूरा करने के लिए नौकरी छोड़ दी थी, पूरे घर का खर्च अकेले मेरे जिम्मे था…लेकिन घर लौटने पर एक गिलास पानी पूछने वाला मेरे लिए कोई नहीं था! माँ–बेटे अपने मनचाहे समय पर घर से निकल गए,ये भी नहीं सोचा कि काम कैसे होगा अगर बाई लौट गई? मैंने भरी आँखों से घड़ी देखी, ढाई बजे हुए थे..किसी तरह शरीर की सारी हिम्मत उठने में लगाई, रसोईं में सुबह की बची हुई दो रोटियों को सूखी–साखी सब्जी से गटककर वापस निढाल होकर लेट गई..पता ही नहीं चला ,कब आँख लगी, कब शाम भी हो गई।
“मामी..मामी.. उठिए, शाम हो गई..नानी कह रहीं शाम को नहीं सोते” ननद की दोनों बेटियाँ मेरे बगल में बैठी हुई मुझे जगा रही थीं, शरीर की थकान जा रही थी..मन हल्का होने लगा था, मैंने प्यार से पूछा,
“कितना बज गया बेटा?” उन दोनों ने घड़ी की ओर मेरा चेहरा घुमा दिया.. घड़ी में साढ़े छः बजे देखकर बड़ी तसल्ली हुई! कुछ हिसाब किताब मन को चैन दे जाते हैं, ये सोचकर ही आराम मिलता गया कि इतनी देर मैं बिना काम किए बैठी रही.. नहीं बैठी भी नहीं, लेटी रही ..सोती रही ! इसी उत्साह में काम भर के बर्तन धोए और डिनर की तैयारी में लग गई…सास अपनी नातिनों को पढ़ाते हुए हर दूसरे मिनट खीज जाती थीं और अपनी बातों से जाहिर कर देती थीं कि इस गुस्से का कारण वो बच्चियाँ नहीं, बल्कि मैं थी।
“अब हम टीचर तो हैं नहीं..जैसा आता है,पढ़ा रहे हैं“
मैं गोल गोल रोटी बनाते हुए उनकी गोल गोल बातें सुनती रही, पहले भी कितनी बार हुआ है यही सब, दीपक भी कहते और उनकी माँ भी कि मैं दोनों बच्चों को पढ़ा दिया करूँ… मैं हर बार साफ मना करती रही और हर बार उतना ही बड़ा तूफान हमारे बीच से होकर गुज़रता रहा। धीरे–धीरे वो कहना बंद हुआ तो अब नया नाटक शुरू हो रहा था, सासु माँ की तेज आवाज़ से घर गूँज गया,
“दीपक! ऐ बेटा..कोई ट्यूटर ढूँढ़ो इन दोनों के लिए..बताओ, इतनी होशियार माँ की बिटिया हैं,कित्ते कम नंबर ला रहीं पेपर में“
गर्म तवे पर मेरा हाथ छू गया या इनकी बातें सुनकर मुझे झटका लगा.. मुझे याद नहीं! दिमाग़ ख़राब होने लगा था, बहुत कम उम्र से ननद ने दोनों बच्चों को अपने भाई और माँ के पास छोड़ दिया था..”दिल्ली में अच्छे स्कूल हैं,छोटे शहरों में वही एकाध अंधों में काने राजा जैसे स्कूल होते हैं” जैसी बातें बनाकर वो मुक्त हो गई थीं, पहले तो ठीक था लेकिन भाई की गृहस्थी बसने पर तो उनको अपने बच्चों की सुध लेनी चाहिए थी कि नहीं? हालांकि बच्चों से मेरा मन जुड़ा हुआ था लेकिन उनको लेकर जब मुझसे हद से ज़्यादा उम्मीदें की जाने लगीं तो मेरा मन उचटने लगा था..ऊपर से बड़ी होती बच्चियाँ अब जासूस के किरदार में भी आने लगी थीं, कितनी बार मैंने देखा कि जब मेरी और दीपक की बहस चल रही होती थी,उस बीच किसी न किसी बहाने से दोनों कमरे के आस–पास चक्कर लगाती रहती थीं!
