बाल-साहित्य पर वरिष्ठ साहित्यकार दिविक रमेश से पीयूष द्विवेदी की बातचीत 5
सवाल – बाल-साहित्य का स्वरूप कैसा होना चाहिए ?
दिविक रमेश – मोटेतौर पर बाल-साहित्य को दो रूपों में देखा जाता है- उपयोगी बाल साहित्य और रचनात्मक बाल-साहित्य। उपयोगी बाल-साहित्य में जानकारीपूर्ण अर्थात तथ्यात्मक बाल-साहित्य  आता है जबकि रचनात्मक  बाल-साहित्य में कविता, कहानी, नाटक आदि को लिया जाता है। जहां तक मेरी बात है मैं रचनात्मक  बाल-साहित्य को ही ‘बाल-साहित्य’ मानता हूं। बच्चों  के लिए रचा गया साहित्य मूलत: बच्चों के आनंद के लिए होता है जिसे वे सहज रूप में अपनाने को अर्थात पढ़्ते चले जाने या सुनते  चले जाने  को उत्सुक हो जाएं। वह उन्हें बोझ या ‘घर का  काम’ न लगे। एक और  बात। बाल-सहित्य के माध्यम  से भी बच्चों को सुसंस्कृत बनाया जाता है और चीजों  के प्रति संवेदंशील भी लेकिन वह ऊपर से आरोपित नहीं किया जाता बल्कि रचना के अंतर्गत ‘खेल खेल की शैली’ में बुना या पिरोया जाता है। आज यह भी जरूरी है कि बाल-साहित्य में आया कथ्य विश्वसनीय लगे। यानि कल्पना ऎसी हो कि वह बे सिर पैर की ना लगे। ऎसी परी कथा तक लिखना संब है, बल्कि लिखी गई हैं। वस्तुत: उपयोगी बाल-साहित्य में जहां विषय प्रमुख होता है वहां  रचनात्मक बाल साहित्य में विषय का कलात्मक अनुभव।
सवाल – क्या आपको लगता है कि बाल-साहित्य की रचना प्रक्रिया अत्यन्त सहज व सरल है ?
दिविक रमेश – बाल-साहित्य(अर्थात रचनात्मक बाल साहित्य) की रचना प्रक्रिया को मैं बाल-साहित्य के पुरोधा निरंकारदेव जी की तरह बड़ों के साहित्य की रचना-प्रक्रिया के समकक्ष स्वीकार करता हूं। बच्चों की दुनिया में रहते हुए जो अनुभव कलात्मक अभिव्यक्ति के लिए प्रेरित करते हैं, वे ही एक अच्छी यानि सही मायनों में उचित रचना का सृजन कराते हैं। बड़ों के साहित्य की रचना-प्रक्रिया का मूल आधार भी यही है। बाकी तैयारियों की आवश्यकता तो अपनी जगह है ही। किसी विषय को एक खास भाषा-शैली ऒर रूप में गढ़ देना मात्र रचना नहीं कहलाता। मसलन पेड़ के बारे में बताना और पेड़ पर कविता या कहानी आदि लिखना दो अलग-अलग बाते हैं।

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सवाल – बच्चों के जीवन में बाल-साहित्य की क्या भूमिका है ?
