ब्रह्मांडीय विनम्रता
हम धूल हैं—
परिभाषा से परे,
तारों की धूल सरीखे,
जो टूटकर नहीं—
बस अक्स बदलकर
पृथ्वी में मिल गए।
तारों की धूल
सुनहरी हो सकती है,
पर हम भी तो
धूल के कण ही हैं—
मिट्टी से उठे,
मिट्टी के घरौंदों जैसे,
मिट्टी के गुड्डे।
फिर इतना अहम क्यों
अपने मिट्टी होने पर?
सागर, पर्वत, आसमान, दरिया—
मिट्टी के ही चेहरे हैं,
शून्य के धागे,
जो भीतर बहते हैं।
लेकिन हम
भीतर की हवा को तोलकर
उन्हें
सफलता से बड़े आशियाने
बना लेते हैं—
अपने कद से
कहीं ज्यादा ऊंचे।
सोन-धूल हो
या सादा मिट्टी—
भेद सिर्फ दृष्टि में,
तत्व में कहीं नहीं।
रेत का बवंडर भी
रेत का ही एक रूप है—
क्षणिक उड़ान,
निश्चित वापसी
रेगिस्तान में।
मिट्टी
सिर्फ मिट्टी नहीं,
वापसी है
तारों की जमीं पर—
जहाँ आख़िर
सब कुछ
लौटता है।
धूल का कण
सुनहरा हो
या सांवरा—
धूल ही रहता है।
निर्विकार।
नि:शब्द।
और हम—
मात्र एक ज़र्रा।
…………………..
ठसक
तुम नदी —
मैं घाट।
आओ, न!
बहो
मेरे बीच से होकर।
मेरे किनारों को छूकर
निकलो चाहे,
लेकिन कुछ बूँदें
छोड़ जाओ,
ताकि
प्यास बुझे न —
मेरे सूखे होठों को भिगो दे,
लेकिन
और प्यासा छोड़ दे!
कितना बड़ा रिश्ता है
अपने बीच —
ओजस लिए
पलास की महक से पुलकित
यही कामना रहती है —
तू सूखे न कभी।
एक रिश्ता सा रहे,
भटकन का ही सही —
तेरे लिए
भटकता हुआ एहसास लिए।
चाहे कभी
मुकम्मल न हो
मेरी ठसक।
तुम नदी हो,
मेरे मौन को
जी कर गुजरो!
मैं घाट हूँ।
रुके रहना मेरी नियति —
खड़ा रहूँगा वहीं,
तेरी और नई बरसात की
प्रतीक्षा में।
…………..
उठो
हमारे हिस्से का
शुद्ध पानी छोड़ दो
नदियों में
गंदगी, रासायनिक विष, प्रदूषकों से
उफन रही हैं नदियाँ।
गहरे शोक में हैं
वृक्ष नदी किनारे —
कदम्ब और अर्जुन।
प्यासे हैं
पक्षी-परिंदे,
मुर्गाबियाँ,
बत्तखें,
हंस —
सूखी हुई नदी को
घूरते हुए।
बादल भी तो
विरह से हैं
ओत-प्रोत।
पीने को प्यासे
आदिवासी,
मरती नदी के लिए
विलाप करते हुए
कैसे धोएँ
नदी के ज़ख्मी जज़्बातों को?
आक्रोश में हैं —
कि रासायनिक ज़हर से होगी
मुक्ति, कब?
थोड़ी-सी तो छोड़ दो —
निर्मल बूँदें
मेरे चश्म के लिए
नीर बन पाएँ जो
बीमार तहज़ीब पर —
बहाने के लिए।
डर है —
नदी की संस्कृति
मर न जाए कहीं।
कभी ढेर न हो जाएँ
सभ्यताएँ
सड़ रही नदी किनारे।
अगर
आँखों से भी छिन गए
कड़वे पानी के कतरे,
तो क्या ही है विकल्प
सड़कों पर उतरने के सिवा —
इससे पहले कि
नदियों के साथ
सूख जाए
बाजुओं में रक्त,
गले से आवाज़।
उठो।
……………….
इमोजी युग की भाषा
कुछेक गालियाँ ही
बची हैं—
शब्दकोशों में…
कुछ के लिए हैं—
रामपुरी चाकू जैसी…
दिल को फाड़कर
निकल जाती हैं—
आर-पार।
कुछ के लिए
मेटा की गढ़ी हुई इमोजी—
उन्हीं के डिजिटल कारखाने से
निकल आती हैं
स्क्रीन पर…
ऑटोमैटिक गन की तरह…
सब कुछ जैसे कंट्रोल में है—
हम इमोजी दागते हैं,
और वे हमें।
मैं ही हूँ क्या
इतना खाली…?
