Tuesday, June 16, 2026
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दीपक गिरकर की कहानी – छुट्टी

10 मार्च, गुरूवार – आज अविनाश माँ से मिलने की उमंग तथा अपने बच्चों को दादी से मिलवाने की कल्पना में ही उल्लासित हो रहा था। 
11 मार्च, शुक्रवार – आज अविनाश का उतरा चेहरा मेरी नज़र से छिपा नहीं रह सका।     
“क्यों क्या हुआ? क्या छुट्टी नहीं मिली? “
“नहीं मिली”
“क्यों नहीं मिली छुट्टी? डीजीएम साहब से बताया माँ बीमार है?” मैंने अविनाश से पूछा था।
“बताया था, लेकिन वह काँइया सुनता कहाँ है? और उलटा उसने मुझे बुरी तरह से डांटा और अपमानित किया।” अविनाश भीतर ही भीतर तिलमिलाने लगा। उसके के चेहरे पर दर्द की पतली लकीर खिंच गई।
अपमान से अविनाश का चेहरा काला पड़ गया। डीजीएम साहब का एक एक शब्द उसकी छाती में नश्तर की भांति चुभ रहा था। लेकिन अविनाश खून का घूंट पी कर रह गया। मेरे चेहरे पर आक्रोश और मन में क्रोध की दुंदुभियाँ बजने लगी थीं। 12 मार्च को सेकंड सैटरडे और 13 मार्च को संडे की छुट्टी थी और अविनाश को सिर्फ़ एक दिन 14 मार्च सोमवार की छुट्टी चाहिए थी और तीन दिन की हेडक्वार्टर छोड़ने की अनुमति चाहिए थीं। वैसे अविनाश की छुट्टी स्वीकृत उसके विभाग प्रमुख ने करनी चाहिए थी, लेकिन डीजीएम साहब के सख्त निर्देश थे कि कोई भी विभाग प्रमुख उनकी अनुमति के बिना किसी भी अधिकारी की छुट्टी स्वीकृत नहीं करेगा। प्रधान कार्यालय के कर्मचारियों अधिकारियों में इन डीजीएम साहब की वजह से भय और आक्रोश पनप रहा था। इस घटना से अविनाश का मन व्याकुल होकर विक्षोभ और निराशा में डूब गया। अनजान सा रिश्ता था अविनाश से मेरा। अविनाश और मैं हैदराबाद में एक सरकारी बैंक के प्रधान कार्यालय में पदस्थ थें। अविनाश ऑडिट विभाग में पिछले पांच वर्षों से कार्यरत था और मैं एचआर विभाग में पिछले तीन वर्षों से था। हमारी दोस्ती केवल बैंक तक ही सीमित नहीं थी। घरों में आना जाना भी था। हम दोनों अपने अपने परिवार के साथ बैंक के फ्लैट्स में ही रहते थें। एक दिन उसने भारी आवाज में कहा “घर से बड़े भाई साहब और पिताजी के कई फ़ोन आ चुके हैं कि एक बार मम्मी से आकर मिल लो, मम्मी तुम्हें बहुत याद कर रही है। काम की अधिकता और डीजीएम साहब की वजह से बहुत समय से अपने घर भोपाल जाने का मौका ही नहीं मिला। ऑडिट विभाग में काम की अधिकता थी और अविनाश के बिना ऑडिट विभाग का काम हो ही नहीं पाता था। अविनाश कड़ी मेहनत, लगन और ईमानदारी से ऑडिट विभाग का हर काम करता था। जिस तन्मयता से वह काम करता था, वो सच में देखने वाली बात थी। अविनाश की प्रतिभा का लोहा पूरा बैंक मानता था। उसने अपने स्नेहिल व्यवहार और अपनी प्रतिभा से सबका मन मोह लिया था। अविनाश को बैंक से छुट्टी बड़ी मुश्किल से मिलती थी। उसे रविवार और अन्य छुट्टियों के दिन भी बैंक में काम निपटाने बैठना पड़ता था। उसका व्यक्तित्व जिन्दादिल था लेकिन इधर कुछ दिनों से वक्त की मार ने उसके चेहरे से हंसी छीन ली थी। काम के अत्यधिक बोझ, मानसिक तनाव, बैंक प्रबंधन का अनावश्यक दबाव और निरंतर चलते अंतर्द्वंद की वजह से अविनाश शारीरिक तथा मानसिक रूप से टूट गया था। लगातार चिंता तनाव उसके स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डाल रहे थे। रात को 9 बजे पार्किंग लॉट से एपार्टमेंट की ओर जाते हुए हम दोनों खामोश चलते रहे। उसकी आँखों में आँसू थे लेकिन वह अपना चेहरा संयत रखे था। उसका का मन बुझ-सा गया था।
15 मार्च, मंगलवार – आज अविनाश को उसके पिताजी का फोन आया था “अवि तुम्हारी मम्मी को अटैक आया है और अभी सिटी हॉस्पिटल के आईसीयू में जिंदगी और मौत से लड़ रही है। तुम शीघ्र चले आओ।”
अविनाश तुरंत डीजीएम साहब के केबिन में जाकर अपनी मम्मी की वर्तमान स्थिति से अवगत करता है और चार दिन की छुट्टी के लिए निवेदन करता है।  
