ज़ंग लगे तालों के पीछे
कितने आँसू रुके हुए हैं
कुछ रिश्ते जो निभ न पाये
दरवाजों की ओट खड़े हैं
भूली गूँज खुशी की अब भी
बंद दरीचों झाँका करती
वहीं कहीं कुछ दबी सिसकियाँ
संधों संधों खांका करतीं
मंगल गीत और मातम स्वर
उसी सहन में रहन पड़े हैं
कुछ रिश्ते जो निभ न पाये
दरवाजों की ओट खड़े हैं
अरमानों ने रिश्ता तोड़ा
अपनों ने अपनों को छोड़ा
कुछ हासिल करने की ज़िद्द में
सच को कितनी बार मरोड़ा
तर्कों के कुचले पंखों से
पंछी मनके कहाँ उड़े हैं
कुछ रिश्ते जो निभ न पाये
दरवाजों की ओट खड़े हैं
फिर भी आस बनी रहती है
विगत समय के कर्जे ढोती
फर्ज़ सभी तब बन जाते हैं
उपकारों की थोती पोथी
मोल भाव अपनों से करके
बिखरे रिश्ते कब पनपें हैं
कुछ रिश्ते जो निभ न पाये
दरवाजों की ओट खड़े हैं


सरस जी उम्दा भावना प्रधान गीत है
शब्द संचयन सुंदर है ।
Dr Prabha mishra
धन्यवाद आदरणीया…☺️
भावपूर्ण सुन्दर कविता,,, वाह,,,प्रेरित करती
हृदय छू रही है यह कविता
पन्ने फटे, कर रहे फड़ फड़
ताक रहा इतिहास मैं अपना
मूक खड़ा, होकर के जड़
पीछे मुड़ कर देखा है जब
मुझको भी इतिहास दिख रहा
जैसे कोई वहाँ बैठ कर
रिश्तों की जायदाद लिख रहा
सिसक रही है घायल चिट्ठी
सूखे अक्षर अब भी पड़े हैं
कुछ रिश्ते जो निभ न पाए
दरवाज़े की ओट खड़े …..
बहुत सुंदर पंक्तियाँ आदरणीय, मानो मन की परतें आहिस्ता आहिस्ता उधड़ रही हों..!
आपका सादर आभार…☺️
एक लंबी अवधि के बाद तुम्हें पढ़ना बहुत अच्छा लगा सरस।
जीवन की विसंगतियों के मध्य गुम होती संवेदनाओं पर
मनोभावों की करुण प्रस्तुति।
बधाई प्रिय सरस।
दी अपने स्नेहाशीष सदा बनाए रखियेगा…!
☺️
बहुत सुंदर रचना ,भावपूर्ण गीत , घर, परिवार ,रिश्ते के बीच कुछ किरीचे दरक जाती हैं।उन्ही का मानस गान है।बहुत बहुत बधाई सरस जी। आपकी इस कविता को मैने स्वर दिया है।आपको भेजती हूं ।
इस सुंदर प्रतिक्रिया के लिए हृदय तल से आभार रेनू जी। आप द्वारा स्वर बद्ध किया, अपना यह गीत अवश्य सुनना चाहेंगे…☺️
प्रिय सरस जी बहुत ही संवेदनशील भावनाओं से भरा आपका गीत बेहद मर्मस्पर्शी है
गीत के माप दंड पर खरा उतरता आपकी गीत विधा की परिपक्वता को दर्शाता है
हार्दिक बधाई प्रिय सरस ,अरसे बाद एक गहरे भावों से भरा गीत।सामने आया ।
सादर आभार आदरणीया। आशीष स्वरूप यह टिप्पणी हमें और बेहतर लिखने को प्रेरित करेगी..☺️
बहुत सुंदर। भावपूर्ण गीत ।
सादर आभार आदरणीय