सवाल – बाल-साहित्य का स्वरूप कैसा होना चाहिए ?
दिविक रमेश – मोटेतौर पर बाल-साहित्य को दो रूपों में देखा जाता है- उपयोगी बाल साहित्य और रचनात्मक बाल-साहित्य। उपयोगी बाल-साहित्य में जानकारीपूर्ण अर्थात तथ्यात्मक बाल-साहित्य आता है जबकि रचनात्मक बाल-साहित्य में कविता, कहानी, नाटक आदि को लिया जाता है। जहां तक मेरी बात है मैं रचनात्मक बाल-साहित्य को ही ‘बाल-साहित्य’ मानता हूं। बच्चों के लिए रचा गया साहित्य मूलत: बच्चों के आनंद के लिए होता है जिसे वे सहज रूप में अपनाने को अर्थात पढ़्ते चले जाने या सुनते चले जाने को उत्सुक हो जाएं। वह उन्हें बोझ या ‘घर का काम’ न लगे। एक और बात। बाल-सहित्य के माध्यम से भी बच्चों को सुसंस्कृत बनाया जाता है और चीजों के प्रति संवेदंशील भी लेकिन वह ऊपर से आरोपित नहीं किया जाता बल्कि रचना के अंतर्गत ‘खेल खेल की शैली’ में बुना या पिरोया जाता है। आज यह भी जरूरी है कि बाल-साहित्य में आया कथ्य विश्वसनीय लगे। यानि कल्पना ऎसी हो कि वह बे सिर पैर की ना लगे। ऎसी परी कथा तक लिखना संब है, बल्कि लिखी गई हैं। वस्तुत: उपयोगी बाल-साहित्य में जहां विषय प्रमुख होता है वहां रचनात्मक बाल साहित्य में विषय का कलात्मक अनुभव।
सवाल – क्या आपको लगता है कि बाल-साहित्य की रचना प्रक्रिया अत्यन्त सहज व सरल है ?
दिविक रमेश – बाल-साहित्य(अर्थात रचनात्मक बाल साहित्य) की रचना प्रक्रिया को मैं बाल-साहित्य के पुरोधा निरंकारदेव जी की तरह बड़ों के साहित्य की रचना-प्रक्रिया के समकक्ष स्वीकार करता हूं। बच्चों की दुनिया में रहते हुए जो अनुभव कलात्मक अभिव्यक्ति के लिए प्रेरित करते हैं, वे ही एक अच्छी यानि सही मायनों में उचित रचना का सृजन कराते हैं। बड़ों के साहित्य की रचना-प्रक्रिया का मूल आधार भी यही है। बाकी तैयारियों की आवश्यकता तो अपनी जगह है ही। किसी विषय को एक खास भाषा-शैली ऒर रूप में गढ़ देना मात्र रचना नहीं कहलाता। मसलन पेड़ के बारे में बताना और पेड़ पर कविता या कहानी आदि लिखना दो अलग-अलग बाते हैं।