“सुनो यार..कोई ट्यूटर है तुम्हारी नज़र में? देखना ज़रा, माँ को चाहिए बच्चों के लिए..अब उनसे नहीं हो पाता इस एज में” दीपक ने रात को मेरे पास आते ही पहली बात यही कही, मेरा मन खिन्न होने लगा ..वो मेरे बालों से खेलते हुए मेरे चेहरे पर हाथ फिरा रहे थे, मैंने हाथ झिटककर कहा, “हो नहीं पाता तो बोलें अपनी लड़की को..ले जाएँ आकर अपने बच्चे“
मेरे चेहरे को सहलाता हुआ दीपक का हाथ अचानक रुक गया, थोड़ा तैश में आते हुए बोले,
“हर बात में चिल्लाने क्यों लगती हो? बहन के बच्चे हैं..मामा के यहाँ नहीं रह सकते? ये बात दुबारा न सुनूँ मैं..मूड ऑफ करके रख दिया“
थोड़ी देर पहले किसी फिल्मी होरो जैसा प्रणय निवेदन करता मेरा पति, इस समय मुँह फेरकर सोने की कोशिश करने लगा था..ऐसे पलों में मेरा कमरा मुझे एक बंद बक्से सा लगने लगता था, हर तरफ़ से बंद..ना रोशनी,ना हवा..बस घुटन ही घुटन …
अगले दिन फिर वही चक्की चालू थी..घर से मेट्रो स्टेशन, वहाँ से मेरे स्टॉप पर उतरना, फिर रिक्शा करके स्कूल..कभी कभी मुझे लगता कि इस पूरे शहर में इसके अलावा भी कोई रास्ता है क्या? उधर स्कूल में भी एक नया बवाल सिर उठाए खड़ा था, पूरे स्टाफ में कुछ ही गिने चुने लोगों ने अब तक हार्ड स्टेशन पोस्टिंग के लिए एप्लाई नहीं किया था, जिनमें से एक मैं भी थी। हर साल इस झमेले से किसी तरह बचते बचाते मैं एक साल के लिए निश्चिन्त हो जाती थी, लेकिन अगले साल वो सवाल फिर मुँह उठाए चला आता था, जैसे आज मेरे सामने खड़ा था! प्रिंसिपल मैम पूछ भी रही थीं और समझा भी रही थीं,
“आपको एक बार तो हार्ड स्टेशन ट्रांसफर लेना ही है, अभी ले लीजिए..फिर बच्चे की ज़िम्मेदारी आगे आ जाएगी तो और मुश्किल होगा“
मैंने “यस मैम” कहते हुए फॉर्म अपने बैग में रख तो लिया, लेकिन अपने मन की हालत मुझे पता थी। हार्ड स्टेशन के नाम से ही हालत खराब होने लगती थी, देश के किसी दूर–दराज़ इलाके में पटक दिया जाएगा, फिर होगा क्या मेरा? मैम की कही दूसरी बात भी दिमाग में खलबली मचाई हुए थी..सही तो कह रही थीं वो, कल को हम दो से तीन होंगे..ऐसे समय में ट्रांसफर हुआ तो बच्चे के साथ हार्ड स्टेशन पोस्टिंग और मुश्किल में डाल देगी। एकसाथ बहुत सी बातें मुझे एकसाथ मथ रही थीं, घर आई तो देखा पड़ोसियों का जमघट लगा हुआ था..सासुमाँ की तीन–चार बातूनी सहेलियों को देखकर एक सेकंड भी वहाँ रुकने की इच्छा नहीं हुई..बस एक झटके में “नमस्ते आंटी” बोलकर मैं अपने कमरे की ओर बढ़ आई, दीपक अपने बिज़नेस के सिलसिले में किसी से बात कर रहे थे। मैंने पाँच मिनट रुककर इंतज़ार किया,फिर रसोईं में आकर चाय का भगोना आँच पर रख दिया.. स्कूल में मैम की कही बातें, कमरे से आती दीपक की बातें और बैठक से आती मुहल्ले भर की बातें, सब मिलजुल कर कूड़े जैसी इकट्ठे होने लगी थीं, अचानक एक आवाज़ सुनकर मेरे कान चौकन्ने हो गए!
“आप लोगों ने रुपइया पइसा तो कुछ लिया नहीं था खास दीपक की शादी में, क्यों बहनजी ,ऐसे ही कर दी थी ना?”
