Tuesday, June 16, 2026
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योगेन्द्र पाण्डेय की कविताएँ

1. गुजरता हुआ वर्ष…
दिसंबर की सर्द हवाओं के साथ-साथ
यह वर्ष बीत रहा है।
नए वर्ष की आहट से मन उत्साहित है।
बीत रहे वर्ष और आने वाले नववर्ष के बीच
फ़ासला है कुछ खट्टी-मीठी यादों का।
समय कितनी तेज़ रफ़्तार से भाग रहा है!
समय के साथ लड़ता हुआ आदमी
फिर भी हारा हुआ नहीं है—
वह लड़ रहा है लगातार,
जूझ रहा है निरंतर
सुख-दुःख के आते-जाते थपेड़ों से।
एक उम्मीद है जो कभी साथ नहीं छोड़ती।
आदमी के लिए और क्या चाहिए?
थोड़ी बहुत स्मृतियाँ, और
लड़ते रहने का अनवरत संकल्प—
यही तो है ज़िंदा रहने की निशानी।
भागते हुए समय के साथ-साथ भागने से
मिल ही जाती है मंज़िल—
देर-सबेरे, एक ना एक दिन।।
2. आई एम द लाइट ऑफ द वर्ल्ड…
चौराहे से गुजरते हुए
मन खिंचता चला आता है
शांत, स्थिर, बिल्कुल मौन खड़े चर्च की ओर।
शहर के शोर, गाड़ियों के हॉर्न से ख़ुद को अलग किए हुए
एक पुरातन आकर्षण का आभामंडल,
लाल-पीले गेंदे के फूल,
गुलाब के फूल और हरी-हरी दूब की घास पर
मोती जैसे चमकते ओस के बूंद—
आख़िर किसे नहीं खींच लेगा
अपने मनमोहक सम्मोहन में?
ये बड़े-बड़े, हरे-भरे, खामोश खड़े पेड़,
फव्वारे से उठते-गिरते पानी का संगीत,
चर्च की दीवारों से चमकता शांति का सफ़ेद रंग—
यही सबसे उत्तम स्थान है
शांति और प्रेम की तलाश में भटकती आत्माओं के लिए।
शांत चित्त, बाहें फैलाए,
आंखों में प्रेम और करुणा भरे जीसस
खड़े हैं—और मैं निहार रहा हूं इन आंखों में अपलक।
डूब रहा हूं प्रेम और करुणा के अथाह समंदर में।
अचानक एक स्वर कानों में घुल जाता है—
“I am the Light of the World.”
3. घंटाघर…
वक़्त से रूबरू कराता हुआ
कई वर्षों से खड़ा है
शहर के बीचों-बीच चौराहे पर,
भरपूर शान और रौब से सर उठाए
दुनिया की सबसे ताक़तवर वस्तु—
समय का पर्याय,
घंटाघर।
ऊँच-नीच, जाति-धर्म,
अमीर-गरीब, सुखी-दुखी—
सबके समय का ठीक-ठीक हिसाब रखता है घंटाघर;
इंसान को उसके हालात का आईना दिखाता है।
समय से बड़ा ईमानदार कोई नहीं दुनिया में—
घंटाघर खोल कर रख देता है
जीवन भर के धर्म-कर्म का हिसाब-किताब।
घंटाघर रखता है सबका पूरा-पूरा ख़याल
स्थिर भाव से चौराहे पर मौन खड़ा-खड़ा।।
_____________________________
योगेन्द्र पाण्डेय
सलेमपुर, देवरिया , उत्तर प्रदेश
6394893753
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1 टिप्पणी

  1. योगेन्द्र जी!

    बढ़िया कविताएँ हैं आपकी।
    जाने वाले वर्ष की स्मृतियाँ दिल में ठहर ही जाती हैं खट्टी मीठी यादों के साथ और आने वाला वर्ष नई उम्मीदों के साथ प्रवेश करता‌ है। उम्मीदें इंसान के जीवन में प्रकाश की तरह हैं जो पथ प्रदर्शक की तरह आगे बढ़ते रहने के लिए प्रेरित करती हैं। स्वागत तो जायज़ है।

    आपकी दूसरी कविता का शीर्षक पढ़कर चेहरे पर मुस्कान आ गई
    *आई एम द लाइट ऑफ़ द वर्ल्ड*

    अच्छी कविता है।
    ईसा मसीह का संघर्ष, बलिदान और धैर्य शांति का मार्ग प्रशस्त करते हैं। वैसे हर संत लाइट ऑफ़ द वर्ल्ड है।ऐसा हम सोचते हैं।

    घंटाघर

    घंटाघर कई शहरों में हैं। एक लंबा समय इन्होंने देखा है। जहाँ तक हम जानते हैं
    अधिकांश भारतीय घंटाघर ब्रिटिश शासन के दौरान बनाए गए थे, जो शहर के केंद्र में एक महत्वपूर्ण स्थल होते थे तब ये केवल समय बताने के लिए नहीं थे, बल्कि आपातकाल या त्योहारों की घोषणा के लिए भी उपयोग में आते थे,उस समय निजी घड़ियाँ संभवत: उपलब्ध नहीं थीं या सहजता से उपलब्ध न हों।
    वास्तव में ये तत्कालीन शक्ति के प्रतीक के रूप में ऊँचे-ऊँचे बनाए जाते थे।
    हमने एक छोटे से शहर हरदा का घंटाघर देखा है।

    आपकी इस कविता में हमने समय को पहली बार ईमानदार रूप में पढ़ा। वरना तो उसे शक्ति के प्रतीक रूप में ही जाना जाता है।और तब तो शक्ति बेरहम हुआ करती थी और आज भी यह सोच बदली नहीं है। ताकत के तो प्रायः सब गुलाम ही होते हैं फिर वह ताकत चाहे जैसी हो ,चाहे जिसकी हो।
    यह कविता हमारे लिये असमंजस में रही।
    कविताओं के लिये आपको बहुत-बहुत बधाई।

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