1 – अरावली : एक प्राचीन श्वास का विलाप
मैं ऊँची नहीं हूँ,
इसलिए तुम्हारी फ़ाइलों में
अब पहाड़ नहीं कहलाती।
मेरी चोटियाँ
तुम्हारे ड्रोन के कैमरे में
अकड़ नहीं रचतीं,
मेरे शिखर
तुम्हारे आंकड़ों में
गर्व नहीं भरते।
पर याद रखो
जब हिमालय
अभी समुद्र के गर्भ में
शंख की तरह सो रहा था,
मैं तब भी खड़ी थी
नंगी, धैर्यवान,
धरती की पहली स्मृति बनकर।
मैंने
समय को
चट्टानों में जमते देखा है।
मैंने
पृथ्वी की पहली दरार से
जल को रिसते देखा है।
मैं 100 मीटर नहीं,
मैं 250 करोड़ वर्ष हूँ।
तुम्हारी स्केल पर
मैं छोटी हूँ।
पर मेरी जड़ों में
सभ्यता की धड़कन है।
तुम कहते हो
जो सौ मीटर से नीचे है
वह अरावली नहीं।
तो सुनो
क्या माँ की ऊँचाई नापकर
तुम उसकी ममता तय करोगे?
क्या श्वास की लंबाई देखकर
तुम जीवन स्वीकारोगे ?
मेरी छोटी पहाड़ियाँ
वे ही तो
प्यासे गाँवों के
गुप्त जलकुंड हैं।
वे ही तो
रेत के बढ़ते कदमों के सामने
अंतिम दीवार हैं।
मेरी देह पर
तुम्हारी मशीनें चलेंगी,
और तुम कहोगे
यह पहाड़ नहीं था।
पर जब
हवा में धूल
तुम्हारे फेफड़ों में
घर कर लेगी,
जब
रेगिस्तान
तुम्हारे शहरों की
खिड़कियों तक आ जाएगा,
तब क्या कहोगे?
मैं गिरूँगी
तो शोर नहीं होगा।
मैं टूटूँगी
तो टीवी पर ब्रेकिंग नहीं चलेगी।
पर एक दिन
जब पानी
तुम्हारी हथेलियों से
फिसल जाएगा,
तब समझोगे
कि तुमने
एक पर्वत नहीं,
एक युग खो दिया।
मैं अरावली हूँ
नापी नहीं जाती,
समझी जाती हूँ।
मेरी ऊँचाई नहीं,
मेरी आयु बोलती है।
मेरी चुप्पी में
भविष्य की चेतावनी है।
यदि मैं बची,
तो हवा बचेगी।
यदि मैं रही,
तो धरती साँस लेगी।
और यदि
तुमने मुझे
मीटर में तौल दिया
तो याद रखना,
सभ्यताएँ
इंचों में नहीं,
गलत फ़ैसलों में
ढहती हैं।
2 – अरावली का सरकारी शोकगीत
तुमने कहा
सौ मीटर से कम है,
तो पहाड़ नहीं है।
कितनी सरल है तुम्हारी भाषा!
कितनी निर्दोष है तुम्हारी क्रूरता!
सौ मीटर
जैसे पहाड़ कोई पोल हो,
जिसकी लंबाई नापकर
उसका अधिकार तय किया जाए।
जैसे समय कोई फ़ुटपट्टी हो,
और स्मृति
किसी ड्राफ्ट का अतिरिक्त अनुच्छेद।
मैं अरावली हूँ।
तुम्हारी परिभाषाओं से
कहीं पहले की एक भूल
जो अब तक सुधरी नहीं।
जब पृथ्वी
अपनी पहली साँस सीख रही थी,
जब चट्टानें
अभी नाम नहीं जानती थीं,
तब मैं
अपने क्षरण में भी
स्थिर थी।
मैं ऊँची नहीं रही,
क्योंकि मैंने
अहंकार नहीं चुना।
मैं झुकती रही
हवा के लिए,
जल के लिए,
समय के लिए।
और तुम कहते हो
जो झुक गया
वह पर्वत नहीं।
वाह, सभ्यता!
तुम्हारे लिए
सीधे खड़े रहना ही
मूल्य है,
चाहे भीतर से
सब कुछ ढह चुका हो।
मेरी छोटी पहाड़ियाँ
तुम्हारे नक्शों में
सिर्फ़ उभार हैं।
पर वही उभार
तुम्हारी बस्तियों के नीचे
पानी की शिराएँ बनते हैं।
उन्हीं पर
घास उगती है,
उन्हीं में
मृग छिपते हैं,
उन्हीं से
रेगिस्तान
हर रोज़ हारता है
थोड़ा-थोड़ा।
पर तुमने कहा
यह अरावली नहीं है।
कितनी सुविधाजनक पंक्ति है यह!
