इन दिनों
बसंत की आहट है—
दूर देशों से मित्रों द्वारा भेजे चित्रों में
चेरी ब्लॉसम की मुस्कराहट है।
कुछ क्षण भर की वह आभा
कैमरों में क़ैद होकर
मुझे याद दिलाती है—
सुंदरता टिकती नहीं,
सिर्फ़ दिखाई देती है।
कहते हैं,
बसंत प्रकृति का उत्कर्ष है—
पर क्या उत्कर्ष भी
एक ठहराव भर नहीं,
अगले परिवर्तन से पहले?
तब सोचता हूँ—
बाक़ी मौसम भी
शायद अपने-अपने प्रश्न हैं।
जाड़ा
सिखाता है संकुचन—
कि भीतर सिमटे बिना
ऊष्मा नहीं मिलती।
गर्मी
जैसे कोई तपस्या हो,
जहाँ छाँव का अर्थ
धूप के बाद ही समझ आता है।
और वर्षा—
वह मिटाती नहीं,
परतें हटा देती है,
बताती है
कि बह जाना स्वभाव है
या ठहरना स्वभाव।
तब समझ में आता है—
मौसम बदलते नहीं,
हम उनके अर्थ बदलते हैं।
और कड़कड़ाती ठंड में
जो तसल्ली होती है
कि बसंत आएगा—
वह बसंत का नहीं,
उम्मीद के चक्र का विश्वास है।
शायद जीवन भी
इन्हीं ऋतुओं की तरह है—
जहाँ हर अंत
अपने भीतर
एक आरंभ छुपाए रहता है।
- प्रदीप गुप्ता
A1607-08 , Mantri Serene , Goregaon East, Mumbai -400065
