देवियों और सज्जनों, ये बरस बीत गया। बरस जब बीतता है तो ना सिर्फ पुरानी संवेदनाओं को रौंद कर जाता है बल्कि नई संभावनाओ के द्वार खोलता भी है। अमूमन नये बरस की पूर्व संध्या पर लोग उत्सव मनाते हुए पार्टी करते हैं। पार्टी करना अब एक परंपरा बन गया है। पर पार्टी पर्व से पूर्व, पश्चताप पर्व मनाने का भी प्रचलन विगत कुछ वर्षों से जोरों पर है। हमारी संस्कृति में आमतौर पर पश्चताप या क्षमा पर्व किसी बड़ी दुर्घटना या अनहोनी होने के बाद शोक प्रकट करने के लिए मनाया जाता है। अमूमन शोक का समय होने के उपरांत एक वर्ष तक कोई विवाह- मुंडन आदि नहीं किया जाता है पर उत्तर आधुनिक युग में सब कुछ उल्टा –पुल्टा हो गया है। जिस तरह हाँगकांग की तरह काफिन होम्स का कांसेप्ट हमारे यहाँ आया वो कितना आजीबोगरीब है।
हमारे यहाँ “घर एक मंदिर “की बात हुआ करती थी अब तो “घर एक ताबूत” का कांसेप्ट प्रचलन में हो गया है। मुंबई में हाँगकांग के काफिन होम्स की तरह बहुतेरे घर आबाद हो गए हैं जिनमें शौचालय और रसोई सटे हुए ही होते हैं। अब जगह की कमी या सब कुछ एक जगह ही उपलब्ध होने की सोच ही शायद इसका कारण रही होगी। मुंबई में भीड़ बहुत है, व्यापार का केंद्र माना जाता है। कुछ दिन पहले वहाँ पर एक जगह पर एक कम्पनी ने लोगों को जीते जी अपने दाह संस्कार को बुक करवाने के पैकेज के विज्ञापन प्रदर्शित किये थे। इसमें चन्दन की लकड़ी से लेकर गंगा में अस्थियाँ विसर्जित करने का फुल इंतजाम। यानी जिसकी जैसी हैसियत वैसी ही उसकी अधोगति। ना पुत्र के किरिया बैठने की जहमत और ना ही किसी परिजन के दाह संस्कार में शामिल होने की शर्त। अगर आपकी जिंदगी आलीशान रही हो तो आपकी मौत भी आलीशान हो सकती है।
शर्त सिर्फ एक ही है “पैसा फेंको –तमाशा देखो” ।
मौत तो एक ही बार आती है पर इंसान नया साल हर वर्ष मनाता है । नये साल के मौके पर लोग एक दूसरे को लंबी उम्र की शुभकामनाएं देते हैं। पहले खत लिखकर या ग्रीटिंग कार्ड लिखकर लोग एक दूसरे को शुभकामनाएं भेजा करते थे जिसमें धन और श्रम दोनों लगते थे, इधर–उधर से मांगी गई शायरियाँ लिखी जाती थी। जिनका मजमून कुछ यूँ हुआ करता था –
“चली जा ग्रीटिंग सरकते–सरकते,
महबूब से कहना नमस्ते–नमस्ते”।
ये ग्रीटिंग छिप –छुपा कर लिखे जाते थे जिसमें छपे तो लाल गुलाब होते थे,पर कभी – कभी लड़के लड़कियाँ स्याही के साथ अपने खून को मिलाकर ग्रीटिंग को लालमलाल कर दिया करते थे। ये और बात थी कि ग्रीटिंग घर वालों द्वारा पकड़े जाने पर लड़के –लड़कियों की इतनी कुटाई –पिटाई होती थी कि नया साल उनके लिए नया सबक सिखा कर जाता था जिसमें आशिकी का सारा भूत उतर जाया करता था। तब उधार की शायरियाँ चला करती थी अब टीपे हुए कट –पेस्ट मेसेज चला करते हैं। मुफ्त के मेसेजिंग ऐप की बदौलत नये साल में सबको शुभकामना ठेल दी जाती है।
लोगबाग शुद्ध हिंदी, खालिस उर्दू और शुद्धतम संस्कृत में भी शुभकामना संदेश ठेल दिये करते हैं। जिसने कभी जीवन में तुकबंदी तक ना की हो वो भी गालिब की तर्ज की शायरी नये साल में मेसेज के जरिये ठेल रहा है। जय हो जुकरबर्ग की कट –पेस्ट सेवा।
ऐसे ही नये साल के पहले दिन की शुभकामनाओं के मेसेज के एक दिन पहले आता है, पश्चताप का मेसेज जो कि क्षमा पर्व की तरह हो चला है। जिसमें पूरे साल दुत्कार –फटकार कर बात करने वाले लोग संत की तरह उदारता से क्षमा मांगते हुए कहते हैं कि “अगर बीतते हुए साल में मेरे बात- व्यवहार से जाने –अंजाने किसी भी तरह से आपको कष्ट पहुंचा हो तो मैं आपसे क्षमा मांगता हूँ”।
