बशीर बद्र साहब हमारे दौर के सबसे लोकप्रिय शायरों में गिने जाते हैं। यह मेरी खुशकिस्मती रही कि मुझे उन्हें अनेक मुशायरों में सुनने का अवसर मिला और उनकी एक साहित्यिक महफ़िल का संचालन करने का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ। यह लगभग 2003-04 की बात है, जब मैंने कुछ मित्रों के साथ हैदराबाद के राजस्थानी स्नातक संघ में एक काव्य-गोष्ठी का आयोजन किया था। उस कार्यक्रम में बशीर बद्र और नारायण दास जाजू विशिष्ट अतिथि थे। बशीर बद्र साहब ने अपनी शायरी से ऐसा समाँ बाँधा कि लगभग एक घंटे तक श्रोता उनके अशआर में डूबे रहे और भरपूर आनंद लेते रहे। उस महफिल में बशीर साहब ने कहा था कि ऐसी महफिलें होनी चाहिए, जहाँ शायर दिल भरकर सुना सके।
इस घटना के बाद भी मुझे उनसे एक-दो बार मिलने का अवसर मिला। हालाँकि मैं लगातार उनकी शायरी पढ़ता और सुनता रहा हूँ और कार्यक्रमों में उनके शेर कोट भी करता रहा हूं। अब जबकि वे इस दुनिया से विदा हो चुके हैं, मुझे ऐसा लगता है कि वे अपने पीछे शायरी का एक अत्यंत समृद्ध ख़ज़ाना छोड़ गए हैं, जो आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा।
सैयद मोहम्मद बशीर उर्फ डॉ. बशीर बद्र ने ग़ज़लों को नया जीवन और नई चेतना प्रदान की। उनकी शायरी में ग़ज़ल अपनी विशिष्टता और मौलिकता के साथ चमकती दिखाई देती है। वे अपने रंग और शैली के एक अलग तरह के आलोचक भी हैं। उनका व्यक्तित्व अनेक परतों वाला है। बशीर बद्र का जन्म 15 फ़रवरी 1935 को उत्तर प्रदेश के अयोध्या नगर में हुआ। उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त की। ‘आज़ादी के बाद उर्दू ग़ज़ल का आलोचनात्मक अध्ययन’ विषय पर शोध करके पीएच.डी. की डिग्री हासिल की। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में प्राध्यापक के रूप में की। बाद में मेरठ विश्वविद्यालय से जुड़े और लगभग सत्रह वर्षों तक उर्दू विभागाध्यक्ष के रूप में सेवाएँ प्रदान कीं। सन् 1987 में मेरठ के सांप्रदायिक दंगों के दौरान उनका घर जला दिया गया। इस दुर्घटना में उनकी अनेक महत्वपूर्ण और अप्रकाशित रचनाएँ भी नष्ट हो गईं। इस घटना ने उनके मन और मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव डाला। वे इतने आहत हुए कि भोपाल चले गए और कई महीनों तक लेखन-पठन से दूर रहे। अपने घर की उस कहानी को उन्होंने शेर में बांधा था-
लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में
बशीर बद्र की पहचान उनके उस शेर से हुई थी, जो उन्होंने बहुत पहले शायद विद्यार्थी जीवन में कहा था-
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए
निदा फाज़ली ने कहा था कि उनका यह शेर स्वयं बशीर बद्र से कुछ ज्यादा ही प्रसिद्ध हो गया। यह शेर हर जगह सुनाई देता है और लोगों की ज़ुबान पर रहता है। निदा ने यह भी कहा था कि बशीर बद्र की आवाज़ दूर से ही पहचानी जा सकती थी। किसी भी कवि या शायर के लिए यह बहुत बड़ी उपलब्धि होती है कि उसकी पहचान केवल उसके नाम से नहीं, बल्कि उसकी आवाज़ और शैली से भी हो जाए।
सन् 1946 में, मात्र ग्यारह वर्ष की आयु में उन्होंने अपनी पहली ग़ज़ल कही, जिसका पहला शेर था—
हवा चल रही है, उड़ा जा रहा हूँ
तेरे इश्क़ में मैं मरा जा रहा हूँ।’