पड़ोस की आंटी मेरी सास के घाव कुरेदने में लग गई थीं, रसोई में मेरी उपस्थिति से अनजान मेरी सास, गर्वित होकर अपनी महानता के राग अलापने लगी थीं,
“कोई रुपया पैसा नहीं..वही जो बारात का स्वागत हुआ,सो हुआ..हमने भी सोचा, उनके तीन तीन बेटियाँ हैं, एक को हम अपनी बहू बना लें..उद्धार कर दें“
उनके इतना कहते ही सारी औरतें,”बड़ा पुण्य कमाया बहनजी आपने” कहते हुए नतमस्तक होने लगी थीं और मैं रसोई में जड़ हो गई थी! मतलब मुझे अपने बेटे के लिए पसंद करके इन्होंने एहसान किया था मेरे और मेरे घरवालों पर? इनके बेटे के लिए कौन सी लंबी लाइन लगी थी रिश्तों की? हम दोनों की ही अपनी अपनी समस्याएँ थीं, सामंजस्य बिठाकर रिश्ता तय कर दिया गया था…”उद्धार“, बड़ी देर तक ये शब्द मेरे कानों में गूँजता रहा। बैठक में सबको चाय देकर, दो कप चाय अपने कमरे में लेकर लौटी तो दीपक टीवी खोले हुए मैच देखने में लगे हुए थे,एक डिमांड उछली,
“खाली चाय? भुजिया का डिब्बा ले आओ यार“
मैं बिना जवाब दिए चाय के घूँट भरती रही…वो बात मन में छेद करती जा रही थी,ऊपर से दीपक का ये रवैया! ना तो स्कूल के बारे में कुछ पूछना, ना एक बार झूठे ही ये कह देना कि “थक गई होगी“, बस बैल की तरह कोल्हू में फँसे घूमते रहो..थकते रहो..
“भुजिया ले आओ यार..एकाध छोटी प्याज़ काट लाना उसमें,नींबू भी“
दीपक ने फिर अपनी बात दुहराई, पता नहीं मुझे अचानक क्या हुआ …पूरी ताकत से चाय का कप मैंने फर्श पर पटक दिया! इससे पहले मैंने आज तक इस तरह गुस्सा नहीं दिखाया था,दीपक सन्न रह गए थे। अपनी मुट्ठियाँ भींचते हुए मैंने बैठक वाली बात यहाँ दुहराई और सवाल दाग दिया,
“तुम लोगों ने ये रिश्ता जोड़कर उद्धार किया है मेरा?”
दीपक बिना कुछ बोले, भुनभुनाते हुए कमरे से उठकर बाहर चले गए थे.. मुझे पता था,वो माँ से कुछ नहीं कहेंगे। बाद में भी मुझसे यही कहेंगे कि “तुम हर बात पे बवाल मत मचाया करो“
उस शाम अबोला छिड़ा रहा! ना मैंने कोई बात की,ना दीपक मुझे मनाने आए..मन खट्टा था,थोड़ा और खट्टा होता चला गया। रात को कमरे में जैसे ही मैं घुसी, चौंक गई… दीपक कोई गाना गुनगुनाते हुए आँख मूंदकर लेटे हुए थे,ना टीवी चल रहा था ,ना मोबाइल पर गेम में स्कोर बढ़ाया जा रहा था…
“इधर आओ..मेरे पास बैठो“
मुझे अपने पास बुलाते हुए उन्होंने बिस्तर पर हाथ रखा, मैं चुपचाप वहाँ जाकर बैठ गई..दीपक उठकर बैठे और हाथ बढ़ाकर मेरा सिर अपने कंधे पर टिका लिया, मेरे मना करने के बावजूद मेरा सिर दबाते रहे..फिर डाँटते हुए बोले, “कितने रूखे बाल रखती हो! कब से तेल नहीं लगाया? जाओ लेकर आओ, रुको.. मैं लेकर आता हूँ“
मुझे ऐसा लग रहा था जैसे कोई सपना चल रहा हो और अगले किसी भी पल मुझे झिंझोड़कर जगा दिया जाएगा.. लेकिन वो पल आने की बजाय, दीपक तेल की शीशी लेकर आ गए थे और धीरे–धीरे, मेरे बालों की जड़ों को छूते हुए तेल की बूंदें मुझे तृप्त करने लगी थीं..आँसू तो जैसे बाहर आने को उतावले ही बैठे रहते हों, इन पलों में भी बिन बुलाए चले आए थे और मेरा चेहरा भिगोने लगे थे,
“बस करिए..लग गया“
मैंने दीपक का हाथ थाम लिया, वो हाथ छुड़ाकर सिर को धीरे–धीरे दबाने लगे, “मम्मी की बातों का बुरा मत माना करो यार..वो कुछ भी कहती हैं, मैं हूँ ना तुम्हारे लिए..हम हैं ना साथ,हैं कि नहीं?”
