Saturday, April 18, 2026
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वंदना बाजपेयी की कविताएँ

1 – मैंने चुना है घास होना
मैंने चुना है घास होना
ठीक उसी दिन जिस दिन तुमने चुना था पर्वत होना
तुम्हें हमेशा लुभाती रहीं चोटियाँ
और मुझे जरा सी नमी पाकर अंकुरित हो जाना
तुम खुश हुए अपनी शक्ति पर
और मैं मुस्कुराई अपनी जिजीविषा पर
तुम सिमटते गए अपनी ऊँचाइयों के साथ
और मैं फैलती गई, यहाँ वहाँ इधर-उधर
तुमने कुचले जाने का किया विरोध
और मैं कुचल-कुचल कर
पुनः-पुनः पनपती रही
सागर की गहराइयों से पर्वतों की ऊँचाइयों तक
देखो तो,
तुम्हारे निर्जन, निपट एकांत से कलपती चोटियों पर
जहाँ नहीं पनपती कोई वनस्पति
वहीं, हृदयस्थल के ठीक बीचों-बीच
मैंने बना लिया है अपना घर
कई बार बहुत आम होना भी
हमें बहुत खास बना देता है
2 – जरा-जरा सा
हम जहाँ भी जाते हैं
छूट जाते हैं वहाँ जरा सा
और वो जगह जरा सा छूट जाती है हम में
हम जिससे भी मिलते हैं
छूट जाते हैं उसमें जरा सा
और वो भी जरा सा छूट जाता है हम में
जर्रे-जर्रे से बने अपने इस वजूद में
बहुत मुश्किल है ढूँढ़ना
खुद को जरा सा
3 – जल ही जीवन है
एकदम से नहीं मरता कोई पौधा
पहले समेटती हैं पत्तियाँ, खुद को भीतर
फिर थोड़ा और…
फिर थोड़ा और…
थोड़ा-थोड़ा और, बार-बार
पूरा सूख जाने से पहले
प्रकृति और मन
या मन की प्रकृति
स्पष्ट, गोचर, अखंडित नियम सी
विघटन और पुनर्निर्माण के किसी बिन्दु पर
टूटती, बाट जोहती, सरल, विकल
कि अक्सर मन का समेटना खुद को खुद में
नहीं है आध्यात्म का एकांगी राग
ना ही पलायन की विरक्त धुन
ना उन्माद, ना कौतूहल
ना विभ्रम, ना शोक
मात्र एक कोशिश है, प्रकृति प्रदत्त
मुरझाने से पहले खुद को बचाने की
आखिरकार जल ही जीवन है…
4 – वो सुन लेती है अनकहा
मैंने सुना वो सब कुछ
जो तुमने कहा ही नहीं
चाट-पोंछ कर खाई गई कटोरी देख
मैंने सुना “आज बहुत अच्छी बनी है सब्जी”
घंटों रगड़ कर साफ किये घर कोने-कोने में
शाम को गुनगुनाते तुम्हारे किसी पुरानी फिल्म के गीत पर
मैंने सुना, “कितनी मेहनत करती हो तुम मेरे मन को यूँ तरोताजा कर देने में”
लंबे टूर पर घर से दूर जाते हुए
उभर आए संतोष से घुलती माथे की लकीरों से
मैंने सुना कि सुरक्षित है तुम्हारा परिवार मेरे हाथों में
तुम्हारे बचपन से ले कर अभी तक के वाद- विवाद, दर्द, तकलीफ को
बिना आँख मिलाए कह भर देने से
डबडबा आई मेरी आँखों ने सुना ‘शुक्रिया’
इस तरह मेरा साथ देने के लिए
मरते हुए रिश्तों को पुनर्जीवित करने
किसी संजीवनी की तलाश में हिमालय पर नहीं भटकती स्त्रियाँ
वे सुन लेती हैं बहुत कुछ अनकहा
और बाँध लेती हैं आँचल के छोर में
किसी संजीवनी की तरह
5 – एक मौसम पतझड़ का
ये उदास वीरान पतझड़ का मौसम है
पता नहीं किसने तय किया होगा
एक महीना पतझड़ के लिए
किसने कहा होगा
‘पुष्पा आई हेट टीयर्स’
और प्रकृति प्रेमिका ने
थाम लिया होगा ‘बीज मंत्र’
और वर्ष भर हरा-भरा रहने के लिए
साल का छोटा सा हिस्सा कर दिया घोषित
विषाद के लिए
रोई जी भर के
डाल-डाल झटक कर
पात-पात फेंककर
खुरच-खुरच कर उतारा बीते साल का लेखा जोखा
तभी तो सदिया बीतीं
और उसके वसंत के हर्ष में कभी मिलावट नहीं हुई
किसी अतीत के विषाद की
और मेरे हर वसंत के हिस्से में
सेंध लगाए रहता है कोई पुराना पतझड़
साल दर साल बढ़ता जाता है पतझड़
कि बमुश्किल जगह बची है
वसंत के लिए
अजीब बात है
जब -जब मैंने सुनी
पुष्पा, ‘आई हेट टीयर्स’ की आसमानी गुहार
मैंने भीतर के पतझड़ को
ढाँप दिया बाहर के वसंत से
री सखी !
तुम भी प्रकृति मैं भी प्रकृति
एक ही पंच तत्व के दो आयाम
पर तुम टूटती हो साल में एक बार
ताज़ा दम होने के लिए
और मैं टूटती हूँ हर बार
उम्र जितना लंबा पतझड़ लिए
और उठती हूँ
खुद में थोड़ा और पतझड़ समेटकर
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