Saturday, April 18, 2026
होमकविताबिमल सहगल की कविता - गली में पसरा पड़ा सन्नाटा

बिमल सहगल की कविता – गली में पसरा पड़ा सन्नाटा

अजब मंजर है
अब शहर की उस गली का
एक तरफ मस्जिद है
दूसरी तरफ मंदिर है बना
खूब रौनक हुआ करती थी
बीते दिनों यहां
और फिर एक दिन
आस्थाओं के टकराव में
जब शोरगुल आकाश को भेद कर
जमीन पर नीचे आ गिरा
तब से बस पसरा पड़ा रहता है वह
गली के बीचों-बीच ही,
पहरेदारों की निगरानी में,
रूआंसा सा, दिशा हारा,
बन कर सन्नाटा।
जागता है कुछ देर के लिए ही, आजकल,
जब जुम्मे को लोग आते हैं उधर से
और फिर मंगल के दिन
कुछ और लोगों के लिए
इस तरफ से है रास्ता बनाता;
बाकी दिनों तो मस्जिद की मीनार
और मंदिर का गुंबद, दोनों,
देखते रहते हैं बस कौतूहल भरे,
सहमे-सहमे से खड़े
तसल्ली देते, एक दूसरे को
बीते दिनों के आपसी मेलजोल, और
अज़ान और आरती के
जुड़ते सुरों की यादों को
मन-ही-मन ताजा करते।
बिमल सहगल
बिमल सहगल
नवंबर 1954 में दिल्ली में जन्मे बिमल सहगल, आई एफ एस (सेवानिवृत्त) ने दिल्ली विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की। अंग्रेजी साहित्य में ऑनर्स के साथ स्नातक होने के बाद, वह विदेश मंत्रालय में मुख्यालय और विदेशों में स्तिथ विभिन्न भारतीय राजदूतवासों में एक राजनयिक के रूप में सेवा करने के लिए शामिल हो गए। ओमान में भारत के उप राजदूत के रूप में सेवानिवृत्त होने के बाद, उन्होंने जुलाई, 2021 तक विदेश मंत्रालय को परामर्श सेवाएं प्रदान करना जारी रखा। कॉलेज के दिनों से ही लेखन के प्रति रुझान होने से, उन्होंने 1973-74 में छात्र संवाददाता के रूप में दिल्ली प्रेस ग्रुप ऑफ पब्लिकेशन्स में शामिल होकर ‘मुक्ता’ नामक पत्रिका में 'विश्वविद्यालयों के प्रांगण से' कॉलम के लिए रिपोर्टिंग की। अखबारों और पत्रिकाओं के साथ लगभग 50 वर्षों के जुड़ाव के साथ, उन्होंने भारत और विदेशों में प्रमुख प्रकाशन गृहों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है और भारत व विदेशों में उनकी सैकड़ों रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं। अंत में, 2014-17 के दौरान ओमान ऑब्जर्वर अखबार के लिए एक साप्ताहिक कॉलम लिखा। संपर्क - [email protected]
RELATED ARTICLES

7 टिप्पणी

  1. विमल जी!

    आपकी कविता पढ़ी। सांप्रदायिक वैमनस्य के चलते होने वाले फसादों के बाद का सन्नाटा खामोश रहकर भी बहुत कुछ बोलता है।
    मौन की उस भाषा को सब नहीं समझ पाते।

    काश लोग धर्म का सही अर्थ समझ पाएँ की धर्म का अर्थ कर्तव्य है। भागवत में बार-बार धर्म को कर्तव्य कह कर व्याख्यायित किया गया है। कर्तव्य का अर्थ होता है करने योग्य।
    सांप्रदायिक वैमनस्य
    के चलते हिंसा करना कर्तव्य तो नहीं हो सकता और न ही धर्म।
    यह विषय बेहद गंभीर है इस पर लंबी बात हो सकती है आपकी छोटी सी कविता ने दिमाग को सक्रिय किया।
    शुक्रिया आपका।

    • नीलिमा जी,
      आपकी सटीक प्रतिक्रियाएं लेखन को प्रोत्साहन देती हैं। मेरी कविताएं अक्सर हमारे आस पास की चिंतादायक परिस्थितियों और घटनाओं के प्रति मेरे मन के अवसाद से शिकायत बन निकलती हैं।

      आपके सहचिंतन के लिए आभार!
      बिमल सहगल

  2. आदरणीय सर संवेदनशील कविता
    समाज किस ओर बढ़ रहा है ,इंसान अलग क्यों हो गया ,इबादत अपनी जगह धर्म अपनी जगह ,इंसान तो एक ही मांस मिट्टी लहू का बना है,इंसान का नुकसान मानवता का नुकसान है
    काश इसे शांत हृदय धैर्य से समझे ,तो बैर वैमनस्य लड़ाई यहां तक युद्ध भी न हो।
    उत्तम कविता साधुवाद

    • कुन्ती जी, आपकी अनुरूप भावनाओं के लिए आभार।
      बहुत दुख होता है जब बरसों के इंसानी रिश्ते हमारी संकीर्ण धार्मिक सोच के किसी असंगत मोड़ पर आ अचानक दुर्भावनाओं की बलि चढ़ जाते हैं। इस संदर्भ में मेरा एक शेर है:

      बनाया था खुदा ने तो फक्त आदम जात को
      उसने खुदा के मुख़्तलिफ़ किरदार घड़ लिए

      बिमल सहगल

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Most Popular

Latest