मैं धीमे धीमे सिर हिलाती हुई अपने ख्वाबों की दुनिया में सैर कर रही थी, वो दुनिया जहाँ मैंने अपने ट्रांसफर वाला फॉर्म चिंदी चिंदी करके हवा में उड़ा दिया था, ननद के बच्चों को भी यहाँ रखने से मुझे कोई शिकायत नहीं थी, सास भी मुझे भली लग रही थीं…मेरा साथी मेरे पास है, मुझे समझ रहा है, इससे ज़्यादा मुझे कुछ नहीं चाहिए..
अगली सुबह एक नयी रोशनी लिए हुए आई थी, दुगुने उत्साह से मैंने घर का काम निपटाया, नया सूट पहनकर हल्का सा मेकअप किया..जी में आया, आज मेट्रो से नहीं, कैब से स्कूल जाया जा। मेरे फ़ोन का इंटरनेट काम नहीं कर रहा था… दीपक सो रहे थे, धीरे से उनका फोन उठाकर कैब बुक की। जितनी देर में कैब आई,उतनी देर में ना जाने कितने बिना पढ़े मैसेज स्क्रीन पर उभरकर आ गए थे.. खुद को बहुत रोका, लेकिन मैसेज ननद के थे, किसी नए मुद्दे की आशंका से मन घबरा गया और मैंने मैसेज बॉक्स खोल लिया!
“बात हुई किसी से?”
“कब तक हो जाएगा?”
“तीन बार बैंक से फोन आ गया“
मुझे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था, माज़रा क्या था? बिजली की गति से फोन चलाते हुए,ऊपर के मैसेज पढ़े तो कलेजा बाहर आ गया! ननदोई ने कोई लोन लिया था बैंक से, उसकी किश्त भरनी थी..दीपक ने कहा था कि वो इंतज़ाम करके पैसा भेज देंगे, मेरे दिमाग़ में बहुत कुछ साफ होने लगा था। कैब में बैठते ही एक एक बात प्याज़ की पर्तों की तरह खुलकर अनावृत होने लगी थी..ननद को इस बार फिर पैसे चाहिए, दीपक को इंतज़ाम करना है, बलि का बकरा कौन? मैं… मुझसे पैसे लेकर वहाँ दिए जाएँगे, तभी कल रात इतना प्यार बरसाया गया…एकदम से घिन आने लगी मुझे..दीपक से, उन मीठी बातों से और खुद से भी!
वो दिन स्कूल में जितना भारी बीता,उससे ज़्यादा घर लौटने का रास्ता लंबा लगा…दीपक झेंपे से बैठे थे, समझ गए थे मैसेज मैं पढ़ चुकी थी,
“वो …पढ़े होंगे ना तुमने मैसेज.. कुछ इंतज़ाम हो जाएगा क्या?”
मैंने बिना नाराज़ हुए आराम से कहा,”दीदी को पैसे भेजने थे, तो ऐसे ही कह देते,पहली बार तो भेज नहीं रहे हो..सिर दबाने की क्या ज़रूरत थी?”
दीपक के चेहरे पर आया गुस्सा मुझे दिखा, लेकिन बड़ी कुशलता से उसको दबाते हुए वो बोले,
“तुम तो निगेटिव ही सोचती हो..खैर, मेरे अकाउंट में भेज देना, मैं उनको भेज दूँगा“
“मैं ही भेज दूँगी ना” मैं इस बात पर हैरान थी, दीपक मुझे धीरे बोलने का इशारा करते हुए,
“शांत रहो यार..दीदी को ये थोड़ी बताता हूँ कि तुमसे लेकर दिए.. अच्छा नहीं लगता“
मेरे ऊपर ये एक नया आघात था! ये सयानापन भी चलता है इस घर में..लेकिन कुछ कड़े निर्णय लेकर मैं चुप हो चुकी थी। कुछ बातों को बोलने का नहीं, समझाने का समय आता है..मेरे लिए वो समय, कुछ महीनों बाद आने वाला था।
“सिक्किम पोस्टिंग आई है? मतलब?” दीपक के चेहरे पर हवाइयां उड़ गई थीं, सासु माँ एक नया दाँव खेलने को तैयार बैठी थीं, “तुमने जगह भरी होगी? कुछ कहते हैं ना उसको..हार्ड पोस्टिंग ? दीपक से नहीं पूछा था?”