दिविक रमेश – बच्चों के जीवन में नि:संदेह बाल-साहित्य की अहम भूमिका है। मनुष्य के जीवन में साहित्य की जो भी जरूरत सिद्ध है वही बाल-साहित्य की बालक के संदर्भ में भी कही जा सकती है। बालक के जीवन में बाल-साहित्य की सबसे अहं भूमिका तो बालक को बालक बनाए रखने में ही है। बाल-साहित्य बच्चे से उसके बचपने ऒर उसके अधिकारों को छीनने वाली तमाम ताकतों को सहज रूप से पराजित करता है। उसे एक सहज, अंकुठित, संवेदनशील ऒर उचित मनुष्य बनाने की दिशा में सहजता के साथ खेता है। ऒर हां मैं बाल-साहित्य को ’सब का साहित्य’ कहना अधिक पसंद करूंगा। बच्चों के खिलॊने आदि को बच्चों के खिलॊने कहा जा सकता है लेकिन बाल साहित्य को ’सबका साहित्य’ कहा ऒर माना जाना चाहिए। वस्तुत: बाल-साहित्य बच्चे से बूढ़े सबके लिए होता है। बड़े जब ’बाल-साहित्य’ पढ़ते हैं तो कम से कम दो प्रभाव विशेष रूप से देखे जा सकते हैं। एक तो यह कि वे अपने बच्चों को चुनकर बेहतर बाल-साहित्य उपल्ब्ध करा सकते हैं ऒर दुसरे खुद अपने भीतर के बच्चे अर्थात मानव-सुलभ जरूरी मासूमियत को बचाए रख सकते हैं। ऒर यह भी कि मैं बच्चे को मनुष्यता की सांस समझता हूं। मनुष्य का सांस लेना बहुत ही सहज ऒर निरंतर प्रकिया है अत: हमारा ध्यान उसकी अहमियत की ओर प्रय: नहीं जाता लेकिन उसमे थोड़ा सा भी व्यवधान उसकी सर्वोपरि आवश्यकता को उजागर कर देता है। मनुष्य के जीवन में बच्चे की भी यही भूमिका ऒर स्थिति है। इस संदर्भ में बाल-साहित्य बच्चे को बच्चा बने रहने में अहं भूमिका अदा करता है, वह भी कितना महत्त्वपूर्ण है इस पर कोई बहस नहीं हो सकती। तो बच्चे ही नहीं सभी मनुष्यों के जीवन में बाल-साहित्य की बहुत बड़ी ऒर अनिवार्य भूमिका है।
सवाल – बाल-साहित्य के प्रति हिंदी के समकालीन स्थापित लेखकों/रचनाकारों में अत्यंत हल्केपन और अ-गंभीरता का भाव परिलक्षित हो रहा है ! अधिकत्तर स्थापित व बड़े साहित्यकार बाल-साहित्य से दूरी बनाए हैं जिस कारण हिंदी में बाल-साहित्य की काफी कमी परिलक्षित होती है। इसपर आप क्या कहेंगे ?
दिविक रमेश – बंगाल में कहावत है कि जब तक कोई लेखक बच्चों के लिए नहीम लिख लेता वह बड़ा साहित्यकार नहीं कहलाया जा सकता। मैं भी इस बात को सही मानता हूं। हां हिन्दी साहित्य के वर्तमान परिदृश्य में एक हद तक आपकी बात सही है। लेखकों में ही नहीं लेखन से जुड़ी संस्थाओं, आलोचकों, मिडिया (प्रिंट ऒर इलॆक्ट्रोनिक) आदि में भी बाल-साहित्य को या तो उपेक्षित निगाहों से देखा जाता है अथवा कम महत्त्वपूर्ण माना जाता है। केन्द्रीय धारा के बड़ों के लिए लिखे गए साहित्य के इतिहास में भी बाल-साहित्य को सम्मिलित करने में गुरेज ही प्रतीत होता है। लेकिन, अच्छी बात यह है कि इस विपरीत माहौल के बावजूद जहां एक ओर हिन्दी में बाल-साहित्य (खासकर बाल-कविता) उत्कृष्ट बिन्दुओं को छू चुका है वहीं धीमी गति से ही सही बाल-साहित्य के महत्त्व को समझने के प्रयास प्रारम्भ हो चुके हैं। आज हिन्दी के बाल-साहित्य की जानकारी भी बढ़ी है। मसलन प्रेमचन्द ने हिन्दी का पहला बाल-उपन्यास लिखा था ऒर जंगल की कहानियां नाम से खासतॊर पर बच्चों के लिए कहानियां लिखी थीं  या अमृतलाल नागर, विष्णु प्रभाकर, मोहन राकेश, बच्चन, दिनकर, भवानीप्रसाद मिश्र आदि  ने बहुत अच्छी बाल-रचनाएं लिखी हैं ऒर बहुत से अन्य बड़ों के लेखन में प्रसिद्ध हो चुके साहित्यकार अब लिखने को प्रेरित हैं। मैं स्वयं बड़ो का साहित्यकार पहले मान लिया गया था, बच्चों के लेखन में बाद में आया था। फिर भी स्थिति में सुधार की बहुत बड़ी गुंजाइश बनी हुई है, ऒर इसके अपने कई कारण हैं। लेकिन मैं यह भी कहना चाहूंगा कि आज बहुत से साहित्यकार ऎसे भी हैं जो बच्चों के लिए ही लेखन करते हैं। इनके साहित्य का भी कम मूल्य नहीं है।
सवाल – आज के इस डिजिटल युग में जब कोर्स की पढ़ाई के बाद बच्चों का अधिकाधिक समय टीवी, कंप्यूटर आदि के साथ बीत रहा है, आपको नही लगता कि बच्चों में साहित्य के प्रति लगाव कम हो रहा है ? अगर हाँ तो इसके लिए आप किसे दोषी मानते हैं और इसका समाधान क्या है ?