“देखो अविनाश, तुम्हारी मम्मी अकेली नहीं है उनके पास तुम्हारे पिताजी है,  तुम्हारा बड़ा भाई है और हॉस्पिटल के डॉक्टर उनका इलाज कर रहे हैं। तुम वहां जाकर क्या कर लोगे?  मार्च क्लोजिंग है। तुम्हें किसी भी हालत में छुट्टी नहीं मिलेगी। ऑडिटर्स को कौन संभालेगा? अपनी डेस्क पर जाओ और काम करों।”
दो टूक रुखा सा जवाब देकर डीजीएम साहब फिर अपने काम में लग गये। केबिन से बाहर आते-आते अविनाश के धैर्य का बाँध टूट चुका था,  आंसुओं का सैलाब बह चला था। वह अवाक खड़ा रह गया और उसके हाथ से मोबाइल छूट गया। इस घटना ने उसकी मनोस्थिति में भूचाल ला दिया था। मैं उसे कैंटीन में ले गया। उसे समझाया कि घबरा मत। ऊपर वाला सब ठीक करेगा। मैंने उससे कहा कि तुझे डीजीएम साहब नहीं छोड़ रहे हैं तो तू ऐसा कर भाभी और बच्चों को आज ही ट्रैन या बस से भोपाल भेज दे और तू अप्रैल महीने में ऑडिट होने के बाद चले जाना। तेरे बच्चों की वार्षिक परीक्षा भी हो चुकी है। उसे मेरी बात ठीक लगी और हमने आज रात की ट्रैन से ही अर्जेंट में टिकिट करवाकर उसकी पत्नी और उसके दोनों बच्चों को भोपाल के लिए रवाना करवा दिया।
17 मार्च, गुरूवार – सुबह 10 बजे अविनाश को अपने बड़े भाई गिरीश का रोते रोते फोन आया “अवि मम्मी नहीं रहीं। हमें छोड़कर चली गई।”
अविनाश के विभाग के एक डेस्क अधिकारी तिवारी ने मुझे फोन से सूचित किया कि “अविनाश की मम्मी का देहांत हो गया है, तुम शीघ्र हमारे विभाग में चले आओ।” 
यह खबर सुनकर मेरे पैरों तले जमीन खिसक गयी। हाथ पाँव फूल गए। मैंने अपने आप को संयत किया। मैं ऑडिट विभाग में पहुँचकर देखता हूँ कि अविनाश फूट फूट कर रो रहा है। मैं उसे अपने सीने से लगाकर उसे चुप कराने की कोशिश करता हूँ। मैं ऑडिट विभाग के डिपार्टमेंटल हेड एजीएम सक्सेना जी को और अविनाश को लेकर डीजीएम साहब के केबिन में जाकर अविनाश की मम्मी का दु:खद समाचार सुनाता हूँ और हम डीजीएम साहब से रिक्वेस्ट करते हैं कि अविनाश को अब तो छुट्टी दे दीजिए।  
डीजीएम साहब ने कहा “मुझे यह जानकर बड़ा दुःख हुआ कि अविनाश की मम्मी का देहांत हुआ है। मैं उन्हें श्रद्धांजलि देता हूँ। होनी को कौन टाल सकता है। अविनाश धैर्य बनाए रखो।  अविनाश तुम छोटे हो। तुम्हारे बड़े भाई वहाँ है वे ही सारे क्रियाकर्म करेंगे, वैसे भी तुम्हें क्रियाकर्म करने का अधिकार नहीं है। मार्च क्लोजिंग निपट जाए और वार्षिक ऑडिट का  काम पूरा हो जाए तब तुम छुट्टी लेकर अपने घर भोपाल जा सकते हो।” 
अविनाश को गहरा धक्का लगा। उसे पूरी छत घूमती नजर आ रही थी। डीजीएम साहब के केबिन में ही अचानक अविनाश की आँखों के आगे अँधेरा-सा छाने लगा और वह चक्कर खाकर गिर पड़ा। मैंने अविनाश के चेहरे पर और मुँह में पानी डाला लेकिन पानी उसके मुँह में नहीं गया और उसकी गर्दन बांयी ओर झुक गई और आँखे फटी की फटी रह गई। उस समय बैंक के डॉक्टर कपूर प्रधान कार्यालय में आए हुए थे। वे आए और वे अविनाश को चेक करके बोले “ही इज नो मोर।” हम सभी की आँखें फटी की फटी रह गईं। प्रधान कार्यालय में फुसफुसाहट शुरू हो गई थी और कार्यालय का पूरा स्टाफ धीरे-धीरे डीजीएम साहब के केबिन के बाहर जमा हो गए था। पूरा प्रधान कार्यालय सन्न रह गया था। किसी को समझ नहीं आ रहा था कि अचानक यह क्या हो गया। बैंक का उच्च प्रबंधन सकते में था। यूनियन लीडर्स लाचार दिख रहे थें। डीजीएम साहब का डर के मारे चेहरा पीला पड़ गया था।  
हम लोग अविनाश की बॉडी को लेकर पास के अस्पताल में ले गए वहाँ भी डॉक्टर ने अविनाश की मृत्यु की पुष्टि की। मैंने अविनाश के बड़े भाई को अविनाश की मृत्यु की सूचना दी। हम अविनाश की बॉडी को लेकर पोस्टमार्टम के लिए सिविल हॉस्पिटल ले गए। वहाँ पूरा दिन लग गया। रात को 8 बजे हमें पोस्टमॉर्टम की रिपोर्ट और अविनाश की बॉडी मिली। एक प्राइवेट हॉस्पिटल की एम्बुलेंस में मैं अविनाश की बॉडी के साथ उसके घर भोपाल गया था। अविनाश अपने पैरों से चलकर अपने घर भोपाल नहीं लौटा, वह बक्से में बन्द होकर अपने घर आया था। बिना छुट्टी लिए।   
दीपक गिरकर
कथाकार
28-सी, वैभव नगर, कनाडिया रोड,
इंदौर- 452016
मोबाइल : 9425067036