मैंने ‘नहीं‘ में सिर हिलाया,वो थोड़ा और भड़क गई थीं! मैंने शांत कराते हुए समझाया, “कोई बात नहीं..कौन सा वहाँ परमानेंट रहना है? कुछ सालों की बात है, कल को फैमिली बढ़ेगी तो जाना मुश्किल होगा” इतना कहकर मैं अपने कमरे में आकर लेट गई थी। दिमाग में बीसों तरह की हलचल मेरे सामने हाथ नचाकर पूछ रही थीं कि कैसे रहोगी वहाँ अकेले? गुस्से में अपने पैर पर ही तो कुल्हाड़ी नहीं मार ली मैंने?
दीपक ने थोड़ी देर बाद कमरे में आकर मायूसी से पूछा,
“मेरे बगैर रह लोगी? मेरे बारे में तो सोच लेती?”
मैंने अपने भटकते मन की लगाम कसते हुए कहा, “आप भी चलिए वहाँ..अभी आपका कोई काम तो शुरू हुआ नहीं है यहाँ”
दीपक एकदम से फट पड़े थे, “मतलब बस अपना अपना सोचना है..बाकी चीज़ें सब कैसे मैनेज होंगी? तुम निकल लो, मैं तुम्हारे पीछे पट्टा बाँधे आ जाऊँ..घर की कोई ज़िम्मेदारी नहीं किसी की“
मैंने दीपक को भीतर तक भेदती नज़रों से देखते हुए कहा, “सब मैनेज होता रहेगा। जैसे इतने सालों से खर्च चला रही थी मैं, चलाती रहूँगी… बच्चों की स्कूल फीस, इनके ऊपर का खर्च भी हमेशा की तरह मैं देती रहूँगी..इसके अलावा मेरी कोई ज़रूरत है भी नहीं यहाँ“
एक नंगा सच मैंने सामने लाकर पटक दिया था, दीपक तनतनाते हुए घर से बाहर चले गए थे। पता नहीं कब घर आए,कब खाना खाया कुछ पता नहीं..बच्चे उस दिन के बाद से मुझसे कटने लगे थे, सास थोड़ी और चिढ़ी चिढ़ी सी रहने लगीं!
जिस दिन रात को मुझे निकलना था, मन खाली सा होने लगा था..दीपक के पास थोड़ी देर जाकर बैठी, लगा वो एक बार पूछ लें कि “साथ चलूँ? एक बार सेट करवा दूँ चलकर?”
