पतझर में झर जाते पत्ते,शाखें रह जाती हैं
कुछ भी शेष नहीं ऱहता बस यादें रह जाती हैं
कभी नियति ने बांहें फैला,खुली चुनौती दी है
जीवन पथ पर फूल मिले तो चुभते कांटें भी हैं
मंजिल दूर नजर आती,बस,राहें थक जाती हैं
कुछ भी शेष नहीं ऱहता बस यादें रह जाती हैं
निर्झर के आंसू मिलते है,निर्जन पाषाणों पर
बूंदों का सहगान बिखर जाता कोमल पातों पर
सूनी आंखें चुपके चुपके जाने क्या कह जाती हैं
कुछ भी शेष नहीं ऱहता बस यादें रह जाती हैं
मन की बातों को समझूं क्या इतना भीकम था
भींगीपलकों पर सोया हर कतरा कतरा नम था
अंतरमन की गहन उदासी बूंदों मे बह जाती है
कुछ भी शेष नहीं ऱहता बस यादें रह जाती है
मेघों का जादू नभ के आंगन को रंग जाता है
धानी रंग धरती का आंचल ,और संवर जाता है
कंपित अधरों पर मौसम की बाते रह जाती है
कुछ भी शेष नहीं ऱहता बस यादें रह जाती है
इस रिमझिम में अनजाना संसार निखर जाता है
सपनों के मधुमय आंगन में,प्यार बिखर जाता है
दूर बसे पाहुन की बस,मुलाकातें रह जाती है,,
अति सुन्दर। हार्दिक बधाई स्वीकार करें।
सादर प्रणाम के साथ हार्दिक धन्यवाद, आभार आपका।
रचना को आपने अपना स्नेह दिया,आभारी हूं।
पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर
प्रिय पद्मा
तुम्हारी कविता पढ़ी।
कविता जीवन की निरंतरता में मौसम की तरह आने और जाने वाले सुख और दुख की व्याख्या करती है।
जैसे मौसम या ऋतु के अनुरूप प्रकृति में परिवर्तन की गति निश्चित है।इसी तरह जीवन में भी सुख और दुख आते-जाते रहते हैं और जो जीवन विगत है ,वही स्मृतियों में ठहर जाता है।
जिस तरह अतिथि घर में आते हैं और कुछ समय बाद अपनी हल-चल छोड़कर चले जाते हैं। और हम उनकी मुलाकातों को याद करते रह जाते हैं।
वास्तव में जो आज है वही सत्य है ।जो कल बीत गया। वह जाने के बाद भी यादों में ठहर जाता है।
जीवन के यथार्थ को सत्यापित करती हुई बढ़िया कविता है।
बधाई बहुत बहुत।
प्रस्तुति के लिए तेजेन्द्र जी का शुक्रिया।
पुरवाई का आभार।
आदरणीय नीलिमा दी
सादर सस्नेह प्रणाम। आपने मेरी कविता पढी और अपना स्नेहाशीष दिपा।हृदय से आभार बहुत बहुत धन्यवाद दीदी।आपने कविता के मर्म कौ समझा और बहुत अच्छी व्याख्या की,मेरा सृजन कृतार्थ हो गया ।
आभार पुन:।धन्यवाद पुरवाई
उत्तम कविता!
याद रह जाने वाली कविता के लिए बधाई!
हार्दिक धन्यवाद, आभार आदरणीय