बताते हैं कि इटावा में एक साहित्यिक सभा में उन्होंने अपनी पहली ग़ज़ल सुनाई। ग़ज़ल इतनी पसंद की गई कि उन्हें ‘बद्र’ का ख़िताब दिया गया। इस प्रकार सैयद मोहम्मद बशीर, ‘बशीर बद्र’ बन गए। बशीर बद्र का परिचय केवल एक शेर तक सीमित नहीं है। उन्होंने लंबी रचनात्मक यात्रा तय की है। चाहे मुशायरे का मंच हो या पत्रिकाओं के पन्ने, हर जगह उन्होंने अपने कलात्मक बोध की गहरी छाप छोड़ी है। यद्यपि उनकी दृष्टि में मुशायरों की दुनिया कभी-कभी ऐसी लगती है, जहाँ एक सृजनशील व्यक्तित्व जन्म लेता है और वहीं समाप्त हो जाता है, फिर भी यह स्पष्ट सत्य है कि आज भी असंख्य श्रोता और पाठक उनके अशआर पर मुग्ध दिखाई देते हैं।
मख़मूर सईदी ने उनके बारे में सच ही कहा था कि बशीर बद्र की ग़ज़लें मानसिक शांति और सांस्कृतिक वातावरण की जीवित आत्मा का चित्र प्रस्तुत करती हैं। ये सरल शब्दों में कही गई ऐसी रचनाएँ हैं, जो शिकायत से दूर होते हुए भी सादगी के सौंदर्य से भरपूर हैं। ताज़ी हवा के नरम झोंकों की तरह ये मन को छूकर सीधे दिल में उतर जाती हैं।
बशीर बद्र की लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण उनकी मौलिकता है। उनकी शायरी में सादगी और चंचलता का ऐसा मेल है, जो पाठक और श्रोता दोनों को प्रभावित करता है। वे साधारण शब्दों को भी अत्यंत सुंदर काव्यात्मक रूप दे देते हैं।
ख़ुदा ऐसे एहसास का नाम है,
रहे सामने और दिखाई न दे
मुहब्बत, अदावत, वफ़ा, बेरुख़ी
किराये के घर थे बदलते रहे
अब किसे चाहें, किसे ढूँढा करें
वह भी आख़िर मिल गया, अब क्या करें
विख्यात गीतकार और शायर शहरयार का मानना था कि नई ग़ज़ल पर कोई भी चर्चा बशीर बद्र के उल्लेख के बिना पूरी नहीं हो सकती। यह सच भी है बशीर बद्र की शायरी में प्रेम, मानवीय रिश्ते, जीवन-दर्शन और संवेदनाओं का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। अज़ीज़ इंदौरी ने उनके बारे में लिखा है कि उन्होंने गहन वैचारिक दृष्टि को अपनाते हुए सहज और बेफ़िक्र लहजे के साथ आधुनिक प्रतीकों और नए शब्दों का प्रयोग किया, जिससे कविता में नये अर्थ उत्पन्न हुए। उनकी अधिकांश ग़ज़लें विचार और कला के सौंदर्य से सुसज्जित हैं।
बशीर बद्र का दूसरा संग्रह ‘इमेज’ 1973 में प्रकाशित हुआ. इत्तेफाक ही है कि उसी साल मैं मैने दुनिया में आँखें खोली थी। प्रोफेसर आल अहमद सुरूर ने इमेज की ग़ज़लों पर लिखा था कि इसमें नया एहसास, नई उपमाएँ, नए रूपक, नई तस्वीरें और नए बिंब अर्थपूर्ण ढंग से उपस्थित हैं। यहाँ शरीर की ऊष्मा भी है और आत्मा की प्यास भी। बदलती हुई ज़िंदगी के नए अनुभव और भावनाएँ भी इसमें दिखाई देती हैं। यह संग्रह उनके काव्य की मूल विशेषताओं का उत्कृष्ट प्रतिनिधित्व करता है।
इकाई और इमेज दोनों संग्रहों के में बाद वो उर्दू के बड़े शायरों की सफ में खड़े हो गये। उनका नाम नासिर काज़मी के बाद आधुनिक ग़ज़ल के सबसे महत्वपूर्ण और विश्वसनीय शायरों में गिना जाने लगा। गंभीर साहित्यिक स्वर से अलग, मुशायरों में उनका अंदाज़-ए-बयाँ और तरन्नुम एक अलग ही आकर्षण पैदा करता था। वे अपनी विशिष्ट प्रस्तुति से श्रोताओं का दिल जीत लेते थे।
बशीर बद्र हर मंच पर समान रूप से लोकप्रिय रहे हैं। इसका कारण यह है कि उन्होंने लगभग हर शेर में किसी नई बात को नए ढंग से कहने की कोशिश की। चाहे विषय आधुनिकता का हो या मनुष्य की शाश्वत भावनाओं का, उनकी ग़ज़लें हमेशा नई और ताज़ा प्रतीत होती हैं।