इसके बाद
कोई अपराध
अपराध नहीं रहता।
कोई कटान
कत्ल नहीं कहलाता।
कोई विस्फोट
विकास बन जाता है।
मेरे सीने में
ड्रिल घुसेगी,
और फ़ाइल कहेगी
कानूनी है।
मेरी देह से
पत्थर निकाले जाएँगे,
और प्रेस विज्ञप्ति बोलेगी
रोज़गार सृजित हुआ।
मेरी नसों का पानी
सूख जाएगा,
और विशेषज्ञ बताएँगे
जलवायु परिवर्तन।
वाह!
कितनी सुंदर भाषा है
नष्ट करने की।
तुमने मुझे
मीटर में तौला,
जबकि मैं
युगों में फैली थी।
तुमने मेरी आयु
हटाकर
मेरी ऊँचाई लिखी।
और फिर कहा
इतनी छोटी चीज़
क्या रोकेगी विकास?
सुनो
मैं विकास नहीं रोकती थी।
मैं विनाश को
थामे खड़ी थी।
मेरे गिरने से
कोई भूकंप नहीं आएगा।
मेरे मरने से
कोई राष्ट्रीय शोक नहीं होगा।
पर जब
दिल्ली की हवा
रेत उगलेगी,
जब
राजस्थान की रातें
और लंबी प्यास बन जाएँगी,
जब
जलाशय केवल
पुरानी तस्वीरों में रह जाएँगे
तब शायद
किसी फ़ाइल के हाशिये पर
कोई लिखेगा
काश,
हमने अरावली को
सिर्फ़ ऊँचाई से
न आँका होता।
मैं अरावली हूँ।
मैं सौ मीटर नहीं,
मैं सभ्यता की सीमा हूँ।
मेरे नीचे गिरते ही
यह देश
थोड़ा और
रेगिस्तान हो जाएगा।
Behad marmik jese kisi maa ke sarir ke tukde tukde krne ke aadesh die ho government ne . Are maa to maa hoti h . Iske nap kamatlab hi kahan hota h . Ye surakhsya kavach h tut gaya to insan ka hal kya hoga . Sochte nji hn.
शुक्रिया संगीता जी
बेहतरीन कविताएं, बहुत बढ़िया
शुक्रिया सर
बेहद सटीक रचनाएँ ! महत्वपूर्ण और सधा हुआ सृजन !
शुक्रिया आपका
प्रिय तेजस!
अरावली पर्वतमाला पर आपकी दो कविताएँ पढ़ीं। बहुत धैर्य से पढ़ते हुए उसके महत्व को समझा।
सबसे पहले शीर्षक– *अरावली : एक प्राचीन श्वास का विलाप*
और दूसरा-
*अरावली का सरकारी शोकगीत*
दोनों ही शीर्षकों ने सबसे पहले ध्यान आकर्षित किया।
शायद इसके पहले मिडिल क्लास में हमने इसके बारे में पढ़ा था।
उस समय का अबोध मन इसकी महत्ता को इतना अधिक नहीं जान सका था।
आपको पढ़ने के बाद इसके बारे में और अधिक जानने की जिज्ञासा हुई।
गूगल में सर्च करके जब इसके बारे में पढ़ा, तो इसका महत्व समझ में आया।हम इसको मात्र राजस्थान की पर्वतमाला मानते थे।
वास्तव में यह दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है, जो लगभग 2 अरब साल पुरानी मानी जाती है और गुजरात से शुरू होकर राजस्थान और हरियाणा से होते हुए दिल्ली तक लगभग 692 किलोमीटर तक फैली है।
यह थार मरुस्थल को पूर्व की उपजाऊ भूमि में फैलने से रोकती है और धूल भरी आँधियों को नियंत्रित करती है।
यह मानसून की दिशा को प्रभावित कर वर्षा कराने में सहायक होती है।
यह तो बहुत थोड़ी सी विशेषताएँ हैं। विशेषताएँ तो इसके आगे भी बहुत है।
पर्यावरण और भौगोलिक दृष्टि से इसका बहुत महत्व है।
आपको पढ़कर अरावली का दर्द और उसकी पीड़ा महसूस हुई।
लेकिन उसकी पीड़ा जिस परमार्थ के भाव से है, कोई उसके महत्व को समझ पाए तब न!
जिस पर्यावरण को आज अपने स्वार्थ के चलते नजरअंदाज किया जा रहा है वही भविष्य में संकट का कारण बनेगा।
जागरुकता के तौर पर ध्यानाकर्षण की तरह, इस बेहद संजिदा कविता के लिये, आपको बहुत-बहुत बधाई।
प्रस्तुति के लिए तेजेन्द्र जी का बहुत-बहुत शुक्रिया।
पुरवाई का आभार।
इतनी विस्तृत टिप्पणी हेतु अशेष आभार आपका मैडम
बहुत बढ़िया कविताएँ तेजस.
बधाई