यह विनीत भाव से भेजा हुआ मासूमियत से भरा मेसेज उसी तरह की उल्टबांसी है जैसे किसी का कत्ल कर दिया जाए और उसके प्राण निकलने से पहले उसी से गुनाह–ए–कत्ल बख्शवा लिया जाए।
इतनी माफियों की इफरात देखकर एक उद्यमी को माफी की दुकान खोलने का आइडिया आया। उसने सोचा कि अगर दाह संस्कार संपादित कराने की दुकान खोली जा सकती है तो माफी की दुकान भी तो खोली जा सकती है। किस्म –किस्म की माफियाँ और उनके पैकेज। कापर माफी, सिल्वर माफी, गोल्डन माफी, डाएमंड माफ़ी, प्लेटिनम माफी। प्रादेशिक माफी, नेशनल माफी, इंटरनेशनल माफी। देसी माफी, कंटिनेंटल माफी, यूनिवर्सल माफी।
माफी की दुकान में कापर माफी भी इस साल शामिल की गई है, क्योंकि कापर जिसे सबसे गया गुजरा मेटल माना जाता था वह भी अब आम आदमी की पहुँच से बाहर हो गया है। इस साल सोने चांदी की कीमतों की तरह कापर की कीमतों ने भी तहलका मचा दिया।
माफी की दुकान में सबसे हाट केक की तरह बिक रही माफी है,महबूब से माफी ममंगवना। इस माफी के रेट बदलते रहते हैं क्योंकि यह बात पर निर्भर करता है कि कपल का ब्रेकअप कितने दिनों पहले हुआ है और किन वजहों से हुआ है ? अगर प्यार में धोख़ा दिया गया है और एक्स से दुबारा मिलवाना है तो गोल्डन माफी के रेट लगेंगे। पति – पत्नी के बीच विवाद की माफी मंगवाने के लिए सिल्वर माफी के रेट लगते हैं जो सिल्वर के रेट की तरह बहुत ज्यादा हैं। पर माफी वाली कम्पनी का दावा है कि फिर भी यह धनराशि, मैन्टेनेंस और एल्युमिनी से सस्ती पड़ती है।
माफी कम्पनी की दुकान में माँ – बाप से माफी मांगने का कोई पैकेज नहीं है। माफी कंपनी का मानना है कि बच्चों को अपने माँ – बाप से माफी मांगने की कोई जरूरत नहीं है। क्योंकि माँ बाप तो अपने बच्चों को माफ कर ही देते हैं। क्योंकि बागबां के अमिताभ बच्चन जैसे बच्चों को माफी ना देने वाले बाप सिर्फ फिल्मों में पाए जाते हैं, ऐसे कठोर हृदय वाले पिता सिर्फ रील लाइफ में होते हैं, रियल लाईफ में नहीं।
माफी वाली कम्पनी कार्पोरेट सोशल रेस्पोंसबिलिटी (सीयसआर) भी करती है। उसने प्लेटिनम माफी अमेरिका के प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रम्प साहब के लिए आरक्षित कर रखी है। यह माफी ट्रम्प साहब को भारतीयों से मांगनी है जो उन्होंने अमेरिका के चुनाव में भारतवंशियो और भारतीयों से वादा किया था कि वह सत्ता में आयेंगे तो भारत और अमेरिका की दोस्ती को नई ऊंचाई देंगे। लेकिन उन्होंने मित्रता में सुदामा की भाँति कपट किया । उन्होंने ना सिर्फ भारत से अमेरिका जाने वाले माल पर पचास परसेंट कर लगा दिया बल्कि भारतीयों की वीजा की फीस को बहुत ज्यादा बढ़ा दिया ताकि भारतीय लोग अमेरिका ना जा सकें। एक तरफ तो ट्रम्प भारतीय लोगों का अपना मित्र कहते हैं वहीं दूसरी तरफ भारत की अर्थ व्यवस्था को “डेड इइकोनमी” कहकर बदनाम करते हैं। क्या मित्रता में यह छल माफी के लायक है ? और अगर यह माफी मांगी जाती है तो यह दुनिया की सबसे बड़ी माफी होगी, यानी प्लेटिनम
माफी।
एक अदना सा साहित्यकार इन माफियों की फेहरिस्त पढ़ रहा था। उसने मुस्करा ते हुए एक उस्ताद शायर का शेर पढ़ा –
“रहनुमाओं ने कहा है ये साल अच्छा है,
दिल को खुश रखने का गालिब ख्याल अच्छा है “।