Sunday, May 31, 2026
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विश्व दीपक त्रिखा का लघुकथा संग्रह ‘मेरी झंड ज़िन्दगी’

 

मेरी झंड ज़िन्दगी – लघुकथा संग्रह, लेखक – विश्व दीपक त्रिखा… प्रथम संस्करण – 2025, मूल्य – ₹350/-

पृष्ठ संख्या – 116, प्रकाशक – विपिन पब्लिकेशन, रोहतक-124001, हरियाणा, मो. +91  9355674175

पुस्तक की भूमिका में वरिष्ठ रंगकर्मी विश्व दीपक त्रिखा लिखते हैं – “माफ़ी मांगता हूं उन किरदारों से, जिनके बारे में मैंने इस पुस्तक में लिखा है। हालाँकि किसी का भी नाम नहीं लिखा और कोई जान भी नहीं पाएगा कि किसके बारे में लिखा है… मगर हाँ, अगर वे ख़ुद पढ़ेंगे तो ज़रूर पहचान जाएंगे। उम्मीद करता हूं कि वे इसे अन्यथा नहीं लेंगे और मुझे माफ़ कर देंगे… दुनिया में प्यार ही प्यार बांटेंगे।”

उनकी पुस्तक के बारे में पढ़िये सुधीजन क्या कह रहे हैं….

‘मेरी झंड ज़िन्दगी’ एक नाट्यकर्मी के 70 सालों के सघन अनुभवों का स्पष्ट एवं खुला लेखा-जोखा है। आमतौर पर हम सब की ज़िन्दगी में कुछ ऐसे वाक्यात होते हैं, जो लंबे समय तक ज़हन में रहते हैं और कहीं न कहीं हमारी सोच, हमारे व्यवहार को प्रभावित भी करते हैं। बेशक इन में से बहुत सारे अनुभव बेहद व्यक्तिगत होने के साथ-साथ समाज के तय मानदंडों के विपरीत भी होते हैं, जिन्हें सार्वजनिक करने का हौसला हर किसी में नहीं होता। विश्व दीपक त्रिखा ने ख़ुद पर व्यंग्य करते हुए इन्हें सबके सामने खोल देने का साहसपूर्ण काम किया है।

  • अविनाश सैनी, संपादक

विश्व दीपक त्रिखा हरियाणा के सबसे सीनियर रंगकर्मी हैं, लेकिन कहानी लेकन में यह उनका पहला प्रयास है। हल्का-फुल्का व्यंग्य लिये ये रचनाएं उनके जीवन की वे घटनाएं हैं, जो दिल को चीरती भी हैं और कुछ ना कुछ संदेश भी देती हैं। सच में, ऐसी बहुत सी घटनाएँ मेरे जीवन में भी घटी हैं, पर समय की कमी के चलते उनको पन्नों पर नहीं उतार सका। त्रिखा जी ने यह काम करके नये उभरते कलाकारों को एक राह दिखाई है।

  • यशपाल शर्मा, स्नातक, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय एवं विख्यात अभिनेता।

विश्व दीपक को मैं तब से जानता हूं जब वह रंगमंच की दुनिया में एक सशक्त हस्ताक्षर के रूप में अपनी जगह बना रहे थे। अब उनकी सृजनशील ज़िन्दगी में लघुकथा-विधा ने अपनी सशक्त दस्तक बिछाई है। इसी मध्य उनका एक नाटक, किस्सागोई भी चर्चा में आ चुका है। विश्व दीपक ने लेखन, सृजन और मंचन के क्षेत्र में एक पूरे कालखंड को प्रभावित किया है। प्रतिभी कभी-कभी कुण्ठा की संकरी गलियों से भी निकलती है, लेकिन उसकी गुणवत्ता एवं दमक कभी कम नहीं होती।

  • डॉ. चन्द्र त्रिखा, निदेशक – उर्दू प्रकोष्ठ, हरियाणा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी

त्रिखा जी ने अपनी पुस्तक में अपने उपर व्यंग्य करने का कठिन काम पूरी बेबाकी से कर दिखाया है।  वे अपनी आलोचना को पूरे साहस एवं खुले दिल से स्वीकार करते नज़र आते हैं। ऐसा काम कोई सच्चा व्यक्ति ही कर सकता है। उनकी ये स्वकारोक्तियाँ हँसाती हैं, गुदगुदाती हैं लेकिन साथ ही साथ सोचने को मजबूर भी करती हैं। इतनी सच्ची और विविधतापूर्ण लेखनी अब कम ही देखने को मिलती है। एक आनन्ददायक और पठनीय पुस्तक।

  • अनिल गोयल, पत्रकार एवं नाट्य समीक्षक, अतिथि संपादक, रंग प्रसंग (राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय)

इस पुस्तक की कहानियां त्रिखा जी की कलम से निकली कुछ सच्चाइयां हैं, जिनको पढ़कर कुछ लोग असहज हो सकते हैं, कुछ आत्मसात भी कर सकते हैं। मैं भी बहुत बार उनसे असहमत रहा हूं, पर इसके कारण मेरे दिल में उनके प्रति सम्मान कभी कम नहीं हुआ। इन छोटी-छोटी, मीठी कड़वी यादों को दीपक जी ने साहित्यिक रूप दिया है। सही कहूं, तो यह पुस्तक मानवीय व्यवहार का एख दस्तावेज़ है, जिसने गाहे-बगाहे हमें जीवन के बारे में सूचित किया है। पद और कद के बदलते हुए स्वरूप को इतनी सहजता और शिद्दत से दीपक जी ही लिख सकते हैं।

  • जगबीर राठी, पूर्व निदेशक – युवा कल्याण विभाग,  महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक
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