या हूँ—
पुरानी सदी का आदमी…
कि बहुत वक्त रहता है
मेरे पास
लंबे-लंबे संवादों
के लिए।
देखता रहता हूँ…
चमकती तितलियों को
स्क्रीन पर तैरते हुए…
कभी तितलियाँ
बदल लेती हैं
अपने रंग
बन जाती हैं गिद्ध
और कभी लगती हैं
बिच्छू जैसी…
ज़हरीला डंक मारने को तत्पर।
सोचता हूँ—
क्या इनके पीछे
कोई चेहरा भी है?
किसकी फ़ौज हैं ये—
हमेशा
तैयार बर तैयार?
लेकिन—
कुछ ऐसा तो नहीं
कि मैं भी हूँ
ऐसी ही फ़ौज का
एक सिपाही।
यह सवाल
मेरा भी है—
मुझसे।
…………………
सुन्न साए
सुंदर आदमी से
सुंदर बात की
कामना करनी
सहज ही है,
क्योंकि दर्पण तो
कान में
फुसफुसाता है
ऐसे ही।
छाया भी क्या
खोलेगी नहीं
अपनी ज़बान?
लेकिन साए
चुप ही हैं,
सदमे से सुन्न हैं —
या मूक हैं,
जैसे उनके
कुछ
समझ में
आता ही न हो।
शुद्धता का ज़िक्र भी
सुंदर लोग ही
करते हैं।
उस बिखरे हुए बालों वाला
फुटपाथी ताकता है
अपनी कुरूपता —
हर रोज़।
लेकिन दर्पण
जो है
उसके बस्ते में
तिड़क गया है —
तो, फुसफुसाएगा, कैसे?
देखता है
कि सुंदर लोग भी
चीखते हैं
उसी के जैसे —
लेकिन उनके कानों तक
पहुँचती ही नहीं कभी
फुटपाथी की
पुरज़ोर बतकही।
यह भी शायद
असहज नहीं है
खुशहालों की
दुनिया में।
सुंदरता के पेड़
रोशनी में नहीं
अँधेरे में जागते हैं —
पर यह सच
बाहर तक
आता नहीं।
जब सुंदर
और असुंदर
दोनों ही हैं
क्षणभंगुर —
तो इन्हें धिक्कारते हो
क्यों?
…………………….
मेरे खून में लथपथ नीर
मेरे खून में लथपथ नीर
अभी-अभी छलका है
दहनी आँख से
एक आँसू।
शहर के बीचों-बीच
दरिंदगी ने घोंप के खंजर
लहुलुहान कर दी है
मोहब्बतें बिखेरती
फिज़ा।
संवेदना है — या है सिर्फ आदत?
जो शून्य में से उतरा
खून में लथपथ है नीर—
घबरा गया है
अपने ही ज़ख्मों से
जो सिसकता है
हर दिन — हर घड़ी
मेरे अंतःकरण के किसी कोने में।
कभी भूलता नहीं है मुझे
वह ज़ालिम मंज़र
जो दौड़ पड़ता है
मेरे जेहन के जंगल में
सहमे हुए बच्चे सरीखा —
और गिद्ध बन
नोचने लगता है मुझे
फिर भी
क्यों बेखबर हूँ
……………………
प्रेम – निवेदन
अक्सर —
उसकी भूरी आँखों में
इक ख़ास
निवेदन रहता है —
खून से लिखी हो चिट्ठी, जैसा
उसकी नज़रों में
कुछ बहता है।
और मेरी तरफ़,
ख़ामोशी से,
चोरी-चोरी से
उछालती भी है,
शायद छुपाकर —
जैसे आग्रह कर रही हो
मुझसे।
कह रही हो
कोई धड़कन उसकी,
कि आओ,
कुछ पल साथ जी लें;
ज़िन्दगी की कड़ी धूप में
साथ-साथ चलते,
और बैठ,
पीपल की ठंडी घनी छाँव में —
सुस्ता लें,
बिंद-झट।
लेकिन मैं हूँ कि
उसके निवेदन के
एहसास से अनभिज्ञ —
जैसे होऊँ कोसों दूर, उससे…
ख़ुद से।
अपनी हस्ती की
मुरदगाह को
खोदने,
जानने,
पहचानने में ही—
व्यस्त;
उसके निःशब्द निवेदन की
मधुर आवाज़ से
बेख़बर,
और अपने मन की
अजीब घुटन तले
दबा हुआ—
अपने इर्द-गिर्द
मोटी-मोटी दीवारें
खड़ी करने में लगा हूँ।
लेकिन ऐसा लगता है
कि उसका यह निवेदन है जो…
मुझको,
अपने आप में ही
संघर्ष जैसा है —
शायद…कुछ —
उसके लिए —
बिल…कुल व्यर्थ।
और उसकी
भूरी आँखों की
भूरी-भूरी मुस्कान की—
सियाही से लिखा
मुहब्बत में भीगा निवेदन-पत्र —
मेरे एहसासों के….