दिविक रमेश – यदि बच्चों का लिखित साहित्य के प्रति लगाव कम लग रहा हे तो उसके लिए टी.वी आदि उपकरण उतने जिम्मेदार नहीं हैं जितने हम बड़े। हम पुस्तक का विकल्प भ्रमवश इन सुविधाओं को मान बॆठे हैं। ये विकल्प नहीं बल्कि सहयोगी की भूमिका में होने चाहिए थे। होता क्या है? अपने द्वारा बना लिए गए कृत्रिम व्यस्तता के किलों में बंद रहकर या रहने के लिए बड़ों ने अपने से पीछा छुड़ाने के लिए अर्थात अपनी सुविधा के लिए बच्चों को मात्र इन उपकरणों की ओर धकलने की सुविधा प्राप्त कर ली है। वे खुद किताबों से दूर होते जाते रहे हैं फिर बच्चों के क्या आदर्श बनेंगे। हमारे ही देश में ऎसे स्थान भी हैं जहां बच्चों के जन्मदिनों आदि पर पुस्तकें भेंट की जाती हैं। बड़े लोग गलत समझते हैं कि बच्चों के लिए मात्र पाठ्यक्रम में लगी पुस्तकें पढ़ लेना पर्याप्त है। कुछ बातें तो मैं पहले ही कह चुका हूं।
सवाल – आज के बच्चे ही कल देश की बागडोर संभालेंगे, ऐसे में उनके लिए कैसा साहित्य होना चाहिए?
दिविक रमेश – निश्चित रूप से आज का बच्चा कल की मानवता का भविष्य है। एक अच्छा मनुष्य कैसा होना चाहिए, यह कमोबेश हर जागरूक मनुष्य को पता है, भले ही वह किसी भी भू-भाग का हो, जाति, धर्म, रंग आदि को हो। हर मनुष्य अन्तत: मनुष्य है यह बात, भेद बनाए रखने में प्रयासरत तमाम प्रतिकूल ताकतों के बावजूद, समझ में आ चुकी है। बाल-साहित्य मनुष्य की दुनिया में इस दिशा में ले जाने वाला सबसे बड़ा पथ-प्रदर्शक हो सकता है ऒर वह भी बिना किसी आतंक, धौंस, जबरदस्ती, उपदेशात्मकता आदि की शॆली के। असल में, जैसे स्वाभाविक रूप से बच्चे के लिए सब और सबके लिए बच्चा बिना किसी दुराग्रहों के स्वीकार होता है वैसे ही बाल-साहित्य भी अपने सहज ऒर मासूम रूप के कारण सबको ग्राह्य होता है। जैसा मैं संकेत कर चुका हूं, आज बाल-साहित्य, अपनी शैली में भले ही अधिक से अधिक दोस्ताना होता चला गया हो लेकिन जिम्मेदार बड़ों के द्वारा लिखे जाने के लिए अन्तत: बच्चे को एक ऎसा मनुष्य बनाने की राह पर ले जाता है जो अंकुठित हो, संवेदनशील हो, आत्मविश्वासी हो, तर्कशील हो, कर्तव्यों ऒर अधिकारों के प्रति सजग हो, मनुष्य को मनुष्य से ही बांटने वाले भेदक तत्वों से दूर रहने वाला हो, अंधविश्वासों से परे हो, इत्यादि। संक्षेप में तो अभी इतना ही। हां, फिर कहना चाहूंगा कि ’बाल-साहित्य’ में यह सब आरोपित ढंग से सिखाने की शैली नहीं, बल्कि बच्चों को इनका भागीदारी बनाने ऒर अपनत्व देने की शॆली में बुनना होता है।यह चुनौती भी है और कौशल भी।

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