प्रसिद्ध मुशायरा-संचालक और शायर डॉ. मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद ने कहा था कि आधुनिक उर्दू ग़ज़ल का कोई भी परिदृश्य डॉ. बशीर बद्र के उल्लेख के बिना पूर्ण नहीं हो सकता।’ वास्तव में उनकी शायरी उर्दू साहित्य की अमूल्य धरोहर है। आधुनिक उर्दू कविता में उन्हें ‘ग़ज़ल का इमाम’ कहा जाता है।
मुझे इत्तेफ़ाक से शहरयार और निदा फाज़ली के साथ कुछ वक़्त गुज़ारने का मौक़ा मिला है। निदा फाज़ली ने कहा था-
दुश्मनी लाख सही ख़त्म न कीजे रिश्ता
दिल मिले या न मिले हाथ मिलाते रहिए
ये शेर जब बशीर साहब के पास पहुँचा तो उन्होंने इसका जवाब कुछ यूँ दिया था-
कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से
यह नए मिज़ाज का शहर है, ज़रा फ़ासले से मिला करो।
अपनी अपनी तबियत और मिज़ाज की बात है, लेकिन बशीर साहब बहुत कोमल स्वभाव के थे। नफ़रतों के खिलाफ उन्होंने रचनाधर्मिता खूब निभाई। वे संदूक़ों में भरकर नफ़रतें ख़त्म करने की बात करते थे। जानते थे कि वो दरिया की तरह हर तरफ रास्ता निकाल लेंगे।
हम भी दरिया हैं, हमें अपना हुनर मालूम है
जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे, रास्ता हो जाएगा
बशीर बद्र ने अपने अशआर के माध्यम से जीवन के लगभग हर अनुभव और समस्या को अत्यंत सलीके से अभिव्यक्त किया है, लेकिन उनकी ग़ज़लों में प्रेम का रंग सबसे अधिक दिखाई देता है। इसी कारण उन्हें ‘मुहब्बत का शायर’ भी कहा जाता है। उनकी ग़ज़लों में मिठास, संगीतात्मकता और गेयता का अद्भुत संगम मिलता है।
उनकी कुछ और यादगार पंक्तियाँ देखिए—
‘कोई फूल धूप की पत्तियों में हरे रिबन से बँधा हुआ
वो ग़ज़ल का लहजा नया नया, न कहा हुआ न सुना हुआ
‘जिसे ले गई है अभी हवा, वो वर्क था दिल की किताब का
कहीं आँसुओं से मिटा हुआ, कहीं आँसुओं से लिखा हुआ
बशीर बद्र के अशआर की लोकप्रियता हर दौर और हर वर्ग में रही है। बड़े-बड़े आलोचक, वक्ता, लेखक और राजनेता अपनी बात को प्रभावशाली बनाने के लिए उनके शेरों का सहारा लेते हैं। यहाँ तक कि राज्यसभा और लोकसभा में भी उनके शेर बार-बार उद्धृत किए जाते रहे हैं।
सन् 1972 के शिमला समझौते के समय पाकिस्तान के राष्ट्रपति ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो ने तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को मित्रता और सद्भावना का संदेश देते हुए उनका यह शेर सुनाया था—
दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे
जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों
फरवरी 2018 में लोकसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने जब यही शेर उद्धृत किया तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जवाब में बशीर बद्र का यह शेर सुनाया—
जी बहुत चाहता है सच बोलें
क्या करें, हौसला नहीं होता
सन् 1999 में डॉ. बशीर बद्र तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ अमेरिका की यात्रा पर गए थे। वहाँ आयोजित एक मुशायरे में उन्होंने अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश की नीतियों के कारण ग़रीबों, कमज़ोरों और मासूम लोगों पर हुए अत्याचारों के संदर्भ में यह शेर पढ़ा था—
मासूम जुगनुओं को मसलने का शौक़ है
तौबा करो, ख़ुदा से डरो, तुम नशे में हो।