डाकख़ाने तक
शायद ही…
कभी पहुँचे।
……………….
याद की ऊष्मा
कितना भी उलझा रहूँ
भागदौड़ की इस वहशत में,
कितना भी सताए
खुदगर्ज़ जीवन की तनातनी,
और रोज़मर्रा की ये उलझनें—
तू…
तेरी याद
हमेशा,
हर पल,
घिर आती है चित में
नमी की चादर जैसे।
अंगड़ाई लेती है याद,
जैसे बारिश की बूँदें
घुलती हों
आकाश की ज़बान में।
तेरे मनमोहक चेहरे से
उड़कर आते हैं आज भी
मीठी यादों के पुष्प,
और समा जाते हैं
ख़ुशबू बनकर
गहरे तक मेरे।
विश्वविद्यालय की
सूनी सड़कों का
मंज़र कभी नहीं भूलता
मुझे।
यहाँ गुलमोहर के
ब सूखे पत्तों पर
चलते थे हम,
और वो टूटने लगते थे,
आहें भरते,
तेरे पाँव तले।
मुहब्बत में डूबे
तेरे कदम…
कितने बे-ख़बर होते थे!
और हमारे बीच की पदचापें
कितनी मौन होती थीं—
धीमे से टकराती हुईं
हमारे दिलों की
किन्हीं रमणीक वादियों में!
सुर्ख़ बोगनविलिया की
वो झाड़ियाँ —
जिनके पास
तू बैठ जाती थी
सटकर मुझसे,
बहुत बहुत क़रीब…
इत्र था वो, या
तेरे बदन की अपनी बहर—
एक पागल महक लेकर,
जो उड़ आती थी मेरी तरफ़,
छू जाती थी
मेरे एहसास की पंखुड़ियाँ।
मुलाकातों के नक्श
यूँ उभर आते हैं जेहन में,
जैसे सरसों के खेत में
अचानक आ खिलती है
धूप-सी चमक।
मुझे कभी भूलते नहीं
मिलन के
वो ख़ूबसूरत लम्हे—
जो पल-भर में बदल देते हैं
मेरे मन का रंग।
और मेरा दिल हो जाता है
उज्ज्वल—
रात में चाँदनी हो जैसे।
तुम कहीं भी हो,
लेकिन भीतर कभी भी
धीमी नहीं पड़ती
तुमसे मिलने की लपट।
दिल में सुलगती आग है—
और मैं यादों की आँच पर,
पकता हुआ,
हौले-हौले,
अपनी ही ऊष्मा से
पिघलने लगता हूँ।
……………..
तौर तरीके
उन्हीं जैसे हैं
जो पिस्तौल और कट्टे
रखते हैं कपड़ों में
छिपाकर।
हम रखते हैं
क़लमें
कमीज़ और कुर्ते
की जेब में।
हमारे गिरोह नहीं
गुट हैं संघ हैं।
शब्द चित्र लिखते हैं
प्रशंसा में क़सीदे पढ़ते हैं
एक दूजे के लिए।
गिरोह तो साधारण
अपराधियों के होते हैं।
हम शालीन हैं।
हथियार भी नये हैं
लैपटॉप
कंप्यूटर
और मोबाईल।
जैसे उनके पास होते हैं
रॉकेट लांचर
मशीन गन
आरडीएक्स
ड्रोन।
हम भी हैं वफादार
उनके ही जैसे
अपने गुट के लिए।
मारते नहीं
वध कर देते हैं
बिल्कुल वैसे ही
उन्हीं की तरह।
नियम हैं
हर गिरोह के जैसे होते हैं।
गद्दारी के लिए
वफादारी के लिए
और
बीच बचाव वाले भी।
शब्दों की ही
हम सुपारी देते हैं
फिरौती मांगते हैं।
हां, शब्द थोड़े सभ्य रहते हैं
संसदीय।
हमारे शब्द वाण
न लिखने योग्य छोड़ते हैं
न कहीं
छपने योग्य।
हम अपने प्रतिद्वंद्वी के
मन का वध करते हैं
थोड़े अलग ढंग से।
विस्तार से चर्चा करेंगे
फिर
किसी और दिन।
- पंकजेश्वर, ब्राम्पटन, कनाडा