लेकिन मेरी फिक्र से ज़्यादा महत्वपूर्ण उनका गुस्सा था जो अभी भी उनके चेहरे पर पसरा हुआ था.. कुछ सोचकर मैं सास के कमरे में आई, बच्चे स्कूल में थे, वो अपने कपड़े अलमारी में लगा रही थीं,
“निकलूँगी थोड़ी देर में..आप ध्यान रखना अपना“
कहते हुए मैं पैर छूने के लिए झुकी,वो तुरंत एक कदम पीछे हट गईं, “ये सब करने की कोई ज़रूरत नहीं..कहना तो नहीं चाहिए, लेकिन ये कोई तरीका नहीं है घर छोड़ कर जाने का“
वो पूरी तरह से लड़ाई के लिए तैयार बैठी थीं, मैंने आराम से एक लंबी साँस ली, अपने भीतर उबल रहे आक्रोश को काबू में किया और बोलना शुरू किया, “नौकरी मेरे हिसाब से तो चलेगी नहीं..जहाँ भेजेंगे वहाँ जाना पड़ेगा ना, घर बैठे तनख्वाह थोड़ी मिलेगी“
सास मेरी ओर देखते हुए चीखीं, “ऐसा क्या भला हो रहा है तुम्हारी नौकरी से? तुम कौन सा खर्चा चला रही थीं घर का? सब खर्चा दीपक करता है..बाहर जाकर अय्याशी का शौक है, आग लगे ऐसी नौकरी को“
मेरी आँखें आँसुओं से धुंधलाने लगी थीं… कुछ घंटों बाद एक नए सफर पर मुझे अकेले निकलना था और मेरे हिस्से एक आशीर्वाद भी नहीं आ सकता था? इस पल भी मुझसे मेरी मेहनत का हिसाब माँगा जा रहा था? और इन सबके लिए जो ज़िम्मेदार था, वो और कोई नहीं ..वो आदमी था,जिसने अग्नि को साक्षी मानकर मेरे सम्मान की रक्षा करने का संकल्प लिया था। झूठ पर झूठ बोलकर,अपनी साख बनाने के लिए दीपक ने मुझे कितना नीचे धकेल दिया था! गुस्से पर नियंत्रण रखते हुए मैंने शब्दों को चबाकर बोलना शुरू किया,
“एक पैसे की कमाई नहीं कर रहा आपका लड़का पिछले तीन सालों से..केवल ठप्पा लगा रखा है बिज़नेस का। इस घर की एक एक चीज़ मेरी तनख्वाह से आती है, ननदोई जी के लोन की किश्तें भी चुकाई हैं,पूछ लीजिएगा अपने बेटे से..मेरी नौकरी को आग लगी तो कुछ भी नहीं बचेगा“
इतने बड़े सच को स्वीकारना तो बाद की बात थी, उनके लिए सुनना ही मुश्किल हो रहा था,क्रोध से काँपती हुई चिल्लाईं,
“तुम उल्टा–सीधा कुछ भी कहोगी और हम मान लेंगे?”
मैंने कंधे उचकाते हुए संयत स्वर में जवाब दिया,
“मत मानिए! आपने पूछा तो बता रही हूँ… मैं आपको बताने के लिए थोड़ी करती रही, मैं तो ये सोचकर करती रही कि आपका और आपके परिवार का उद्धार कर रही हूँ“
एक इतना भारी शब्द “उद्धार“,जो मेरे कंधे पर आकर बैठ गया था, उसके उतरते ही मैं फूल सी हल्की हो चुकी थी..सास हतप्रभ होकर आँगन में खड़े दीपक को देख रही थीं, दीपक की नज़रें ज़मीन को और मैं अपने सामने खड़ी टैक्सी को देख रही थी जो मुझे रेलवे स्टेशन ले जाने के लिए आ चुकी थी।
बढिया कहानी…अंत मे उद्धारी चुका कर कहानी का अंत अच्छा लगा ..वैसे इस तरह के बहुत से घर है जिनकी सच्चाई दर्शाती है यह कहानी
कमाल की बात है आपके लेखन में,बहुत बहुत बधाई एवं साधुवाद!!
अंधेरे बादलों के पीछे चमकती सुनहरी किरण सी कहानी। पढ़कर आश्वस्ति हुई। उम्मीद अभी बाकी है..!
बस उस कंडीशनिंग से निकलने भर की देर है।
आनंद आ गया…
बहुत अच्छी लगी कहानी आपकी लकी जी! ऐसा लगा जैसे पिंजरे से आजाद हो गए।
झूठ,धोखा और छलावा!! आखिर कब तक टिकेगा।अपनी झूठी शान को बनाए रखने के लिये पुरुष अपनी ही पत्नी के साथ इस तरह छल करे!! तकलीफ तो होगी ही।
थोड़े से प्यार की अपेक्षा रहती है अगर वह भी दिखावे के रूप में मिले तो अफसोस तो होगा ही!
लेकिन एक शानदार निर्णय। सास को बताना जरूरी था कि किसने किसका उद्धार किया और कर रहा है।
अंत में शीर्षक की सार्थकता नजर आती है जब सच्चाई के सामने झूठ का पर्दा उठ जाता है। कहीं-कहीं सच का आइना दिखाना बहुत जरूरी होता है। बेहतरीन कहानी के लिए बहुत-बहुत बधाई आपको!
प्रस्तुति के लिए नीलिमा शर्मा जी का शुक्रिया और पुरवाई का आभार।
बहुत मार्मिक कहानी