एक ओर शायर अपने युग का प्रवक्ता होता है, तो दूसरी ओर वह दूरदर्शी भी होता है। वह केवल अपने समय को ही नहीं देखता, बल्कि आने वाले समय की समस्याओं को भी पहचान लेता है। डॉ. बशीर बद्र में यह गुण भरपूर रूप से मौजूद था। उन्होंने जहाँ अपने दौर की सच्चाइयों को व्यक्त किया, वहीं भविष्य के सामाजिक और मानवीय संकटों की ओर भी संकेत किया। इसी संदर्भ में उनके कुछ शेर उल्लेखनीय हैं—
हिंदुस्तान का सच्चा वफ़ादार मैं ही हूँ
कब्रों से पूछ, असली ज़मींदार मैं ही हूँ।
‘दरिया के साथ वो तो समंदरों में मिल गया
मिट्टी में मिल के मिट्टी का हक़दार मैं ही हूँ
व्यंग्यकार मुज्तबा हुसैन मेरे सरपरस्तों में रहे हैं। उन्होंने एक रेखाचित्र में बशीर बद्र के बारे में बड़ा दिलचस्प किस्सा बयान किया है- एक बार दिल्ली की एक साहित्यिक सभा में बशीर बद्र को अपना कलाम सुनाने के लिए आमंत्रित किया गया। उर्दू के महान कथाकार राजेन्द्र सिंह बेदी साहब कहा कि ‘यार! हमने दर-ब-दर, मुल्क-बदर और शहर-बदर तो सुना था, यह ‘बशीर बद्र’ क्या होता है? इस पर सब हंस पड़े।
बहुत कम रचनाकारों को ऐसी लोकप्रियता मिलती है, बशीरबद्र के शेर लोगों को मुहावरों और लोकप्रिय गीतों के बोल की तरफ ज़बान पर चढ़ गये। ‘कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी, वो गुलाबों का शजर लगता है, बेवज़ू आँखें हैं, पढ़ते हुए डर लगता है, मैं मोम हूँ, उसने मुझे छूकर नहीं देखा, उम्रें बीत जाती हैं दिल को दिल बनाने में.. जैसे असंख्य मिस्रे लोंगों की ज़ुबान पर चढ़ गये हैं।
डॉ. बशीर बद्र के सात काव्य-संग्रह उर्दू में और हिंदी में प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी प्रमुख कृतियों में ‘इकाई’, ‘आसमान’, ‘इमेज’, ‘आमद’, ‘आहट’, ‘आस’, ‘अल्लाह हाफ़िज़’ तथा ‘बीसवीं सदी में उर्दू ग़ज़ल’ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। उनकी अनेक रचनाओं का अंग्रेज़ी और फ़्रांसीसी भाषाओं में अनुवाद भी किया गया है। उनके चार काव्य-संग्रहों का संकलित संस्करण ‘कुल्लियात-ए-बशीर’ शीर्षक से पाकिस्तान में प्रकाशित हो चुका है। उर्दू भाषा और साहित्य के प्रति उनके अमूल्य योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें 1999 में पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया। इसके अतिरिक्त उन्हें साहित्य अकादेमी पुरस्कार भी प्राप्त हुआ। वे मध्य प्रदेश उर्दू अकादमी के अध्यक्ष पद पर भी आसीन रहे। बॉलीवुड की प्रसिद्ध फ़िल्मों ‘डेढ़ इश्क़िया’ (2014) और ‘मसान’ (2015) में उनके कई शेर सुनाई देते हैं। उनकी अनेक ग़ज़लों को जगजीत सिंह और चंदन दास जैसे लोकप्रिय ग़ज़ल गायकों ने अपनी मधुर आवाज़ में अमर कर दिया।

- एफ एम सलीम
ब्यूरो चीफ, डेली हिंदी मिलाप, हैदराबाद
[email protected], (9848996343)
मूल रूप से पत्रकार, कहानी, कविता, ललित निबंध एवं आलोचना सहित विभिन्न विधाओं में लेखन, 13 पुस्तकें प्रकाशित।

एफ एम सलीम जी ने बशीर बद्र साहब पर बहुत विस्तृत विवरण देते हुए उनकी ग़ज़लों का विश्लेषण किया है शुक्रिया।
हमारे विचार से उनका यह शे’र लोकतंत्र और वैश्विक स्तर पर वैदेशिक नीतियों पर आज बहुत ही प्रासंगिक हैं मौजूं है
कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से
ये नए मिजाज का शहर है ज़रा फांसले से मिला करो
डा बशीर बद्र साहब की स्मृतियों को शत् शत् नमन विनम्र श्रद्धांजलि
आदरणीय सलीम सर!