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2 टिप्पणी

  1. कर्मचारी सिर्फ कर्मचारी नहीं होता, जितनी उसकी अपनी परिवार के प्रति भी जिम्मेदारी होती है। कर्मचारियों पर काम का दबाव के साथ उनके उच्चाधिकारियों के अमानुषिक व्यवहार का बेहद मार्मिक चित्रण किया है।
    हृदयस्पर्शी कहानी। बधाई दीपक गिरकर जी आपको।

  2. दीपक जी!

    बहुत ही मार्मिक कहानी है आपकी।

    कोई ऑफिसर इतना भी क्रूर प्रकृति का हो सकता है!इतना संवेदनहीन कि जिसमें इंसानियत बिल्कुल नहीं होती, विश्वास नहीं होता! लेकिन वास्तव में ऐसे लोग भी होते हैं दुनिया में! अगर ऐसा न होता तो महामना मदन मोहन मालवीय जी अपनी जेब में हमेशा लिखा हुआ त्यागपत्र न रखते।

    कई वर्षों पूर्व यह संस्मरण पढ़ा था। वे अपनी माँ के बहुत आज्ञाकारी थे उनकी किसी बात को टालना, मना करना या अवहेलना करना उनके स्वभाव में नहीं था। इसीलिए जब एक अंग्रेज अधिकारी से माँ के कहने पर उन्होंने एक दिन की छुट्टी माँगी, तो मना करने पर उन्होंने तत्काल इस्तीफा निकाल कर दे दिया।

    आज का समय ऐसा नहीं है नौकरी बहुत मुश्किल से मिलती है इसलिए मजबूरियाँ झेलना पड़ता है।
    नौकरी जब मजबूरी बन जाती है तो तकलीफ देती है।
    अंत तो बेहद-बेहद मार्मिक लगा।क्रूरता की चरम स्थिति।
    ऐसा लगा जैसे आँखों के सामने से पूरी कहानी चलचित्र की तरह जीवन्त गुजर गई हो।
    बिना किसी कल्पना समायोजन के एक लीक पर कहानी समाप्त हो गई।वह भी मृत्यु के साथ।
    माँ का रिश्ता होता ही इतना अपना है जिसके साथ लापरवाही नहीं बरती जा सकती।

    कहानी वर्तमान काल के में अधिकारियों द्वारा अपने अधीनस्थ कर्मचारियों के प्रति कठोरता के हद की ओर इशारा करती है।

    हम अनुशासन के प्रति कठोर हूं पर पत्थर तो न बने कि आपकी चोट से किसी की मृत्यु ही हो जाए।
    वैसे तो दुखान्त कहानी शुभकामनाएँ और बधाई लिखते हुए दुविधा में डाल देती हैं।
    पर लेखकीय कौशल जो प्रभावित करता है, उसे तो प्रणाम करना ही पड़ता है।
    बधाई आपको ।

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