आपको पढ़ा-
*आधुनिक ग़ज़ल के साथ प्रतिनिधि शायर बशीर बद्र का जाना*
बड़े-बड़े शायरों को पढ़ना अलग बात है और उन्हें जानना अलग बात है। इसमें कोई दो मत नहीं कि शेर और शायरी! दोनों ही बहुत प्रभावशाली होती हैं। बहुत गहरी होने के कारण सीधे दिल तक दस्तक देती हैं।
हमारा परिचय तो उनके शेरों के माध्यम से ही रहा। और उससे ज्यादा उन्हें जाना नहीं। उनके जाने के बाद उन्हें अधिक जाना, और जो रह गया था वह आपके इस लेख से उनके बारे में पता हुआ।
कोई भी बड़ा साहित्यकार ;चाहे वह हिंदी का हो या उर्दू का, उनसे अपना परिचय होना या उनसे मुलाकात होना; बड़े फक्र की बात होती है।
आप वाकई बहुत भाग्यशाली हैं।
निश्चित रूप से यह सत्य है कि “वे अपने पीछे शायरी का एक अत्यंत समृद्ध ख़ज़ाना छोड़ गए हैं, जो आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा।”
आपके लेख से पता चला कि उनका अध्ययन काफी समृद्ध रहा।
मेरठ में घटी उनकी घटना के बारे में पढ़ कर हम भी स्तब्ध हुए कि ऐसा क्यों?
*लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में*
*तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में*
वाकई इस शेर के पीछे की कहानी बहुत मार्मिक है।
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए
☝️ यह शेर काफी प्रसिद्ध रहा।
निदा फाज़ली ने सही कहा कि उनका यह शेर स्वयं उनसे कुछ ज्यादा ही प्रसिद्ध हो गया। यह शेर आज भी हर जगह सुनाई देता है और लोगों की ज़ुबान पर रहता है।
यह बात भी100 फीसदी सही है कि,”किसी भी कवि या शायर के लिए यह बहुत बड़ी उपलब्धि होती है कि उसकी पहचान केवल उसके नाम से नहीं, बल्कि उसकी आवाज़ और शैली से भी हो जाए।”
निदा फ़ाज़ली भी हमारे प्रिय शायर हैं
*”दुश्मनी लाख सही ख़त्म न कीजे रिश्ता*
*दिल मिले या न मिले हाथ मिलाते रहिए”*
☝️यह हमारा प्रिय शेर है।
इसे पढ़ते हुए चेहरे पर मुस्कान आ जाती है।
*कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से*
*यह नए मिज़ाज का शहर है, ज़रा फ़ासले से मिला करो।*
*हम भी दरिया हैं, हमें अपना हुनर मालूम है*
*जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे, रास्ता हो जाएगा*
यह स्वाभिमान की बात है।
*”दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे*
*जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों”*
इस शेर से तो हम भी पूरी तरह सहमत हैं।
आपके माध्यम से बशीर बद्र साहब को थोड़ा और जान पाए।
आपका इस लेख के लिये बहुत-बहुत शुक्रिया।
ईश्वर दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करें।
कमलेश कुमार दीवान जी और नीलिमा जी धन्यवाद।
बहुत ही सुंदर लेख के लिए धन्यवाद। इस लेख से मुझे बशीर बद्र के बारे में जानकारी मिली और उनकी रचनाओं को पढ़ा। आशा है कि इस प्रकार के लेख आगे भी आते रहेंगे ताकि हम अपने साहित्य के बारे में जानकारी हासिल कर सकें।